रविवार, 8 फ़रवरी 2015

पखवाड़े की कविताएँ

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क़ैस जौनपुरी


आज ‘रोज़ डे’ है

तुमने सुना?
आज रोज़ डे है

पहला रोज़ जब मैंने तुम्हें दिया था
तब तुमने कहा था
"कितना प्यारा है ये क़ैस"
और तुमने उसकी पंखुड़ियों को
अपने हाथों में समेट लिया था

मैंने ठीक उसी वक़्त
तुम्हारी आँखों में कुछ देखा था
एक चमक
जो तुम्हारी आँख नम होने से आई थी
और मेरे एकटक तुम्हारे चेहरे को देखने पे
तुम मुस्कुराई थी

मुझे याद है वो भी दिन
जब मैंने कहा था
"बस ये रोज़ ले लो. और दफ़ा हो जाओ मेरी ज़िन्दगी से."
तुम्हें भी तो याद होगा
तुम मुझे सड़क पे अकेला छोड़के चली गयी थी
मगर मेरी ज़िद के आगे हार गई थी
और घर जाके वापस मिलने आई थी
मैं वही रोज़ लिए
तुम्हारे घर के सामने वाली गली में खड़ा था
तुम आई तो मैंने पूछा था
"क्यूं ठुकरा रही हो मुझे?"
इस बात पे तुम रो पड़ी थी
और मेरी उँगलियों को
अपनी उँगलियों से जकड़ लिया था तुमने
और तुमने कहा था, "मैं तुम्हें ठुकरा नहीं रही हूँ क़ैस. मैं मज़बूर हूँ."

और फिर उस दिन मैंने तुम्हारे रोते हुए होंठों को छुआ था
तुम्हारे होंठों का ज़ायका अभी तक मेरे होंठों पे है...

उस दिन रोज़ डे तो नहीं था
लेकिन आज रोज़ डे है
सुनके, वो दिन याद आ गया
और आज तुम्हारी भी याद आ गयी
00000000000000000000000.

राजीव आनंद

हाय! मर रही संवेदना

हाय! मर रही संवेदना
बेहोशी में आखरी सांस लेती

पिता ने पकड़ लिया है खटिया
बेटे व्‍यस्‍त हैं जाकर हटिया
मां बूढ़ी हमेशा रहती है रोती
बहू खा-पीकर मौज में सोती

हाय! मर रही संवेदना

बेटा मगन है धन कमाने में
नये धनवान में अंहकार बहुत है
धन ही मन पर करता है राज
यही है इक्‍सवीं सदी का समाज

हाय! मर रही संवेदना
बेहोशी में आखरी सांस लेती

पिता के मरने के पहले ही
बेटे ने मुंह में गंगाजल डाला
चमचमाती कार में बैठ कर
अंतिम संस्‍कार का शॉपिंग कर डाला

हाय! मर रही संवेदना
बेहोशी में आखरी सांस लेती

तेरा वजूद

चलना सिखा दिया जब पिता ने
रौंदने लगे तुम अरमानों को
सत्‍य है ये खामोश रहते है पिता
मत भूल तू नैतिकता के फरमानों को

तुझे दुनिया में लाकर
पिता ने दिखलाया है रास्‍ता
अपने निर्लज्‍ज स्‍वार्थों की पूर्ति में
भूल गया पिता से है कोई वास्‍ता ?

पिता गर आज नाकाम है
उनकी देख-भाल आज तेरा काम है
इससे महत्‍वपूर्ण कुछ हो नहीं सकता
तेरा वजूद है पिता, तू इन्‍हें छोड़ नहीं सकता !

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंडा
गिरिडीह-815301, झारखंड
000000000000000000000.

आचार्य बलवन्त


शहीदों के प्रति
 
क़ब्र पर जिनके आँसू बहाया गया।
जिन्दगी भर जिन्हें आजमाया गया।
जान जिसने लुटा दी वतन के लिए,
सिरफ़िरा कल उन्हें ही बताया गया।
फ़ख्र से गीत जिनके पढ़े जा रहे,
विष उन्हें कल यहीं पर पिलाया गया।
सिलसिले वायदों के चले आ रहे,
क़र्ज़ फिर भी न उनका चुकाया गया।

0000000000000000000.

