शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

अशोक गौतम का व्यंग्य - कॉफ़ी विद कृष्ण

व्यंग्य/ कॉफी विद कृष्ण

रात बड़ी देर तक मल्लिका का मस्ती भरे गानों पर नाच देख ऐसी नींद आई कि मत पूछो। सारी रात जागे रहने पर भी सपने में मल्लिका ही दिखाई देती रही। बड़ी मुश्किल से मल्लिका से पीछा छुड़ाया। वह तो पीछा छोड़ने को तैयार ही नहीं थी। आखिर मैंने दोनों हाथ जोड़ उससे कहा,' हे हुस्न की मलिका मल्लिका! अब मरे सपनों से चली जाओ प्लीज! बहुत हो गया मुझपर तुम्हारा राज। मेरी बीवी को इस बात का पता चल गया कि उसके मायके जाते ही उसके बदले तुम आ रही हो तो..... कोई और भी मेरी तरह तुम्हारा इंतजार कर रहा होगा। अब उस सोते सोते को जगाओ और अपना हुस्न धर्म निभाओ!'

तब कहीं जाकर वह गर्ई कि तभी अचानक सपने में कृष्ण ने आकर मेरे ऊपर की रजाई खींचते कहा,' मियां उठो। कब तक चार बार आंखों को आप्रेशन करवाने के बाद भी भोग विलास के सपने लेते रहोगे?'

'कृष्ण! कौन कृष्ण? इंश्योरेंस वाला?? मैंने तो पिछली किश्त इनटाइम जमा करवा दी थी। अब क्यों सपने में आकर भी मुझे तंग कर रहे हो,' कह मैंने अपने ऊपर ली रजाई जोर से पकड़ी तो वे मुझसे मेरी रजाई छुड़ाते से बोले,' नहीं! मैं इंश्योरेंस वाला कृष्ण नहीं। मथुरा वाला कृष्ण हूं!'

'तो मुझे क्यों परेशान कर रहे हो? जाकर गोपियों के बीच रास रचाओ , बेरका वालों का घी - मक्खन खाओ,' मैंने बिस्तर पर पासा पलटा।

'उनके साथ तो रास करते युगों हो गए नास्तिक। आज मैं तुम्हें नास्तिक से आस्तिक बनाने आया हूं। रही बात दूध- मक्खन की! अब मैंने भी फैट लेना बंद कर दिया है। मैंने तुम्हारे सिर के बालों में अभी- अभी एक सफेद बाल देखा तो सोचा कि तुम्हें आने वाले खतरे के प्रति आगाह करता चलूं!'

'हद हो गई यार! सफेद बाल मेरे सिर पर आया और परेशान तुम हो रहे हो?'

' इस देश के हर जीव का ख्याल रखना सरकार का दायित्व हो या न पर मैं अभी भी इसे अपना मेरा दायित्व समझता हूं, सो...'

'क्या हो गया जो मेरे सिर पर सफेद बाल उग आया! यहां तो अब जीव पैदा ही सफेद बालों के साथ हो रहा है! दूसरे ये सफेद बाल तुम्हारे सिर पर तो नहीं उगा है न? मेरे सिर पर उगा है तो ये मेरी सिरदर्दी है। तुम मेरी चिंता में घुलने वाले कौन होते हो? तुम अपने सिर के बालों की चिंता करो और मेरे बालों को मेरे भरोसे छोड़ दो। मेरी गली में हर दस कदम के बाद बाल डाई करने की दुकानें खुली हैं।'

'अरे बाल डाई करने से क्या होता है? उम्र तो छुपाई नहीं जाती न? मैं तो तुम्हें कहने आया था कि अब तीर्थ व्रत कर लो । मेरे मथुरा- वृंदावन आना चाहते हो तो.... असल में नास्तिक से नास्तिक भी जब तक तीथरें पर जाकर अपने को पंडों से ठगवाता नहीं, उसे स्वर्ग नहीं मिलता। इसलिए तुम चाहो तो.... मथुरा -वृंदावन आने का मैं तुम्हें .... मैं साथ रहूंगा तो पंडों से ठगने की संभावनाएं जरा कम हो जाएंगी और.... इतने भोगविलास के बाद भी तुम स्वर्ग के शर्तिया अधिकारी हो जाओगे!'

' मतलब??'

'मेरे पास तुम्हारे लिए एक पैकेज है। ऐसा पैकेज कि इसमें नराधम से नराधम जीव भी स्वर्ग प्राप्त कर सकता है। वहां तुम्हारा गाइड खुद मैं रहूंगा......' उन्होंने कहा तो मेरी उनमें इतनी जिज्ञासा जागी कि मैंने अब तक जो वे मेरे मुंह पर से रजाई खींच रहे थे, अब मैंने ही अपने मुंह पर से रजाई उठा दी,' मतलब??'

