रविवार, 22 फ़रवरी 2015

सुशील यादव का व्यंग्य - ‘राम रसायन’ हमरे पासा .....

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व्यंग्य

‘राम रसायन’ हमरे पासा .....

हमे शास्त्रों में पारंगत होने की घुन थी। वेद-पुराण वाले शास्त्र तो नहीं पढ़ पाए। भौतिक, रसायन,जन्तु शास्त्र में घुस गए।

पी.जी. रसायन शास्त्र में करने के बाद पीएच.डी. धारी डाक्टर बन गए।

पहले इसी विषय से ज्यादा कन्नी काटते थे। कारण कि लम्बे-लम्बे सूत्रों को दिमाग में बिठाए रखना, तथा दिमाग और सूत्रों का संतुलन साथ बनाए रखना असंभव सा जान पड़ता था।

एक बात दिमाग में जम के बैठी थी, कि एच.२ ओ. जो पानी के अवयव हैं वही अवयव हवा में भी हैं। फिर हवा वाले दोनों अवयव काहे नहीं मिल जाते ?सब पानी पानी क्यों नहीं हो जाते ? बाद में पता चला, पानी बनाने के लिए ,हवा के एच २ अवयव और ओ २ अवयव को ऊँचे दाब पर बिजली में फ्यूजन कराना जरुरी होता है।

विज्ञान के अपने फंडे हैं, अपना फील्ड है,। उधर अनुमान-तर्क,ऊँचे या नीचे फेंकने की कोई जगह नहीं होती। कल्पना की उड़ान भरने का भी लिमिटेड स्कोप होता है।

अनुसन्धान को बूस्ट करने या इंजन को दागने भर की दिमागी ताकत चाहिए होती है। बाकी के प्रयोगों के लिए ,आपके द्वारा इस्तेमाल किये हुए चीज ही परिणाम दे सकते हैं।

बहुतों ने हमको मना किया कि अमेरिका वाले, रसायनज्ञ पंडितों को वीसा देने में उत्साहित नहीं रहते। आना-कानी के हर उपाय अपनाते हैं। उनको लगता है पता नहीं ये बन्दा कौन सा फार्मूला ढूढ़ के , क्या गुल खिला बैठें ?

एक दिन हमसे किसी ने पूछ लिया ,आपने रसायन शास्त्र में पी.एच.डी. किया है बता सकते हैं ये ‘राम-रसायन’ क्या बला है?

हमने कहा,अपने केमिस्ट्री सब्जेक्ट में राम-रसायन नाम की कोई बला नहीं पाई जाती हाँ ,बचपन में हमने हनुमान चालीसा के रिकार्ड में बजते कहीं सुना था “राम रसायन हमारे पासा .......”

बिलकुल सही ......। करोडपति के प्रश्नों जैसा उचित जवाब पाकर,वे हमे दस हजारी जीत का हकदार मान गये। बात और आगे नहीं बढी। मगर.......?

हमारे मन में शोध-प्रबंध का नया अध्याय खुल गया। घर आते ही चालीसा खोला, सिवा इस एक लाइन के आगे सब सपाट था।

हमें लगा कि गोस्वामी जी को ‘राम’ में एच.२ओ. यानी ‘पानी’ यानी ‘जीवनसार तत्व’ माफिक हजार गुणों वाला दिव्य रसायन सरीखा कुछ दिखा होगा ....?

आज ‘पानी’ सरलता से, सर्व सुलभ ईश्वर की दी हुई सभी नेमतों में सर्वश्रेष्ठ है। इसीलिए अमृत सदृश्य पानी को राम -रसायन रूप में स्वीकार कर वन्दनीय बना दिया।

जिन लोगों ने राम नाम के अमृत रसायन रूप का आस्वादन किया उनकी वैतरणी पार लगते गई।

आज भी कलयुग में राम का नाम ही काफी है ......’जय श्री राम के नारे’ ने एक समय, पराधीनता के दिनों में कहे जाने वाले ‘जय-हिन्द’ के घोष मानिंद काम किया है?

