बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

सावित्री काला की कहानी - स्वयं सिद्धा

"स्वयं सिद्धा "

वह बाल विधवा थी। जब वह केवल पांच वर्ष की थी ,तभी सुना था की उसका विवाह पास के गांव के सात वर्ष के बालक रामेश्वर के साथ कर दिया गया था। उसे अपने विवाह की जरा सी भी याद नहीं है। उसकी बुआ कहती है कि जब उसकी बारात आई थी तो वह भी ताली बजा बजा कर नाच रही थी ,तभी उसकी दादी ने उसे पकड़ कर आलमारी के ऊपर बिठा दिया था ,ताकि बारातियों के साथ ही न नाचने लगे। अलमारी के ऊपर बैठी बैठी ही वह रोते रोते वहीँ सो गई थी ,सोती हुई अवस्था में ही बड़े भाई तथा पिताजी ने गोद में लेकर उसके फेरे करवाये थे। सुबह जब वह उठी तब तक बारात जा चुकी थी। पर सबने उससे कहा कि उसकी शादी हो गई है। बाराती भी बड़े खुश हो कर गए थे ,उसके पिता ने खूब दान दहेज दिया था। बड़े बड़े बर्तन ,कई गायें जो दूध देती थीं ,सारे परिवार वालों के लिए अच्छे अच्छे कपड़े जेवर आदि सब दहेज में दिया गया था।

पर वह सारा दान दहेज रामेश्वर के भी काम का नहीं था। वह तो चाह रहा था कि जल्दी से जल्दी अपने घर पहुँच कर कंचे खेलूं ,पतंग उड़ाऊँ जो उसकी दीदी ने उसको लाकर दी थी। उस पतंग पर डोरी बांध कर खूब ऊँचे आकाश में उड़ाना चाहता था। इसी लिए वह जल्दी से जल्दी पिता से घर जाने का आग्रह कर रहा था। उसके पिता समधी कि खातिर नवाजी से बहुत खुश थे। वे रामेश्वर को गोदी में लेकर बहला रहे थे ,कि घर जाकर उसे खूब सारे कंचे तथा रंग बिरंगी पतंगें लाकर देंगे।

रामेश्वर को भी अपने बचपन के विवाह का ज्ञान नहीं रहा। वह भी लोगों से ही अपने विवाह कि बातें सुना करता था। अभी वह पंद्रह वर्ष का ही हुवा था ,दूसरी कक्षा में पढ़ रहा था कि उनके गांव में भयंकर रूप से संक्रामक बीमारी हैजा फैला जिसमे रामेश्वर की तथा उसके बाद उसके पिता की मौत हो गयी। गोविंदी उस समय केवल तेरह वर्ष की थी। गांव की महिलाओं ने उसके घर आकर रोना धोना शुरू किया। उसकी हाथ की चूड़ियाँ पत्थर से तोड़ दी गयीं। उसके शरीर के सारे जेवर जो उसने पहिने हुए थे सब उतरवा दिए गए ,उसे सफेद धोती पहनने को कहा गया। अछूत की तरह गोविंदी को बारह दिन तक गोशाला में रखा गया तथा एक समय ही खाना दिया गया। यह सब तो वह चुप चाप सहती रही ,इतना तो वह सुनती थी कि बचपन में उसका विवाह कि रामेश्वर नाम के लड़के के साथ हुवा था। वह अब मर गया है ,तभी ये महिलाएं उससे ये सब प्रपंच करवा रहीं हैं। जैसा वे कहती गयीं वह करती गयी लेकिन जब नाई उस्तरा लेकर उसके बाल काटने लगा तो वह विद्रोह कर बैठी ,उसने अपने को कमरे के अंदर बंद कर दिया। सारे घरवालों के कहने पर भी दो दिन दरवाजा नहीं खोला। जब उसकी सखी सुरभि आई उसने भी बहुत कोशिश की अपनी दोस्ती का वास्ता दिया। तब बड़ी मुश्किल से गोविंदी ने दरवाजा खोला ,तथा घर के किसी बन्दे से बात नहीं की। वह अपनी सखी सुरभि का हाथ पकड़ कर उसके घर चली गयी। वे दोनों अभिन्न मित्र थीं।

उसके घरवाले बड़ी मिन्नत करके दस दिन बाद गोविंदी को घर ला पाये। इस बीच उसका जेठ उसे लेने आया। पर घरवालों ने उसे नहीं भेजा ,न जाने उसकी क्या इच्छा रही होगी।

