बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

राजेश कुमार पाठक की कहानी - बूट पॉलिश

बूट पॉलिश

रोहित एक गरीब लड़का था। चौदह साल की उम्र होते-होते उसके उपर मां-बाप का स्नेहिल साया उठ चुका था। अब वह और उसकी छोटी बहन किसी तरह अपनी जिंदगी आस-पड़ोस के लोगों की कृपा पर गुजारने को मजबूर हो गये थे। गांव का माहौल था। कोई शहरी संस्कृति थी नहीं। जीवनयापन के लिए गांव के लोगों द्वारा ही खाने-पीने, पहनने आदि में जाकर जो दिक्कतें उन्हें होती थी, उसे मिलजुल कर पूरा कर दिया जाता था। रोहित अपनी बहन रीना के साथ हर रोज स्कूल भी जाता था। मनोयोग पूर्वक दोनों पढ़ाई भी करते थे। पढ़ाई-लिखाई में वे दोनों भाई-बहन उतने तेज नहीं पर उतने भी कमजोर नहीं कि स्कूल के शिक्षक उन्हें भोंदू समझें। मजबूरियां ही ऐसी थी कि दोनों भाई-बहन भविष्य में पढ़-लिखकर छोटी ही सही पर क निश्चित आमदनी वाली सरकारी-गैर-सरकारी नौकरी प्राप्त करने की मंशा पालते हुए पूरी तन्मयता से पढ़ाई में जुटे रहते।

रोहित का मन नहीं मान रहा था। उसे हर रोज आस-पड़ौस के लोगों पर बोझ बनकर जीवन गुजराने में कई बार हीन भावनाओं का भी शिकार होना पड़ रहा था। वह इसी तरह ढ़ेर सारी बातें मन में लिए सो रही अपनी छोटी बहन को जगाया और मन की बात कह डाली।

पर भैया, आखिर ऐसा भी तुम कौन सा काम कर पाओगे कि घर में उतने पैसे आ जाएं कि हम दोनों को अपने ही पड़ोसियों पर बोझ ना बनना पड़े, रीना ने पूछा।

कुछ पैसे अगर कहीं से मिल जाते तो मैनें सोचा है कि बूट पॉलिश का समान बगल के शहर खरीद लूं और फिर सुबह और शाम वाली लोकल ट्रेनों के समय में लोगों के बूटों की पॉलिश कर हर रोज कुछ-न-कुछ रूपये कमा लाउं। क्योंकि बापू के जूतों को हर रोज साफ करते रहने से मुझे इस काम को बखूबी कर जाने में कोई परेशानी नहीं होगी। तुम्हें यह पता तो होगा ही कि जब मैं बापू के जूतों को बिना पॉलिश के ही इस कदर साफ कर देता था कि वे भी दंग रह जाते थे। कहा करते थे-'ऐसी चमक तो मोची के बूट पॉलिश से भी नहीं आ सकती थी', रोहित ने अपनी बहन के मन को टटोलते हुए कहा।

वह सब तो ठीक है भैया, पर इसके लिए भी दो-चार सौ रूपये तो चाहिए ही। पॉलिश, क्रीम, ब्रस और फिर उसके काठ के बक्से वगैरह के लिए। लोगों से तो रूपये मांगना ठीक नहीं। वे तो इतना ही रहम कर दे रहें है, वह कम थोड़े ही है ?

रीना कुछ अफसोस जताते कह गई। पर इतना कहते ही उसे अपने पिता के बटुए की याद आई। वह खुशी से उछल पड़ी। बोलने लगी-निराश मत हो भैया, बापू की थोड़ी बहुत बुरी आदतों पर उनके द्वारा किए जा रहे खर्चों से तंग आकर एक बार मां ने उनके बटुअे को ही घर में बेकार पड़े घड़े में छिपा कर रख दिया था। मां ने मुझसे कहा भी था कि मैं बापू को नहीं बताउं। मां भी तो भुलक्कड़ थी। मिल जाए तो शायद तेरे काम भर पैसे की जुगाड़ हो जाए।

देखो, देखो, ढूंढो-रोहित ने कहा।

रीना को वह बटुआ मिल चुका था। दोनों ने उस बहुए में पाए गए कुल 545 रूपये गिनकर निकाले। खुशी से झूम उठे दोनों।

रविवार का दिन था। सुबह-सुबह दोनों भाई-बहन बगल के बाजार से बूट पॉलिश के सारे सामान खरीद लाए। समान खरीदने एवं उसे घर लाने तक में उस पर किसी आस-पड़ौस के लोगों की नजरें नहीं पड़ी। घर से लेकर गए पुराने थैले में भर कर जो ला रहे थे।