मुह में राम लाकर बगल में छूरी (छोरी) लिए घूमने का आजकल अलग फैशन है। चाहे तो आप दोनों काम साथ-साथ कर सकते हैं यानी छुरी और छोरी को राम वाली गांधीगिरी के साथ कहीं भी चलाया जा सकता है।

राम के नाम को, ‘राम-नाम सत्त’ हो जाने तक बखान करना हिन्दू परंपरा में अपना अहम् मायने रखता है।

कंधा देने वाले जानते हैं की एक राम का नाम ही ‘सत्य’ है बाक़ी मिथ्थ्या है ,विनाशी है मिटने वाला है।

राम के रसायन में लपेट के मुर्दे में जान तो नहीं फूंकी जा सकती मगर मुर्दा किसी मायने में कहीं से ‘राम’ का नाम ही सुन ले तो पानी में फेके हुए राम-नाम लिखे पत्त्थर माफिक तर जाएगा।

मेरे पड़ोसी ने राम के नाम से मन्दिर बनाने का बीड़ा उठा रखा है। रसीद बुक ले के साल में दो बार आ पहुंचते हैं। कितने का काट दूँ..... ?

मुझे चंदा कटवाने में मर्मान्तक पीड़ा होती है। क्या कहूँ, ’गई भैंस पानी में’ वाले भाव आते हैं। यानी गाँठ से जो भी दो उसका रिजल्ट आने से रहा ?

चंदा उगाहने वाला पिछले पच्चीस सालों से राम राग अलाप रहा है। एक ईंट भी रख नहीं पाया जाने कब बनेगा या बनेगा भी कि नहीं राम जाने ?

चंदा देने से इनकार करने का मन गवाही नहीं देता। उधर राम जी का बड़ा नाम, बड़ा बैनर, अगर न दो तो वैतरणी वगैरह का आगे जो इन्तिजाम होना होता है वो सब रद्द। कहीं खैर नहीं ....? मन ये भी बोलता है ,कौन बला मोल ले, इस नश्वर संसार की आड़ी-तिरछी कमाई है, यहीं खप जाए ?रसीद फाड़ने से पहले राम-भक्तों से पूछ लेता हूँ , भगवान जी का मन्दिर बन तो जाएगा न ?

वे तरह-तरह की चौपाइयां खोलने लग जाते हैं, कि फलां जगह प्रभु ने ये कहा है वो कहा है। मै दबी जुबान से कहता हूँ ये सब तो गोसाईं जी के अपने विचार थे ....?

वे जान जाते हैं, अब दाल इधर ज्यादा गलाएगे तो दाल के जलने गंध पड़ोस तक पहुँचने की नौबत आ जायेगी, सो रसीद थमाते हुए ,वे नोट बिना गिने रख के आगे बढ़ जाते हैं।

मुझे अन्दर से हिदायतें मिलनी शुरू हो जाती है ,,,,,,भगवान के नाम पर निकाली हुई रकम का ज्यादा गुणा-भाग या हिसाब –किताब नहीं रखते ......? भगवान के नाम पर भी चार पैसे नहीं छोड़ोगे तो दान –दक्षिणा के नाम पर परलोक सुधरने के चांस नहीं ?

चंदा देने के बाद जब शर्मा जी से मिले , बहस कर डाला। चंदा देने के जायज पहलु की तरफ उनके दिमाग में कुछ हिदायत भरने की इच्छा जगी। हमने कहा ,शर्मा जी ,अच्छा तो है वे कुछ कर रहे हैं। दान-दक्षिणा देने के बारे में आप निहायत संकोच करते हैं ?क्या ख़ाक ले के जायेंगे ?कभी सोचा ....?विदेश में बच्चे होने का ये मतलब नहीं की अपनी संस्कृति ही भूल जाओ। वे इतना कमा रहे हैं कि दोनों हाथ लुटाओ तो कम न पड़े।

वे मन्दिर बनाएं तो ठीक न बनाएं तो ठीक। ये उनकी मरजी। कम से कम हमें तो संतोष होगा की हमने भक्त होने में कोई कमी न रखी ......। उनका पाप उनको ही लगेगा ...?एक दिन देखना प्रभु उनसे कैसा बदला लेंगे ....?वे ऊपर वाले हैं सब जानते हैं .....?शर्मा जी हें हें करने लगे ,हमने कब मना किया है ?आपने क्या दिया ,उतना हमसे ले जावें।

मुझे लगा कि इस रसायन-विद्या में ज्यादा शोध-मंथन जारी रखूंगा तो सचमुच प्रभु-भक्त मंडली का मैं कर्मठ सदस्य बन जाउंगा मेरे हाथ में चंदे की एक अदद रसीद बुक होगी?

भविष्य की संभावनाओं को विराम लगाने के नाम पर, गिलास भर ठंडा पानी पीकर हम पानीदार एच.२ ओ. में खो गए। ’राम-रसायन’ के ज्ञान को फिलहाल जय राम जी की ......

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सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

Email Susyadav7@gmail.com

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  1. बहुत खूब ! स्कूल के दिनों की याद आ गई...उम्दा व्यंग....बधाई ..प्रमोद यादव

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