रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

March 2015
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

आलेखः घास के जूते

लेखकः हरदेव कृष्ण

जानकारी का स्त्रोतः अखबार और प्रदर्शनियां

image

 

घास के जूते

पैरों की हिफाजत के लिए जूते और चप्पलों का अविष्कार किया गया। इनके निर्माण के लिए मुख्यतः पशुचर्म, रबड़ या सूती वस्त्र को उपयोग में लाया जाता है। शुद्धि के लिए साधु लोग काष्ठ को , यानि खड़ाऊं को महत्व देते हैं। लेकिन देवभूमि हिमाचल , विशेषकर कुल्लू अंचल में ‘ घास के जूते या चप्पल’ प्रयोग में लाए जाते हैं। इन्हें स्थानीय भाषा में “ पूला” कहा जाता है। गांव में चमड़े के जूते घर के अंदर ले जाना अच्छा नहीं समझा जाता, मंदिर के परिसर में भी इनकी मनाही है। कुल्लू के कुछ गांव , जैसे कि तीऊन, जठानी और खोपरी आदि में , सीमा के बाहर ही जूते उतारने आवश्यक हैं। वहां केवल पूला पहन कर जाना पड़ता है। वैसे भी हिमाचल प्रदेश के ऊपरी क्षेत्रों में बर्फ और सर्दी खूब पड़ती है। वहां नंगे पाँव धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करना कठिन होता है। पूला चप्पल पहन कर बर्फ में भी चल-फिर सकते हैं।

पूला बनाना एक हुनर है। इसके लिए विशेष प्रशिक्षण लेना पड़ता है। इसे बनाने के लिए भांग के रेशों को प्रयोग में लाया जाता है। यहां इन्हें शेःल कहा जाता है। पूला का सबसे नीचला भाग यानि तला शेःल की रस्सी से बनाया जाता है। इसके लिए लगभग 10 मीटर लंबी रस्सी बाटी जाती है। नाप के अनुसार ,एक विशेष कारीगीरी के तहत इस रस्सी के फंदे और लड़ें बनाकर पूला के तले को बनाया जाता है। बाद में एक प्रकार की बुनाई की जाती है जो कि ऐड़ी की तरफ से आरंभ करके आगे तक जाती है। पूला के ऊपरी भाग में स्थानीय सफेद झबरी बकरी के बाल उपयोग में लाए जाते हैं। उन्हें ऊन के तरह मरोड़ी दी जाती है। फिर उन्हें लाल,गुलाबी या हरे रंगों में रंग लिया जाता है। इससे पूला सुन्दर लगने लगता है। इस ऊपरी भाग को बनाने के लिए बहुत एकाग्रता और कुशलता की दरकार होती है। इस पर कई रंगों के धागों को भी खूबसूरती से पिरोया जाता है।

कुछ जगहों पर आधे पैर की पूलें उपयोग में लाई जाती है। इन्हे ‘ मेदू- पूला’ कहते हैं। इसके लिए धान की घास प्रयोग में लाई जाती है। इसे पहले पानी में गीला किया जाता है, फिर उसे रस्सी की तरह बाट लेते हैं। ऊपरी भाग के निर्माण में भी इसी रस्सी की सहायता ली जाती है। कभी-कभी इस के लिए वनों में मिलने वाली ‘ बगड़ घास’ को भी उपयोग में ले लेते हैं।

लाहुल-स्पिति जैसे क्षेत्रों में पूला बनाने के लिए गेहूं और जौ के डंठलों का प्रयोग किया जाता है। धान के घास की भांति ही इन डंठलों को पानी में भिगो कर कूट लिया जाता है। उसके बाद बाट कर रस्सी बनाई जाती है। लेकिन बाद में भेड़ या बकरी की खाल चढ़ा दी जाती है। इसका ऊन वाला भाग बाहर होता है। इनकी खासियत यह है कि यह जूते घुटनों तक लंबे होते हैं। यह मजबूत ,गर्म और टिकाऊ होते हैं, इनके भीतर पानी तक नहीं जाता। वहां की भौगोलिक परिस्थति के हिसाब से यह जूते बहुत उपयोगी सिद्द होते हैं। किन्नौर में इन्हें ‘ पोनो ’ कहा जाता है। वहां इसका ऊपरी भाग कपड़े का होता है, और जब इसमें कशीदाकारी की जाती है तो इसे ‘ जोम्बा ’ का नाम दिया जाता है।

हिमाचल के इन खास जूतों को , सर्दी और गीले मौसम में कोई भी पहन सकता है। किसी जगह क्राफ्ट मेला लगा हो तो इन को अवश्य परखें।

