सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

राजेश कुमार की कहानी - पथरीली राह

कहानी :-

'' पथरीली राह ''

image

लेखक - राजेश कुमार

वानी जब आती है तो अपने साथ ढेर सारी सौगातें लाती है। जिन्हें पा लेने के बाद आदमी अपने आप में कुछ अजीब-अजीब सा महसूस करने लगता है। एक अजीब सा उत्साह, एक अजीब सी मस्ती, एक अजीब सा निखार उसे अपने चारों ओर बिखरी- बिखरी सी नजर आने लगती है,और, वह कल्पनाओं के रंगीन पंखों पर बैठकर दूर - बहुत दूर तक उड़ जाना चाहता है। वहां जहां आसमानी सितारे हैं और उन सितारों के पीछे भी एक संसार हैं, जिसे लोग '' प्यार का संसार '' कहते हैं।

'' जी हां प्यार का संसार ''!

परन्तु प्यार के मूलत : तीन दायरे होते हैं, और इन दायरों तक सीमित प्यार ही सच्चा प्यार होता है। ये दायरे हैं - आकर्षण, अपनापन और आलिंगन।

इन सीमित दायरों के बाहर के प्यार , प्यार न रहकर वासना में परिवर्तित हो जाता है। सर्व प्रथम इसमें भटके इंसान को सब प्यारा- प्यारा सा, अच्छा-अच्छा सा , भला - भला सा लगता है। उमंगों की इस फूलों भरी धरती पर पहुंचते ही उस पर कुछ इस तरह की मदहोशी छा जाती है, कि उसके कदम लड़खड़ा जाते हैं। लड़खड़ा गयी जिन्दगी सहारा पाने को बेचैन हो जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे बिना सहारे के अगला सफर तय नहीं किया जा सकेगा। तब नशीली आंखों में खोज का भाव आ जाता है। उसे अपने लिये एक समवयस्क की तलाश होती है, जो जिन्दगी की आखिरी मुकाम तक उसका साथ दे सके। साथी भी मिल ही जाता है और साथी के मिलते ही दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो जाते हैं। इस आकर्षण के पश्चात दोनों का खिंचवा एक ही ओर हो जाता है। एक ही ओर के खिंचाव से दोनों के अन्दर अपनापन की भावना जागृत होती है। उस वक्त दोनों के अन्दर किसी प्रकार का संदेह, कोई डर नहीं रह जाता है। दोनों के इस अपनत्व के कारण ही उनका प्यार गहरा और अटूट हो जाता है। फिर दो दिल धड़कते हैं, प्यार की जल तरंग उनकी आत्माओं में बजती है, और वे समा जाते हैं एक दूसरे की बाहों में। आलिंगन बद्ध हो जाते है। तब वे सब कुछ भूल जाते हैं। उन्हें दीन- दुनिया की परवाह नहीं रहती। जमाने का डर उनके दिल- ओ - दिमाग से निकल जाता है। वे वक्त की चाल को भूल जाते है। उन्हें याद रहता है सिर्फ ओर सिर्फ अपना प्यार। जिनके सहारे वे उम्र के लम्बे सफर को तय करना चाहते है।

स्वप्निल नेत्रों वाली वह रूप राशि की प्रतिमा ,इतनी गोरी और गुलाबी थी कि छुये से ही मैली हो जाये। हर नख-शिख बोलता सा लगता था।

सीप सी बड़ी - बड़ी आंखों के बीच सुतवां नाक। अण्डे से लम्बोतर चेहरे पर संतरे की फांक की मानिंद होंठ। सुराहीदार गर्दन के नीचे पुष्ट और आकर्षक वक्ष। पतली कमर, उभरे हुए पुष्ट नितम्ब और सुडौल जंघाये , कुल मिलाकर वह संगतराश की तरह तराशी हुई कोई अद्भुत व अलौलिक प्रतिमा लगती थी। उसका नाम निशी था। वह एक गरीब परिवार की अठारह वर्षीया लड़की थी। वह अपने भाई- बहनों में सबसे बड़ी थी। उसके पीठ पर दो भाई थे। जो क्रमशः आठ और चार वर्ष के थे। उसके पिता की मृत्यु हो गयी थी। पिता के मरणोपरान्त मां ही इन भाई - बहनों के भरण पोषण किया करती थी। पिता के मृत्यु के पश्चात निशी तथा उनके दोनों भाईयों की पढ़ाई का जिम्मा ,वो मालिक ले रखा था। जिसके घर निशी की मां काम किया करती थी।

