शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

संत वेलेंटाइन दिवस विशेष आयोजन : प्रेम कविताएँ

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क़ैस जौनपुरी

 
आज वैलेंटाइन डे है

आज वैलेंटाइन डे है
मुझे पता है
तुम्हें इंतज़ार होगा कि
"क़ैस, कुछ न कुछ ज़रूर करेगा."

मगर, मैं क्या करूँ
पिछले साल, जो कुछ हुआ
उसके बाद तो अब
तुम्हारे आसपास
मेरे नाम का हाई अलर्ट लगा होगा...

--

 

आज मैंने फिर शर्ट पहनी है

आज मैंने फिर शर्ट पहनी है
पिछले साल तुम वैलेंटाइन डे के मूड में थी
मैं सड़क पे तुम्हारे बिलकुल पास खड़ा था
तुम्हारी स्कूटी के हैंडिल में कुछ खाने की चीजें लटकी थीं
कुछ चकली, चिक्की और चाय के साथ खाने वाली चीजें
तुमने मख़मली सफ़ेद रंग की रिदा पहनी थी
सफ़ेद रंग के बीच तुम्हारा वो हल्का गुलाबी चेहरा
वो मुम्बई सेंट्रल का सिटी सेंटर जहाँ हम खड़े थे
जहाँ हमने एक दूसरे को काफी देर तक
बस चुपचाप देखा था
जहाँ तुम्हारे होंठ कुछ कहते कहते रुक गए थे
मैं तो तुम्हारे होंठों के गुलाबीपन में खो सा गया था...

मगर तुम अपने ख़यालों में
दुनिया के सारे बंधन पार कर
मेरी शर्ट को तुमने फाड़ दिया था
और फिर तुमने मेरे सीने पे अपने होंठ रखे थे
मुझे कसके गले भी लगाया था
और मेरे होंठों को जी भर के प्यार किया था तुमने...

जब तुम आँखों से दूर हुई
तब बड़ी हिम्मत करके तुमने ये सब बताया था...
और तब...
मैं अपने होंठों पे आए हुए अफ़सोस को तसल्ली दे के मुस्कुराया था...
 


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स्वर्णलता ठन्ना


1. प्रेम

ओ मानीखेज प्रेम !
किस पर्याय से
सम्बोधित करूँ तुम्हें
निष्ठुर हो तुम
सोचने नहीं देते
कुछ अपने सिवा...
निर्दयी भी हो
कि सारी दयार्द्र
भावनाओं को
समाहित कर लेते हो
स्वयं में
और सबसे ज्यादा तो तुम
निर्मोही हो
क्योंकि तुम्हारे मोह में
छोड़ देता हैं हर कोई
दूजे सारे बंधन
तुम मासूम दिलों पर
कर लेते हो
अपना आधिपत्य
बनकर सर्वमान्य
और सम्पूर्ण
इसलिए प्रेम
तुम रहो सदा, सर्वत्र
सबके दिलों में
बनाए रखो अपना वर्चस्व
और हमेशा ही
पुकारे जाओ
सृष्टा और सृष्टि के
सम्बोधन से ........।

2. प्रेम
 
ओ अव्यक्त प्रेम !
तुम क्यों शब्दों में ढल
बन जाते हो कविता
आँखों में ढले आंसूं से
लुढक जाते हो
गालों से होते हुए
होठों पर आकर

कभी बन जाते हो
फूल कलियाँ
तो लगता  है
हर सुबह बिखरे मिलोगे
ओंधे मुंह मेरे आँगन में
पारिजात के पुष्पों बीच
या तो बन तितली
घूमते-फिरोगे
आँखों के आगे
पर मैं तुम्हें
छू भी न पाऊँगी
तुम क्यों हर बार
व्यक्त करने कि
तमाम कोशिशों के
बाद भी
रह जाते हो
अनकहे, अनसुलझे से
प्रेम !
क्या यही है
तुम्हारी नियति .....

