शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - शिव शक्ति शिव भक्ति का केंद्र

14 फरवरी महाशिवरात्रि पर विशेष
शिव शक्ति-शिव भक्ति का केंद्र है छत्तीसगढ़
० शताब्दियों पूर्व राजाओं ने बनाया शिवमय


ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे त्रिकालदर्शी देवों की बात करें, तो अखिल भारत वर्ष सहित छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक मंदिर और देवालय भगवान शिव शंकर अर्थात महेश्वर के ही है। प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की चतुर्दशी तिथि पर मनाया जाने वाला सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि हिंदू धर्म शास्त्रों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ब्रह्म विष्णु और महेश के रूप में हिंदू धर्मावलंबी सृष्टिकर्ता के रूप में ब्रह्मा जी की आराधना करते है, तो नारायण रूपी विष्णु पालनकर्ता की दृष्टि में भक्तगणों के आराध्य माने जाते है। सबसे अलग महेश अथवा भगवान शंकर विध्वंश के देवता के रूप में पूजे जाते है। यही कारण है कि अपनी कुशलक्षेम के लिये भगवान शिव की आराधना सबसे अधिक की जाती है। छोटे से छोटे स्थान में भी भगवान शिव के शिवालय अवश्य मिल जाते है, किंतु बड़े से बड़े शहर में भी विष्णु के मंदिरों की संख्या ऊंगलियों में गिनी जाने वाली ही है। ब्रह्मजी का एकमात्र मंदिर पुष्कर, राजस्थान में है। हिंदी पंचाग की पांचवा माह श्रावण माह होता है, जो भगवान भोले शंकर को समर्पित है। कहा जाता है कि श्रावण मास में भगवान शिव शंकर के सौम्य रूप के दर्शन संभव हो पाते है। हमारे धर्मशास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि रूद्र के केवल 11 अवतार ही है। भगवान रूद्र का अवतार भी कैसे हुआ और क्यों हुआ इसे भी जानना जरूरी है। ‘भगवान शिव ने अपनी दाहिनी भुजा से ब्रह्मा जी की उत्पन्न कर जीवेां को जन्म देने की जवाबदारी सौंपी। उन्होंने अपने बायी भुजा से भगवान विष्णु को उत्पन्न कर उन्हें सृष्टि के संचालन की जिम्मेदारी दी। अंत में शिव जी ने अपने हृदय के दो टुकड़े किए। एक टुकड़े के रूप में श्रीश्री भगवान रूद्र उत्पन्न हुए, जिन्हें भगवान शिव ने प्राण लेने की जिम्मेदारी दी।’


न पुण्यम, न पापं, न सौख्यं, न दुखं।
न मंत्रो ने तीर्थं, न वेदा न यज्ञाः।।
अहं भोजनम नैव, भोज्यं न भोक्ताः।
चिदानंदरूपः शिवोअहं, शिवोअहं।


छत्तीसगढ़ प्रदेश को यदि शिव नगरी और शिव ग्राम से संबोधित किया जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। जहां श्रावण मास में इस प्रदेश के अनेक शहरों और ग्रामों में शिव कथाओं का आयोजन भक्तों को शिवमय कर देता है, तो दूसरी ओर बच्चों से लेकर उम्रदराज लोग सुबह शाम शिवभक्ति में लीन हो जाते है। इस प्रदेश में एक नहीं अनेक शिव मंदिर अपनी ऐतिहासिकता सिद्ध करते रहे है।


प्राचीन हाटकेश्वर मदिंर राजधानी की शान
शिव दर्शन और शिवालयों की बात करें तो हमारे प्रदेश की राजधानी रायपुर में लगभग 700 वर्ष पुराना हाटकेश्वर मदिंर पुरानी शिव परंपरा को प्रादुर्भुत कर रहा है। खारून नदी के तट पर स्थित उक्त प्राचीन शिवालय की स्थापना इतिहास वेत्ताओं के अनुसार राजा ब्रह्मदेव ने 14वीं शताब्दी में किया था। हमारे बुजुर्ग बताते है कि रियासत कालीन हाटकेश्वर मंदिर श्रावण मास में श्रद्धालुओं की शिवभक्त का केंद्र होता है। खारून नदी तट पर माघी पूर्णिमा के दिन और फिर महाशिवरात्रि के दिन बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। शिवभक्तों द्वारा अपनी शिवार्चना मंदिर में स्थापित शिवजी की प्रतिमा का दुग्धाभिषेक, जलाभिषेक और रूद्राभिषेक कर इच्छापूर्ति की कामना की जाती है। राजधानी रायपुर में ही इस मंदिर के अलावा और भी शिवालय है, किंतु शहर से दूर होने के बाद भी मंदिर की प्राचीनता भक्तिगणों को आकर्षित करने में सबसे आगे देखी जा रही है। महाशिवरात्रि के दिन सुबह से लेकर देर संध्या तक इस प्राचीन मंदिर में भगवान शिव को प्रसन्न करने भक्तगणों द्वारा निम्न मंत्र का जाप सुनाई पड़ता रहा है-
ऊँ भुर्भुर्वः स्वः ऊँ तत्पुरूषाय विध्वमहें।
महादेवाय धीमही, तन्नो रूद्र प्रचोदयात।।