-----------------------------------------------------------------------------

हरदेव कृष्ण, ग्राम/डाक – मल्लाह-134102

जिला पंचकूला (हरियाणा)

पुस्तक समीक्षा

image

जीवन का मूल स्वर है दर्द का कारवॉं

कुमार कृष्णन

आम जीवन की बेबाकी से जिक्र करना और इसकी विसंगतियों की सारी परतें खोल देना यह विवेक और चिंता की उंचाईयों का परिणाम होता है। आज जो साहित्य रचा जा रहा है,वह लेखन की कई शर्तों को अपने साथ लेकर चल रहा है। एक तरफ जिन्दगी की जहां गुनगुनाहट है,वहीं दूसरी तरफ जवानी को बुढ़ापे में तब्दील होने की जिद्द भी है,इन्हीं सब शर्तों की अनेक रंगों को अपनी ग़ज़लों में पिरोने का साहस डॉ. मालिनी गौतम ने किया है। यूं तो डॉ. मालिनी गौतम साहित्य की अनेक विधाओं में लिखती हैं, लेकिन हाल ही में प्रकाशित उनका ग़ज़ल संग्रह 'दर्द का कारवॉं' वीरान जिन्दगी के कब्रिस्तानों पर एक ओर जहां जीवन और मुहब्बत की गीत लिखती है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान जीवन की विसंगतियों से लड़ने की ताकत भी देती है।

संग्रह की ग़ज़लों के रंग इन्द्रधनुषी हैं,लेकिन सारी ग़ज़लों का मूल स्वर जीवन है और जीवन में घटनेवाली घटनाओं का चित्रण है। इससे प्रतीत होता है कि डॉ़. मालिनी गौतम ने अपनी ग़ज़लों में जिया ही नहीं है,बल्कि उसे भोगा भी है। इन दो क्रियाओं 'जीना और भोगना',ऐसी काई में पगडंडी है, जिस पर फिसलने का डर बना रहता है। डॉ. मालिनी गौतम ने स्वयं को फिसलने नहीं दिया है,जो भी लिखा है मजबूती के साथ और साफ—साफ लिखा है। जैसे

 

इक पल रोना इक पल गाना अजब तमाशा जीवन का

हर दिन एक नया अफ़साना अजब तमाशा जीवन का

——— ——

वांसती कुछ सपने हैं इन शर्मीली आंखों में

आशाओं के दीप जले इन चमकीली आंखों में

 

डॉ मालिनी गौतम अपनी ग़ज़लों के माध्यम से पाठक को नए उत्साह और समय को सकारात्मक ढंग से लेने की सलाह देती है न कि पाठक के कंधों को कमजोर करना चाहती है। उनकी ग़ज़लों का यह सकारात्मक रूख सूरज के साथ चलने की जीजीविषा और चांद की रोशनी को अपनी आंखों में भर लेने छटपटाहट। जैसे—

 

पड़े पैरों में है छाले मगर मैं फिर भी चलता हूं

कभी सहरा कभी दरिया से अक्सर गुजरता हूं

 

सच में उत्साह आदमी को किरदार की आईनासाजी का हूनर सिखाता है। यह हूनर डॉ मालिनी गौतम के लेखन का आत्मवल है। संग्रह की ग़ज़लों के पाठ के बाद सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

 

यह तो सहज ही पता चलता है कि डॉ मालिनी गौतम की ग़ज़ल दुनिया की दुनियां आमजीवन के आसपास घूमती है,लेकिन यह पूरे तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि डॅा मालिनी गौतम जीवन की दुनियां के बाहर नहीं निकलना चाहती हैं, इनका लेखकीय कॉनवास काफी बड़ा है। जीवन के हरेक आहट नए—नए दृश्य का तलाश करती है,जिसमें भोर की पहली किरण के साथ हसीन उजालों की सुगबुगाहट मिलती है। विरह और वियोग का एक छटपटाता हुआ पन्ना भी खुलता है और उस पन्ने पर बड़े ही सलीके से मोहब्बत का नाम लिखा जाता है।

 

जुल्फों केा रूख से हटाकर चल दिए

चांद धरती पर दिखाकर चल दिए

 

साहित्य में फटे हुए दूध को मालिनी गौतम रबड़ी नहीं कहती बल्कि साहित्य की तमाम खूबियों और छंदों की रश्मों को निभाती है, जिस कारण इनकी ग़ज़लें पठनीय और असरदार हो जाती है।

 

पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि 'दर्द का कारवॉ' की ग़ज़ले पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होंगी। संग्रह की तमाम ग़ज़लें पठनीय और शिल्प के लिहाज से मुकम्मल है

 

समीक्षित कृति—

दर्द का कारवॉ

(ग़ज़ल संग्रह)

डॉ मालिनी गौतम

मूल्य 150 रुपये

पहले पहल प्रकाशन

25—ए,प्रेस काम्पलेक्स,एम.पी नगर

भोपाल (मध्य प्रदेश)

​हास्य - व्यंग्य

-------------------

बुढ़ौती  में तीरथ... .