अब गोविंदी तथा सुरभि ने संग साथ ही रहना शुरू किया। दोनों के घरवालों को भी कोई ऐतराज नहीं था। दोनों पांचवीं कक्षा तक पढ़ी हुयी थीं। सुरभि भी किस्मत की मारी थी। उसका भी बचपन में विवाह हुवा था। उसका पति उससे उम्र में बड़ा था। वह जब पड़ने शहर गया तो ,साथ पढ़ने वाली किसी लड़की से शादी कर ली। उसके घर में तो कोहराम मच गया ,लेकिन उसने कोई परवाह नहीं की ,वह नौकरी करके शहर में ही बस गया था ,कभी गांव नहीं आया। सुरभि के ससुराल वाले किस मुंह से उसे लेने आते। दोनों सखियाँ थी विवाहिता ,एक विधवा थी दूसरी परित्यक्ता। दोनों किस्मत की मारी थीं ,वे सदा साथ साथ ही रहती थीं ,साथ साथ खेतों में काम करती तथा कभी सुरभि गोविंदी के घर रहती थी कभी गोविंदी सुरभि के घर में ही सो जाती थी।

वे दोनों आगे पढ़ना चाहती थीं। तभी गांव में एक स्कूल खुला। रश्मि दीदी वहां प्रधान अध्यापिका बन कर आयीं। उन्होंने गांव की लड़कियों तथा महिलाओं की शिक्षा के प्रति जागरूक होने का अभियान चलाया। घर घर से बच्चों को लाकर पढ़ाना शुरू किया। उनका यह अभियान का प्रयास काफी सफल हुआ। लोगों ने अपने बच्चे रश्मि दीदी के स्कूल में भेजने शुरू कर दिये।

रश्मि दीदी ने प्रौढ़ शिक्षा के लिए भी पाठशालाएं शुरू करदी थीं। पास पड़ोस के गांव में जा जा महिलाओं तथा पुरुषों को रात्रि पाठशालाओं में आ कर पढ़ने का आग्रह किया। गांव के कुछ लोगों ने उनकी इस योजना का स्वागत किया ,रश्मि दीदी एक दिन महिलाओं को पढ़ाती थीं और एक दिन गांव के पुरुषों की कक्षा लगती थी।

गोविंदी तथा सुरभि ने भी स्कूल में जाकर छठी कक्षा में दाखिला ले लिया। तीन वर्ष बाद आठवीं की बोर्ड परीक्षा में दोनों पूरे जिले में प्रथम तथा द्धितीय स्थान प्राप्त किया। रश्मि दीदी के साथ वे दोनों खूब खुश रहती थीं। वे दोनों अपने खेतों में भी साथ साथ ही काम करती थीं ,तथा संग साथ ही पढ़ती रहती थीं। अब उनकी मुंह पर मायूसी नहीं रह गयी थी। परिवार के लोग भी उन दोनों को खुश देख कर बहुत खुश रहते थे। तथा उन्हें आगे पढ़ने तथा बढ़ने के लिए सदा प्रोत्साहित करते रहते थे।

समय बीतने पर दोनों सखियाँ अब दसवीं की तैयारी करने में लगी थीं। वे दोनों अपना खर्चा स्वयं ही निकाल रहीं थीं। क्यों कि आठवीं में प्रथम तथा द्धितीय आने पर सरकार से वजीफा मिलता था। दसवीं कि परीक्षा दोनों ने अच्छे अंकों में ही नहीं पूरे जिले में दोनों फिर प्रथम तथा द्वितीय स्थान पाकर उत्तीर्ण क़ी। दसवीं का परीक्षा फल आते ही रश्मि दीदी ने दोनों को पुलिस में भर्ती होने का फार्म भरवा दिया। उन दोनों क़ी प्रतिभा देख कर बिना कोई प्रयास किये चयन भी हो गया। कहते हैं जब वे पुलिस क़ी ट्रेनिंग लेने के लिए गांव से चली थीं तो सारा गांव उन्हें स्टेशन तक छोड़ने आया था दोनों ही गांव के लोगों का स्नेह व प्रेम व सहानुभूति तथा रश्मि दीदी के सहयोग से बड़ी अभिभूत थीं।

एक वर्ष की ट्रेनिंग के बाद उनकी नियुक्ति ट्रैफिक पुलिस की टुकड़ी में हो गयी। वहां भी दोनों संग साथ ही रहती थीं ,बड़ी खुश थीं। तभी परिवालों से पता चला कि गोविंदी का जेठ उनके घर के कई चक्कर लगा चुका है ,वह कमाऊ गोविंदी को अपने साथ रखना चाहता था। इधर सुरभि का नालायक पति भी उससे सम्पर्क बनाना चाहता था। लेकिन दोनों के परिवार वालों ने अपनी बेटियों का उन्हें कोई पता नहीं दिया। वे कई चक्कर लगा कर वापिस चले गए ,इन दोनों सखियों को बहुत बाद में पता चला। ये अब किसी कि कोई किसी प्रकार की सहायता नहीं लेना चाहती थीं क्यों कि दोनों ही अब अपने पांव पर खड़ी हो चुकी थीं। रश्मि दीदी के प्रोत्साहन पर दोनों ने नौकरी के साथ साथ बी .ए. कि डिग्री भी ले चुकी थीं। और अब वकालत की डिग्री के अंतिम वर्ष की तैयारी में लगी हुई थीं।