•    डॉ. रामवृक्ष सिंह


       
दिल्ली का दर्द

दिल्ली की गद्दी के निमित्त मच गया समर में घमासान।
हैं निकल पड़े सब महाभट्ट सन्नद्ध चतुर्दिक शस्त्र तान।।

है कहीं कमल रक्ताभ वर्ण तो कहीं प्रदर्शित वरद हस्त।
है कहीँ आदमी आम खड़ा झाड़ू कर में लेकर प्रशस्त।।

दिल्ली में है इस बार बड़ा दंगल, मोरचा तिकोना है।
हैं व्यग्र ठोकते ताल मल्ल, हो जाय अभी जो होना है।।

दिल्ली की जनता जान रही, मंचित होता प्रसहन नवीन।
नट हैं अभिनयरत कई किन्तु हैं मुख्य पात्र तो महज तीन।।

दिल्ली शापित है सदियों से, सहती आयी सब ज़ोर-ज़बर।
नादिरशाही, मुगलिया दौर अँगरेज और फिर गणतन्तर।।

अब तलक यहाँ जो भी आया, जीभर छीना झपटा खाया।
दिल्ली के भाग्य बदलने का संयोग नहीं है बन पाया।।

माँ है दिल्ली, जो अपने ही बच्चों की उपेक्षा सहती है।
सिसकी ले-लेकर रोती पर, कुछ नहीं किसी से कहती है।।

है किस नेता का दिल ऐसा, दिल्ली की पीर समझ जाए।
दुःख-दर्द बाँट ले दिल्ली का, दिल से दिल्ली को अपनाए।।

है सात फरवरी को आया जनता के हाथ पुनः अवसर।
इस बार चुनें प्रतिनिधि ऐसे, दिल्ली भी गर्व करे जिनपर।।
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शंकर लाल


चुनाव का कमाल
चुनाव का देखो कमाल
कोई निकला है गले में मफ्लर डाल
किसी ने बदल ली है अपनी चाल
किसी के बुरे है हाल
किसी की नहीं गल रही है दाल
चुनाव का देखो कमाल |
कोई आरोप लगा रहा है
कोई सफाई दिए जा रहा है
कोई छटपटा रहा है
कोई हार के डर से घबराह रहा है
कोई सपने दिखा रहा है
कोई जनता को अधिकार बता रहा है
मगर मतदाता को कुछ समझ नहीं आरहा है
क्योंकि वो सदियों से वादों के दम पर
हर बार ठगा जा रहा है
अभी के हालात देख कर और कन्फ्युजा रहा है
क्योंकि गरीब नेता
दस लाख का सूट पहन कर आ रहा है
जबकि गरीब आदमी ठण्ड से मरे जा रहा है
कोई सौ- सौ चूहे खाकर
चल रहा है हज की चाल
चुनाव का देखो कमाल
क्या हो गए है बेचारे नेताओं के हाल
चुनाव....
शंकर लाल , इंदौर
000000000000000000000.

शंकर मुनि राय "गड़बड़"


भइया फागुन आई गईल l
चलल बासंती फेंक दुपट्टा अमवां बउराईल
भौजी देंह अँइठली भइया फागुन आई गईल l
गांठ परल तीसी के मन में माथ भइल भारी
बिहँसत निकलल सरसोइया भी मारत सिसकारी l
बात बुझाइल तब, जब लउकल मंगिया पियराईल
भौजी देंह अँइठली भइया फागुन आई गईल ll
प्रीत के पाहुन भंवरा बनि कर के लगले मंडराए
याद परल बीतल जिनिगी, सासो लगली मुसुकाए
सरहज नयन चलवली, सउँसे देंह छुवाय गईल
भौजी देंह अँइठली भइया फागुन आई गईल ll
पत्नी छान तुरावे रोजे, रोज बढ़े परेशानी
पाठ करत पत्नी चालीसा बीतल कुल्ह जवानी
"गड़बड़" बात बनल जब घर में साली आई गईल
भौजी देंह अँइठली भइया फागुन आई गईल ll
000000000000000000000.

जय प्रकाश भाटिया


माँ संवेदना है

माँ संवेदना है भावना है अहसास है
माँ जीवन में फूलों भरी ख़ुशबू सी आस है
माँ तुझे हम सबका सादर नमन अर्पित है
आपकी छाया बन हम आज भी गौरवान्वित है ।

माँ ही  हमारी जीवन दाता  है,
माँ ही हमारी भाग्य विधाता है,
माँ के पालन पोषण से ही है--
हमारा हुआ है पहला विकास,
माँ ही है  हर बच्चे का पहला विश्वास,
माँ ही होती है जीवन में प्रथम गुरु-- और
माँ के आशीर्वाद से ही पूरी होती है ,
--जीवन की हर आस . 

