बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य : बाबा मंत्रालय आज के भारत की अनिवार्य आवश्यकता

व्यंग्य

बाबा मंत्रालय आज के भारत की अनिवार्य आवश्यकता

डॉ. रामवृक्ष सिंह

अपने देश में बाबाओं की बढ़ती संख्या, समाज में उनके महत्त्व, देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति आदि में उनके अमूल्य और अपरिहार्य योगदान को देखते हुए यह समीचीन रहेगा कि सरकार अलग से बाबा मंत्रालय स्थापित करे

 

बाबा मंत्रालय के स्थापित हो जाने से कई फायदे होंगे। अभी प्रामाणिक तौर पर कोई यह नहीं बता सकता कि देश में कितने बाबा हैं। लेकिन उनकी संख्या कई लाख होगी, और उसी अनुपात में बाबा लोगों के कई प्रकार भी होंगे। बूढ़े-जवान, अधेड़, महिला-पुरुष, गृहस्थ, गृह-त्यागी, घोषित पत्नी-धारी, अघोषित पत्नी-धारी, पत्नी-भोगी, पत्नी-त्यागी, गरीब और फक्कड़, घुमक्कड़, मठाधीश, मंदिर-स्वामी, आश्रम-स्वामी, नदी तीर-वासी, अरण्य वासी, नगर-वासी, ग्राम-वासी, मज़ार वाले बाबा, पीर बाबा, पैदाइशी बाबा, व्यवसाय अंतरण के पश्चात् बने बाबा, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले बाबा, पेरोल से भागे बाबा, बलात्कारी बाबा, डकैत बाबा, कट्टाधारी बाबा, त्रिशूलधारी बाबा, चिमटे वाले बाबा, नागा बाबा, वस्त्रधारी बाबा, नित स्नान करनेवाले बाबा, महीनों न नहानेवाले बाबा, शराबी बाबा, कबाबी बाबा, चिलम सुलगाकर सुल्फा-गाँजा चढ़ानेवाले बाबा, बम-बम बाबा, हरि-हरि बाबा, पुलिस के संरक्षण वाले बाबा, नेता और मंत्रीजी के गुरु बाबा, केवल युवा महिलाओं को शिष्या बनानेवाले बाबा, शर्तिया बेटा देने वाले बाबा, पदोन्नति देने वाले, प्रेमिका पटाने का मंत्र और भभूत देनेवाले बाबा, मद्रासी बाबा, नेपाली बाबा, बंगाली बाबा, वशीकरण मंत्र फूँकने वाले बाबा, गंडे वाले बाबा, ताबीज वाले बाबा, कैमरे वाले बाबा, मोबाइल वाले बाबा, दंडी बाबा, लात मारने वाले बाबा, सहलाने वाले बाबा, गले लगानेवाले बाबा, जटाधारी बाबा, गंजे बाबा, पाजामा-कुर्ता वाले बाबा, लंगोट धारी बाबा, लुंगी वाले बाबा, गेरुए वाले बाबा, हरे कपड़ों वाले बाबा, दाढ़ी-मूँछ वाले बाबा, सफाचट बाबा, बदबू छोड़नेवाले बाबा, सेंट लगानेवाले बाबा, औघड़ बाबा, कमंडल बाबा, ..अरे राम-राम, बाबा लोगों की इतनी प्रजातियाँ और प्रकार हैं कि उनकी गणना और वर्गीकरण करना तो किसी मंत्रालय के ही वश की बात है।

 

पाठक पूछेंगे कि बाबा मंत्रालय बनने से शासन और समाज को क्या लाभ होगा? तो हमारा मंतव्य है कि बाबाओं के पंजीकरण और विनियमन से शासन को कम से कम यह तो पता रहेगा कि अमुक-अमुक इलाके में और अमुक-अमुक कोटि-कैटेगरी के इतने बाबा यहाँ-यहाँ हैं। मंत्रालय की वेबसाइट पर बाबा लोगों के ब्यौरे होंगे। तब देश के जिस नागरिक को जो सुविधा या सेवा चाहिए होगी, या जिस समस्या से निजात पानी होगी वह उसके अनुरूप बाबा की जानकारी वेबसाइट से ही पा लेगा। अभी तो बाबा लोगों का सारा कारोबार बसों या सार्वजनिक मूत्रालयों में चस्पा पैंफलेटों के ज़रिए, देश के नामचीन भाषायी अखबारों में छपे विज्ञापनों और चेलों-चपाटों की जबानी किए गए प्रचार के भरोसे चलता है। बाबाओं के पंजीकरण-शुल्क से देश के राजकोष में भी वृद्धि होगी। साथ ही, नेताओं के लिए कबीना मंत्री, राज्य मंत्री आदि बनने के अवसर उपलब्ध होंगे। प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के पदोन्नति के अवसर बढ़ेंगे। साथ ही, मंत्रालय से जुड़े पूरे अमले की भर्ती के रास्ते खुलेंगे। यानी कुल मिलाकर बाबा मंत्रालय के बन जाने से देश के हर वर्ग को फायदा होगा।

 

