शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

प्रमोद यादव का व्यंग्य - सूट का सफ़र

सूट का सफ़र / प्रमोद यादव

‘ गुरूजी कहानी बहुत बढ़िया है..’ गजोधर ने पानठेले में पहुंचते ही कहा.

‘ कौन सी कहानी गजोधर ? आजकल लिखने-पढने लगे हो क्या ? ‘

‘अरे नहीं गुरूजी...हम क्या ख़ाक लिखेंगे ? हमने तो कभी ढंग का “ काउवाला” निबंध भी नहीं लिखा..’

‘ तो फिर कविता जरुर लिखी होगी जवानी में ..’ गुरूजी ने छेड़ा.

‘ क्या गुरूजी...आप भी.....कालेज के दिनों शौक जरुर था शेरो-शायरी का..कविता का..पर खुद कभी लिखा नहीं..’ गजोधर ने याद करते कहा.

‘क्यों ? कोई “ प्रेरणा” नहीं मिली क्या ?’ गुरूजी ने पूछा.

‘ प्रेरणा नहीं गुरूजी...करुणा नाम था उसका..’ गजोधर ने झटके से जवाब दिया.

‘ अच्छा..अच्छा..तो करुणा थी वो...अब कहाँ है भई ? ‘ गुरूजी पूछे.

‘ घर में है गुरूजी...और कहाँ रहेगी ? उन दिनों इधर-उधर की एक से एक उम्दा कविता...शायरी उसे लिख मारता था..अब तो वो मुझे बर्तन-भाड़ा फेंक मारती है उससे शादी जो हो गई..’

‘ अरे.. शादी हो गई ये तो बड़ी ही अच्छी बात है...ऐसे भाग्यवान तो विरले ही होते हैं जिनकी शादी प्रेमिका से हो पाती है..लैला-मजनूं...हीर-रांझा..शीरी-फ़रियाद तो बेचारे बदनसीब थे.. बिना शादी किये मर-मिटे..शादी के बाद तो तुमने उस पर खूब कविता की होगी ? ‘

‘ मत याद दिलाइए गुरूजी उन दिनों की..अब सब ये एक कहानी हो गई है..’ गजोधर ने आह भरते कहा.

‘ अरे हाँ गजोधर.. अभी तुम किसी कहानी की तारीफ़ कर रहे थे.. किसकी कहानी है ? गुरूजी ने याद दिलाते पूछा.

‘ गुरूजी ये कहानी है – दिये की और तूफ़ान की ..’ गजोधर बोला.

‘ दिये और तूफ़ान की ? मैं समझा नहीं यार इसका मतलब ? ‘

‘ मतलब ये गुरूजी कि पिछले दिनों साहबजी के दसलखिया सूट को लेकर सियासी हलकों में जो तूफ़ान उठा था.. देश भर में जो आलोचना और थू-थू हुई थी..उसकी कहानी.... विरोधी तो विरोधी आम जनता को भी ये नागवार गुजरा था.. जिस देश के ज्यादातर गरीबों के बदन पर एक कपडा तक मयस्सर नहीं,उसके पालनहार..मुखिया दसलखिया सूट पहने.. ये क्या बात हुई ? चलो माना कि विदेशी आका को “इम्र्प्रेस” करने ऐसा किया पर एक आदमी को खुश कर करोड़ों को नाखुश करना कहाँ की बुद्धिमानी है ? जनता मंहगाई के मार से त्रस्त और साहबजी दसलखिया सूट में मस्त..क्या-क्या बातें नहीं हुई ? तब भी साहबजी सब-कुछ सुनते हुए दिये की तरह शांत टिमटिमाते रहे.. कोई सफाई या बयान नहीं दिए ..और फिर अचानक बेडा गर्क हो गया..’ गजोधर ने कहा.

‘ कैसे ? ‘ गुरूजी ने पूछा.

‘ अरे कैसे क्या ? दिल की बाजी ( दिल्ली ) हार गए..दसलखिया सूट को एक सस्ता मफलर निगल गया.. तब भी दिया टिमटिमाता ही रहा.. अब “सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या हुआ “ जैसी हालत है..’

‘ साफ-साफ कहो यार.. ये होश में आने वाली बात क्या है ? ‘ गुरूजी बोले.

