गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

रामवृक्ष सिंह का आलेख - अंग्रेजी माध्यम से हिन्दी सीखने के खतरे

आलेख

अंग्रेजी माध्यम से हिन्दी सीखने के खतरे

डॉ. रामवृक्ष सिंह

आज़ादी के समय भारत में कुल 1652 भाषाएँ थीं। विभिन्न कारणों से इन भाषाओं की संख्या निरन्तर कम होती चली गई है और अब देश में लगभग सौ भाषाओं के अस्तित्व में रह जाने की बात की जा रही है। इनमें से 22 भाषाएँ संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हैं। इन 22 भाषाओं में अंग्रेजी कहीं भी नहीं है। संविधान की आठवीं अनुसूची में कहीं न होकर भी अंग्रेजी हमारे देश में आज हर जगह है। लॉर्ड मैकॉले को बधाई हो। आप अपनी कुचाल में सफल रहे, सर।

बाज़ार-आधारित मुक्त अर्थ-व्यवस्था में कोई भी पण्य, जिन्स अथवा सेवा अपनी गुणवत्ता और आर्थिक मूल्यवत्ता आदि के दम पर कायम रहती है। नैतिकता, सांस्कृतिक मूल्य, भाषा आदि के मसले भी इससे अछूते नहीं हैं। इस देश का आम नागरिक अपनी-अपनी भाषा का जानकार होते हुए भी, उससे अनभिज्ञता दर्शाने और अंग्रेजी में पूर्णतया पारंगत न होते हुए भी उससे अनुराग बढ़ाने में गुरेज़ नहीं करता, तो इसका एक कारण यह भी है कि अंग्रेजी आज बाज़ार की भाषा है। अंग्रेजी की जानकारी हो जाने पर आप कंप्यूटर अच्छे से चला सकते हैं, मोबाइल और अन्य बहुत-से यंत्रों के कुंजी-पटल को संचालित करने की योग्यता आप में आ जाती है। हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के साथ यह सुविधा नहीं है। अंग्रेजी में केवल 26 अक्षर हैं, जबकि देवनागरी में उसके दुगने से भी अधिक। अंग्रेजी में मात्राएँ नहीं होतीं, इसलिए उसके संक्षेपाक्षर एवं परिवर्णी शब्द बनाना आसान है, देवनागरी में यह असंभव नहीं, किन्तु दुष्कर तो है ही। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि अंग्रेजी फैशन में है। हिन्दी आउट ऑफ फैशन है। जिस संस्कृत को हम दुनिया की सबसे वैज्ञानिक एवं कंप्यूटर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त भाषा स्वीकार कर चुके हैं, उसके व्यवहर्ता आज इस देश में केवल 14000 रह गए हैं। यानी संस्कृत तो अब विलोपन के कगार पर है। बनैले जानवरों को लुप्त होने से बचाने के लिए हमारी सरकारें अपनी पूरी ताकत झोंक देती हैं। आशा है कि इस देश की मनीषा की धरोहर- संस्कृत को बचाने के लिए भी गंभीर प्रयास किए जा रहे होंगे।

फ़ैशन में होने और वर्तमान यंत्र-प्रधान वातावरण में काम करने के लिए अधिक अनुकूल होने के कारण आज देश के प्रायः सभी राज्यों और सरकारी तथा निजी, हर प्रकार की प्राथमिक शालाओं में राज्य की प्रतिनिधि भाषा के साथ-साथ, अंग्रेजी के भी शिक्षण की व्यवस्था की गई है। राज्य की प्रतिनिधि भाषा इसलिए कहा जा रहा है कि अकसर बच्चों की मातृभाषा (मातृ-बोली) अलग होती है और प्रान्त की भाषा अलग। उदाहरण के लिए मेरी मातृभाषा (या बोली) भोजपुरी है, किन्तु मेरे प्रान्त की भाषा हिन्दी है। मेरी ग्राम्या माँ मुझसे भोजपुरी में बात करती है, मैंने शुरुआती भाषा-ज्ञान माँ से पाया और वह भोजपुरी का ही था। बाद में जब मैं पढ़ने गया तो हिन्दी से परिचय हुआ। और यकीन जानिये, वह हिन्दी भी किसी अंग्रेजी से कम नहीं थी- उतनी ही अपरिचित, उतनी ही दुरूह, उतनी ही बेगानी।

