रविवार, 8 फ़रवरी 2015

विक्रम सिंह की कहानी - पसंद - नापसंद

कहानी

पसंद नापसंद

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विक्रम सिंह

वह सिगरेट का कश लेकर धुएं को छोड़ता जा रहा था। मोबाइल को कई बार उठाता है। फिर रख देता है।'' क्या इतने सालों बाद उसे फोन करना अच्छा होगा।'' आखिर कार उसने नम्बर डायल कर मोबाइल को अपने कानों से लगा लिया था। माथे में पसीने की बूंदे आ गई थीं। मोबाइल की घंटी लगातार बजते जा रही थी। मगर कोई रिसीव नहीं कर रहा था। घंटी पूरी होने के बाद आवाज आई, आप जिससे बात करना चाह रहे हैं अभी फोन नहीं उठा रहा है। फोन काट मोबाइल को दोबारा मेज पर रख देता है। फिर से सिगरेट जला लेता है 'उसे तो अब मेरा नाम भी याद नहीं होगा। लेकिन उसी ने तो मेरा नाम रखा था मिट्ठू। वह हंसा,मिट्ठू। उसे याद आता है वह दिन जब पार्क में बैठी उसकी प्रेमिका उसके चेहरे को गौर से देखते हुए यह कहती है तुम्हारी शक्ल मिथुन चक्रवर्ती से एकदम मिलती है। मैं तुम्हें मिट्ठू कह कर बुलाया करूंगी। आज से तुम्हारा नाम मिट्ठू है। उस दिन वह अभिलाश से मिट्ठू हो गया था। उसने सोच लिया है आज उसे फोन पर भी यही नाम कहूँगा । उसके मोबाइल की घंटी बजने लगी। वह नम्बर देख खुश हो जाता है। झट से रिसीव कर वह अपने कानों में लगा लेता है। उधर आवाज आई,'' जी आपका मिसकॉल आया था।''

मैं मिट्ठू बोल रहा हूँ।''

यह सुनते ही उसकी सांसें जोर जोर से चलने लगी थी। जैसे किसी ने उसे डरा दिया हो। ''हाँ बोलो''

''क्या तुमने मुझे पहचान लिया?'

''नाम तो दूर तुम्हारी आवाज से ही पहचान लिया था'''

''कैसी हो तुम''

''मैं ठीक हूँ 'तुम कैसे हो?''

''बस चल रहा है।''

'' क्या चल रहा है?''

''मेरा एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है। वह मैं तुम्हें भेजना चाहता हूँ। तुम्हारा घर का पता चाहिये था। ठीक है मैं तुम्हें मैसेज कर दूंगी।''

''ठीक है कर देना''

''अच्छा ठीक है'' कह दोनों ने मोबाइल काट दिया था।

फिर कोई मैसेज नहीं आया था। वह इतंजार करता रहा मैसेज का मगर उसका मैसेज नहीं आया। कई मैसेज इस बीच आये भी मगर वह जब भी मैसेज टोन बजने के बाद मोबाइल को देखता मैसेज किसी और का होता था। वह सोचता कही वह भूल तो नहीं गई। या उसका मेरे उपन्यास पर कोई दिलचस्पी नहीं है। रात दस बजे तक वह ना जाने क्या- क्या सोचता जा रहा था। बिस्तर पर लेटा उसका ध्यान बार- बार मोबाइल पर भी चला जा रहा था। उसे कई बार ऐसा लगा जैसे मैसेज टोन बजा है। अभी उसने फोन हाथ पर रखा ही था कि मोबाइल की घंटी बज उठी थी। वह खुश हो जल्द से रिसीव करता है। कहता है,तुम्हारा मैसेज नहीं मिला अभी तक''

''सुनो तुम मुझे अपनी किताब मत भेजना। क्योंकि मैंने तुम्हारे बारे मैं अपने पति को सब कुछ बता दिया था। अगर उसने तुम्हारी किताब देख लिया तो वह बहुत गुस्से में आ जायेंगे। वह सोचेंगे मैं अभी भी तुमसे बात करती हूँ।''

''तुमने मेरे बारे में उसे बताया क्यों था?''

''लड़की जात हूँ ना बात पेट में पची नहीं।''

मिट्ठू मुस्कुराता है।'' सुनो मैं अपनी किताब पोस्ट तुम्हारे घर तुम्हारे भईया के नाम से भेज दूंगा। फिर तुम उसे छुपा कर रख लेना जब मौका लगे पढ़ना।''

''अच्छा ठीक है जब मैं कहूँगी तब भेजना ठीक है। क्योंकि वह तो बनारस में रहते है। बीच बीच में आते रहते है।''

''तुम बनारस में अपने पति के साथ क्यों नहीं रहतीं हो?''

