बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

हर्षद दवे का लघु आलेख : वर्तन परिवर्तन

वर्तन-परिवर्तन -

हर्षद दवे.

२. ज्योत से ज्योत...

पुरानी फिल्म 'नया दौर' और नई फिल्म 'लगान' में एक जानदार मेसेज है : मुश्किलें चाहे कैसी भी हो पर उन का सामना करने की ताकत 'एकता' में होती है. अगर साथी हाथ बढाते हैं तो कोई काम मुश्किल नहीं रहता. पेट्रोल से चलती टैक्सी तांगे के आगे न निकल पाएं या गांव की क्रिकेट टीम अंग्रेजों की टीम से मुकाबले में बेहतरीन प्रदर्शन करे यह भी संभव है!

अधिकतर जीत या सफलताएं सामूहिक कोशिशों का नतीजा होतीं हैं, यही तो मानवजाति की सही दौलत है: मेलजोल, एकता, भाईचारा, सपोर्ट!

पर क्या हम इस बात पर सजग हैं? गुजराती कहावत के मुताबिक़: 'दिया तले अँधेरा!' चाहे कितनी भी रोशनी फैलाता हो एक दीपक, परन्तु उस के नीचे तो अँधेरा ही रहता है. परन्तु अगर उस दिए के पास दूसरा दीपक जला लिया जाए तो उस की रौशनी से दोनों दीपक के तले रौशनी फ़ैल जाएगी! अँधेरा नहीं रहेगा. यदि ऐसी दीपमाला बनाई जाए तो अन्धकार की क्या मजाल है कि रोशनी के सामने टिक पाएं! कृपया इसे समझें! दिया प्रतीक मात्र है, उसे जलाने का मतलब है किसी की सहायता करना. यदि हम सब तय कर लें कि हम किसी एक आदमी की सहायता करेंगे तो मेरा विश्वास है कि इस से प्रेरित हो कर कल कोई और किसी की सहायता करने के लिए अवश्य आगे आएगा. इस से हम इस धरती पर जीवन को अधिक सुन्दर, सुखमय एवं समृद्ध कर पाएंगे!

तो फिर देर किस बात की?

ज्योत से ज्योत जगाते चलो!

हमारे बीच जो विरोध, विवाद, विचारभेद या उठा-पटक और वेदना-दुखों का अँधियारा फैला हुआ है उसे भाईचारा, प्रेम, साथ व संवेदना के जरिये ही दूर किया जा सकेगा. इस के फायदे अनगिनत हैं. इस से किसी के जीवन का अँधेरा तो दूर होगा ही साथ साथ सकारात्मक सोच की रोशनी फ़ैलाने का आनंद व् संतोष भी तो मिलेगा!

पते की बात यह है कि हम भी एक दीपक ही हैं और हमें भी किसी दिए की ज्योत से ही प्रकाशित किया गया है, अतः हमें चाहिए की हम भी प्रेम व करूणा के दीप रोशन करते रहें!

====================================================

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------