मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

दीपक आचार्य का आलेख - सेटिंग करने वाले हमेशा अपसेट रहते हैं...

हमेशा अपसेट रहते हैं

सेटिंग करने वाले

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

प्रवाह को स्वीकार करते हुए जीवन जीना और जीवन जीने के लिए प्रवाह को अपने अनुकूल करना आदमी की सोच में होता है। हर आदमी यही चाहता है कि जो कुछ हो वह उसका मनमाफिक ही हो, अन्यथा कुछ हो ही नहीं।

प्राकृतिक, दैहिक, दैविक और भौतिक विषयों में प्रवाह के अनुरूप अपने आपको ढाल लेने वाले लोग परम संतुष्ट और धैर्यवान होते हैं। उन्हें प्रकृति और ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा होती है और इसलिए कभी अपने आपको भाग्यवादी और कभी ईश्वरवादी होकर जीते रहते हैं, अपने ही हाल में मस्त रहते हैं।

इंसानी मर्यादाओं के अनुसार ही इनका कर्म, चरित्र और व्यवहार होता है इसलिए अपने कामों और स्वार्थों से कहीं अधिक स्थान मानवीय संवेदनाओं और सेवा-परोपकार को देते हैं। दूसरी किस्मों के लोग अपने काम, लक्ष्य और स्वार्थ का ताना-बाना बुन लेने के बाद प्रवाह को अपने अनुकूल बनाने के लिए प्रयासों में लग जाते हैं।

इन लोगों को सिर्फ अपने काम से ही सरोकार होता है फिर चाहे कुछ भी और कैसा भी कर्म क्यों न अपनाना पड़े। ये लोग जहाँ कहीं होते हैं वहाँ इनका पूरा और पक्का विश्वास सेटिंग के भरोसे ही होता है।  दुनिया के तमाम समीकरणों और समझौतों का पूरा-पूरा ज्ञान एवं अनुभव रखने वाले ये लोग हर काम को पूरा करने के लिए सारे संबंधों को भुनाने से लेकर हर छोटे से छोटे अवसर और मुलाकात का पूरा-पूरा फायदा उठाने में माहिर हुआ करते हैं।

जीवन निर्वाह और जीवन विकास के लिए पुरुषार्थ की प्रधानता हर युग में स्वीकारी गई है और इसके लिए न्यायोचित मार्गों और सात्ति्वक गलियारों को ही मान्यता दी गई है, पिछले दरवाजों से या गलत-सलत रास्तों से कार्य संपादन को वज्र्य ही माना गया है। अधिकतर सेटिंग वाले काम मर्यादाहीनता के द्योतक होते हैं जिसमें कहीं नैसर्गिक प्रवाह को रोका या बदला जाता है, कहीं अपने काम के लिए औरों को दुःखी करने की मानसिकता हावी होती है।

आजकल ऎसे लोगों की खूब भरमार सभी तरफ है जिन्हें सेटिंग मास्टर कहा जाता है। ये लोग दिन-रात किसी न किसी उधेड़बुन और सेटिंग में लगे रहते हैं। यहाँ तक कि सेटिंग के चक्कर में इन्हें नींद निकालने तक का पूरा समय नहीं मिल पाता।  और तो और सपने भी देखेंगे तो सेटिंग के ही। 

जो एक बार सेटिंग के फेर में पड़ जाता है वह जिन्दगी भर इस मकड़जाल और मायाजाल से बाहर नहीं निकल पाता क्योंकि उसे वह रास्ता मिल जाता है जिसके जरिये कर्म के संकल्प और लक्ष्य के बीच की दूरी घट जाती है।

फिर आदमी को जब अपनी ही तरह के दूसरे लोग भी सहज ही उपलब्ध हो जाया करते हैं तब पारस्परिक उन्नति, सहकार और गठजोड़ की सारी संभावनाएं मूर्त रूप ले लिया करती हैं। सेटिंग में दक्ष लोगों का तगड़ा नेटवर्किंग हर तरफ ऎसा बन जाता है कि फिर यह संगठित संरचना का रूप प्राप्त कर लेता है।