!!

तारकेश कुमार ओझा

कहते हैं कि अंग्रेजों ने जब रेलवे लाइनें बिछा कर उस पर ट्रेनें चलाई तो देश के लोग उसमें चढ़ने से यह सोच कर डरते थे कि मशीनी चीज का क्या भरोसा, कुछ दूर चले और  भहरा कर गिर पड़े। मेरे गांव में ऐसे कई बुजुर्ग थे जिनके बारे में कहा जाता था कि उन्होंने जीवन में कभी ट्रेन में पैर नहीं रखा। नाती - पोते उन्हें यह कर चिढ़ाते थे कि फलां के यहां शादी पड़ी है। इस बार तो आपको ट्रेन में बैठना ही पड़ेगा। इस पर बेचारे बुजुर्ग रोने लगते। दलीलें देते कि अब तक यह गांव - कस्बा ही हमारी दुनिया थी... अब बुढ़ापे में यह फजीहत क्यों करा रहे हो...।

हां यह और बात है कि उन बुजुर्गों का जब संसार को अलविदा कहने का समय आया तो उनकी संतानों ने किसी तरह लाद - फांद कर उन्हें कुछेक तीर्थ करा देने की भरसक कोशिश की। अपने देश की प्रतिभाओं का भी यही हाल है। राजनीति , क्रिकेट और फिल्म जगत को छोड़ दें तो दूसरे क्षेत्रों की असाधारण  प्रतिभाएं इसी बुढ़ौती में तीरथ करने की विडंबना से ग्रस्त नजर आती है।  बेचारे की जब तक हुनर सिर पर लेकर चलने की कुवत होती है, कोई पूछता नहीं। यहां तक कि कदम - कदम पर फजीहत और जिल्लतें झेलनी पड़ती है।

लेकिन जब पता चले कि बेचारा काफी बुरी हालत में है... व्हील चेयर तक पहुंच चुका है  या आइसीयू में भर्ती है  और दुनिया से बस जाने ही  वाला है तो तुरत - फुरत में कुछ सम्मान वगैरह पकड़ा देने की समाज - सरकार में होड़ मच जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े पुरस्कार की घोषणा होते ही नजर के सामने आता है ... एक बेहद  निस्तेज थका हुआ चेहरा...। सहज ही मन में सवाल उठता है ... यह पहले क्यों नहीं हुआ। क्या अच्छा नहीं होता यह पुरस्कार उन्हें तब मिलता जब तक वे इसकी महत्ता को समझ - महसूस कर पाने में सक्षम थे। एक प्रख्यात गायक की जीवन संध्या में बैंक बैलेंस को लेकर अपने भतीजे के साथ विवाद हुआ। मामला अदालत तक गया।

मसले का हल निकालने के लिए उस गायक ने किस - किस के पास मिन्नतें नहीं की। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। हां यह और बात है कि दिल पर भारी बोझ लिए उस शख्सियत ने जब दुनिया को अलविदा कहा तो उनकी शवयात्रा को शानदार बनाने में समाज ने कोई कसर बाकी नहीं रहने दी। एक और मुर्धन्य गायक को जब जीवन संध्या पर सरकार द्वारा पुरस्कार की घोषणा का पता चला तो वे बेहद उदास हो गए और हताशा में कहने लगे... क्यों करती है सरकार यह सब...मेरी दो तिहाई जिंदगी तो दो पैसे कमाने की कोशिश में बीत गई... अब इन पुरस्कारों का क्या मतलब।

बुढ़ौती में तीरथ की विडंबना सिर्फ उच्च स्तर की प्रतिभाओं के मामले में ही नहीं है। छोटे शहरों या कस्बों में भी देखा जाता है कि आजीवन कड़ा संघर्ष करने वाली  प्रतिभाएं सामान्यतः उपेक्षित ही रहती है। समाज उनकी सुध तभी लेता है जब वे अंतिम पड़ाव पर होती है। वह भी तब जब उनकी सुध लेने या सहायता की कहीं से पहल हो। मदद का हाथ बढ़ाने  वालों को लगे कि इसमें उनका फायदा है। अन्यथा असंख्य समर्पित प्रतिभाओं को तो जीवन - संघ्या पर भी वह उचित सम्मान नहीं मिल पाता, जिसके वे हकदार होते हैं। 