 

 3. प्रेम

मन की
मौन देहरी को लाँघ
एक आभा लेकर
चले आते हो तुम
दरकते किवाड़ से
झांकती रोशनी संग
आभासित हो जाते हो तुम
छल-कपट की दुनिया में
अपनी सादगी
क्यों हर बार
लेकर चले आते हो
तुम ‘प्रेम’ .........।
 

 

परिचय -

नाम -   स्वर्णलता ठन्ना
जन्म - 12 मार्च ।
शिक्षा - परास्नातक (हिन्दी एवं संस्कृत) 
            यूजीसी-नेट - हिन्दी
            वैद्य-विशारद, आयुर्वेद रत्न (हिंदी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद)
            सितार वादन, मध्यमा (इंदिरा संगीत वि.वि. खैरागढ़, छ.ग.)
            पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा इन कंप्यूटर एप्लीकेशन (माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता वि.वि. भोपाल)
पुरस्कार - आगमन साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समूह द्वारा "युवा प्रतिभा सम्मान २०१४" से
      सम्मानित 
संप्रति - ‘समकालीन प्रवासी साहित्य और स्नेह ठाकुर’ विषय पर शोध अध्येता,
            हिंदी अध्ययनशाला, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन।
प्रकाशन - प्रथम काव्य संकलन ‘स्वर्ण-सीपियाँ’  प्रकाशित, वेब पत्रिका अनुभूति,  स्वर्गविभा,  साहित्य कुंज,  साहित्य   
            रागिनी,  अपनी माटी, पुरवाई, हिन्दीकुंज, स्त्रीकाल, अनहद कृति, अम्सटेल गंगा, अक्षरवार्ता  सहित अनेक पत्र- 
            पत्रिकाओं में कवितायेँ  एवं लेख प्रकाशित।
संपर्क -
ई-मेल - swrnlata@yahoo.in

 

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मनीष श्रीवास्तव

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[सह—संपादक
इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए
भोपाल]

मैं कोई नज्म लिखूँ
मैं कोई नज्म लिखूँ या कोई गीत लिखूँ
तुझको अपना दिलबर या मनमीत लिखूँ
इश्क की पुरबाई या दिल की सौदाई लिखूँ
मोहब्बत की सबाई या प्यार की रुबाई लिखूँ
दिल का तुझे ताज लिखूँ या आफताब लिखूँ
फूल कोई गुलाब लिखूँ या महताब लिखूँ
अपनी जाने-जां लिखूँ या अपना खुदा लिखूँ
दिल जो सुनता है तुझको वो सदा लिखूँ

नेक सी सीरत लिखू या ईश्वर की दुआ लिखूँ
मेरे ख्वाबों की जमी या तुझको आसमां लिखूँ।


खुदा उसे मेरा मुकद्दर कर दे

खाली दिल मेरा मोहब्बत से भर दे
खुदा तू उसे मेरा मुकद्दर कर दे
जिसकी खातिर काटी जाग के रातें
जिसके सिवा की न हो दूजी बातें
या तो हो जाए वो मेरा
या दिल को तू पत्थर कर दे
खुदा उसे मेरा ...
वो ही मंजिल मेरी, कारवाँ वो मेरा
वो ही पहला ख्वाब आखिरी भी मेरा
मुझ पे बस उसकी इनायत कर दे
खुदा उसे मेरा ....
वो जिनकी यादों में
जीता हूँ न मरता
जलके दिन गुजारता हूँ
बस आहें हूँ भरता
कभी उस सितमगर को भी
मोम कर दे
खुदा उसे मेरा ....


ख्याल तू मेरा
कुछ ख्वाब अधूरे, कुछ चाहतें अधूरी
मिल जाओ जो तुम, हो जाएंगी ये पूरी
सफर जीस्त का, कट जाएगा यूं भी
मिल जाए तू, बात होगी कुछ और ही
जानता हूँ ये, तुझे यकीं न होगा
ख्याल तू मेरा, इबादत है तू मेरी