वह कहते है तुम पापा मम्मी के साथ रहो।''

''तुम्हारा मन लगता है।''

''मन लगाना पड़ता है।''

''तुमने कभी नहीं कहा कि मैं आप के साथ रहूँगी।''

''क्या बताउॅ? घर में मुझे बारह लोगों का खाना बनाना पड़ता है।''

''कौन-कौन है घर में।''

''दरअसल क्या है मेरी ननद और उसके तीन बच्चे है। और दो ननद भी है। देवर है। पापा मम्मी है।''

''यह तो कुल मिलाकर दस लोग हुए।''

''मगर खाते तो बारह लोगों के बराबर है।''

मिट्ठू को हँसी आई मगर उसने हंसी को रोक लिया। ''बना लेती हो इतने लोगों का खाना।''

''जब मैं नई- नई आई थी तो मेरी सासू माँमेरा बना हुआ खाना फेंक दिया करती थीं। फिर दोबारा बनाती थीं।''

''वह क्यों?''

''क्या है यह लोग बहुत मसाले दार खाना पसंद करते हैं। तुम्हें तो पता ही है। हम लोग मसाला कितना कम खाते थे। इसलिए मेरी आदत थी मसाला कम डालने की, तो इस वजह से इन लोगों को मेरा खाना पसंद नहीं आता था।''

''तुमने अपने पति को यह सब बाते नहीं बताई थीं।''

''बताई थी और खूब झगड़ी भी थी कि शादी कर के मुझे यहां लाकर पटक दिये हैं। मुझे अपने साथ क्यों नहीं रखते हो। वह मुझसे कहते हैं कि मैं तो काम पर निकल जाता हूँ। तुम घर पर अकेली कैसे रहोगी। फिर आज का जमाना भी तो ठीक नहीं हैं। तुम तो देखती हो कि क्राइम पेर्टोल में सब कुछ। मैं फिर भी नहीं मानी तो बाप रे उसने मुझे इतनी जोर का चाटा लगा दिया। इतने गुस्से में आ गया कि क्या कहूँ। उस दिन के बाद से मैंने फिर कभी नहीं कहा। क्या है ना मेरी सासू माँने इन सब को यह सिखाया है कि पत्नी को कभी अकेले लेकर नहीं रहना चाहिए नहीं तो किसी से भी चक्कर चला लेंगी। अब तुम ही बताओ यह कोई मेरी उम्र रह गई्र है यह सब करने की''

''कभी बनारस घुमाने भी नहीं लेकर गये।''

''नहीं, कभी नहीं लेकर गये।''

''शादी को तो चार साल हो गये और चार साल में एक बार भी नहीं लेकर गये तुम्हें बनारस।''

वह चुप रही। फिर बोली,''बाद मैं कई बार फिर बोलने लगे ठीक है अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो चलो मैं तुम्हें वही लेकर चलता हूँ। मगर मैंने मना कर दिया था। क्योंकि जब मैं मायके गई थी माँपापा को यहॉं की सारी बात बताई थी तो उन सब ने मुझसे यही कहां बेटा अब जैसा भी है समय काटो,अपने आप सब ठीक हो जाएगा। खैर छोड़ो तुम्हारी बीबी कहाँ है।''

''वह लुधियाना अपनी बहन के घर गई है।''

''तुम नहीं गये साथ में।''

''नहीं मैं नहीं गया कम्पनी में कुछ काम था।''

''तुम्हें मेरा नम्बर कहाँ से मिला''

''मैं कुछ दिन पहले ही रानीगंज गया था। वहां मैंने यह नम्बर तुम्हारी सहेली बीना से लिया था।''

''मेरी तो खुद तुमसे बात करने की बहुत इच्छा थी। मैं खुद तुम्हारा नम्बर खोज रही थी।'

तुम एकबार बीना से कह रही थीं, देख सब लड़के एक जैसे होते है। शादी के बाद मुझे मिटठू भूल गया।''

''और नहीं तो क्या?''