' अगले सोमवार यानि दो दिन बाद मेरी एसी बसें लाल किले के पास से मथुरा -वृंदावन धाम हेतु भक्तों के लेकर निकलेंगी। दो दिन का कार्यक्रम है और खर्चा प्रति श्रद्धालु मात्र दो हजार! उसमें रहना -सोना, खाना -पीना सब!' तुम्हारे सिरहाने के नीचे अपना विजिटिंग कार्ड छोड़े जा रहा हूं.....' मैं उनसे कुछ और संवाद बनाता कह वे गायब हो गए।

मैंने भी सोचा कि चलो नास्तिक होने के बाद भी दो हजार में स्वर्ग की बुकिंग ही करवा ली जाए। यहां तो दो हजार में सरकारी फ्लैट के लिए आवदेन करने वाला आवेदन पत्र तक नहीं आता।

और दो रोज बाद मैं अपनी बीवी को बिन बताए कृष्ण की टूरिस्ट बसों में लाल किले से मथुरा वृंदावन की यात्रा पर हो लिया। बीवी को मैंने अपने साथ इसलिए नहीं लिया कि उसे साथ ले गया तो स्वर्ग में भी मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी। हर चौथे दिन मायके भागी रहा करेगी।

वृंदावन हमारी बस पहुंची तो कृष्ण ने मुझे बस से उतारा और अपने साथ यमुना किनारे ले गए। यमुना में काला सा कुछ देखा तो मैं डरा। मुझे डरा देख कृष्ण ने पूछा,' क्यों ठिठक रहे हो? कोई पंडा दिख गया क्या??'

' नहीं! यमुना में कालिया दिख रहा है,' तुमने तो इसे अपने वश में कर लिया था न?'

' हां! बहुत पहले कर लिया था!'

' तो ये क्या है?' मैंने कृष्ण से पूछा तो वे हंसते बोले,' अरे पागल, ये कालिया नहीं , ये तो आस- पास के गुजरों की भैंसे यमुना में तैर रही हैं। उस बेचारे को अब यमुना में जगह ही कहां बची है? तुम लोगों की भूख तो एक दिन......'

' और ये यमुना में जो काला जल दिख रहा है, ये कालिया के विष से ही हुआ होगा? कितना भयंकर था वह? आज तक जल साफ नहीं हुआ,' मैंने आश्चर्य से पूछा तो कृष्ण हंसते हुए बोले,' हद है यार! मजाक की भी हद होती है! तुम्हारा सामयिक ज्ञान तो जीरो है। ये कालिया के विष से काला हुआ जल नहीं, ये तो आसपास के गंदे नालों से तुम्हारा आने वाला गंदा जल है। तुम लोगों ने सच कहूं गंगा -यमुना का बेड़ा गर्क करके रख दिया है और अपने को इतने साफ बनते हो कि.......' कृष्ण ने कहा तो मैं पता नहीं क्यों महाबेशर्म होने के बाद भी लज्जा गया।

' और ये.......'

' ये ब्रजभूमि है!'

' सुना है तुम यहां गाएं चराया करते थे ,पर यहां तो एक भी गाय नहीं दिख रही। कहां चली गईं सब गाएं? अब तो चाय को बहुत मन कर रहा है । तुम्हारे ब्रज आकर आज शुद्ध दूध की चाय पी अमर होने को बहुत मन कर रहा है हे कृष्ण!' पर सामने जब चाय में पैकेट का दूध डालते रेहड़ी वाले को देखा तो मैं दंग रह गया,' ये क्या प्रभु?'

' मैंने चाय छोड़ दी है। कॉफी लेते हैं। जबसे मेरे ग्वालों ने नकली दूध बनाने का फार्मूला ईजाद कर लिया तबसे गायों को पूछता ही कौन है? कौन गोबर से हाथ गंदे करे, कौन घास लाए? बेचारी सड़कों पर आ गई हैं,' कह कृष्ण ने लंबी सांस भरी तो मैंने उन्हें सांत्वना देते कहा,' कोई बात नहीं प्रभु! वक्त वक्त कर फेर है.... तुम्हारे मथुरा के पेड़ों के बारे में बड़ा सुना है , कहो तो सामने वाली मिठाई की दूकान से.........'

'मत खाना इन्हें ,जिसने खाए वह पछताया ही! क्या पता इनमें ये क्या- क्या मिलावट करने लग गए हैं ये आजकल ..... बदनाम करके रख दिया मुझे इन्होंने!' उन्होंने सख्त हिदायत देते कहा।

' तो तुम इन्हें रोकते क्यों नहीं? बदनामी तो तुम्हारी ही हो रही है न कुल मिलाकर...... ऐसे में लोग नास्तिक न बनें तो और क्या करें.....'

' अच्छा, अब चलो, मेरे गेस्ट हाउस में आराम करो। कल सुबह आठ बजे मिलेंगे। फिर तुम्हें अपनी जन्मस्थली घुमाऊंगा।'

' जन्मस्थली बोले तो??'

' मैटरनिटि होम! पर हां! सुबह जल्दी जाग जाना...... अब चलता हूं ,राधा इंतजार कर रही होगी ..' कह वे हाथ हिलाते पुरजोर भजन लगे ऑटो में चढ़ गए।

अशोक गौतम,

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

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