रविवार, 8 फ़रवरी 2015

अशोक बाबू माहौर की हास्य कविताएँ

1)गधों की टोली में

गधों की टोली में
घुस गए
सज्जन पुरुष
समझकर अपना दल
न जाने और क्या ?
क्या पकड़कर चल दिए ?
लगाते नारे
‘जय हो
गधा महाशय की
जय हो ‘
थर्राते भड़के
मोटे पहलवान
शब्द उछालकर
जुबान से ,
तोड़कर सारी सीमाएँ
मानो उठाकर औजार!
छेदकर सीने को
तिरछी नजरें घुमाकर बोले ,
भाइयों प्यारे -प्यारे गधों
समाज में
कुछ लाना है
समझो इंसान से
गधा बनाना है
लादकर ईंटों के ढेर
पहला काम बताना है !

(2) मास्टर जी

पहेलियाँ बुझाते
मास्टर जी
चौराहे पर
इकठ्ठा किए लोगों को
पागल बनाते
कभी खुद कलम उठाकर
मतवाले ढंग से
गधे पर
मानो निबंध लिखते
निसंकोच मन से !
निचोड़कर सारी बाधाएं
झोले में ,
दूर तक जाते
बाँधकर,गले में घंटी
गधे के
पूजा अर्चना करते
पिघलाकर मन को
चुपके से
बाप बनाते
लगता जैसे कोई
सिर पर रखा पाप
नहाकर गंगा में
छोड़कर आए !

(3) हास्य कविता

हास्य कवि सम्मलेन में
हँसी का तड़का
जाने कहाँ
गुम हो गया ?
हर चेहरे पर उदासी मँडराने लगी
बादल बनकर डराने लगी
रूप बदलकर !
तभी भीड़ में
एक कवि को जोश आया
मानो होश आया
लिटाकर गधे को
गद्दे पर
माला पहनाकर फूलों की
पाँव स्पर्श कर
लड्डू खिलाया
टीका लगाकर ,
बजाकर हारमोनियम
ठुमका लगाया !

(4)गधों के महाशय

शहर से दूर
गाँव में
गधों के मोहल्ले में
गद्दी आलीशान
उसपे विराजमान महाशय
गधों के
करते कमाल
कभी रोते हँसते मुँह फुलाए
खोलकर केशों को
नजरें घुमाए
हाथों पर
न जाने क्या बनाए?
फूँक से उड़ाकर
मूँछ को
कुचलकर तिनका
पैरों से
दाँत दिखाए
खींचकर तिलक लम्बा
धूल में लेटकर
फटे बाँस सा
गीत गाए !

(5)गधों के मोहल्ले में

गधों के मोहल्ले में
माननीय महोदय जी पधारे
खींचकर तिलक लम्बे आड़े
लगाकर भभूत
पहनकर खादी कुरता
लपेटकर धोती !
मंच पर करते प्रहार शब्दों का
माडकर शहद में ,
मानो छानकर फैंकते चीज को
अनोंखे भाषण में !
तभी भीड़ से
आवाज गूँजी
चीरती हवाओ को
सन्नाटा मचाती !
सामने आया
नौजवान गधा
होश गँवाकर
बकने लगा,बचन टेड़े ,
सज्जनों मेरी सुनो
हमारी तरक्की है
क्योंकि अपने मोहल्ले में ?
ऐसे नेताओं की
ड्यूटी पक्की है !

(6)चूहे पर गधा गरजा

गधा चूहे पर भड़का
यानि मुँह खोलकर गरजा
जा वे जा
रास्ता मत काट
वरना ,तुझे कूड़े के साथ फैंक दूँगा!
चूहा थरथराया ,कपकपाया
फिर भी ,
मुँह बनाकर
तीखा जवाब गिराया !
सुन वे गधे
तेरी किस्मत अच्छी है
कि में छोटा हूँ
वरना उछालकर बीच चौराहे पर
घुमाकर किसी खँडहर में
फैंक देता !