''मगर देखो मैंने तुम्हें फोन किया ना।''

''अच्छा सुनो तुम मुझे फोन मत करना जब मैं तुम्हें मिसकाल या फोन करूं तब तुम मुझे फोन करना। और दोपहर के दो बजे मेरा सारा काम खत्म हो जाता है। रात दस बजे के बाद मैं फ्री हो जाती हूँ। और कभी मेरा सप्ताह- पन्द्रह दिन अगर फोन नहीं आया तो यह नहीं की तुम फोन कर देना। बस तुम इंतजार करना मैं जरूर करूंगी। ''

और सुनो अगर कभी तुम्हारा फोन आये और मैं ना उठाउं तो समझ जाना मेरी पत्नी मेरे साथ है। अभी हम रात में ही बात करेंगे। क्योंकि मेरी डयूटी अभी जरनल शिफ्ट चल रही है। तो हम अभी रात में ही बात करेंगे।

''अच्छा ठीक है अब मैं रखती हूँ।''

अगले दिन रात दस बजे बिस्तर पर लेटा हुआ मिट्ठू फिर से फोन का इंतजार करने लगा था। आज फिर उसे नींद नहीं आ रही थी। खैर मोबाइल में शेयरिंग होने लगी। मिट्ठू ने झट-पट मोबाइल रिसीवर कानों में लगा लिया था। हाँ हेलो,

''कैसे हो?'

मैं ठीक हूँ काम हो गया क्या?

''हाँ, अभी बाबू को सुला कर' हटी हूँ''

''खाना खा लिया तुमने''

''हाँ खा लिया। और तुमने क्या बनाया था आज?'

''टमाटर की चटनी,गोभी की सब्जी,रायता,रोटी''

''अच्छा,बहुत कुछ बनाया था। सब मसालेदार था।''

वह हॅंस पड़ी

''नहीं मैं जानता हूँ तुम अच्छा खाना बनाती हो। मैंने तुम्हारे हाथ का बना मछली चावल खाया है। बहुत अच्छा बनाती हो।''

मैंने सुना है तुम्हारी बीबी भी बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती है। मुझे बीना ने बताया था।''

'हाँ अच्छा बनाती है।''

''तुम अपनी शादी से खुश हो।''

''क्या तुम अपनी शादी से खुश हो।''

''अब खुश होने के सिवा चारा भी क्या है।''

''क्योंकि तुम्हारा पति सरकारी नौकरी करता है?''

''मेरे मन मैं कभी ऐसा नहीं था। कि मैं नौकरी वाले लड़के से शादी करना चाहती थी। तुम एक जगह स्थिर नहीं थे।''

''क्या करता कही अच्छी नौकरी नहीं मिल रही थी। जब मैकेनिकल डिप्लोमा कर के निकला तो पता चला साला भारत देश में पढ़े लिखे बेरोजगार लड़कों की कमी नहीं है। उसमें एक में भी शामिल हो गया हूँ। फिर ना जाने मैं दिल्ली,मुम्बई,राजस्थान,गुड़गॉव ना जाने कितने इंडस्टियल शहर में घूमता रहा इस बीच कितनी नौकरी पकड़ी फिर छोड़ दी। क्योंकि मैं अपना शोषण नहीं करवाना चाहता था। और होने भी क्यों देता। जानती हूँ कम्पनी के बड़े बड़े उद्योगपति खुद तो करोडों रूपये की गाड़ी में घूमते हैं। आलीशान बंगलों में रहते है। हमें महीने में चार हजार रूपये की तनख्वाह पर काम करवाते है। और फिर मैं यह चाहता था मुझे ऐसी नौकरी मिले जहाँ तनख्वाह अच्छी हो। ताकि मैं तुमसे शादी कर संकू।''

वह रो कर कहने लगी,मुझे पता था जल्द से जल्द कामयाब हो मुझसे शादी करना चाहते थे। क्योंकि तुम हमेशा डरते थे कही मेरी शादी ना हो जाये।''

''सब कुछ जानते हुए भी तुमने मुझसे शादी से इनकार कर दिया था।''

''क्योंकि मैं डरती थी कही शादी के बाद तुम्हारा कैरियर ना खराब हो जाये। क्योंकि उस वक्त तुम अपना कैरियर बनाने के लिये संघर्ष कर रहे थे ''

''जानती हो संगीता जब तुम मेरे साथ पार्क में बैठी होती थीं। तो मुझे लगता था मेरे पास सब कुछ है। मुझे किसी चीज की कमी नहीं महसूस होती थी जैसे पूरा ब्रम्हांड जीत लिया हो। पर मुझे क्या पता था उसे ही पाने के लिये एक छोटी सी नौकरी पाने की जरूरत है। इसलिए फिर मैंने एक कम्पनी में नौकरी करनी शुरू कर दी थी। आज जब मल्टीनेशनल कम्पनी में नौकरी कर रहा हूँ फ्लैट में रह रहा हूँ' गाड़ी से घूम रहा हूँ। मगर ना जाने मुझे ऐसा लगता है मेरे पास कुछ नहीं है। '