अब रोहित हर रोज अपने गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर शहर के बीचों बीच स्थित रेलवे स्टेशन पर जाकर यात्रियों के बूट की पॉलिश करता, कुछ भी हो पर वह हर रोज 15 से 20 जूतों की पॉलिश कर ही देता था जिससे उसे सौ रूपये तक की कमाई हो जा रही थी अैर इस काम में समय भी दो घंटे से ज्यादा नहीं लगते थे। घर से निकलते, वापस होते एवं प्लेटफार्म पर बूट पॉलिश करते वह हमेशा सचेत रहता कि उसे कोई चिरपरिचित या फिर गांव के जान-पहचान के लोगों से ना भेंट हो क्योंकि वह जानता था कि अगर गांव के या फिर आस-पड़ोस के लोग उसे बूट पॉलिश करते ेख तो उनके उच्च जाति के होने के चलते सगे-संबंधियों की मानहानि होगी। पर स्थिति भी कुछ ऐसी थी कि वह इस काम को छोड़ना नहीं चाहता था। रोजी-रोटी का जो सवाल बन गया था। वैसे उसे पता था कि गांव के ही एक उच्च जाति के लोग कोलकाता में जूते का व्यवसाय करता था पर उसे तो लोग हेय दृष्टि से ना देखकर सम्मान से ही देखते थे। लोग उसके बूट पॉलिश के काम को भला गिरी नजरों से क्यों देखेंगे ? इतना कुछ होने पर भी वह अपने झोले में रखे बूट पॉलिश के सामान के उपर कुछ किताबें रख लिया करता था। जब कभी भी लोग आते-जाते पूछ भी बैठें या फिर झोले को देखना भी चाहें तो उसके उपर रखी किताबें ही नजर आए और फिर वह कह दे कि वह शहर के शिक्षक से ट्यूशन पढ़कर आ-जा रहा है।

समय बीतता गया। रोहित और उसकी बहन रीना दोनों खुश रहने लगे। बूट पॉलिश करने के बाद रोहित घर लौटकर रीना के साथ मिलकर दोंनो अपने लिए खाना भी बना लेते। आस-पड़ौस के लोगों को यह सबकुछ समझ में नहीं आ रहा था। तब रोहित ने लोगों से स्पष्ट कह दिया कि वह शहर जाकर शाम में दो-तीन ट्यूशन अपने से जूनियर लड़कों का पकड़ रखा है जिससे उसे कामभर पैसे मिल जाते है। अब लोगों पर वह बोझ बनकर भी नहीं रहना चाहता है। वैसे वक्त बेवक्त वह अपने पड़ोसियों से कुछ मदद मिल जाये उससे भी वह गुरेज नहीं करता था। कारण था कि कहीं उनकी भावनाओं को ना ठेस पहुंच जाए कि बुरे वक्त में जब जरूरत थी तो लोगों की सहानुभूति ली और अब जबकि उसकी स्थिति अपने बूते ठीक होने लगी तो उन्हें वह भूल गया।

जाड़े का मौसम था। रोहित सर पर चादर ओढ़े था। वह बूट पॉलिश के लिए अपने झोले से सामान निकाल ही रहा था कि एक व्यक्ति ने पूछा-बूट पॉलिश करोगे क्या ? कितने लोगे ? देखा तो उसका सिर घूम गया। क्लास में उसे सबसे अधिक चाहने वाले शिक्षक रामप्रसाद खड़े थे। क्या सोचते हो ? क्या बूट पॉलिश नहीं करोगे ? ट्रेन भी आने वाली है। हो सके तो जल्दी करो। अपनी पहचान छिपाये रोहित अपने गुरूजी के जूते को पॉलिश पूरी तन्मयता से कर डाली। जब रामप्रसाद ने पैसे के बारे में पूछा तो रोहित ने अपनी आवाज में थोड़ा भारीपन लाते हुए कहा कि वह पहली पॉलिश बिना कोई दाम लिए करता है। आपके जूतों की पॉलिश मेरी आज की पहली पॉलिश है। अतः मैं उसके कोई दाम नहीं लूंगा, रोहित ने स्पष्ट कह दिया। रामप्रसाद को यह बात समझ में नहीं आ रही थी कि कोई भी व्यक्ति तो अहते सुबह या फिर अपने शुरू के कामों में तो बोहनी के नाम पर कुछ-न-कुछ तो लेता ही है। यह तो पहली दफा ही मैं सुन रहा हूं कि कोई अपने शुरू के काम में कुछ नहीं लेता है। खैर, जैसी तेरी मर्जी या फिर जैसा तेरा वसूल। यह कहकर रामप्रसाद अपने गनतव्य तक ले जाने वाली ट्रेन के डब्बे में अपने लिए जगह बनाने में जुट गया।

इधर रोहित अपने गुरूजी के जूतों की पॉलिश करते वक्त मन-ही-मन गुरू भक्ति के सागर में आकंठ डूबता चला गया था। उसे आज असीम आत्मिक सुख की अनुभूति हो रही थी। देखते ही देखते सचमुच में उसके पास जूतों की कतार लग गई थी। आज उसे लग रहा था कि जल्दी से उन सारे जूतों में पॉलिश करने में भी लगभग आधे घंटे का वक्त और लग जायेगा परंतु यह भी सच था कि आज उसे और रोज से दुगनी कमायी भी हो सकेगी। शायद गुरू कृपा का असर हो। वह अन्य दिन कुछ वक्त इंतजार करने पर भी उतनी कमाई नहीं कर पाता था परंतु आज मानों बहुत ही आसानी से उसे अपना काम मिल गया और वह उसे निबटाकर जल्द ही घर वापस लौट सकेगा।