बाबाओं के पंजीकरण और बाबागिरी के पेशे के विनियमन से आम जनता को बहुत फायदा होगा। जैसाकि ऊपर कहा जा चुका है, अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुसार लोग अपने इच्छित बाबा का चयन कर सकेंगे। जो बाबा जिस काम का विशेषज्ञ होगा, उसके पास लोग अपनी ज़रूरत पूरी करने के लिए जा सकेंगे। अभी तो बड़ा घालमेल है, जिस बाबा की विशेषज्ञता पदोन्नति दिलाने में है, उसके पास ऐसे लोग पहुँच जाते हैं जिन्हें बेटे की चाहत है। बाबा पज़ल हो जाते हैं कि अब क्या करें, हमारी विशेषज्ञता तो इस काम में है नहीं। मंत्रालय बन जाने और वेबसाइट निर्मित हो जाने पर बाबा अपने नेट से जानकारी लेकर ऐसे लोगों को दे सकते हैं कि बच्चा तुम अमुक-अमुक बाबा के पास जाओ, वे तुम्हारी विशेष जरूरत को पूरा करेंगे।

पंजीकरण के समय बाबाओं के इतिवृत्त का भी पता चल जाया करेगा। अभी तक तो इस संबंध में बाबा तुलसीदास की उक्ति ही थंब रूल मानी जाती है कि- नारि मुई, धन-संपति नासी। मूँड मुँड़ाय भये संन्यासी। पर अब जमाना बदल गया है। बाबाजी पत्नी के मर जाने और संपत्ति नष्ट हो जाने पर बाबा बने हैं इसकी कोई गारंटी नहीं। अभी लखनऊ के एक प्रसिद्ध हनुमान मंदिर में एक बाबाजी ऐसे मिल गए जो ब्राह्मण नहीं थे, किन्तु बड़े बड़े कान्यकुब्जों को आशीर्वाद देते थे। खैर, बात इतनी सी नहीं है, वे किसी जघन्य अपराध की सज़ा काट रहे थे और लगभग पंद्रह वर्ष पहले पेरोल से भाग आए थे। बाबा बनने से पहले यदि निष्पक्ष जाँच हो तो पता चल जाए कि बाबा बनने की आकांक्षा रखने वाले अभ्यर्थी में बाबागिरी की योग्यता और पात्रता है भी या नहीं।

 

कोई-कोई बाबा बड़े प्ले-बॉय टाइप के होते हैं। उनके शिष्य-शिष्याएं भी उसी अभिरुचि वाले होते हैं। यदि इन लोगों का बाकायदा पंजीकरण हो तो इनकी चिकित्सा जाँच भी हो पाए और ज़रूरत होने पर एड्स आदि संक्रामक और जानलेवा बीमारियों से बचाव के उपाय भी किए जा सकें। बाबाओं के मरने पर उनके आश्रमों से कई-कई क्विंटल सोना और करोड़ों रुपये की नकदी बरामद होती है। चूंकि उनकी आय-व्यय का कोई लेखा-जोखा नहीं होता, ऑडिट नहीं होता, इसलिए इतनी बड़ी राशि देश के आर्थिक क्रिया-कलापों की दृष्टि से निष्क्रिय पड़ी रहती है। आय-कर भरने का तो खैर सवाल ही पैदा नहीं होता। बाबा मंत्रालय के बन जाने पर ये सारी विसंगतियाँ भी दूर हो जाएंगी।

अपने देश के अनपढ़ और गंवार लोग ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े नेता, मंत्री, अधिकारी आदि भी बाबा लोगों की चरण-रज लेने जाते हैं। यह तो पक्का है कि ऐसा करने से समाज के इन शिरोमणियों का कल्याण होता है, नहीं तो बाबा लोगों की इतनी पूछ क्यों होती? एक बार जब बाबा मंत्रालय बन जाएगा, तो ऐसे समाज-शिरोमणि लोग मंत्रालय में ही अलग से बाबा कॉन्क्लेव बनवा सकते हैं और ज़रूरत के अनुसार, बिना कोई समय गँवाए अपना उल्लू सीधा करने के लिए बाबा लोगों के चरणों की भभूत अपने माथे पर लगाकर मनचाही मुरादें पा सकते हैं।

 

बाबा मंत्रालय के बन जाने पर उसमें काम करने के लिए सुयोग्य अधिकारियों और कर्मचारियों की भी ज़रूरत होगी। हमने यह लेख बिना किसी खास अनुभव अथवा अध्ययन के, बस ऐसे ही लिख दिया है। किन्तु हम विश्वास दिलाते हैं कि यदि अवसर दिया जाए तो हम बाबा मंत्रालय के शुरुआती अध्ययन-कार्य और तदनन्तर उसके दैनंदिन काम-काज को सुचारु रूप से चलाने में बहुमूल्य योगदान कर सकते हैं। इसमें हमारा बहुत बड़ा स्वार्थ है। वैसे तो बाबागिरी के लिहाज से हम बिलकुल अयोग्य और नाकारा हैं, लेकिन उनके मंत्रालय से जुड़कर हमें भी बाबा लोगों के हिस्से की मलाई और मौज़ में अपना थोड़ा-सा शेयर मिल जाया करेगा। इसलिए यदि कभी ज़रूरत हो तो प्रस्तावित मंत्रालय में हम अपनी सेवाएं देने के लिए सदैव तत्पर रहेंगे। बाबाजी लोगों की जय हो।

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