'जानते हो मिट्ठू जब तुमने मुझे भाग कर शादी करने के लिए कहा था। मैंने तुम्हें हाँ भी कर दिया था। मगर मैं जब अपनी मां का चेहरा देखती। कि मेरे जाने के बाद उसके साथ क्या होगा। कहीं पापा उसे जान से न मार दें। फिर मैं पापा का चेहरा देखती तो मुझे लगता था कहीं पापा इस बदनामी से आत्म हत्या ना कर ले। जब मैं भाइयों को देखती तो सोचती कही मेरे ऐसा करने से यह शर्म से कालेज जाना ना छोड़ दे। बस यह सब सोच मैं डरती थी। एक तरफ तुम थे मेरा प्यार जो मुझे दिलो जान से चाहता है और दूसरी तरफ मेरे माँपापा जिन्होंने मुझे पाल पोस कर इतना बड़ा किया था। कुछ समझ नहीं आता था ऐसा लगता था आत्म हत्या कर लो पर उसमें भी मैं रूक जाती थी। क्योंकि मेरी आत्महत्या करने से भी लोगों के बीच कई तरह के सवाल होते लोग कहते जरूर प्रेगनेन्ट होगी किसी से चक्कर होगा तभी आत्म हत्या कर ली। फिर पुलिस वाले भी सवाल जवाब करते क्या हुआ था लड़की ने क्यों आत्म हत्या की। इसलिए आत्म हत्या भी नहीं कर पाई। घुटन भरी जिन्दगी जीने लगी। सोचती थी माँ से तुम्हारे बारे में बताओ मगर मैं जानती थी माँपिताजी के पास इस रिश्ते का खुलासे का मतलब था यह रिश्ता हमेशा के लिए खत्म''

''पर तुमने तो मिलना तो दूर मुझसे बात करना भी छोड़ दिया था। फिर बाद में तुम्हारी शादी का निमंत्रण कार्ड अपने घर में देखा ।''

''हाँ क्योंकि मैं तुम्हें भुलाने कि कोशिश करने लगी थी। मैं सोचती थी अपने आप तुम भी मुझे भूल जाओगे। क्या तुम मुझे माफ कर दोगे?''

''अच्छा तुमने अपना पता मैसेज नहीं किया'' बात पलटते हुए कहा।

''हाँ कर देती हूँ। कब पोस्ट करोगे?''

''जब तुम कहो''

'' अभी ही भेज दो वह घर पर नहीं है।''

''कल ही पोस्ट कर देता हूँ।''

''अब समय भी बहुत हो गया है तुम सो जाओ। कल बात करेंगे।''

अगले दिन सुबह मिट्ठू ने अपने उपन्यास को संगीता को पोस्ट कर दिया था।

रात के दस बजते ही मिट्ठू का मोबाइल बजने लगा। उसने मोबाइल को झट रिसीव कर लिया था। मोबाइल रिसीव करते ही मिट्ठू ने कहा,'' हाँ मैंने अपनी किताब आज पोस्ट कर दी है।''

''ठीक है।' उसने बड़े धीमे से कहा था।

''क्या हुआ उदास लग रही हो?''

''एक बात बोलूं बुरा तो नहीं मानोगे।''

''नहीं बताओ''

''आज मैं तुमसे आखिरी बार बात करूंगी।''

''वह क्यों?'

क्योंकि कल जब तुम्हारी पत्नी को यह सब पता चलेगा तो मैं उसकी नजरों में गिर जाउॅगी। और अगर मैं तुमसे इसी तरह बात करती रहूँगी तो मेरा काम मैं यहाँ मन नहीं लगेगा। फिर तुम्हारा भी वही हाल होगा। इसलिये हमें एक दूसरे को भुला देना चाहिए।''

''हम दोनो अच्छे दोस्त की तरह भी तो बात कर सकते है।''

''वह हम और तुम मान सकते हैं। मगर समाज इसे नजायज रिश्ता ही कहेगा।''

''क्यों हर बार तुम दूसरों के लिए मुझे त्याग देती हो कभी मेरे बारे में क्यों नहीं सोचती। क्यों नहीं मेरे लिए दूसरों को त्याग देती हो।''

''अपने लिए जीना कोई जीना नहीं होता जो दूसरों के लिए जीता है वही जीना हुआ। फिर जब प्यार के लिए त्याग करते है वही सच्चा प्यार है।'' इतना कह उसने फोन काट दिया था।

