गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

पुस्तक समीक्षा - खो गई गीली हॅंसी की चिंता

खो गई गीली हॅंसी की चिंता
कुमार कृष्णन

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आज हिन्दी ग़ज़ल हमारे समक्ष विभिन्न रूपों में नए—नए कथ्य लेकर उपस्थित हो रही है और हिन्दी की अन्य विधाओं के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है। जहां तक इसके कथ्य सम्प्रेषण की बात है तो यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि हिन्दी ग़ज़ल के साथ मनुष्यता की संपूर्ण विरासत उपस्थित है। यह कहने में कोई आपत्ति नहीं है कि साहित्य का संपूर्ण सौन्दर्याभास का एक खुला दस्तावेज इसके भीतर समाहित है। यह उर्दू से होते हुए हिन्दी में आयी है। इसका इतिहास हिन्दी में पुराना नहीं है, लेकिन गैर विधा से हिन्दी में आगमन होने पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से भी उर्दू लेखन शैली का इसके उपर प्रभाव नहीं है। नवीन विचारधारा, समसामयिकता और लालित्य के बीच हिन्दी में यह अपना स्थान बनाने में सफल हुई है। उदाहरण के रूप में हम घ्रुव गुप्त की ग़ज़लों को ले सकते हैं। ध्रुव गुप्त एक पके हुए ग़ज़लकार हैं। उनकी ग़ज़लों की गहराई में कई पड़ाव से होकर गुजरने पड़ते हैं। उनका हाल में ही प्रकाशित ग़ज़ल ' मुझमें कुछ है जो आईना सा है' राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली से  छपकर आया है। संग्रह में कुल नब्बे ग़ज़लों और नज्मों से गुजरने के पश्चात यह सहज ही वोध होता है कि संपूर्ण ग़ज़लें आम जीवन की खिडकियों से झांकते हुए जीवन की सौन्दर्य भरी उम्मीद की कल्पना करती है। ध्रुव गुप्त की उम्मीद में कल्पना एक भूल जानेवाला स्वपन नहीं , बल्कि यथार्थ के आंचल तले सुगबुगाहट के रूप में प्रतीत होती है। मिसाल के तौर पर—


तुम अॅगीठी लेके बैठो अपने खेतों के करीब
हम शहर से लौटकर किस्से सुनाने आएंगे
+++++++++++++++++++++++++++++
गरचे सन्नाटा था अपने दरमियां भी रात भर
दूर से उठती हुई कुछ आहटों में कौन था


उपरोक्त वर्णित शेरों में सौन्दर्यपरक रूप—रंग उभरकर सामने आया है। शहर और गांव को ग़ज़लकार ने एक महीन धागे में पिरोने का सफल प्रयास किया है। आज साहित्य में शहर और गांव की कल्पना अलग— अलग नजरिये से की जाती है। एक ओर जहां शहर नकारात्मक प्रतीक का द्योतक है,वहीं गांव सकारात्मक मूल्यों पर आधारित एक चित्र है। दोनो के प्रति ग़ज़लकार के भीतर एक बेहतर तालमेल बैठाने की चिंता है। दरअसल में ध्रुव गुप्त की शायरी की एक बड़ी ताकत है लोक। लोक गांव का नगर का। ग़ज़लकार के इस लोक में सम्बन्ध— सरोकार, दु:ख—आग और आवारगी तथा दूब—भर उम्मीद के विभिन्न रूप—रंग और आयामों के अन्दाजे—बयां सुर में सृजन सा नजर आते हैं। लफ़्जों की आंखों और जुबॉं से पता चलता है कि लोग यहां अपने ख़्वाबों के लिये जीते भी हैं, मरते भी हैं और मारे भी जाते हैं। वहीं दूसरे शेर में समकालीन परिस्थितियों में हर किसी के भीतर सन्नाटे का चित्र उपस्थित होता है। इस चित्र को ग़ज़लकार ने उपस्थित करते हुए किसी के होने की आहट का बोध करवाते हुए अपने भीतर एक कल्पना को जन्म दिया है, जो कल्पना यथार्थ की जमीन पर साकार हो जाने का भी संकेत देती है।
संग्रह के प्रत्येक ग़ज़ल में ग़ज़ल के सौन्दर्यबोध के साथ— साथ ग़ज़लकार  की प्रगतिशील चिंता भी उभरकर सामने आयी है


एक ज़रा परदा हटाकर देखिए
किसलिए आंखें चुराकर देखिए
+++++++++++++++++++
अपना चेहरा भी बड़ा अनजान है
आईना घ्रर में लगाकर दे​खिए


यह जाहिर है कि साहित्य का मूल उद्देश्य आमजीवन की जटिलताओं को विश्लेषित करते हुए एक प्रगतिशील चिंता और जीवन सौन्दर्य का दरबाजा खोलना है।ग़ज़लकार में आत्मविश्वास है।


हमारा जिस्म मिट्टी का का पता है सबको
रगों में दौड़ता फिरता ये आसमां क्या है


इस दृष्टि से ' मुझमें कुछ है जो आईना सा है' की ग़ज़लों और नज्मों को सफलता मिली है। इसके पाठ के बाद पाठक को सकून की एक नई दुनिया दिखाई देगी। साथ ही हिन्दी ग़ज़ल के विकास में संग्रह ​की ग़ज़लें मील का पत्थर साबित होगी।


समी​क्षित कृति:— मुझमें कुछ हे जो आईना सा है
  ग़ज़लकार :— ध्रुव गुप्त
प्रकाश​क:—राधाकृष्ण प्रकाशन, 7/31 अंसारी मार्ग,
        दरियागंज, नई दिल्ली

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