बच्चन की हास्य व्यंग्य कविताएँ

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हरिवंशराय बच्चन की चुनिंदा हास्य-व्यंग्य कविताएँ

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दार्शनिक और कवि

दार्शनिक हो?
तुम्हें यह सोहता है
कि पंकज को न छुओ,
उसके पास भी न जाओ,
बस उसकी बास में बसो

कवि हो?
तुम्हें यही सोहता है
कि पंकज के पास ही न आओ,
उसको छुओ ही नहीं,
उसके पंक में भी सनो-धँसो

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चचा, चचा, चचा,
चचा में अब कुछ नहीं बचा;
झुके हुए सलाम हैं
चची के गुलाम हैं

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दो रूप : दो सलूक
ओ पिता जी!
आपको मेरा नमस्कार बारंबार
जहाँ तक आप जनक हैं

पालक, पोषक, शिक्षक, प्रगति के प्रेरक हैं,
( बड़ा खेद है कि आप कुछ और भी हैं)
जहाँ आप
सड़ी-गली रूढ़ियों के प्रतिनिधि हैं,

प्रतिगामी पोंगापंथियों के ठेकेदार,
( और कुछ और भी जो मुझ से न कहलाइए
वहाँ आपको मेरी ठोकरें
एक – दो – तीन – चार !

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परिवार नियोजन

आबादी बढ़ गई हे,
घटनी चाहिए,
सब जानते हैं;
पर जवानों को बच्चे न पैदा करना चाहिए,
इसे हम बूढ़ों का षड्यन्त्र मानते हैं ।

नये न आएँ
पुराने डटे रहें;
दुनिया की बुढ़िया--
ढीली-डाली-ढली--
करिती, खांसती, खरवारती चली जाए;
या यह अच्छा होगा
कि दुनिया रहे कसी-
युवतियाँ चलें तन के,
युवक सिर उठाए, सीना फुलाए,
बच्चे उछलते-कूदते;
गली-गली को गुँजाए उनका उल्लास,
उनकी हँसी ।

सरकार ऐसा नियम क्यों न बनाए
कि जो जी-भर जीवन जी-भोग चुके हैं,
और अब चुके हैं,


झुके हैं, चुचके हैं
जो बूढ़े-खड्डूस हैं,
नामूस दकियानूस हैं,
बेकार बकवासी बेमतलब क्रोधी हैं,
हर नई बात के नपुंसक विरोधी हैं,
भारत सरकार ऐसा विधेयक क्यों न पास कराए,
कि वे सब- पचास के ऊपर-
एक दिन
अफीम की पुड़िया खाएं और सो जाएँ ।
और हाँ, फिर न उठें, जम्हाएँ ।

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प्रायश्चित

महादेवी और पंत
छत पर से पुकार-पुकारकर कहते हैं
कि देश की आबादी बढ़ गई है
तो गुनहगार हम नहीं हैं ।

पर कुछ उनको
गुनहगार समझते हैं ।
(क्यों?
अनुमान वे भी कर सकते हैं ।)
गो उनके लिए
प्रायश्चित करने वाले भी कम नहीं हैं ।
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दो नंगे


पूछते हो,
तुम उसके साथ
नंगे नहाते हो,
क्या मजा पाते हो?

मजा यही पाता हूँ
कि वह मेरी मैल छुड़ाता है,
मैं उसकी मैल छुड़ाता हूँ ।

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शब्दों का सरोपा

कवि जी महाराज,. '
शब्दों का सरोपा उतारिए,
शीशे में निहारिए;
सब हैं सो आप हैं,'
आप क्यों समझते हैं
आप ही बड़प्पन की माप हैं?
सरोपा आपका किसी से छोटा भी हो सकता है,
इंसान आपका किसी से भी छोटा नहीं ।

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नए-पुराने
पुरानो, पुरानी कहो,
नई सुनो ।
नयो, नई कहो,
पुरानी सुनो ।

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कवि और विदूषक
कवि!
तेरे ऊपर उठने का चरम बिंदु है
नबी ।
तेरे नीचे गिरने की अंतिम सीमा है
विदूषक !
बेशक ।

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नौ सौ नब्बे नबी

गांव-गांव में
नगर-नगर में
पैगंबर उठ खड़े हुए हैं
इतने
पैगंबरी बन गया
नामानाम ( नाम + अनाम भी) कमाने का
दुनिया में अच्छा खासा पेशा ।

ऊर्ध्व बाहुओं का जंगल,
शब्दों का दंगल!