पॉच दिन बाद संगीता को मिट्ठू का पोस्ट मिला था। उसने किताब को देखा उसे अपने अटैची में छुपाकर रख दिया था।

मिट्ठू सोचता है संगीता को जब भी मेरी याद आती होगी तो वह मेरी किताब जरूर पढ़ती होगी। कभी ना कभी वह मुझे फोन पर मेरी किताब के विषय में कहेगी।

संगीता ने किताब को कभी अटैची से नहीं निकाला था। वह हमेशा डरती रही थी कही मेरे पति इस किताब को देख ना ले। वह पेपर बेचने वाले का इंतजार कर रही थी जब कभी भी वह आयेगा तो पेपर के साथ इस किताब को भी दे दूंगी। मगर सप्ताह भर बीत गया था। पेपर वाला नहीं आया था। उसने सोच लिया किताब को जला दूंगी

इसी बीच संगीता का पति राकेश आ गया था। तीन दिन रहने के बाद वापस चला गया था।

अगले दिन पेपर वाला आ गया था। संगीता पेपर को वजन करने को देकर अंदर कमरे में अटैची से किताब लेने चली गई थी। वह अटैची में देखती है वह किताब नहीं है। वह पूरी अटैची के कपड़े उलट देती है। मगर किताब नहीं मिलती है। संगीता को काटो तो खून नहीं। कुछ ऐसी स्थिति हो गई थी। वह घर का पूरा कोना- कोना छान मारती है पर किताब नहीं मिलती है। वह सोच में पड़ जाती है आखिर किताब गई कहा। हालत ऐसी की वह किसी से पूछ भी नहीं सकती थी। सो चुप हो गई थी।

पेपर वाला वजन के हिसाब से पैसे देकर चला जाता है।

वह उस दिन बार -बार याद करती है कि किताब तो मैंने अटैची में ही रखी थी। ऐसा तो नहीं किसी ने किताब को अटैची से निकाल लिया है। पर मेरी अटैची को मेरे सिवा कोई हाथ नहीं लगाता है।

करीब पन्द्रह दिनों बाद संगीता के पति दोबारा वापस आते है। रात के भोजन के वक्त कहते है,मैंने वह किताब पढी बहुत अच्छा उपन्यास था।'' इतना सुनते ही संगीता दंग रह गई। उसकी इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि वह पूछती आप किताब को कब लेकर चले गये। वह चुप रही। वह किताब की तारीफ करते जा रहे थे। वह संगीता को कहने लगे इस किताब को तुम भी पढना,एक लड़की जो एक लड़के से बेहद प्यार करती है मगर अपने मां-पिता से कुछ नहीं कह पाती है। और मां-बाप की एक ऐसे पसंद के लड़के से शादी करती है जिसे वह जानती नहीं और कभी देखा नहीं। उसे अपनी पूरी जिंदगी सौंप देती है। जैसे लड़के लड़की की अपनी कोई पसंद ना पसंद होती ही नहीं है। मां-बाप जिसके साथ हाथ बांध दे उसके साथ जिंदगी बितानी पड़ती है। आज भी हमारा समाज कितनी पुरानी सोच रखता है।

 

परिचय

नाम- विक्रम सिंह

जन्म- 1 जनवरी 1981,जमशेदपुर झारखण्ड

शिक्षा- मैकेनिकल इंजीनियरिंग।

प्रकाशन- वारिस ;कहानी संग्रहद्ध2013,समरलोक,सम्बोधन,किस्सा,अलाव,देशबन्धु,प्रभात खबर,जनपथ,सर्वनाम,वर्तमान साहित्य,परिकथा,आधरशिला,साहित्य परिक्रमा,जाहन्वी,परिंदे इत्यादि पत्र-पत्रिकाओ में कहानियॉ प्रकाशित। एक कहानी परिकथा के जनवरी नव लेखन अंक के लिए स्वीकृत। तथा एक कहानी कथाबिंब में स्वीकृत। एक कहानी माटी पत्रिका में स्वीकृत।

सम्प्रति- मुंजाल शोवा लि.कम्पनी में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत

सम्पर्क- बी ब्लॉक-11,टीहरीविस्थापित कालोनी,ज्वालापुर,न्यू शिवालिकनगर,हरिव्दार,उत्तराखण्ड,249407

bikram007.2008@rediffmail.com

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  1. बहुत अच्शा उपन्यास था लेखक साहब । मुझे लगतां हे कही न कहि यह सत्य आपके साथ हुआ हे । यही हकीकत हे गांव में आज भी ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वर्तमान सामजिक यथार्थ को दर्शाती सुन्दर कहानी |

    उत्तर देंहटाएं

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