(7)गधों के

गधों के मोहल्ले में
सु-प्रसिद्ध गायक आया
पतझड़ में बहार लाया
गीत गाया
सुर ताल मिलाकर
‘माफ़ करियो
मैं खड़ा हूँ
अजनबी डगर में ‘
सुनते ही गीत
भड़क उठे
मोटे तगड़े पहलवान
करने महाभारत संग्राम ,
तभी दुबले पतले
महामूर्ख गधे ने बाजी मारी
गरजकर चिंघाड़ा
खामोश ठहरो जरा
क्या करते हो ?
धुंध में लंगोटी कसकर
अखाडा दिखाते हो !

(8)भिखारी गधा

द्वार-द्वार जाकर
कुण्डी खटखटाता
अपनी पराई
आप बीती
जग बीती
कहानी सुनाकर भीख माँगता
एक होनहार गधा !
किंतु यही अपराध था उसका
सजा भी खास नहीं थी !
भिखारियों के मौहल्ले में
कई सालों से
भर्ती होनी थी
बुद्धिमान गधे की !
इसी बात को
ध्यान में रखकर
वहाँ के मुखिया श्रीमान जी ने
झठ से मोहर लगा दी
हाथों में
रोते -चिल्लाते बच्चों की
एक मोटी सी
किताब थमा दी ,
भीख माँगकर
भिखारियों के पेट पालने की
कड़ी ड्यूटी दी !
मानो बेरोजगार गधे को
नौकरी देकर
जिंदगी बना दी !

(9)गधे की टेंशन

गधे को टेंशन है
कि पढ़ा -लिखा क्यों नहीं ?
क्यों नहीं बना
होशिआर – समझदार समाज में ?
आह : भरकर विचार लेकर
एक गधा
शिक्षक जी के पास पहुँचा!
सर , मैं पढना चाहता हूँ
कुछ बनना चाहता हूँ
हठाकर बुराई
फैंकना चाहता हूँ !
शिक्षक जी मुस्कुराया
दोनों हाथ फैलाकर बतिआया ,
सुन गधे
तू क्या कर पायेगा ?
सारे दिन नंगा घूँमता
ईंटे ढोता है
लोगों को हँसाता है
अब क्या खाक ?
पढ़ पायेगा !
गधा सिमटकर ढेर हो गया
किंतु अंदर तूफ़ान जगाकर
प्रधान जी के पास पहुँचा
सर , मैं पढना चाहता हूँ
कुछ बनना चाहता हूँ
गधा रुपी बीमारी ,
समाज से हटाकर
फैंकना चाहता हूँ !
प्रधान जी मुस्कुराए
रस भरी आवाज में बतिआए ,
कोई बात नहीं
पढ़कर क्या करलोगे ?
यहाँ सभी गधे हैं
समाज गधों से भरा है
फिक्र नहीं करते
गधा भी महान है !
गधा ठनक कर अंदर भड़का
जाकर बीच चौराहे पर चिल्लाया ,
मुझे पढना है
कुछ बनना है
शोर मचा दिया !
कुछ सज्जन पुरुष पास आकर बोले ,
क्यों जी ठीक तो हैं?
क्यों गूँज रहे हो ?
धूप में तप रहे हो !
गधा मुस्कुराकर बोला ,
मैं गधा हूँ
आप महागधे हो !

(10)गधों का मेला

पास खड़े युवक से
निगाहें टटोलते पूछा ,
भाई मुझे कुछ बताइए
कहाँ से आ रहे हो ?
आप !
पीछे हठकर युवक बोला ,
क्या पता है ?
आपको ,
वहाँ गधों का मेला है
नाना प्रकार के
छोटे- बड़े
गधे बेचे जा रहें हैं
खुलेआम घुमाघुमाकर !
मैं अचानक ठहर गया
कल्पनाओं की,
झड़ी लगाकर खुद में ,
इंसान ढूँढ़ने लगा
मानो बहती नदी में
छलांग लगाकर
खोजने लगा !

  अशोक बाबू माहौर

                     ग्राम-कदमन का पुरा,तहसील-अम्बाह,

                     जिला-मुरैना(म.प्र.)476111

                     ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------