शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

दीपक आचार्य का आलेख - ध्वस्त होनी ही है झूठ की बुनियाद

ध्वस्त होनी ही है

झूठ की बुनियाद

dr.deepakaacharya@gmail.com

जीवन की सफलता अपने आप को बड़ा दिखाने या वैभवशाली बनाने में नहीं है बल्कि अपने आप को उस स्थिति में पहुंचाने में हैं जहां हर कोई हृदय से हमें स्वीकार करे, चाहे हमारा उनसे किसी भी प्रकार का संबंध या परिचय हो या न हो।

जिनसे हमारा संपर्क रहा है उन लोगों की बजाय वे लोग ज्यादा नीर-क्षीर विवेक भरा निर्णय रखते हैं जो हमसे किसी न किसी अपेक्षा या उपेक्षा से बंधे या शिकार नहीं हैं।

अपने परिचितों की बजाय एक आम आदमी हमारे जीवन और व्यवहार का फैसला ज्यादा ठीक ढंग से कर सकता है क्योंकि उसे हमसे कोई काम नहीं पड़ता।

बहुसंख्य लोग फैशनी संसार और पूंजीवादियों के अनुरूप अपने आपको ढालने और दिखाने की कोशिश करते हैं और इस चक्कर में उन सभी रास्तों का सहारा लेते हैं जहाँ से पैसों और प्रतिष्ठा की आवक बनी रहती है।

धन-सम्पत्ति, भोग-विलास और उन्मुक्त आनंद की चाह में लोग सारी मर्यादाओं को भुला डालते हैं और उन रास्तों पर चल पड़ते हैं जहाँ से लौटने पर सिवाय पश्चाताप और लुट जाने के अहसास के और कुछ नहीं होता।

और यह वह स्थिति होती है कि जिसमें ज्ञान शून्यता और विवेकहीनता का मलाल हमेशा बना रहता है। भौतिक संपदाओं से परिपूर्ण वैभव और भोग-विलासिता पाने के लिए आजकल लोग क्या कुछ नहीं कर रहे हैं, यह किसी को समझाने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमारे आस-पास खूब सारे लोग हैं जिनका उदाहरण के तौर पर बेफिक्र होकर इस्तेमाल किया जा सकता है।

ये लोग झूठ की प्रतिमूर्ति या झूठ सम्प्रदाय के मठाधीश कहे जा सकते हैं क्योंकि इनके लिए झूठ बोलना न कोई पाप है, न गलत बल्कि झूठ इन लोगों के जीवन व्यवहार का वह अहम हिस्सा है जो दिन ब दिन और अधिक प्रगाढ़ होता हुआ इनकी जिन्दगी में प्रतिष्ठित हो चुका है।

आरंभ में एक गलती या अपराध को छिपाने के लिए आदमी झूठ बोलता है लेकिन बाद में एक सच को छिपाने के लिए हमेशा झूठ का सहारा लेना मजबूरी हो जाता है। अनचाहे भी झूठ का आश्रय ग्रहण करना ही पड़ता है।

जो लोग कुछेक बार झूठ का सहारा ले लिया करते हैं उनके लिए फिर हर बार झूठ का दामन थामना अपरिहार्य जरूरत ही हो जाती है। इन लोगों के लिए सत्य, धर्म और न्याय का कोई वजूद नहीं होता बल्कि अपने काम निकालना और स्वार्थ पूरे करना, अपने भोग-विलास के साधन तलाशना और मौज-मस्ती में रमे रहकर आनंद पाना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य होकर रह जाता है।

अति भोगवादी और भौतिक चकाचौंध में खोकर व अपने आपको डुबो कर आनंद पाने के इच्छुक लोगों के लिए झूठ अपने आपमें वह ब्रह्मास्त्र है जिसका सहारा पाकर वे समय, श्रम और धन आदि किसी पर भी डाका डाल सकते हैं।

झूठ के बूते प्राप्त धन, संसाधन और भोग के आनंद कुछ समय तक उन्मुक्त भोग और मौज-शौक देकर मदमस्त होने का आभास करा सकते हैं लेकिन इनका इससे अधिक कोई भविष्य नहीं होता।

झूठ की नींव पर जिसका जीवन निर्माण होता है वह निर्माण न होकर विध्वंस की भूमिका कही जा सकती है क्योंकि झूठ की बुनियाद पर टिका कोई महल कभी स्थायी नहीं हो सकता है, उसे कभी न कभी तो खण्डहर होना ही है और जब दीवारें गिरने लगती हैं तब  सब कुछ पराया हो जाता है, न भोग-विलास के संसाधन अपने साथ होते हैं न वे व्यक्ति जो हमारा उपयोग करते रहे हैं या हम जिनका उपयोग करते रहे हैं।

झूठ की नींव पर आज तक न कोई टिका है, न टिकने वाला है। बावजूद इसके अंधकार और आसुरी आनंद पाने की तीव्र इच्छाओं के वशीभूत होकर हम सारे के सारे लोग उस दिशा में भाग रहे हैं जिधर किसी न किसी मोड़ पर जाकर भुलभुलैया में भटक कर औंधे मुँह गिरना ही है या फिर पत्थरों से टकरा कर अपनी कपाल रेखाओं को मिटाना ही।

झूठ का जब पर्दाफाश होता है तब अच्छे-अच्छे मजबूत संबंधों की नींव डगमगा जाती है, दिल के दरवाजे खुल जाते हैं ओर तब जो सच सामने आता है वह हमें भी लज्जित कर देने वाला होता है और जमाने भर को भी। झूठ के सहारे कुछ वर्ष जीने का आनंद पा सकते हैं लेकिन कलई खुल जाने के बाद सब कुछ कई गुना विपरीत होने लगता है और जितना आनंद झूठ बोल बोलकर प्राप्त किया होता है। 

जीवन में अंतिम क्षण तक आनंद में रहना चाहें तो झूठ का परित्याग करें। जिन लोगों ने झूठ की बादत ही डाल ली है वे भी प्रायश्चित कर लें और आगे से झूठ और झूठे कर्मों का परित्याग कर दें तो उनका भी समय ताजिन्दगी सुनहरा बना रह सकता है वरना झूठ के सहारे जीने वाले सभी लोगों के रास्ते अंधेरी गलियों और भटकाव की मंजिल तक ही पहुंचते हैं।

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