हिन्दीतर भाषी प्रान्तों में बच्चे पहले अपनी प्रान्तीय भाषा सीखते हैं, फिर अंग्रेजी और उसके बाद यदि उनके स्कूल में प्रावधान हुआ तो हिन्दी। इन स्कूलों में हिन्दी सीखने का माध्यम बच्चों की स्व-भाषा, प्रान्तीय भाषा नहीं, बल्कि अंग्रेजी होती है। ‘हिन्दी को बुधुआ की लुगाई न बनने दें’ शीर्षक मेरे लेख पर प्रतिक्रिया करते हुए छत्तीसगढ़ से तेलुगु-भाषी (हाँ वे तेलुगु-भाषी हैं, पर छत्तीसगढ़ में रहते हैं) श्री रंगराज अयंगार ने लिखा कि हिन्दीतर भाषी रोमन में लिखित हिन्दी सीखेंगे तो उन्हें सुविधा होगी। इस प्रपत्ति में एक जोखिम अन्तर्निहित है। भारत के हिन्दीतर भाषी जन-समुदाय को रोमन के माध्यम से हिन्दी सिखाने के लिए पहली पूर्वापेक्षा यह होगी कि वे पहले अंग्रेजी सीखें और उसकी बारीकियों को भी पकड़ें। सतही ज्ञान से काम नहीं चलने वाला। a का उच्चारण अ, आ, ए, ऐ में से क्या होगा, यह वे कैसे जानेंगे? Hou का उच्चारण क्या होगा- हाउ (जैसे हाउस में) या ऑ (जैसे ऑनर में) या आ (जैसे आ’र- an hour में)? C का उच्चार क होगा (जैसे कैट में) या स (जैसे सिरील- cereal) में? d का उच्चारण द होगा या ड। अंग्रेजी के हर अक्षर के साथ यही दुविधा है। आप रोमन वर्णमाला के माध्यम से देवनागरी एवं अन्य भारतीय लिपियों के अक्षरों का अंकन कैसे करेंगे? और यह व्यायाम करने की ज़रूरत क्या है? भाषा हमारे जीवन के विभिन्न कार्य-व्यापारों के संचालन-संपादन का एक माध्यम मात्र है। क्या हम अपने देश के आम नागरिकों से यह उम्मीद करें कि वे अपना अमूल्य जीवन किसी अन्य काम में न लगाकर, बस भाषा की बारीकियाँ सीखने में ही सर्फ़ कर दें?

माननीय श्री रंगराज अयंगार से फोन पर बात करके मैंने उनसे विनम्रता पूर्वक पूछा कि श्रीमन् आपकी मातृभाषा क्या है? वे बोले –तेलुगु। इसके बाद मैंने उनसे तेलुगु में ही बात की और तेलुगु तथा हिन्दी की वर्णमाला की एकरूपता की ओर उनका ध्यान दिलाया। तेलुगु और हिन्दी के स्वर तथा व्यंजन बिलकुल एक जैसे हैं। केवल लिपि का अंतर है। अलबत्ता तेलुगु में ए और ऐ के मध्य एक और स्वर है। इस प्रकार उसकी स्वन-व्यवस्था और लिपि-वैविध्य हिन्दी-देवनागरी से भी अधिक समृद्धता लिए हुए है। इसलिए यदि किसी तेलुगु-भाषी को हिन्दी सीखनी हो तो बेहतर होगा कि वह तेलुगु से सीधे-सीधे हिन्दी सीखे, न कि पहले अंग्रेजी सीखे और फिर अंग्रेजी के माध्यम से हिन्दी। यह तो ऐसे ही हुआ कि जैसे किसी को विजयवाड़ा से चेन्नै जाना हो तो पहले वह फ्लाइट से दिल्ली आए और फिर दिल्ली से चेन्नै की फ्लाइट लेकर चेन्नै पहुँचे। क्या यह बेहतर नहीं होता कि वह विजयवाड़ा से सीधे चेन्नै ही चला जाए? यदि फ्लाइट न हो तो ट्रेन से ही सही। इसमें धन, समय, प्रयास, परिश्रम- हर संसाधन की बचत होगी। हाँ, ऐसे व्यक्ति का तो कुछ नहीं किया जा सकता, जो दुराग्रही है और दिल्ली के रास्ते ही चेन्नै जाने पर आमादा है।

वैसे भी, हिन्दी एवं हिन्दीतर भारतीय भाषाओं की वाक्य-रचना में विभिन्न व्याकरणिक अवयवों की अवस्थिति एक-जैसी होती है, जबकि अंग्रेजी वाक्य-रचना का स्वरूप बिलकुल अलग होता है। नीचे के उदाहरण में किए गए वाक्य-विश्लेषण से इस बात को समझा जा सकता है।