मुंगेली जिले का मकदूद्वीप भी शिवभक्तों का केंद्र
मुंगेली जिले के अंतर्गत बैतलपुर के समीप चारों ओर पानी से घिरा मदकू द्वीप भी शिवभक्ति और मेले के लिये प्रसिद्ध स्थान है। इस द्वीप की मनोहारी छटा भी देखने लायक है। इसी द्वीप पर मसीही लोग भी फरवरी के दूसरे सप्ताह में अपना आध्यात्मिक आयोजन करते है। उनके आयोजन की समाप्ति के बाद आने वाली महाशिवरात्रि शिव भक्तों को अनायास ही अपनी रमणीयता की ओर आकर्षित कर लेती है। महाशिवरात्रि आने से कुछ दिन पूर्व ही मकदू द्वीप पर शैव परंपरा को मूर्त रूप देने श्रद्धालु अपनी तैयारी प्रारंभ कर देते है। यदि मकदू द्वीप के महाशिवरात्रि आयोजन को इस धरती का महान तीर्थ कहा जाये, तो गलत नहीं होगा। जिस प्रकार का दृश्य मकदू द्वीप पर निर्मित होता है। वैसा शायद इस मृत्यु लोक में कहीं और देखने को न मिले। मकदू द्वीप में उत्खनन कार्य से प्राप्त प्राचीन स्थापत्यकला के भग्नावशेष तो दर्शनीय हैं ही साथ ही कलचुरी शासन प्रतापमल्ल देव का ताम्र सिक्का, प्रतिमाएं एवं शिवलिंग विशेष आकर्षण का केंद्र होते है। इस ही वेदी पर संयुक्त रूप से निर्मित पांच शिवलिंग युक्त 12 स्मार्तलिंग की उपलब्धि से तत्कालीन शैव परंपरा का द्योतक है। मकदू द्वीप में स्थापित शिवलिंग को ‘धूमनाथ’  के नाम से जाना जाता है। काले रंग के पत्थर से निर्मित होने के कारण ही शिवलिंग का नाम धूमनाथ पड़ा। शिवनाथ नदी के बीच स्थापित मकदू द्वीप वास्तव में नयनाभिराम दृश्य निर्मित करता है।


शिवमय रही है सिरपुर की धरती
महानदी के किनारे बसा सिरपुर अपने प्राचीन काल से ही शिवमय वातावरण से रचा बचा रहा है। सिरपुर में शिव मंदिरों की पूरी श्रृंखला ही दिखाई पड़ती है। सबसे पहले गंधेश्वर मंदिर का दर्शन मंदिर में संग्रहित कर रखी गयी कलात्मक प्रतिमाओं से दर्शनार्थियों की नजर ही नहीं हटती है। बहुत लंबे समय से गंधेश्वर मंदिर सतत रूप से पूजित रहा है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर शिव लीला के अलग अलग दृश्य भी आकर्षक मुद्रा लिये हुए है। सिरपुर के संग्रहालय में रखे चुतुर्भुज शिवलिंग की प्रतिमा संभवतः अद्वितीय है और अन्यत्र ऐसी मूर्ति नहीं मिली है। शिव मंदिर समूहों में शामिल 4 फीट ऊंचा शिवलिंग काफी प्राचीन इतिहास को समेटे दिखाई पड़ता है। यह मंदिर पाश्चयातन शैली का शिव मंदिर कहा जाता है। इसी तरह मंडप के आकार का एक शिव मंदिर भी गर्भगृह में स्थापित की है। इन्हीं शिवलिंगों और शिव मंदिरों की श्रृंखला के बीच गर्भगृह में ही योनिपीठ में चार फीट ऊंचा शिवलिंग स्थापित है। उत्खनन के दौरान सिरपुर में पंचायतन बालेश्वर महादेव मंदिर भी प्राप्त हुआ। मंदिर का नामकरण महाशिवगुप्त को बलार्जन उपाधि एवं ताम्रपत्र में उल्लेखित बालेश्वर मंदिर के आधार पर किया गया है। इसी शिव मंदिर के चारों कोनों में अन्य मंदिरों के भी अवशेष मिले है।


