सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

राजेश कुमार पाठक की कहानी - बंटवारा

बंटवारा
    विजय मैंट्रिक की परीक्षा पास कर अपने गांव के बगल वाले शहर से सटे कॉलेज में दाखिला लेना उचित समझा। कारण यह था कि ऐसा कर वह अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी दादी की देखभाल भी समुचित तरीके से कर सकता था। उसकी दादी मां भी ऐसी थी कि उसके बिना वह एक पल भी गुजारने में असहज महसूस करती थी। विजय के पिता गैर सरकारी स्कूल में काम चलाऊ पगार पर एक शिक्षक थे जो गांव से दूर एक शहर में स्थित था


    विजय के बड़े बाबूजी एवं उसके पिता के बीच घर एवं संपत्ति का बंटवारा हो चुका था। उसे अब भी याद है कि जब सारी साझी संपति का बंटवारा हो चुका था तो दादी मां ने गुस्से में आकर कहा था-'सब कुछ जो साझा था उसका तो बंटवारा तुम दोनों ने कर डाला। मैं भी तो साझी हूँ। मां तो दोनों भाईयों की हूँ। बता मेरा बंटवारा कैसे करेगा ? क्या मुझे डगरे के बैगन की तरह कुछ दिन इसे और कुछ दिन उसके साथ बिताने कहोगे ? बंद करो यह सब। मैं बंटवारे को नहीं मानती। क्या सब बांटा तुम दोनों ने ? क्या-क्या किसके पल्ले पड़ा ? वही दो बीघे जमीन में एक बीघा छोटे को ओर एक बीघा बड़े को। और था ही क्या तेरे पास ? अब बता मुझे कैसे बांटेगा? क्या मेरे भी दो टुकड़े करेगा ?' दादी मां की आँखें नम हो गयी थी। वह और भी कुछ बालना चाह रही थी पर रूँधे स्वर जुबान नहीं बन पा रहे थे।


    मुझे याद है उन दोनों पर दादी मां के ह्दय में बंटवारे के चलते उमडी पीड़ा भी असहनीय दिख रही थी। बंटवारा होना था तो हुआ। पंचों ने फैसला देते हुए कहा कि मां किसकी ओर रहेगी यह लॉटरी बतायेगी। उसने दोनों बेटों के नाम के पुर्जे बनाए और एक छोटे नादान बच्चे से उस पुर्जे को उठा लेने को कहा। उठाये गए पुर्जे में विजय के पिता का नाम लिखा था। पंचों ने बंटवारे पर अंतिम मुहर लगाते हुए दो संयुक्त परिवार को अलग-अलग विखंडित कर अपने को सफल बंटवारा करवाने का गुमान पाले उस स्थान को छोड़ चला था। दादी मां के टुकड़े ना होकर भी विभाजन हुआ था।  अब वह और विजय उसके हिस्से आये क कमरे में साथ-साथ रहने लगे। साथ खाना, साथ सोना। दोनों की यही दिनचर्या बनने लगी। दादी मां विजय को दादी और मां दोनों की ही ममता उंडेलते रहती। विजय भी खुश रहने लगा। दादी मां के हाथ की बनी सब्जी-रोटी हो या सिर्फ रोटी और उसमें लपेटी नमक-तेल उसे सब भाने लगा।


    इधर विजय के बड़े बाबूजी अपने क्रूर स्वभाव को पाले जब-तब दादी मां को भी नहीं बख्शते थे। बात-बात में लड़ते रहते थे। बड़ी मां तो और उनके क्रोध के आग में चुगली की घी भर-भर कर दादी मां के विरूद्ध ज्वाला भड़काती रहती। बड़े बाबूजी का भी एक बेटा था-अजय। दुनिया को नहीं मालूम पर मुझे तो सब मालूम था कि दादी मां उसे भी उतना ही प्यार करती थी जितना कि वह मुझे। पर बड़ी मां थी कि वह अजय और दादी मां के मधुर संबंधों को भी कटुतापूर्ण एवं बढ़ा-चढ़ा के बड़े बाबूजी के पास रखती थी जिससे वे बड़े उद्वेलित होते रहते थे।