‘ अरे गुरूजी..अब बता रहे कि वो सूट किसी हीरा व्यापारी ने उपहार में दिया था..उसी वक्त बता देते तो कम से कम हीरे से ( दिल्ली से ) हाथ नहीं धोते.. साथ ही ये भी बता रहे कि अब उस सूट की नीलामी होगी..बोली लगेगी.. बैकग्राउंड भी बताया कि ऐसा पहले भी होता रहा है.. और नीलामी से जो धन मिलेगा उसे गंगा सफाई अभियान में दिया जाएगा.. आज उस दसलखिया सूट का सफ़र तीन दिनों बाद सूरत में समाप्त हो गया..सूट चार करोड़ इकतीस लाख की उंची बोली में नीलाम हो गया..’ गजोधर ने सविस्तार बताया.

‘ पर गजोधर ..विरोधी तो इसे “डेमेज कंट्रोल” कह रहे..बिगड़ती छवि सुधारने की कवायद बता रहे..’

‘ ठीक कह रहे गुरूजी..छवि सुधारने की ही कहानी है यह..इस कहानी में विश्वसनीयता कम और फर्जीवाड़ा ज्यादा दिखती है..क्योंकि कहानी का पूरा लोकेशन प्रदेश विशेष है..उपहार देनेवाले से लेकर बोली लगाने वाले तक..सब एक ही थैले के चट्टे-बट्टे.. जब बोली लगनी थी तब ही मैं जान गया था कि इसे आखिर में कहाँ का शख्स खरीदेगा..जैसा-जैसा सोचता गया वही होता गया..गोया जैसे कहानी मैं ही लिख रहा हूँ..’ गजोधर ने फलसफाना अंदाज में कहा.

‘ गजोधर..हर बात पर शक करना अच्छी बात नहीं..हो सकता है इस बात में शत-प्रतिशत सच्चाई हो..’ गुरूजी ने समझाया.

‘ नहीं गुरूजी..सच्चाई होती तो उसी वक्त हकीकत बयां करते...महीनों चुप नहीं रहते.. दिल्ली की गद्दी भला कौन खोना चाहता ? और फिर उपहार देने वाले पर भला क्या प्रतिबन्ध था जो वे भी चुप्पी साधे रहे..? ‘

‘ ये तो उनका स्टाईल है गजोधर.. देर से ही सही पर अपने विरोधियों को एकाएक जोर का झटका जोरों से देते हैं..अब देखो..दसलखिया सूट का सफ़र...देशहित में उन्होंने इसे लाख से करोड़ में पहुंचा दिया..सूट अब ख़ास से फिर आम हो गया.. चार करोड़ इकतीस लाख में नीलाम हो गया..गंगा की सफाई में दान हो गया..अब सबकी बोलती बंद है..इनके चेहरे पर मुस्कान मंद-मंद है..वो एक गाना है ना- “ मानो तो मैं गंगा माँ हूँ न मानो तो बहता पानी “ बस इसी तर्ज पर तुम चाहे इसे सच मानों न मानो पर हकीकत यही है..ये कहानी नहीं है..’ गुरूजी एक सांस में बोले.

‘ चलो गुरूजी ..आप कहते हैं तो मान लेता हूँ... तो फिर ये भी मान लूं न कि देर से ही सही पर अच्छे दिन जरुर आयेंगे..किसी न किसी दिन एकाएक खाते में पंद्रह लाख अवश्य आयेंगे..’ गजोधर ने गुरूजी की ओर पुलक कर देखते कहा.

‘ पता नहीं गजोधर.. जबसे इस वादे का जुमलीकरण हुआ..मेरा भरोसा कम हो गया..अब इसे केवल एक कहानी ही मानो.. वो भी दुखांत..’ गुरूजी ने संजीदगी से कहा.

‘ क्या गुरूजी..आप भी अजीब हैं..कभी चने के झाड में एकदम से चढा देते है तो कभी धडाम से पटक देते है..मुझे लखपति देखना शायद आपको पसंद नहीं.. जब भी अपने फेवर की बात कहता हूँ तो हमेशा “पता नहीं” कह आप हाथ झाड लेते हैं.. ’

इतना कह गजोधर एकाएक नाराजगी दिखाते, सामने की दीवार पर जहाँ  "स्वच्छ भारत अभियान - अपना भारत स्वच्छ भारत" नारा लिखा था, पिच्च से पान थूकते “ चलता हूँ ” कह आगे बढ़ गया. गुरूजी उसे जाते देखता रह गया.

xxxxxxxxxxxxxxxxxx

प्रमोद यादव

गया नगर , दुर्ग , छत्तीसगढ़

pramodyadav1952@gmail.com

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------