जब वे दोनों परीक्षा देने मेरे पास आयीं तो रश्मि ने उन दोनों के विषय में मुझे काफी कुछ बता दिया था। वे परीक्षा देने मेरे ही घर पर रूकती थीं ,मुझे भी बड़ा गर्व अनुभव होता था कि मेरे गांव की लड़कियां स्वयंसिद्धा हो गयी हैं। वे दोनों परीक्षा देने मेरे साथ ही कालेज जाती थीं। मैं ला कालेज में टीचर थी , मैंने भी उनसे कहा कि पढ़ने में मैं उन कि पूरी सहायता करुँगी। क्यों कि रश्मि और मैं साथ साथ ही एक ही कालेज में पढ़े थे हम दोनों भी गांव से ही पढ़ कर आये थे। रश्मि को गांव के स्कूल में नौकरी मिली मैने डिग्री कालेज में पढ़ाना शुरू किया। हम दोनों का मिलना होता ही रहता था।

गोविंदी तथा सुरभि शहर में ही रहती थीं। दिन भर पुलिस कि ड्यूटी करके शाम को ला कि कक्षा में पढ़ती थीं ,वे दोनों तीन वर्ष तक हमारे घर आने तथा परीक्षा देने के लिए ठहरने से हमारे घर कि सदस्य बन गयी थीं हमारे बच्चे भी दोनों को बहुत प्यार करते थे उन्हें अच्छा मानते थे ,वे बच्चों के साथ खूब बतियाती थीं। मैने भी उन्हें काफी सारी पुस्तकें अपने विद्यार्थियों से दिलवाईं। ला के अंतिम वर्ष कि परीक्षा दे कर जब वे दोनों जाने लगीं तब मैने उनसे कहा ,जीवन अकेले नहीं जिया जाता ,वे बोली हम अकेले कहाँ हैं ,हम दोनों तो वर्षों से साथ साथ ही हैं ,फिर आपका तथा रश्मि दीदी का पूरा परिवार हमारे साथ है, फिर भी तुम दोनों को अपने विषय में भी सोचना चाहिए। उन्होंने बड़े बुझे मन से कहा कि वे विवाह के नाम से ही इतनी दुखी हैं कि इस विषय में सोच भी नहीं सकती। उनके विवाह करने कि इच्छा तो उनके परिवार वालों ने बचपन में ही समाप्त करदी है। जब मैंने उन दोनों की अंतर वेदना सुनी तो मेरी ममता उनके प्रति और बढ़ गयी। मैने अपने मन में सोचा कि माता -पिता बच्चों कि बचपन कि ना समझ उम्र में विवाह करके कितना अनर्थ करते हैं। गोविंदी तथा सुरभि ने वकालत की परीक्षा तीनों वर्ष मेरे ही घर में रह कर दी थी। वे दोनों एक महीने पहिले छुट्टी ले कर आ ती थीं ,तथा मेरे अस्त व्यस्त घर को भी व्यवस्थित करके जाती थीं। उन दोनों में बड़ा अच्छा ताल मेल था ,बड़ी आसानी से वे

एक दूसरे की कही बात मान जाती थीं। कोई भी बात गोविंदी जल्दी समझ जाती थी ,सुरभि जरा देर से समझ पाती थी। जब भी समय मिलता था मैं दोनों को गाइड करती रहती थी। वकालत की परीक्षा भी दोनों ने अच्छे अंकों से प्रथम डिवीज़न से पास की। मैने ही तार देकर उनको उनके परीक्षा परिणाम की सूचना दी थी। वे दोनों पुलिस की नौकरी करते करते अब वकील बन चुकी थीं। उन्हें कानून की पूरी जानकारी भी हो चुकी थी। वे अपनी आगे की राह तय करने के लिए रश्मि तथा मुझसे राय लेती रहती थीं। उनके डिपार्टमेंट ने उनकी योग्यता देख कर उन्हें प्रोमोशन भी दे दिया था।

वकालत की परीक्षा पास करके वो दोनों रश्मि के साथ छुटियों में हमारे घर आयीं। मेरे बच्चों के लिए खूब सारी गिफ्ट लेकर आयीं। मेरे लिए अच्छी सी साड़ी तथा बड़ा सा पर्स लेकर आयीं ,रश्मि भी अपना पर्स तथा साड़ी हमको दिखा रही थी ,तथा यह भी कह रही थी कि तुम दोनों ने बहुत खर्च कर दिया है ,पर साड़ी और पर्स बहुत सुन्दर है। हम सब ने पंद्रह दिन खूब मस्ती कि ,वे दोनों भी परिवार में रह कर खूब खुश थीं।

