हर्षद दवे का लघु आलेख - रंग बरसे

वर्तन परिवर्तन

४. रंग बरसे...

यह सत्य घटना है.

मरीज दो, कमरा एक. दोनों के रोग असाध्य. एक मरीज के बिस्तर के पास खिड़की थी और दूसरे के बिस्तर के पास दीवार. दीवारवाला मरीज अपने बिस्तर से उठ कर बैठ भी नहीं पाता था. मजबूरी थी. परन्तु खिड़कीवाला मरीज खिड़की से बाहर के दृश्य देख पाता था. दूसरा उसे बार बार पूछा करता था: ‘बाहर क्या दिखता है?’

‘यहां से सुन्दर सा पार्क दिखता है. वहां छोटे छोटे बच्चे खेल रहे हैं.’ खिड़कीवाला मरीज बताता. कभी वह खिड़की से नजर आते दूर के तालाब के बारे में कहता था. कभी बेटे के साथ खेलते पिता की बात करता था तो कभी पुत्री को चलना सिखाती माँ के बारे में या फिर कभी उड़ते हुए पंखी, पानी में तैरते बतख, लहराते वृक्ष, गीली सड़कें, स्कूल जाते हुए छात्रों के बारे में बड़े चाव से बताता था.

बिस्तर में पडा बीमार यह सब सुनकर खुश हो जाता था. कभी उसके मन में ख़याल आता कि काश! मैं भी ये नज़ारे देख पाता. मुझे खिड़की से ये सब देखने का मौक़ा कब मिलेगा? उसकी यह मंशा तब पूरी हुई जब खिड़कीवाला मरीज अचानक चल बसा. अस्पतालवालों ने उसकी इच्छा के अनुसार बचे हुए मरीज का बिस्तर खिड़की के पास लगा दिया. बस, अब तो उसे खिड़की से बाहर देखने का बेशुमार आनंद लेना था...उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर गर्दन ऊपर उठाई और खिड़की के बाहर देखा तो वह सन्न रह गया.

खिड़की के बहार सिर्फ सफ़ेद सी दीवार ही दिखाई दे रही थी!

यदि ईश्वर ने हमारी जिंदगी में कुछ कम रंग भरे हो तो यह कमी हम अपने आत्मविश्वास के सहारे पूरी कर सकते हैं. हमारी सकारात्मक सोच से हम अपनी जिंदगी को अधिक रंगीन बना ही सकते हैं. हमने देखा कि अपनी प्रबल कल्पनाशक्ति से पहला मरीज खुद की और साथवाले मरीज की जिंदगी में रंग भरता था ठीक वैसे ही हमें अपनी कठिनाइयों को अनदेखा करते हुए जैसी भी जिंदगी हमें मिली है, हमें उस में ही रंग भरने होते हैं. अपने दुखड़े रोने के बजाय मुश्किलों में भी खुश रहा जा सकता है. हमारे जीवन में इन्द्रधनुष के सारे रंग न होते हुए भी उसे कुछ तो रोचक बनाया ही जा सकता है. हमें अपनी भूमिका अच्छे से निभानी चाहिए. ईश्वर भी यही चाहता है! यक़ीनन! आप अपनी जिंदगी में पसंदीदा रंग भरने से प्रारंभ कर सकते हैं.

आज से ही अपनी जिंदगी में नए रंग भरने का प्रारंभ करें...

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