बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

दीपक आचार्य का आलेख - शंका त्यागें, श्रद्धा रखें

शंका त्यागें, श्रद्धा रखें

- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

श्रद्धा और शंका ये दोनों ऎसे शब्द हैं जो जहाँ भी रहते हैं वहाँ परिपूर्ण अवस्था में रहते हैं और दोनों ही अपने जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं।

इन दोनों का ही यदि अपने जीवन में न्यूनाधिक अनुपात हो तब जीवन के सारे आनंद गौण होकर रह जाते हैं और पूरा जीवन विषादों, तनावों और फालतू की चर्चाओं से घिरा रहता है जहाँ न कोई आनंद है, न सुख या सुकून। 

बात किसी व्यक्ति की हो अथवा ईश्वर की, या फिर किसी विचार की ही क्यों न हो। हम किसी एक पर शंका भी करें और उसके प्रति श्रद्धा का भाव भी बनाए रखें, यह कदापि संभव नहीं होता।

आजकल श्रद्धा और शंका समय सापेक्ष शब्द हो गए हैं। अक्सर कई बार हमारी श्रद्धा आकार लेने लगती है और फिर इसका रूपान्तरण शंकाओं और आशंकाओं में होने लगता है।  यह हमारे मस्तिष्क की भ्रमावस्था का संकेत है।

कई बार हम ऎसे-ऎसे मामलों और व्यक्तियों में शंका करने लग जाते हैं जिसका कोई औचित्य नहीं होता। आमतौर पर हमारी अधिकांश शंकाएं स्वाभाविक रूप से निरर्थक और निराधार ही होती हैं। व्यक्तियों के मामले में हो सकता है कि कई बार हमारी श्रद्धा जग जाए और कुछ ऎसे अनमने काम हो जाएं अथवा किन्हीं कारणों से अश्रद्धा पैदा होने लगे तब शंकाओं का होना स्वाभाविक है लेकिन यह भी सामान्य बात है कि कई बार लोग अपने कामों को लेकर ईश्वरीय विधान और ईश्वर के प्रति भी शंका करने या रखने लग जाया करते हैं।

कितनी विचित्र स्थिति है कि जो विधाता हमारा सृजन करता है हम उसी के विधान और उसी पर ही संदेह करने लग जाया करते हैं। 

खूब सारे लोग ऎसे होते हैं जो अपने मामूली से कामों के पूर्ण न होने पर घबरा जाते हैं। कई सारे साधक भी ऎसे होते हैं जो ईश्वर से कोई न कोई इच्छा रखते हैं और इसकी पूर्ति नहीं होने की स्थिति में  ईश्वर के प्रति अविश्वास और शंका करने लग जाया करते हैं।

खूब सारे लोग अपने स्वार्थों और कामों में इतने रम जाते हैं कि भगवान को भी नहीं छोड़ते। इन सभी को लगता है कि जैसे ईश्वर हमारे अपने ही कामों के लिए बना है और काम होते रहें, तब तक वह अच्छा। और काम न हो पाएं तो सारा दोष भगवान का ही। जैसे कि भगवान हमारा नौकर ही हो। कोई सा काम बता दो, उसे करना ही करना है।

कई लोग भगवान को खुश करने के जतन पूरे करने के बाद अपने काम बताते हैंं। दूसरी किस्म में वे लोग आते हैं जो भगवान के नाम से बाधाएं लेते हैं और काम होने पर बाधाएं छूटेंगी वरना ठन-ठन गोपाल। यह भी एक अजीब तरह की ब्लेकमेलिंग ही है।

श्रद्धा में दृढ़ता का अभाव और कामों को प्रधानता देना ही मनुष्य की तमाम प्रकार की समस्याओं का मूल कारण है। जीव मात्र की कोई सी कामना हो, कर्म करते रहना आरंभिक कत्र्तव्य है।

कामनाओं की पूर्ति के लिए ईश्वर के प्रति अनन्य श्रद्धा और आस्था भाव का होना नितान्त जरूरी है। कोई सा काम हो, इसके लिए भगवान के समक्ष विनम्र भाव से निवेदन कर दिए जाने के बाद हमारा काम सिर्फ कर्म करना ही रहना चाहिए।

भगवान सभी प्रकार के कर्म करने में समर्थ है और उसके लिए सिर्फ श्रद्धापूर्वक निवेदन ही काफी है। लेकिन अक्सर देखा यह जाता है कि हम लोग कोई सी कामना भगवान के समक्ष निवेदित तो कर दिया करते हैं मगर उसके बाद धैर्य नहीं रखते और बार-बार पीछे लग जाते हैं।  और थोड़ा समय व्यतीत होने पर ईश्वर प्रति भी श्ांका व्यक्त करने की आदत बना डालते हैंं।

यह वह अवस्था होती है कि जिसमें एक तरफ तो हमें अपनी इच्छाओं की पूर्ति अब तक नहीं हो पाने का दुःख होता है और दूसरी तरफ जाने कितनी प्रकार की शंकाएं और आशंकाएं हम अपने आप को लेकर तथा भगवान को लेकर करने लगते हैं।

हम किसी भी प्रकार की कोई कामना भगवान से समक्ष करें या न करें, वह अन्तर्यामी है और उसे सब पता है कि किसके मन में क्या है, कौन क्या चाह रहा है, किसके दिमाग में क्या कामना जगी हुई है और कौनसी इच्छा पूरी करनी है।

कहा गया है कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। ईश्वर हमारे जीवन में यथायोग्य समय में ही अपनी इच्छाओं की पूर्ति करता है और किसकी इच्छा कब पूरी करनी है, यह वही जान सकता है, और कोई नहीं।

इसलिए एक बार भगवान के समक्ष अपनी भावनाएं व्यक्त कर दें, इसके बाद भूल जाएं। बाकी का काम भगवान का है और उसे बार-बार याद दिलाने की कोई आवश्यकता भी नहीं होती।

एक बार सच्चे मन से जो कुछ भी भावनाएं हैं उन्हें भगवान के सम्मुख निवेदन कर दें, इसके बाद भगवान के प्रति अश्रद्धा जैसा कोई भाव न रखें।

हमारे कई सारे काम हमारे चाहे समय से पहले भी पूर्ण हो सकते हैं लेकिन हमारे भीतर अश्रद्धा और शंका भाव आ जाने की वजह से भी हमारे कई सारे काम समय पर पूरे नहीं होते बल्कि आगे से आगे बढ़ते जाते हैं। 

जीवन में या तो शंका रखें अथवा श्रद्धा। दोनों का सम्मिश्रण कभी आनंद नहीं दे सकता। इसी प्रकार दोनों के रहते हुए जीवन और व्यवहार सब कुछ आडम्बरी और विषम हो जाता है। 

बात किसी व्यक्ति को लेकर हो या भगवान की। हमेशा दृढ़ श्रद्धा रखें और आदर-सम्मान दें, कभी शंका न रखें। ऎसा होने पर ही हम जीवन में ईश्वरीय कृपा और जीवन-आनंद का अनुभव कर सकते हैं। जो श्रद्धा के पात्र हैं उनके प्रति श्रद्धा हमेशा बनाए रखें, इसी में हमारा कल्याण समाहित है।

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