    वक्त के साथ अजय और विजय को यह अहसास होने लगा था कि दादी मां उन दोनों को बेंइंतहा प्यार करती थी। उन्हें उन दानों में ही बेटे और पोते होने का सुकून मिलता था। दादी मां स्वस्थ रहे इसके लिए विजय के बाबूजी एक ग्वाले के यहाँ से आधा लीटर दूध नियमित पहुँचाने को कह रखा था। दादी मां को दूध में रोटियां डालकर खाने में अतिशय संतुष्टि मिलती थी। अजय के बाबूजी पूर्णरूप से खेती एवं कुछ लोगों के यहाँ पुरोहित वृति से अपना घर किसी तरह चला पा रहे थे। इधर कुछ मौसम की मार के चलते पैदावार भी मन लायक नहीं हो सकी थी। सच कहूँ तो उनकी माली हालत खस्ता होते जा रही थी पर दादी माँ को विजय के बाबूजी के चलते खान-पान जहाँ तक दूध आदि मिलने में कोई कोर कसर नहीं रह रही थी।


    दादी मां मन ही मन सोचती अजय का इसमें क्या दोष? सो वह चोरी-छिपे ही सही अपने हिस्से वाले दूध से थोड़ा बहुत दूध अजय को पिला ही देती। ऐसा करने से उसे अजब का सुकून मिलता था। आखिर वह भी तो उसका पोता था। अजय के मना करने पर भी वह उसकी बात नहीं मानती थी। अजय कहता-'दादी मां, यह सब क्यों करती हो ? यह दूध तो तेरे लिए आता है। फिर विजय भी तो दूध नहीं लेता है। उसे तो तुम दूध नहीं देती क्या ? तुम भूल गई हो कि तुम मेरे हिस्से नहीं पड़ी हो। पंचों ने तो तुम्हें विजय के बाबूजी के हिस्से डाल दिया है। छोटे बाबूजी को यह सब पता चला तो मुझे क्या, तुझे दूध मिलना भी बंद हो जाएगा।'


    कैसे पता चलेगा ? मैं विजय को थोड़े ही बताती हूँ। वह तो पढ़ाकू है। पढ़ने-लिखने में ही इतना व्यस्त रहता है कि उसे पता ही नहीं चलता कब शाम और कब सुबह हुआ ? दादी मां ने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा। पता चल भी जाए तो क्या होता है ? तू अपनी तुलना दो तोले दूध से करता है। मैं दूध छोड़ सकती हूँ, तुझे नहीं।
    पर मैं नहीं चाहता कि मेरे चलते तुम पर कोई आफत आए, अजय ने गंभीरता से कहा।


    विजय अपनी पढ़ाई के साथ-साथ दादी मां और अजय के इस तरह वार्तालाप करते अक्सर  चोरी-छिपे देख-सुन ही लेता था। वह मन ही मन कहता-वाह री, दादी मां। कितना विशाल है तेरा ह्दय। तुझे क्या पता तेरी ऐसी हरकत से मुझे कितनी उर्जा मिलती है ? आज सचमुच में मुझे अहसास हो रहा है कि तन बंट सकता है, धन बंट सकता है पर मन अगर चाह ले तो वह नहीं बंट सकता। मुझे तो अब शक होने लगा है कि दोनों बापुओं के रगों में तेरा भी खून दौड़ता है या नहीं ? माफ करना दादी मां, यह सब मैं मन में सोचता हूँ। बोलकर पाक रिश्तों को नापाक करना नहीं चाहता। तुझे क्या पता मैं अजय से कितना प्यार करता हूँ। बस प्यार करता हूँ उसका इजहार नहीं कर पाता। डरता हूँ। बड़े बाबूजी इसे किस रूप में लेंगे। उन्हें तो पता चलते ही रहना चाहिए कि हम दोनों के बीच बंटवारा जो हुआ है।