इसी बीच एक नवयुवक अनुनय करते हुए कि वह बहुत ही जल्दीबाजी में है, अगर हो सके तो उसके जूते की पॉलिश वह सबसे पहले कर दे। ग्राहकों ने रोहित के विनय पर उस नवयुवक के जूतों की पॉलिश उनसे पहले करने की इजाजत दे दी। तब रोहित ने उस नवयुवक को अपने जूते उतारने को कहा। नवयुवक ने जल्दी-जल्दी बताते हुए कहा कि उसे जूते उतारने की जरूरत नहीं। यूंही बिना उसे उतारे ही वह बूट पॉलिश कर दे। रोहित को यह सब कुछ अटपटा लग रहा था। गौर से जब देखा तो वह नवयुवक कुछ असहज भी महसूस कर रहा था। नवयुवक ने कहा-पॉलिश करने है तो करो वरना मैं चला। जूता नहीं उतारूंगा। रोहित भी थोड़ा अड़ा। कहा कि उन्हें जाने से किसने रोका है ? वह बिना पॉलिश कराये आ रही एक ट्रेन पर चढ़ गया। ट्रेन रूकी हुई थी। रोहित अपने बूट पॉलिश के काम को छोड़ उस नवयुवक पर नजरें गड़ाये रहा। वह देख चुका था कि वह कहां बैठा है। वह दौड़ा-दौड़ा रेलवे पुलिस के पास गया। अपनी शंका का कारण उन्हें बताया। पुलिस को सबकुछ समझते देर ना लगी थी। वह रोहित के बताये गए डब्बे में चढ़ा और उसकी पहचान पर उस नवयुवक को डब्बे से उतार अपने जूते उतारने को कहा। वह ना नुकुर करने लगा। पर ज्योंही पुलिस का डंडा उस पर पड़ा तो उसने जूते उतार दिये। जूते उतारते ही उसके हील के नीेचे और जूते के अंदर छिपाये गए नशे की वस्तु 'कोकिन' बाहर आ चुका था। पूछताछ करने पर नशे के एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश हो चुका था।

अगले दिन के सभी अखबारों में रोहित का फोटो पूरी घटना के साथ छपा था वह भी मुख्य पृष्ठ पर। देश-दुनिया-गांव-गली हर जगह रोहित की ही चर्चा हो रही थी। गांव के सभी लोग उसकी सूझ-बूझ पर फूले ना समा रहे थे। सबों को रोहित पर गर्व हो रहा था। उधर उसके गुरू रामप्रसाद को भी रोज ही अखबार पढ़ने की आदत थी। उसने जब ट्रेन से स्कूल वापस आते वक्त अखबार खरीदा तो मुख्य पृष्ठ पर छपी खबर एवं रोहित के फोटो ने बरबस उनका घ्यान उस ओर खींच लिये। वह रोहित के किये पर अंदर-ही-अंदर गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। उसकी बुद्धि, सूझ-बूझ, चपलता पर अपने को समर्पित कर खुशी के आंसू छलकाये जा रहे थे। उन्हें इसका भान होते देर ना लगी कि उसके जूतों की पॉलिश भी रोहित ने ही की थी और धन्य है उसकी गुरू भक्ति ! कितनी चतुराई से वह बूट पॉलिश के रूपये भी नहीं लिये थे। गुरू जो मैं ठहरा। उसने विद्यालय की शान को बढ़ाया है। अखबार में सरकार से उसे पुरूस्कृत करने की अनुशंस की गई थी। रामप्रसाद ने भी समय पर स्कूल पहुंच रोहित के इस सुकृत्य पर विद्यालय में एक समारोह आयोजित कर उसे पुरूस्कृत करने की घोषणा की।

पुरूस्कार के दिन रोहित कह रहा था-हर काम अपने आप में बस काम होता है। वह ना छोटा होता है ना बड़ा। छोटे कामों को भी अगर बड़े मंसूबे से किये जायें तो वह तुच्छ या छोटा नजर नहीं आता। गांव के लोग अब कहते है कि मुझे अब बूट पॉलिश का काम छोड़ देना चाहिए। अब इसकी जरूरत नहीं रह गयी। पर मैं कहता हूं कि अब तो इसकी और भी मुझे जरूरत है। मेरी पहचान बन गई है-बूट पॉलिश। ना भी करूं तो लोग मुझे बूट पॉलिश करने वाले के रूप में ही जानेंगे।

पुरूस्कार के बाद लोग रोहित में आए अंतर को देख पा रहे थे। अब वह बूट पॉलिश के सामान को झोले में छिपाकर नहीं बल्कि उसे अपने हाथों में लहराते हुए चला करता था। चादर से सिर भले ही सर्द मौसम में ढ़का रहता था पर उसका चेहरा साफ-साफ नजर आता था कि वह रोहित है।

राजेश कुमार पाठक

पॉवर हॉउस के नजदीक

गिरिडीह-815301, झारखंड

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