 

लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और दैनिक जागरण से जुड़े हैं।

-------------------------------------------------------------------------------------

तारकेश कुमार ओझा, भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर ( प शिचम बंगाल) पिन ः721301 जिला प शिचम मेदिनीपुर संपर्कः 09434453934

संसार अच्छा न लगे

तो छोड़ दें

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जो हमेशा ही कहते रहे हैं यह दुनिया खराब है।

बहुत से लोग ऎसे हैं जो किसी न किसी से हमेशा परेशान रहते हैं और कहते हैं कि लोग खराब हैं।

कई लोग ऎसे होते हैं जो अपनी ही समस्याओं से ग्रस्त रहते हैं और दिन-रात इस बात को लेकर कुढ़ते रहते हैं कि उन्हें उतनी तवज्जो नहीं मिल पाती जितनी मिलनी चाहिए।

आम तौर पर  देखा यह जाता है कि दुनिया में कोई भी इंसान अजातशत्रु नहीं हो सकता है। हर किसी का कोई न कोई शत्रु हो ही जाता है।

यह जरूरी नहीं कि इसकी कोई वजह हो ही। खूब सारे लोग शत्रुता पैदा होने के लिए ही पैदा हुए हैं और इनके जीवन का एक सूत्री कार्यक्रम यही है कि वे बेवजह शत्रुता पैदा करते रहें और इसी से इनका वजूद बना रहता है।

जब तक रोजाना कोई न कोई नकारात्मक काम न कर लें या किसी से दुश्मनी नहीं निकाल लें तब तक चुप नहीं बैठते।

सांसारिक जीवन में हर इंसान के लिए शत्रु और मित्र हमेशा बने रहते हैं और इस कारण से इंसान किसी न किसी उलझन में पड़ा ही रहता है।

लोग हमसे किसी कारण या स्वार्थ से कोई शत्रुता करे यह बात है लेकिन कोई बिना कारण से शत्रुता करे, तो इसका अर्थ यही है कि इंसानियत के दुश्मनों का वजूद अभी कम नहीं हुआ है। 

आम तौर पर दो तरह के इंसान होते हैं। कई सारे लोग ऎसे होते हैं जो सारी दुनिया को खराब बताते रहते हैं और कोई काम नहीं करते हैं।

इन लोगों का हर दिन दूसरों की निंदा के साथ उगता है और सारे संसार की समस्याओं पर गंभीर चिन्तन  और षड़यंत्रों की चिन्ता के साथ समाप्त होता है।

ये लोग जहां काम करते हैं, जहां रहते हैं वहां अपने ही अपने में खोये रहते हैं। खुद कुछ नहीं करते मगर संसार और अपने साथ रहने वाले लोगों को दोष देते रहते हैं।

काफी सारे लोग ऎसे हैं जो हमेशा आत्मदुखी रहने के आदी हैं और इनका कोई क्षण प्रसन्नता से नहीं गुजरता।

यह पूरा संसार एक दूसरे पर आश्रित है, समन्वय और सहकार का प्रतीक है और इसमें तरह-तरह के लोग मिलते हैं जिन्हें अपनेपन से भी, और अनमनेपन से भी साथ रखना पड़ता है और साथ काम करना पड़ता है।

नदी-नाव जैसा यह संयोग जिन्दगी भर चलता रहता है और इस दौर से हर कोई गुजरता ही है। किसी को दोष देने से कुछ नहीं होने वाला।

जिन लोगों को यह संसार बुरा लगता है उन्हें चाहिए कि वे संसार छोड़ देने के लिए तैयार हो जाएं और दूसरी सारी आशाओं, आकांक्षाओं तथा अपेक्षाओं को त्याग कर ईश्वर से यही प्रार्थना करें कि जितना जल्दी हो सके, संसार से दूर कर दे।

संसार में जो लोग जैसे हैं उन्हें स्वीकारें और अपनी बुद्धि तथा विवेक के अनुसार उनका उपयोग करें, उनसे काम लें तथा सांसारिक और परिवेशीय कर्मयोग का प्रवाह निरन्तर बनाए रखें।

आज संसार से भागने की बजाय संसार को अपने अनुकूल बनाकर चलने की आवश्यकता है। और यह तभी संभव हो पाएगा जबकि हम सभी लोग अपने-अपने क्षुद्र अहंकारों से मुक्त होकर संसार के लिए जीने और मरने की आदत डालें।

---000---

हमें अपनी मानवीय जड़ों का कैसे पता चला?