अगर न मिले तो भी कोई गम नहीं
हम-तुम मिलेंगे दूजे जहां में कहीं।


संग तेरे चलने दे
खुशियों की फुहारें दिल के आंगन में बिखरने दे
कुछ दूर ही सही, संग तेरे चलने दे
सफर तुम्हारे साथ हो, तो मंजिल की फिक्र किसे
मैं दरिया तू सागर मेरा, मुझे तुझमें मिलने दे
मौसम भी बदल गया, बदल गया हर मंजर
खिलते हसरतों के फूल, तू इनको खिलने दे
अरसे से था दबा, बयां न हो पाया कभी
छिपे इस राज को, आज तू खुलने दे
वक्त की धूप में, तिरा साया मेरी छांव है
दे इजाजत, तेरे रंग में मुझको ढलने दे

मुंतजिर मैं तेरा, मेरी किस्मत के खुदा
करके अपना करम, मेरी तकदीर बदलने दे।


कलियाँ आज चुनने दे
आज न जाओ दूर मुझसे
पहलू में अपने रहने दे
दिल में दबी बात
आज मुझे कहने दे
रहगुजर है तू मेरी
साथ मुझे चलने दे
है छिपे जो राज सारे
आज इन्हें तू खुलने दे
हमनफस तू, हमनवाँ तू
ख्वाब मुझे बुनने दे
इश्क की राह में मुझको
कलियां आज चुनने दे
गीत कोई प्यार का
आज मुझे सुनने दे
धड़कनों में नशा-ए-इश्क
आज तू घुलने दे।


देखा
एक अफसाना उन्हें
बताकर देखा
दिल की बात
जताकर देखा

कब तक दिल की बात
दिल में ही रखें
सोचकर उन्हें हाल-ए-दिल
सुनाकर देखा

यकीं था कबूल
कर लेंगे हमें
पर उन्होंने भी
आजमा कर देखा
बेवफाई उनकी
वफा में बदलेगी
हमने दिल को
यूँ बहलाकर देखा
गम दिया उन्होंने
हमें जिंदगी भर का
जिन्हें हमने प्यार का
खुदा बना कर देखा।

हमसाया
फकत जिस्म का नहीं
रूह का उससे नाता था
एक वही था जो
मुझ पे दो-जहाँ लुटाता था
दूर होके भी दूर न हुआ
साथ चलता हमसाया था
मेरी जिंदगी का हासिल वो
वो ही सरमाया था

मेरी हर आरजू, दुआ वो
वही असल खुदाया था
मुझ में था वो इस तरह
सांसों की तरह समाया था।

 

 

हुई नई शुरुआत
झूमने लगा समा
खिल उठी कायनात
खिजा सारी मिटी
जब छिड़ी तेरी बात
घटायें घिर आईं
हसीन नजारे हुये
रौशन हुआ मैं
जगमगा उठी रात

खिले फूल सारे
चमन गुलजार हुआ
मुकम्मल मैं हुआ
संवर गई हयात
आरजू पूरी हुई
तमन्ना न रही
देखने तुझको निकली
तारों की बारात
जमाना जल गया
देख तुझे साथ
खत्म हुआ सफर
हुई नई शुरुआत।

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त्रिवेणी तुरकर

 

 

यही तो है प्‍यार                           

कितनी सुंदर कितनी व्‍यापक है प्‍यार की यह भावना।              

प्रकृति व जीवों के बंधन को रखती                       

अटूट प्‍यार की यह भावना।                   

धरती माता का प्‍यार देता हम सबको जीवन का आधार।             

जननी माता से मिलता हमको ममतामय प्रेम का उपहार।     

मित्रों की दोस्‍ती में रिश्तों के अपनेपन में बच्‍चों की तोतली रसीली बोली में

बुजुर्गों के आषीषों में घुला रहता है प्‍यार।               

बचपन के साथियों से खेल खेल में गहराता है प्‍यार।               

यौवन के मधुमय पलों में उपजता मधुरस सा सुरभित प्‍यार।            

जीवन संध्‍या में जीवनसाथी की निकटता में विश्वास भरा प्‍यार ॥

इन्‍सान जिनसे करता है प्‍यार रखता है अपनेपन की उनसे भी चाहत।                     

न मिले तो भी दिल के किसी कोने में छुपी रहती है प्‍यार की चाहत।

प्‍यार है एक पवित्र भावना एक भव्‍य विचार है।

जिसके अभाव में मानव का जीवन बेकार है।                     
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इतिश्री सिंह राठौर