भाषा

कर्ता

कर्म

क्रिया

हिन्दी

मैं

कविता

लिखता हूँ।

तेलुगु

नेनु

कवित्वं

व्रासिस्तानु।

बांग्ला

आमी

कविता

निखेची।

गुजराती

हूँ

कविता

लिक्खूं सूं।

पंजाबी

मैं

कविता

लिखदां हां।

अंग्रेजी

आइ

पोएट्री/पोएम

राइट

(भारतीय भाषाओं का सापेक्षा अंग्रेजी वाक्य के पद-क्रम का व्यतिक्रम यहाँ साफ दिख रहा है।)

संविधान की आठवीं अनुसूची में परिगणित कतिपय भाषाओं से लिए गए उक्त उदाहरणों से स्वतः स्पष्ट है कि अपनी-अपनी प्रान्तीय भाषाओं से हिन्दी सीखना हम हिन्दुस्तानियों के लिए बहुत आसान रहेगा, बनिस्बत इसके कि हम पहले अंग्रेजी सीखें और उसके बाद तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी के माध्यम से हिन्दी सीखें।

गोरखपुर के आदरणीय शिक्षक (अवकाश-प्राप्त) श्री शेषनाथ प्रसाद ने मेरा ज्ञान-वर्द्धन करते हुए, मेरे उपर्युक्त लेख पर प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने बताया है कि श्री सुनीति कुमार चाटुर्ज्या ने बहुत पहले रोमन में हिन्दी लिखने की हिमायत की थी। परम आदरणीय मास्टरजी के प्रति प्रणाम निवेदित करते हुए मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि हिन्दी साहित्य का समर्पित विद्यार्थी होने के नाते डॉ. चाटुर्ज्या की पुस्तक ‘भारतीय आर्य-भाषा और हिन्दी’ पढ़ने का सौभाग्य मुझे भी मिला है और मैंने जान-बूझकर अपने संदर्भाधीन आलेख में डॉ. चाटुर्ज्या की स्थापनाओं का उल्लेख नहीं किया है। गुरुजी, यदि पढ़ा-लिखा नहीं होता तो मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए. हिन्दी ऑनर्स, एम.ए. हिन्दी और तदुपरान्त एम.फिल. में टॉप नहीं कर पाता। बिना पढ़े-लिखे मुझे भारतीय स्टेट बैंक में महाप्रबन्धक (राजभाषा) का पद नहीं मिल गया होता। तथापि मेरी ज्ञान-पिपासा सर्व-ग्रासी है, ठीक वैसे ही जैसे श्री प्रभाकर श्रोत्रिय के शब्दों में ‘कबीर की आध्यात्मिक क्षुधा सर्वग्रासी है’। मैं परम आदरणीय श्री शेषनाथ प्रसाद जी से इस विषय में और अधिक ज्ञान पाने की आकांक्षा रखता हूँ। उन्होंने ‘हिमांशु’ शब्द की जो व्युत्पत्ति बताई, वह यदि श्री रंगराज अयंगार जैसे प्रबुद्ध हिन्दी-सेवी को ज्ञात नहीं थी, तो श्री अयंगार उन्हें अलग से धन्यवाद ज्ञापित कर सकते हैं।

अंग्रेजी माध्यम से हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाएं सीखने में बहुत-से खतरे भी निहित है। सबसे बड़ा खतरा तो संज्ञा पदों के सही उच्चारण का है। अंग्रेजी में जाने के बाद भारतीय शब्दों की क्या स्थिति हुई, इसे देखना हो तो बॉम्बे (मुम्बई), कैलकटा (कोलकाता), हायड्राबैड (हैदराबाद), लकनाउ (लखनऊ), कॉनपोर (कानपुर), डेली (देहली- दिल्ली), बैंगलोर (बेंगलूरु), वाइजाग (विशाखपट्टणम) आदि को लें। अंग्रेजी और रोमन की कृपा से हमारे हजारों नाम विरूपित हो चुके हैं। राम बन गए रामा, कृष्ण हो गए कृष्णा। राधा भी एक दिन रैदा बन जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं। आपको मालूम होना चाहिए कि तेलुगु में अंकित ‘गीता’ रोमन में Githa हो जाती है और वहाँ से हिन्दी में पहुँचती है तो स्वभावतः ‘गीथा’ बन जाती है। गुंटूर की एक कॉलोनी का नाम है –कन्नावारि तोटा, रोमन में लिखा गया Kannavari Thota, हमने उसे लिखा ‘कन्नावारी ठोटा’। संस्कृत में अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा के प्रति सचेत रहनेवाले समुदायों के लिए ये बातें बहुत मायने रखती हैं, किन्तु जिस समाज ने अपने जातीय गौरव और राष्ट्र-प्रेम को ही तिलांजलि दे दी हो उसके लिए इन बातों का कोई मोल नहीं। अपनी-अपनी भाषाएं त्यागकर अंग्रेजी के लिए पलक-पाँवड़े बिछाने वाले हिन्दुस्तानी इस बात को शायद नहीं समझ पाएँगे।