माँ का ह्रदय वात्सल्य से भरपूर है,
ममतामयी हाथों में ईश्वर का नूर है,
माँ के चरणो में ही स्वर्ग का वास है,
माँ की सेवा ही प्रभु की सच्ची अरदास है,

माँ की याद कभी दिल से नहीं जाती है ,
उठते बैठते बस माँ ही याद आती है 


उस दिन खुल गए थे स्वर्ग के द्वार--
देवदूत आ गये माँ का करने उद्धार,
लेकर आये थे उस दिन ब्रह्मा जी का निमंत्रण
हाथ जोड़ माँ को ले गए अपने साथ उसी क्षण ,

हम बेसुध से बेबस और निष्प्राण
अश्रुओं की धारा  लिए रह गए अनजान,
आज ही तो माँ ने गुरु दर्शन किये थे--
आज ही माँ ने मंदिर में पूजा की थी,
संध्या में तुलसी पर दीपक जलाया था
पिताजी को भागवत का पाठ  सुनाया था
अपने पोते को प्यार से खाना खिलाया था,
एक पल में ही सब कुछ ढह गया --
और जीवन का एक और अध्याय --
आंसूओं की सरिता में बह  गया।
आज भी हमारे लिए  सर्वोपरि है माँ का प्यार,
माँ के आशीष से ही है हमारा यह घर संसार, --

 

000000000000000000000.

विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र"

सड़क  !

सड़क क्या है मुझसे पूछा गया
मैने सोचा ,  सड़क दीनू की , उसकी घरवाली की रोजी है
उसके बच्चे का बिछौना है , रोटी है
सड़क रामू के पसीने में भिगोई हुई गिट्टी है
सड़क सपने हैं धन्नो के जो उसे ले जायेंगे परियो के देश में .
सड़क खेल का मैदान और क्रिकेट की पिच है , स्कूल के सामने
सड़क आंगन है , सड़क हाट है गांव में . 
सड़क विकास की यात्रा है .

सड़क बनी काली लंबी सड़क
सड़क का बिल बना , बिल से निकला
ठेकेदार का ट्रक .साहब हो गये कार पर सवार
छोटे साहब मोटरसाइकिल और बड़े बाबू स्कूटर पर .
सड़क चल निकली.
 
अब जब जब होती है सड़क की मरम्मत
रामू के पसीने से तर गिट्टियां
भर दी जातीं हैं गढ़्ढ़ो में . दीनू को मिल जाती है रोजी
ठेकेदार एक और ट्रक ले लेता है
नये रंग में रंग जाती है साहब की कार
छोटे साहब और बड़े बाबू की गाड़ियां चमक जाती हैं .
गाड़ियां फिर दौड़ने लगती हैं  बेतहाशा , धन्नो के सपनो पर .
सड़क फिर बन जाती है
गढ़्ढ़ो का ढ़ेर .
 
--
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर


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अंजली अग्रवाल


आयी मेरी जिन्‍दगी में एक नन्‍ही जान...
बनके मेरे सपनों का जहान......
इन आँखों को रोशनी आज मिली है...
जैसे जीने की वजह आज मिली है...
इस नन्‍ही सी जान को जन्‍म मैंने दिया हैं,
यही सोच कर इतराती हूँ मैं...
ये एहसास दुनिया से परे है जिसे महसूस कर मुस्‍कुराती हूँ मैं...
मेरे गमों को भूल चुकी हूँ मैं....
जैसे नींद से उठी हुँ मैं...
मुझे मेरी पसंद नापसंद याद आने लगी हैं...
बचपन की वो सुनहरी यादें गुनगुनाने लगी है...
जिन्‍दगी के सबसे खूबसूरत पल को जी रही हुँ मैं....
मानो नदी में गोते लगा रही हूँ मैं...
चेहरे पर बस हँसी हैं.....
आँखों में इसे पाने की नमी है...
मेरी काँटों भरी जिन्‍दगी में एक फूल खिल गया..
जिन्‍दगी को एक मकसद मिल गया..
मानो जिन्‍दगी में रंगों की होली आयी...
मेरी जिन्‍दगी में एक नन्‍ही जान आयी...


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