वैलेनटाइन डे
डायरी से लिपटे सूखे गुलाब को जब देखती हूं
वह दिन यात आता है
तुम्हारी रूह धड़कन को छूं जाती है
मुझे रूमानी अहसास दे जाती है
आंसूयों से मलीन विस्तर को जब देखती हूं
वह दिन याद आता है
तुम्हारी यादें मुझको लापहरवाह कर जाती है
मुझे जीने का सबक सिखा जाती है
तुम्हारे दिए हुए गुलाबी दुपट्टे को जब देखती हूं
वह दिन याद आता है
मदसमस्त हवा मुझे तुम्हारे पास ले जाती है
मुझे चलचित्त कर जाती है
उस दिन इंतजार करती रही थी
सूर्ख जोड़ों में तुम्हारा
पता नहीं तुम क्यों न आए लेकिन
फोन आया था कि तुम ने आओगे क•ाी
क्योंकि परदेश भा गया था तुम्हें
उस दिन भी वैलेनटाइन डे था
और आज भी वैलेनटाइन डे है
जब वादा किया था तुमने मुझसे
हमेशा साथ निभाने का
और आज 5साल बीत गए
चल रही हूं अकेले उन राहों पर जिस पर
हम साथ चले थे
इस उम्मीद से कि
कहीं तुमसे मुलाकात हो जाए...
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जय प्रकाश भाटिया

कहीं प्यार छुपा हो मेरे लिए,
 
यूं नफरत से न देखो मुझको,
कुछ अपने दिल में भी झांको
कहीं प्यार छुपा हो मेरे लिए,
कोई इकरार छिपा हो मेरे लिए,
 
रूठो भी अगर तो ऐसे तुम
मन अपना दुखी नहीं करना
शायद मन के किसी कोने में
अहसास दबा हो मेरे लिए,
 
क्यों फेर के नज़रें निकल गए,
मुस्कान दबी रही होंठों पर,
न नमन किया ना अदब किया
ना दोस्ती का ऐतबार किया,
नित रोज़ बदलती हालत पर
इस आती जाती फितरत पर
कभी ढूंढ के अपना घर देखो
कोई किरदार छिपा हो मेरे लिए,
 
जो बीत गयी सो बीत गई,
अब देखो नयी बहारों को,
सूरज चंदा ग्रह और तारे
सब मिल जुल कर रहते सारे
देते अंजाम नजारों को,
तुम भी अपने दिल आँगन में
नयनों में प्यार सजा देखो –
इन नफरत की आंधी में भी
कोई दीपक जलता हो मेरे लिए,
 
दिन रात बदलते रहते है,
ऋतुएँ भी आती जाती  है
कभी है पतझड़ कभी है बसंत,
पर खुशियां जीवन में अनंत,
हर पल उस प्रभु की इनायत है,
हर पल उस से सुखदायक है
मन में ना कोई वहम करो,
तुम काम सदा यह अहम करो
खुद सोचो उसकी रहमत में,
उपकार भरा है मेरे लिये…
 
यूं नफरत से न देखो मुझको,
कुछ अपने दिल में भी झांको
कहीं प्यार छुपा हो मेरे लिए,
कोई इकरार छिपा हो मेरे लिए,
०९/०२/२०१५ –

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राम शरण महर्जन

गुलाब तो एक बहाना थी
करीब होने का सपना थी |

दो अनजान वो चेहरे की बातें हैं
हरपल साथ निभाने के वादे हैं |

अनजान बनूँ  कैसे  प्यार में
छुपाऊँ रिश्ते कैसे दो दिल के  |

उम्र का नहीं लहड़ का भी नहीं 
वक्त का है बात जीवन का है |

जुड़ता  रिश्ता पल भर में
धधकता दिल चाहत में |

दुनिया बोले तो बोलने दो
प्यार को फलने-फूलने दो |

यादगार होते अनजान रिश्ते
सदाबहार होते प्यार के रिश्ते |

प्यार में जीवन महकते हैं
जीवन प्यार में संवरते हैं |
०२/१२/२०१५
राम शरण महर्जन
काठमांडू, नेपाल


