शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

अशोक गौतम का व्यंग्य - कपड़े कपड़े का फ़र्क़

व्यंग्य/ मेरे कपड़े, उनके कपड़े

खैर, चरित्र तो मैं अपना बहुत पहले नीलाम कर चुका हूं। ये जो मेरे पास दो मंजिला मकान , आलीशान गाड़ी है, ये सब मैंने अपना चरित्र नीलाम करने के बाद ही हासिल की है। जीव जिंदगी में चाहे कितनी ही मेहनत क्यों न करे, पर जब तक वह अपने चरित्र को मरे बंदरिया के बच्चे सा अपने से चिपकाए रखता है, तब तक भूखा ही मरता है। इधर बंदे ने अपना चरित्र नीलाम किया, दूसरी ओर हर सुख सुविधा ने उसे सलाम किया। कहने वाले जो कहें सो कहते रहें। पर अपना अनुभव है कि जबतक बंदे के पास चरित्र है ,उसके पास केवल और केवल दरिद्र है।

पर चरित्र नीलाम करने के बाद कम्बख्त फिर गरीबी आन पड़ी। जमा पूंजी कितने दिन चलती है? अब समझ नहीं आ रहा था कि अपना क्या नीलाम करूं? अनारकली होता तो मीना बाजार जा पहुंचता।

जब पता चला कि उनके कपड़े एक करोड़ पचास लाख में बिके तो अपना तो कलेजा ही मुंह को आ गया। लगा, नीलामी का एक द्वार और खुल गया। जिसके कपड़े ही एक करोड़ पचास लाख के नीलाम हो रहे हैं वह बंदा आखिर कितना कीमती होगा?

बस फिर क्या था! मुझे उनके कपड़ों की नीलामी की बोली के अंधेरे में आशा की किरण नहीं, दोपहर का चमकता सूरज दिखा और मैंने आव देखा न ताव, अपने और बीवी के सारे फटे पुराने कपड़ों की गठरी बांधी और लखपति होने के सपने लेता बाजार चलने को हुआ तो बीवी ने टोका,' अब ये मेरे कपड़े कहां लिए जा रहे हो? पागलपन की भी होती है हे पागल पति!'

'बाजार जा रहा हूं नीलाम करने,' मैंने सहजपने से कहा तो बीवी चौंकी, ' अपना सबकुछ नीलाम करने के बाद अब कपड़े तक नीलाम करने की नौबत आ गई क्या?

'आई नहीं। नौबत क्रिएट करवाई है उन्होंने। इन तेरे मेरे कपड़ों में मुझे लाखों की कमाई दिख रही है। चल फटाफट बंधी गांठ उठवा और शाम को मेरे आते ही लखटकिया की बीवी हो जा।'

' पर इन कपड़ों को कौन गधा खरीदेगा?' वह परेशान!

' अरी भागवान! ये कोई मामूली कपड़े नहीं, मान ले ये लैला- मजनूं, हीर रांझा,शीरी- फरियाद के ऐतिहासिक कपड़े हैं। तू भी न! सारा दिन टीवी के पास बैठी बस सास बहू के सीरियल ही देखती रहती है। कभी समाचार भी सुनने नहीं, तो कम से कम देख ही लिया कर। उनके कपड़े की एक जोड़ी मात्र एक करोड़ पचास लाख में बिकी। हो सकता है लाखों में न तो हजारों में अपने ये कपड़े भी कोई खरीद ले।

' घर में कोई जोड़ी बदलने के लिए भी छोड़ी कि नहीं? कोई क्या पागल है जो हमारे न पहनने लायक कपड़ों की बोली लगाएगा?' ये मेरी बीवी भी न, जब देखो शंकाओं में ही जीती रहती है।

'क्यों न लगाएगा। मैं अपने कपड़ों को चमत्कारी रंग दे ऐसा प्रचार करूंगा कि.... मसलन ये कपड़े मेरी बीवी को हरी ने उसको तब दिए थे जब वह... पहली बार मुझसे मंदिर जाने के बहाने मिलने आई थी। और ये कपड़े मेरी बीवी को लैला ने हमारी र्फ्स्ट मैरिज एनीवरसरी पर दिए थे। ये वाला सूट हीर ने उसे उसके बर्थ डे पर गिफ्ट किया था। और ये मेरा कुरता पाजामा मजनूं ने मेरी शादी पर तब मुझे पहनाया था जब मै घोड़ी लायक पैसे न होने के कारण गधे पर शान से बैठ तुम्हें ब्याहने गया था......'

 

उसने सुनहले ख्वाब बुनते मेरे सिर पर मेरे और अपने सारे कपड़ों की बंधी गांठ रखी और मैं एकबार फिर अपने माल को नीलाम करने बाजार में जा खड़ा हुआ। बाजार में पहुंचते ही खाली जगह देख दरी बिछाई और अपने और अपनी परीजादी के सारे कपड़े उस पर बिखेर दिए।

पर ये क्या....... एक घंटा बीता.... दो घंटे बीते..... कोई कपड़ों के पास आ ही नहीं रहा था। उल्टा जो भी हमारे कपड़ों के पास से गुजर रहा था, नाक बंद कर देता। शाम तक मैं नीलामी दाताओं को टुकुर टुकुर ताकता रहा। अब समस्या ये कि गांठ जो बांध भी लूं तो उठवाए कौन? कि तभी पुलिसवाला आ धमका, वह डंडे से मेरी बीवी के कपड़ों को टटोलने लगा तो मुझे उसकी इस हरकत पर बेहद गुस्सा आया। पर बाजार की बात थी, सो चुप रहा ,'अरे , ये सब क्या है? चोरी के कपड़े हैं क्या??'

' नहीं, ये वाले हीर के हैं, ये वाले लैला के हैं। ये वाले मजनूं के है और ये वाले ओबामा के जवानी के दिनों के ...'

'छिः! इतने गंदे?'

'बरसों से धोए नहीं हैं न साहब! जस के तस संभाल कर रखे हैं।'

'मतलब, पुलिस वाले को उल्लू बना रहा है?'

'उल्लू और आपका? मर जाए जो आपका उल्लू बनाए।' कह मैंने उसके दोनों पांव को हाथ लगाया तो वह आगे बोला,' म्यूजियम से चुरा कर लाया है क्या??' कह वह मुस्कराते हुए मेरी जेब में झांकने लगा तो मैंने दोनों हाथ जोड़े कहा,' साहब! उनकी देखादेखी में मैं भी इन्हें नीलाम करने ले आया था।'

' पता है वे किसके कपड़े हैं? चल उठा जल्दी से इन गंदे कपड़ों को वरना..... '

तभी सामने से पुराने कपड़े लेने वाली आ धमकी और कमर नचाती बोली, ' ऐ। क्या लोगे इन सब कपड़ों का? दो पतीले लेने हो तो बोलो.......'

 

अशोक गौतम,

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

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