निशी पढ़ने में बहुत तेज थी। अपने वर्ग में वो अक्सर अव्वल दर्जे से उत्तीर्ण होती। मैट्रीक भी उसने प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण किया । उसका नामांकन कॉलेज मे करा दिया गया ।

निशी का कॉलेज का पहला दिन। वह कुछ सहमी सहमी सी। अपने अन्दर अजीब सा भय समाये वो क्लास में बैठी थी। लेक्चरर द्वारा दी जा रही लेक्चर को अपनी कॉपी पर सुनहरी अक्षरों में अंकित कर रही थी। कुछ छणोपरांत घंटी बजी और क्लास समाप्त हो गया। वह सीढियों से नीचे उतर रही थी। जिगर में समाये डर के कारण वह बहुत तेज- तेज कदम बढ़ा रही थी। अचानक सीढी के मोड पर उसे टक्कर लगी और उसके हाथों के सहारों वक्ष स्थल से चिपकी सारी पुस्तकें नीचे फर्श पर बिखर गयी। वह जल्दी जल्दी उन पुस्तकों को बीन कर पुनः वक्ष स्थल से स्पर्श कराते हाथों का सहारा दे खड़ी हुई। तो पाया उसके सामने एक हृष्ट पुष्ट नौजवान खड़ा थ। उसकी उम्र कोई पच्चीस वर्ष के आसपास की होगी। जो बीए के अंतिम वर्ष का छात्र था। वह एक समृद्ध परिवार का लड़का था। उसका नाम था अमित। अचानक उसे सामने देख निशी सकपका गयी। सकपकाया तो अमित भी , लेकिन निशी के चेहरे पर नजर पड़ते ही वह उस अलौकिक प्रतिमा को अपलक देखता रह गया। उसने अपने पांच वर्षीय कॉलेज जिन्दगी के दरम्यान ऐसी सुन्दर लड़की नहीं देखी थी। अतः वह चाह कर भी अपनी निगाहें निशी के चेहरे से नहीं हटा पाया।

अमित के इस कदर आंखें फाड़ - फाड़ कर देखता पा निशी और भी भयभीत हो गयी और तेज- तेज कदमों से सीढ़ियां उतर पुरी शक्ति से भागती- भागती कॉलेज गेट से बाहर निकली। अमित भी उसका अनुकरण करता अपने स्कूटर पर सवार हो कॉलेज गेट से बाहर निकला और निशी के पीछे हो लिया। भय से कांपती निशी भागी जाती और मुड़-मुड़ कर भी देखती जाती। अमित का अपना पीछा करता देख उसको लगा जैसे उसके जिस्म में खून का एक कतरा भी शेष न बचा हो। अपने सम्पूर्ण शक्ति से भागती- भागती वो एक चौराहे पर पहुंच पीछे पलटी। अमित को दूसरी दिशा में जाते देख जैसे उसकी सांस में सांस आयी। अब वह धीरे - धीरे चलती अपने घर को जाने लगी। चौराहे से कुछ ही दूरी पर उसका घर था। घर पहुंची तो जैसे उसे सुकून मिला हो, उसने एक गहरी सांस ली। अपितु अभी भी उसका चेहरा भय से लिप्त था। उसे बार- बार अमित की बड़ी- बड़ी आंखें घुरती नजर आ जाती।