बहरहाल, उपर्युक्त उदाहरणों से यह तो सिद्ध होता ही है कि यदि हिन्दीतर भाषियों को हिन्दी सीखनी है और इसके विलोमतः यदि हिन्दी-भाषियों को अन्य भारतीय भाषाओं का ज्ञान अर्जित करना है तो उन्हें सीधा रास्ता अख्तियार करना चाहिए, यानी एक भारतीय भाषा के माध्यम से ही दूसरी भारतीय भाषा सीखनी चाहिए और अंग्रेजी को उठाकर एक और रख देना चाहिए, क्योंकि उसकी वर्णमाला में इतनी सामर्थ्य नहीं कि वह हमारी भाषाओं की वर्णमाला का स्थान ले सके, न ही उसका वाक्य-विन्यास हमारी भाषाओं के वाक्य-विन्यास से मेल खाता है।

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6 blogger-facebook:

  1. सम्मान्य बंधु,
    मेरी टिप्पणी ने आपको क्षुब्ध कर दिया. इसके लिए मुझे खेद है.
    मेरी मंशा इतनी ही थी कि मैं उस प्रश्न को लेकर बीते समय में विद्वानों में धारासार बहसें हो चुकी हैंं.
    अगर आपकी गरिमा को ठेस न लगे तो आप अपने इस वाक्य पर पुनर्विचार कर लें-- "मेरी ज्ञान पिपासा सर्वग्रासी है". पिपासा 'सर्वग्रासी' अथवe 'सर्वग्राही'.

    उत्तर देंहटाएं
  2. डॉ. साहब,
    आप यह मत सोचिए कि कोई हिंदी सीखने के लिए पहले अंग्रेजी सीखता है. लेकिन जान लीजिए कि दक्षिण भारतीयों की पकड़ अंग्रेजी में बेहतर होती ही है, वह वहाँ की दूसरी भाषा सम है. इसीलिए वे जानी पहचानी भाषा के सहारे हिंदी में प्रवेश करते हैं, जो उन्हें आसान लगता है. जहाँ तक मेरा मानना है कि किसी भी रास्ते आए, पर यदि कोई हिंदी के पास आता है तो हिंदी द्वारा ( हिंदी भाषियों द्वारा) स्वागत होना चाहिए. वह नहीं ही आता तो...??? आने पर स्वागत हो तो शायद वह आगे भी बढ़े. मुझे किसी भी रास्ते हिंदी के द्वारे आने पर आपत्ति नहीं है. खुशी है कि हिंदी के प्रति उसका रुझान हुआ या बढा.

    अयंगर.
    laxmirangam.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  3. श्री अयंगर जी,
    सिंह जी के पिछले लेख की टिप्पणी में मैंने आपका समाधान कर दिया था पर आपको समझ में नहीं आया. उसी स्थल पर मैंने फिर से उसे विस्तार से व्याकरण का नियम देकर समझा दिया है. यहाँ भी दे देरहा हूँ-
    हिमांशु को हिमांशु की तरह ही लिखा जाएगा पञ्चाङ्ग की तरह नहीं.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शेषनाथ जी ,
      सादर धन्यवाद व विनीत,
      कृपया लिंक देखें.
      http://www.hindikunj.com/2015/02/language-script.html
      पुनराभिवादन,,
      अयंगर.

      हटाएं
  4. आभार।
    कोई भी व्यक्ति हिन्दी इसलिए नहीं सीखता कि उसे हिन्दी को उपकृत करना है। अपने-अपने निजी हित के लिए हम भाषाएं ही नहीं अन्य ढेरों कौशल सीखते हैं। जिसे जैसी सीखनी हो, सीखे।
    आप दोनों को बहुत-बहुत धन्यवाद। इस प्रकरण का पटाक्षेप करते हैं। सादर,

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. डॉ. साहब,
      कृपया लिंक देखें.
      http://www.hindikunj.com/2015/02/language-script.html
      आपकी बात सही है कि हर इंसान अपने मतलब से ही कुछ भी सीखता है.
      सादर,

      अयंगर.

      हटाएं

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