एक दिन हम सब शाम की चाय पी रहे थे ,मैने उनसे कहा कब तक ऐसे ही रहोगी ,अब तुम लोगों को अपने बारे में भी सोचना चाहिए। तुम्हें शादी कर लेनी चाहिए। इतना सुन कर दोनों बोली ना बाबा शादी की बात मत कीजिये हम दोनों अपनी जिंदगी से बहुत खुश हैं। रश्मि और मैने उन्हें बहुत समझाया ,अभी तो साथ साथ हो ,कुछ दिन बाद अलग अलग स्टेशन पर ड्यूटी लगेगी अलग अलग शहरों में पोस्टिंग होगी तब क्या करोगी कैसे रह पाओगी। हमारी बातें उनकी समझ में आने लगी।

शायद उन्होंने कभी अलग भी होना होगा ,इस विषय में सोचा नहीं होगा ,पर सदा साथ ही रह पाएंगी इसकी भी तो कोई गारंटी भी तो नहीं थी। रश्मि और मैने मेट्रिमोनियल में एड दिया। कई पत्र आये ,कुछ लड़के हमने स्वयं देखे ,उनसे बाकायदा साक्षात्कार किया ,तथा गोविंदी तथा सुरभि के लिए चार लड़के चुने जो उदार विचारों के थे। क्यों कि एक परित्यक्ता थी दूसरी विधवा ,इसलिए बहुत छान बीन कर लड़के सबकी सम्मति से चुने गए थे। दोनों ने हमारी सम्मति से उन्हें देखा उनसे बात कि तथा अपने अपने लिए वर चुना। रश्मि और हम सब बहुत खुश थे। दशहरे से एक दिन पूर्व फैमिली कोर्ट में जाकर दोनों का क़ानूनी विवाह कराया।

दोनों के परिवार वाले भी ख़ुशी ख़ुशी इस विवाह में सम्मिलित हुए। दशहरे के दिन एक बड़े से होटल में दावत दी गयी ,रश्मि तथा मेरे परिवार ने बरातियों तथा अतिथियों का स्वागत किया। आज दोनों सखियाँ अपने अपने परिवारों में खूब खुश हैं और प्रसन्नता पूर्वक जीवन जी रहीं हैं। हम दोनों परिवारों कि तो वे दोनों अभिन्न सदस्य है ही। हर त्यौहार में हम दोनों उन्हें पूरा नेग भेजती रहती है।

गोविंदी और सुरभि जैसी न जाने कितनी लड़कियां आज भी रूढ़िवादी परम्पराओं की शिकार बनी बैठी होंगी। उनके जीवन में भी ख़ुशी आ सके ,उन्हें भी रश्मि दीदी जैसी मार्गदर्शिका मिल जाएँ जो आज भी गांव गांव में समर्पित भाव से जन जागृति के प्रचार व प्रसार में लगीं हुई हैं। गांव की महिलाओं के लिए गोविंदी तथा सुरभि आज भी आदर्श की पात्र हैं और लोग भी अपनी बेटियों को विद्यालय भेजते हैं ,ताकि उनकी बेटियां भी गोविंदी तथा सुरभि की भांति स्वयं सिद्धा बन सकें। अब तराई के उस गांव में कोई भी अपने बच्चों का बाल-विवाह नहीं करता ,अगर कोई करता है तो उसे दंड दिया जाता है। सभी अपनी बेटियों को रश्मि दीदी के विद्यालय में पढ़ने भेजती हैं। रश्मि जी का यह कार्य सराहनीय है। एक तो उन्होंने रूढ़ि वादी परम्परा तुड़वाई ,दूसरा उन्होंने महिलाओं में जन जागृति का प्रसार कर गांव में कन्या जीवनदायनी जैसी महत्व पूर्ण संस्था की एक शाखा अपने गांव में आरम्भ की ,जिसके प्रभाव से गांव की सभी बालिकाएं रश्मि जी के विद्यालय में पढ़ कर योग्यता हासिल कर रहीं हैं। रश्मि दीदी का विद्यालय आज बारहवीं कक्षा तक हो गया है। उनकी इच्छा है कि गांव में ही बालिकाओं के लिए ट्रेनिंग कालेज भी शुरू हो जाय ,ता कि उनके गांव क़ी बालिकाएं आत्मनिर्भर बन सकें। रश्मि जी का प्रयास जारी है ,हमारी शुभ कामनाएं सदा सर्वदा उनके साथ रहीं हैं तथा सदा रहेंगीं।

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  1. बहुत प्रेरणापूर्ण कहानियाँ हैं - यही उचित है !

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  2. बहुत प्रेरक कहानी। साधुवाद स्वीकार करें।

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