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मुकेश कुमार


(1)  मेरा तू...
मेरा ख्‍वाब भी तू, मेरी हकीकत भी तू
मेरी आरजू भी तू मेरी जुस्‍तजू भी तू
साँझ भी तू, सवेरा भी तू
मेरी धड़कन आवाज दिल सब तू
मेरा अर्ज भी तू, मेरा मर्ज भी तू
मेरा दरिया भी तू मेरा समन्‍दर भी तू
मेरा जिस्‍म भी तू, मेरी रूह भी तू
मेरा सवाल भी तू, मेरी जवाब भी तू
अहसास भी तू, जज्‍बात भी तू
मेरी राह भी तू, मंजर भी तू
मेरे गीत भी तू मेरे मीत भी तू
मेरा इश्‍क भी तू मेरा अश्‍क भी तू
अब तू ही तू, हर तरफ है।

हमें ना तो  मोहब्बत हुई नहीं

(2.)
नफरत-मोहब्बत...
नफरत का कारवाँ नसीब हुआ।
इजहार भी हुआ मगर कुछ यूँ ना प्‍यार हुआ।
वो नदी का किनारा  था, ये रातों थी ये मौसम
तन्‍हा से थे रातों को सितारों के साथ
बहक रहें थे मोहब्बत को गुलाबों की पंखुड़ियों के साथ


(3.) हम मोहब्‍बत करते रहें...

हम मोहब्‍बत करते रहें
की तुम बेवफाई करती रहीं
हम दुख में रोकर तुझे देख हँसते रहें
तु ना दर्द की आहें भरती रहीं


ना देख सकी मेरी मोहब्‍बत की हालातों को
पर क्‍यों यूँही सवाल करती रहीं
हम मोहब्‍बत करते रहें
की तुम बेवफाई करती रहीं

इस दूजे के लिए इकरार करते रहे
इजहार भी मुकम्मल हो गया कि
वो देख मेरी तरफ
प्‍यार इक खूबसूरत धोखा सा

(3.) मजबूर....
आहें भरते रहें कि रातों को तन्‍हा होते रहें
तेरे इश्क में खुद को पागल करते रहें।
जब गुजरती चचंल हवाओं ने खुद को
तुमसे क्‍यूँ मोहब्‍बत करने को मजबूर कर दिया।

मुकेश कुमार
सीकर(राजस्‍थान)
332001.
mukeshkumarmku@gmail.com
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अंजली अग्रवाल

जो आयी तुम मेरी जिन्‍दगी में.....
जैसे जिन्‍दगी में एक कमल खिला....
आँखों को नया सपना मिला....
सागर में जैसे लहरे उठने लगी...
जिन्‍दगी पंछी-संग उड़ने लगी.....
आसमान ने , ये काली चादर हटाई है....
और एक परी निकल कर मेरी जिन्‍दगी में आयी है....
नहीं जानता की कितना प्‍यार है तुमसे.....
सागर की गहराई सा, या आसमान की ऊचाँई सा...
इतना पता है मुझे...
कि जिन्‍दगी भर तुम्‍हारा साथ चाहता हूँ....
तुमसे पहले इस दुनिया से जाना चाहता हूँ....
हर सांस में एहसास है तुम्‍हारा...
मछली और नीर सा साथ रहे हमारा....
नहीं कहता कि चाँद तारे लाकर दूँगा तुम्‍हें...
हाँ पर इन होठों को मुस्‍कुराने की वजह दूँगा मैं....
जीना सिखाया है तुमने.....
मैं तो समन्‍दर में पड़ा था सीप में रखकर मोती बनाया है तुमने....
मेरी नाव की माझी हो तुम...
मेरी जिन्‍दगी की मिठास हो तुम...
जो आयी तुम मेरी जिन्‍दगी मैं.....
बैठा हूँ जैसे बरगद की छाव में.....
हैप्‍पी वेलेंटाइन्‍स डे...
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देवेन्द्र सुथार

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  1. नवश्कार| आपकी रचनाए काफ़ी सुंदर है| आप सचमुच तारीफ के पात्र है| आप बस ऐसे ही लिखते रहिए और हम पढ़ते रहेगे|

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  2. सुंदर संकलन...
    आभार आपका.

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