आजकल सीधे तौर की बजाय सेटिंग से काम होने का चलन है। यह कलियुग का वह रामबाण है जो हर कहीं काम कर जाता है। सेटिंग का ताना-बाना बुनने वाले लोग आम आदमी की नज़रों में चाहे कितने वैभवशाली, लोकप्रिय और महान हों, लेकिन आत्मशांति, सुकून और शांति के मामले में ये आम लोगों से भी गए बीते होते हैं और इनका हर क्षण किसी न किसी सोच-विचार में लगा रहता है।

जीवन के शाश्वत लक्ष्यों की समझ रखने वाले लोग हर हाल में मस्त रहा करते हैं लेकिन जो लोग अपने जीवन और सामर्थ्य से अधिक पाने या जमा करने की भूख से ग्रस्त रहते हैं वे लक्ष्यों का बहुत बड़ा पहाड़ अपने सामने खड़ा कर लिया करते हैं और ऎसे में इन लक्ष्यों का हमेशा बना रहने वाला चिंतन उद्विग्नता और तनावों का माहौल चौबीसों घण्टे बनाए रहता है।

जो लोग प्रकृति के जितने अधिक करीब रहते हैं, प्रवाह के साथ बहने के आदी रहते हैं और हर घटना या हलचल को ईश्वरीय विधान मानकर सहजतापूर्वक स्वीकार कर लिया करते हैं वे लोग जीवन को पूरे आनंद के साथ व्यतीत करते हैं जबकि अपनी क्षमताओं, मानसिक एवं शारीरिक सामर्थ्य से कई गुना अधिक के लिए भागदौड़ को ही जिन्दगी का अहम हिस्सा मान लेने वाले लोग किसी भी क्षण मस्त नहीं देखे जा सकते।

इनके चेहरे पर तनाव और थकान के भाव हमेशा बने रहते हैं और कोई भी इन्हें देख कर आसानी से यह कह सकता है कि ये किसी न किसी गोरखधंधे में रमे हुए हैं। कई बार खूब सारे कामों की चिंता इन्हें एकाध क्षण के लिए शून्यावस्था में भी ले जा सकती है, जबकि कई सारे लोग लोक व्यवहार में प्रत्यक्ष बातचीत के दौरान भी ऎसे लगते हैं कि जैसे किसी और विचारों में कहीं खोये हुए हैं।

अपनी मर्यादाओं और कर्म क्षेत्र की सीमाओं को जानकर जीवन को ढालने की आवश्यकता को सर्वत्र महसूस किया जाता रहा है। ऎसा होने पर अपने लक्ष्य और कर्म में किसी भी प्रकार की न तो बाधा संभव है, न कोई तनाव। जीवन निर्माण और दिनचर्या के हिसाब से जो लोग सेट हैं वे ही मस्त रह सकते हैं।

महत्त्वाकांक्षा और उच्चाकांक्षा स्वाभाविक है, हर इंसान दूसरों से अपने आपको बड़ा, वैभव सम्पन्न और लोकप्रिय देखना तथा दिखवाना चाहता है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हम अपने आपको ही भूल जाएं, अपने आत्म तत्व को विस्मृत कर दें और किसी यंत्र के रूप में ढल जाएं जहाँ जो कुछ हो रहा है उसका न संवेदनाओं से कुछ लेना-देना है, न जगत और प्रकृति से।

सेटिंग करने वाले लोग जमाने के सामने दूसरे रूप में होते हैं और यह कृत्रिमता उनके लिए अपनायी जानी इसलिए जरूरी है ताकि उनके व्यवहार और कर्म से अनभिज्ञ लोगों का पूरा सहयोग मिलता रहे, उन्हीं की तरह के सेटिंगबाज लोग उनके अभिनय को जान न पाएं और मदद करते रहें, उन्हें लेकर भोले या भ्रमित रहें।

जिन लोगों का भरोसा सेटिंग में होता है उन लोगों के लिए जीवन का कोई क्षण ऎसा नहीं मिल पाता जिसमें वे शांत और स्थिर होकर अपने  बारे में कुछ सोच सकें, आत्मचिन्तन कर सकें और जीवन की भूतकालीन या वर्तमान घटनाओं या हलचलों की नीर-क्षीर समीक्षा कर सकें।

इस दृष्टि से सबसे ज्यादा अपसेट कोई रहते हैं तो वे हैं सेटिंग जगत में रमे हुए लोग। जीवन में आत्मिक शांति, शाश्वत सुकून और मुदिता भाव न आए तो हर तरह की सेटिंग का कोई अर्थ है ही नहीं।

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