शनैः शनैः दिन बीते, सप्ताह बीते। अमित नित्य कॉलेज से चौराहे तक और चौराहे से कॉलेज तक निशी के पीछे- पीछे जाता- आता था। पर अब निशी को अमित के इस भाव-भंगिमा से भय नहीं लगता। उसके जेहन से भय अब हमेशा-हमेशा के लिये विलुप्त हो चुका था। अब उसे अपने भीतर अजीब -अजीब सी सरगोशी महसूस होने लगी। एक अजीब सा उत्साह, अजीब सी मस्ती उसे अपने चारों ओर फैली नजर आने लगी। अब वह कल्पनाओं के सतरंगी पंखों पर सवार हो दूर- बहुत दूर तक उड़ गयी। उड़ती हुई निशी वहां पहुंची जहां आसमानी सितारे थे। और, जिसके पीछे भी एक संसार था। अब निशी का झुकाव अमिक के प्रति होने लगा। जिस दिन वह अमित को नहीं देखती उसके अन्दर अजीब सी बैचेनी छा जाती।

उधर अमित का भी वही हाल था। वह भी निशी को बहुत चाहने लगा था और उससे गहरा प्यार भी करने लगा था। अनकहे, अनजाने में ही दोनों प्यार के फूलों भरी धरती पर पहुंचे तो उन्हें सब कुछ भला-भला सा, प्यारा-प्यारा सा लगने लगा। उल्फत का नशा दोनों पर इस कदर छायी कि दोनों  कदम लड़खड़ाती महसूस होने लगी। धीरे-धीरे दोनों का खिंचवा एक ही ओर हो गया। उन्हें लगा अब आगामी सफर बगैर सहारे के नामुमकिन है। एक ही ओर खिंचाव होने से दोनों में अपनत्व की भावना समायी और उनको एक दूसरे से अटूट प्यार हो गया। तब दो दिल धड़के। प्यार की जल तरंग उनकी आत्माओं में बज उठी और वे समा गये एक दूसरे की बांहों में। वे दीन- दुनिया से बेखबर हो वक्त की चाल को भूल गये। जमाने का डर उनके दिमाग से कोसों दूर चली गयी। बस! उन्हें याद रहा केवल अपना प्यार। जिसके सहारे वे आगे की सफर तय करने को इच्छुक थे। वे अपने प्यार को जात पात की सीमा में नहीं बांधना चाहते । अब उन्हें यह महसूस होने लगा कि वे अब एक दूसरे के बिना नहीं रह सकेंगे।

धीरे- धीरे दिन बीते, सप्ताह बीते, यहां तक की महीनों भी बीत गये। और, उनका प्यार और अपनत्व गहराता चला गया। अब उनके सब्र का बांध टूटता महसूस हुआ। इसीलिये दोनों अब एक ही डोर में बंध जाना चाहते थे, ताकि अगला सफर हंसते-हंसते प्यार के सहारे तय कर सकें। दोनों ने ही शादी करने की सोची।

तभी इनके प्यार की खबर निशी की मां और अमित के पिता को लग गयी। अमित के पिता जो एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, उन्हें यह रिश्ता नागवार लगा।

यथार्थ के कंकरीले रास्ते में प्यार को ठोकर लगी। समाज ओर जात-पात उनके बीच एक दीवार बन कर खड़ा हो गया। वक्त की ऐसी चोट पड़ी की प्यार की आत्मा लहू-लुहान हो गयी। उनकी जिन्दगी की मुस्कराहटें दूर बहुत दूर चली गयी। ऐसा प्रतीत हुआ कि उन दोनों का प्यार रूपी महल रेत की भीत पर खड़ा था, जो आंधी के थपेडों को बर्दाश्त न कर सका और विध्वस्त हो गया और आंखों से समुद्र की लहरों सा जल प्लावन शुरू हो गया।

धीरे- धीरे समयानुसार दोनों प्रेमी की जिन्दगी वीरानों में बीतने लगी। एक बार दो दिल पुनः मिलने की भरसक कोशिश की, पर समाज रूपी दीवार उन्हें मंजिल तक पहुंचने में कामयाबी हासिल करने में अनेक अवरोधक दो दिलों के बीच ला खड़ा कर दिया।

इन प्यार की चर्चाओं से निशी के परिवार वालों को अनेक यातनाएं सहने पड़ी। बहुत कष्ट उठाने पड़े। निशी की मां सरस्वती देवी जो अमित के घर ही काम करती थी, को अमित के पिता श्याम बाबू ने अपनी घर की नौकरी से हटा दिये। निशी का परिवार अब दर- दर की ठोकरें खाने लगी। निशी तथा उसके भाईयों की पढ़ाई भी बंद हो गयी। उन्हें पढ़ाई से वंचित होना पड़ा, साथ ही साथ समाज के ताने उलाहने भी सुनने पड़े। सिर्फ इस प्यार के खातिर।