    हर रोज की तरह आज भी अजय दादी मां के साथ अपने मां-पिता से नजरें चुराये दूध-रोटी खा ही रहा था कि अचानक उसके कंठ में आयी हिचकी और उसके चलते उल्टी ने दादी मां को निष्प्राण कर दिया। अजय दूध के साथ खून की उल्टी करने लगा। दादी मां की आँखें फटी की फटी रह गयी। अजय परेशान हो विजय के घर से बाहर निकलकर मां, दादी मां कह कर चिल्लाना शुरू कर दिया। अगल-बगल, आस-पड़ोस के लोग वहां जुट गए। भीड़ लग गई। बड़े बाबूजी को यह समझते देर ना लगी कि अजय दादी मां के साथ दूध रोटी खाते-खाते ऐसी अचेतन अवस्था में आ चला था। अपने बेटे की ऐसी हालत देख बड़ी मां दादी मां पर बिफर पड़ी। कहने लगी-'बड़ी शौक है छोटे बच्चे के साथ खेलने का तुझे। पैदा ही क्यों नहीं कर लेती है ? बूढ़ी हो चली है, पता भी है तुझे ? बच्चे को होने दो कुछ, फिर बताती हूँ। दूध रोटी दे देकर मेरे बच्चे को ही खा जाना चाहती हो ना ? तो खा जाओ। फिर देखना सरेआम तेरा सिर मुड़वाकर पूरे गांव में नहीं घुमाया तो मैं भी असली बाप की बेटी नहीं।'


    बड़ी मां की ऐसी घटिया बोली सुन विजय का माथा सुन्न हो गया था। उसे अजय से ज्यादा दादी मां की चिंता होने लगी जिसे बड़ी मां की कटु बातें सुन कर काठ मार गया था। दादी मां को ऐसा लग रहा था कि धरती फटती और वह उसमें समा जाती। दीदी मां की जिजीविषा मृतप्राय हो चली थी।
    पड़ोस वालों की मदद से गांव के स्वास्थ्य उपकेन्द्र से डॉक्टर आ चुके थे। जाँच करने पर पता चला कि अजय को चोरी-छिपे मिट्टी खाने की आदत थी जिसके चलते उसके अंदर एक नई बीमारी ने अपना स्थान बना लिया था। उल्टी उसी नई बीमारी के चलते हुयी थी। पर बड़ी मां डॉक्टर के उस बात को मानने के लिए तैयार ना थी। उसे तो दादी मां का सिर नीचा दिखाना ही रह गया था सो वह उस पर दोषारोपण करती जा रही थी। अजय को दवा मिलने से कुछ राहत महसूस हो रही थी। इस घटना के बाद बड़ी मां का फरमान जारी हुआ कि आज से अजय दादी मां के दरवाजे नहीं चढ़ेगा।


    इधर दादी मां अंदर ही अंदर बड़ी मां के अपशब्दों के वाण से मर्माहत हो चली थी, घर के एक कोने में बेसुध पड़ी विजय-विजय पुकार रही थी। विजय दौड़ा-दौड़ा दादी मां के पास गया। उसके हाथों को अपने गाल से लगाया तो अतिशय शीतलता महसूस की। शायद यह सच था कि दादी मां इस दुनिया में नहीं रही थी। विजय को लगने लगा कि काश उसे भी दादी मां के साथ दूध रोटी खाने का अवसर मिला होता। वह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसे दर्दनाक मोड़ पर वह किसका सहारा ढूँढ़े। क्या वह बड़े बाबूजी और बड़ी मां से कह डाले कि उसने उसकी दादी मां को सदा के लिए उससे छिन लिया ? रात्रि का समय था। विजय ने जैसे ही दादी मां की मौत की खबर बड़ी मां और बड़े बाबूजी को दी दोनों ही ने मां मां कह कर गगनभेदी स्वर में रोना चिल्लाना शुरू कर दिया। विजय सोच रहा था शायद उनके यह घड़ियाली आँसू रहें हों। जीते जी दादी मां तो आँसुओं की घूँट पीती रही, आपसी संबंधों और बंटवारे को लेकर और आज जब नहीं रही तो.....


    सुबह दादी मां की अर्थी उठ रही थी और उधर दूधवाला हर रोज की तरह उस रोज भी दादी मां के लिए वही आधा लीटर दूध लेकर आ पहुँचा था। पर दूध कौन और किसके लिए ले। दादी मां तो सदा के लिए जा चुकी थी।


राजेश कुमार पाठक
पावर हाउस के नजदीक
गिरिडीह-815301, झारखंड

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  1. एक मर्मस्पर्शी कहानी। सच ही कहा आपने की हर चीज़ का बँटवारा मुमकिन है लेकिन मन का बँटवारा नहीं हो सकता। बधाई स्वीकार करें।

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