हेर-फेरकर
कुछ दोहराते-तेहराते हैं
बोल गए जो बरसों पहले
योरुप, रूस और अमरीका;
अदल-बदलकर
कुछ करते हैं
उनके ऊपर मौलिक टीका,
कुछ जिसको धन कहते,
कुछ उसको ऋण कहते,

  
औ’ आपस में कट-कुटकर
जो कुछ बचता है
वह लगता है
शोर-समर्पित शून्य सरीखा ।

गरियाते हैं
नौ सौ नब्बे नबी
परस्पर एक-दूसरे को
गरियाते और गिराते,
फरियाता है नहीं देश को
कोई रक्षक,
कोई प्रेरक,
दिशा विधायक
कोई मंगलमय संदेसा!

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दाँत का दर्द

कुछ ऐसा हुआ
जिस रात प्रेयसी आई
उसी रात
अक्कलदाढ़ में दर्द उठा;
उसकी मृदुता,
उसकी कठोरता,
किसी ने मुझे न छुआ!

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दो भेंट

जिन्हें देखकर कभी
हो गत था मैं पागल,
अक्ल
उन्हीं को देख
आज आ गई मुझे है ।

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मोहभंग
''रहे न काहू काम के तुम चूतिया 'नवीन' ।

उन दिनों तो
हर किसी नवयौवना के प्रति
समर्पण के लिए
असुर-विकल
मेरा हिया था;
और अब
चालीस बरसों बाद
करके याद
घटनाएँ पुरानी
मुसकराता मौन
बैठा सोचता हूँ,
उस समय
कितना बड़ा मैं चूतिया था!

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मुसीबत
मुसीबत पड़ी
तो रोया था;
ज्यादा मुसीबत पड़ी
तो चुप हो गया था;
बहुत ज्यादा मुसीबत पड़ी है
तो हंसता हूँ
आखिर दुनिया में बसता हूँ ।

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कविता और रोटी ( १)
कविता ने.
मुझे भी रोटी नहीं दी;
उसने भूखों नहीं मारा,
यही क्या कम गनीमत की ।

कविता और रोटी ( २)
कविता से
तुम भई रोटी नहीं पाओगे.
पर कविता पढ़ोगे
तो रोटी सलीके से खाओगे ।

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प्यास-मिठास

प्यासा था
एक कुएँ पर गया,
पानी बहुत मीठा लगा ।

बहुत दिन बाद फिर उसी कुएँ पर गया,
पानी मीठा नहीं लगा ।
पानी बदल गया?
नहीं ।
प्यास बदल गई;
मिठास पानी में नहीं,
प्यास में थी ।

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ईश्वर
उनके पास घरबार है,
कार है, कारबार है,
सुखी परिवार है,
घर में सुविधाएं हैं,
बाहर सत्कार है
उन्हें ईश्वर की इसलिए दरकार है
कि कृतज्ञता प्रकट करने को
उसे फूल चढ़ाएं डाली दें ।

उनके पास न मकान है
न सरोसामान है,
न रोजगार है
जरूर, बड़ा परिवार है;
भीतर तनाव है
बाहर बिखराव है,
उन्हें ईश्वर की इसलिए दरकार है कि
किसी पर तो अपना विष उगलें
किसी को तो गाली दें ।

उनके पास छोटा मकान है

थोड़ा सामान है,
मामूली रोजगार है,
मझोला परिवार है,
थोड़ा काम, थोड़ी फुरसत है,
इसी से उनके यहाँ दिमाती कसरत है ।
ईश्वर है - नहीं है
पर बहस है,
नतीजा न निकला है,
न निकालने की मंशा है,
कम क्या बतरस है ।

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पैमाना

जिसने बहुत किया
उसने कहा मैंने कुछ नहीं किया ।
जिसने कम किया.........
उसने कहा मैंने बहुत किया ।
जिसने कुछ नहीं किया'
उसने कहा मैंने सब कुछ किया ।

काम ने अपना पैमाना छिपाया,
आदमी ने बता दिया ।

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कविता और कविता

चालीस बरस पहले एक कविता पढ़ी थी;
आज उसे फिर पढ़ता हूं:,
लगता है पहली बार पढ़ रहा हूं ।

चालीस दिन पहले एक कविता पढ़ी थी;
आज उसे फिर पढ़ता हूँ,
लगता है पुराना अखबार पढ़ रहा हूँ ।

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(बच्चन के काव्य संग्रह - 'कटती प्रतिमाओं की आवाज़' से साभार)

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1 टिप्पणी "बच्चन की हास्य व्यंग्य कविताएँ"

  1. बच्चन जी के क्या कहने...कुछ कहना उनको दिया दिखाना मात्र है...

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