इस जुदाई को कुछ ही दिन हुआ था कि निशी ने खाट पकड ली। अपने परिवार की दशा को देख- देख वो दिन- रात अपने आपको कोंसती रहती। अपने भाईयों को भूख से बिलखते देख उसे सांत्वना देती पर अनायास ही उसकी आंखों से बाढ़ सी उमड़ कर अश्क छलक जाती। वो लाख इन कीमती मोतियों को बीनना चाहती पर नाकामयाब रहती।

एक दिन कुछ ऐसी ही परिस्थिति उत्पन्न हो गयी, परिणाम स्वरूप निशी की आंखों से समुद्र की लहरें बाढ़ सी उमड़ पड़ी। जिसे रोक पाने में निशी असमर्थ रही। वह रोती कलपती अमित की यादों में खो गयी। पता नहीं कब उसे निद्रा ने अपनी आगोश में भर लिया। निद्रा के आंचल में लिपटी वो ख्वाबों की दुनियां में सैर करने लगी। उसने देखा - उसकी शादी हो रही है रही है। वह दुल्हन के जोडों में लिपटी दुल्हन सी सजी है। खुशी की शहनाई बज रही है। चारों ओर चहल- पहल और खुशियों का आम्बार है। अमित सेहरा बांधें घोड़ी पर सवार हो आया। उसकी शादी हुई। फिर डोली में बैठ वो ससुराल पहुंची। ज्यों ही उसने सुहागरात कक्ष में प्रवेश किया त्योंही दो धुंधली आकृतियां उस पर झपट पड़ी और उसके गले में पड़ा मंगलसूत्र छीन कर गायब हो गयी। निशी पूरे जोश में चीखी। इसकी आवाज सुन सरस्वती देवी तथा दोनों छोटे भाई निशी के खाट के समीप पहुंचे। उन्होंने पाया कि निशी का सारा बदन थर्र- थर्र कांप रहा थ। लेकिन यकायक ही उसकी थर्र-थर्राहट शांत हो गयी। धीरे-धीरे रात्रि अपने अस्ताचल की ओट में जा छिपी और सूर्योदय हो गया। परन्तु निशी की जिन्दगी का सूर्य तो रात्रि के साथ ही हमेशा- हमेशा के लिये अस्ताचल की ओट में जा छिपा। अस्त हो गया।

आज अमित की शादी है। श्याम बाबू ने उसकी शादी अच्छे और सम्पन्न परिवार के एक इंजीनियर की बेटी श्यामा के साथ तय की है। श्यामा डॉक्टरी पढ़ रही है। इन दिनों अमित ने भी एक अच्छी सी नौकरी पकड़ ली है। आज इधर अमित के घर खुशी की शहनाई बज हरी है , उधर निशी के घर मातम छाया है। इधर अमित की बारात की तैयारी हो रही है तो उधर निशी के अर्थी की। इधर अमित को सेहरा बांध लोगों ने घोड़ी पर बिठाया तो उधर कुछ लोगों ने निशी को अर्थी पर लिटाया। इधर अमित की बारात निकली श्यामा के घर को तो उधर निशी की अर्थी को लोगों ने उठाया श्मशान जाने को। एक तरफ से बारात आ रही है , तो दूसरे तरफ से अर्थी जा रही है। दोनों प्रेमी पुनः एक बार चौराहे पर मिले। अमित को जब हकीकत पता चला तो वह घोड़ी से उतरना चाहा पर अपने पिता की लाल- लाल आंखें देख वह सहम गया। फिर हमेशा की भांति आज भी दोनों प्रेमी विपरीत दिशा में चले और एक दूसरे से दूर होते चले गये, और, हमेशा- हमेशा के लिये जुदा हो गये।

:- समाप्त :-

सम्पर्क सूत्र :- राजेश कुमार ,पत्रकार , राजेन्द्र नगर, बरवाड़ीह, गिरिड़ीह 815301 झारखंड

-मेल - patrakarrajesh@gmail.com

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------