शैव परंपरा की अद्वितीय मिशाल है देवरानी-जेठानी मंदिर
बिलासपुर रेल मार्ग पर दागोरी रेल्वे स्टेशन से महज कुछ किमी की दूरी पर अमेरीकापा ग्राम के समीप मनीयारी नदी के तट पर स्थित ग्राम ताला में दो शैव मंदिर स्थापित है, जो पूरे प्रदेश में देवरानी जेठानी मंदिर के नाम से विख्यात है। इसी ताला गांव के समीप सरगांव में मूर्ति विहिन धूमनाथ का मंदिर है। खुदाई के दौरान मिले अवशेष इस बात की ओर संकेत करते है, कि उक्त स्थान में शैव उपासक बहुतायत में रहते रहे होंगे। भगवान शिव के उपासक इस स्थान पर महामृत्युंजय जप कराने विशेष रूप से पहुंचते है। देवरानी जेठानी के नाम से स्थापित मंदिर लगभग ध्वस्त हो चुके है। ये दोनों ही शिव मंदिर है। जेठानी मंदिर के सीढ़ियों पर शिवगणेां की सुंदर आकृतियां उकेरी हुई आज भी दिखाई पड़ रही है। चतुर्भुज कार्तिकेय की मयूरासन प्रतिमा भी इन्हीं मंदिरों के बीच स्थापित है। अर्द्धनारीश्वर से लेकर, उमा महेश, नागपुरूष आदि मूर्तियों में पौराणिक कथानक झलकता है। देवरानी जेठानी मंदिर परिसर में उत्खनन के समय एक विलक्षण मूर्ति भी प्राप्त हुई है। उक्त मूर्ति भारतीय कला में अपने तरह की एक मात्र प्रतिमा है। शिव के रूद्र अथवा अघोर रूप से मिलती जुलती होने के कारण मूर्ति का नामकरण रूद्रशिव किया गया है। संभवतः शिवजी के रूद्र रूप वाली उक्त प्रतिमा सबसे विशाल प्रतिमा है। यह प्रतिमा लगभग ढाई मीटर ऊंची अर्थात लगभत 8 फीट से भी अधिक ऊंचाई लिये है और 3 फीट से अधिक चौड़ाई को समेटे है।


छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी है शिवलिंगों का गढ़
छत्तीसगढ़ प्रदेश का खजुराहो माना जाने वाला भोरमदेव मंदिर भी शिवलिंगों के लिये अपनी पहचान रखता है। गोड़ जाति के लोग अपने आराध्य के रूप में जिन्हें पूजते है, वे भोरमदेव के नाम से जाने जाते है। ऐसा कहा जाता है कि भोरमदेव भगवान शिव का ही नाम है। भोरमदेव मंदिर के गर्भगृह का मुंह पूर्व दिशा की ओर है, जो अपने बीचों बीच शिवलिंग को प्रतिष्ठित किये हुए है। भगवान शिव की अर्द्धनारीश्वर रूप वाली प्रतिमा के साथ ही शिव परिवार की सुंदर और मनोहारी प्रतिमाएं भी दर्शनार्थियों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। ईंट से निर्मित शिवजी का यह परम धाम प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालुओं को दर्शनार्थ यहां खींच लाता है। यहीं से लगभग 3 किमी की दूरी पर स्थित चौराग्राम के समीप खेतों के मध्य एक पत्थर निर्मित शिव मंदिर विद्यमान है। जिसे मंडवा महल का नाम दिया गया है। दक्षिण-पश्चिम दिशा में भी शिवजी का एक सुंदर मंदिर है, जिसे छेरकी महल का नाम दिया गया है।

 
रूद्र के 11 अवतारों को जानें
भारतीय धर्मशास्त्रों में शिव के 11 रूद्र अवतारों के विषय में बताया गया है। महाशिवरात्रि पर्व उन्हें अवतारों की जानकारी जरूरी प्रतीत हो रही है। रूद्र के 11 अवतारों में-कपिल अवतार, पिंगल अवतार, भीम अवतार, विरूपाक्ष अवतार, विलोहित अवतार, शारता अवतार, अजपाद अवतार, अहिर्बुन्या अवतार, शंभु अवतार, चंड अवतार तथा भव्य अवतार शामिल है। इन अवतारों के अलावा 25 अन्य अवतार भी माने गये है। भगवान शिव के इन 11 अवतारों में किसी भी अवतार की पूजा चावल, जौ, तिल, मुंगदाल, गेंहू आदि से की जानी चाहिये।

 


                                           प्रस्तुतकर्ता
                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                                         dr.skmishra_rjn@rediffmail.com

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