आइसक एसिमोव

 

हिन्दी अनुवाद :

अरविन्द गुप्ता

 

1. पत्थर युग

हमारे पूर्वज कौन थे? बाईबिल के अनुसार पहले मानव ऐडम और ईव थे और वे देखने में बिल्कुल आज के लोगों जैसे लगते थे। बहुत सालों तक यहूदी) इसाई और मुसलमान लोगों का इसमें यकीन था।

ऐडम और ईव कब पैदा हुए? बाईबिल में इसका कोई उल्लेख नहीं है परन्तु जिन लोगों ने बाईबिल का गहन अध्ययन किया है उन्होंने इस अनुमान को लगाने की कोशिश की है। उन्हें बाईबिल में घटी कुछ बाद की घटनाओं की तारीखें मालूम थीं। उदाहरण के लिए उन्हें पता था कि बैबिलोनियन्स ने ई पू 586 में येरूशलम पर कब्जा कर वहां के मंदिर को ध्वस्त किया था।

इससे शुरू कर वे पीछे गए। उन्होंने बाईबिल में जिक्र किए भिन्न राजाओं के काल का अनुमान लगाया। फिर उन्होंने प्राचीन राजाओं नोआ और पलास की आयु और उनके जन्म के समय उनके पिता की आयु आदि का भी अंदाज लगाया।

163० में आयरिश विद्वान जेम्स उशर ( 1581 - 1656) ने इन सब के आधार पर उत्पत्ति कब हुई इसका अनुमान लगाया। उनके अनुसार उत्पत्ति ई पू 4००4 में हुई।

बहुत से लोगों ने इसे सही माना। पर अगर यह सच होता तो पृथ्वी की आयु मात्र 6000 वर्ष होती।

बाईबिल के बाहर उस समय इतिहास की क्या स्थिति थी? क्या उससे कुछ मदद मिलेगी?

उशर के काल में किसी को इतने प्राचीन इतिहास का ज्ञान नहीं था। हां) रोम के इतिहास के बारे में लोगों को पता था। पर रोम की स्थापना ई पू 753 में हुई थी।

प्राचीन यूनानी इतिहास में इससे पहले के उल्लेख हैं। मिसाल के लिए पहला ओलम्पिक खेल ई पू 776 में हुआ और ट्रोजन युद्ध ई पू 1200 से कुछ पहले लड़ा गया था।

clip_image002

यह बाईबिल की उत्पत्ति से बहुत बाद की बात है। क्या यूनानियों से पहले भी कोई इतिहास था?

प्राचीन यूनानी इतिहाकारों के अनुसार मिस्त्र का इतिहास उनसे कहीं पुराना था।

प्राचीन मिस्त्र के अनेक शैल्यचित्र और लेख बचे थे पर उन्हें कोई भी पढ नहीं सकता था। मिस्त्र के इतिहास को जानने का कोई तरीका नहीं सूझ रहा था।

पर फिर 1799 में नेपोलियन बोनापार्ट की फ्रेंच फौज ने मिस्त्र पर हमला किया। फौज के एक अफसर को नील नदी के किनारे रोजैटा शहर में एक खुदा हुआ शिलालेख मिला। ' रोजैटा पत्थर ' पर तीन भाषाओं में खुदाई थी - दो मिस्त्र की भाषाओं में और एक यूनानी लिपि में। इतिहासकार यूनानी लिपि को पढ़ना जानते थे। अगर तीनों लिपियों में आलेख एक ही था तो यूनानी लिपि से मिस्त्र लिपि का अनुवाद सम्भाव था। यूनानी आलेख को पढ़ने के बाद इतिहासकार मिस्त्र लिपि को पढ़ना सीख पाए। यूनानी गाइड पास होने के बावजूद यह काम आसान न था क्योंकि यह कहना कठिन था कि कौन सा मिस्त्र शब्द, यूनानी शब्द का अनुवाद था। पर धीरे-धीरे यह काम सम्पन्न हुआ। 1818 में अंग्रेज डाक्टर थॉमस यंग १७७४-१८२९ ने इस कार्य में महत्वपूर्ण प्रगति की। फिर 1821 में फ्रेंच विद्वान ज्या फ्रैंकोइज शैम्पोलिन १७९०-१६३२ ने इस कार्य को सम्पूर्ण किया।

मिस्त्र की भाषा जानने के बाद इतिहासकार मिस्त्र के इतिहास का अध्ययन करने लगे। मिस्त्र की सबसे बड़ी पिरामिड ई पू 2500 में बनी थी। और मिस्त्री साम्रज्य ई पू 2850 में स्थापित हुआ था।

clip_image004

फिर 1846 में ईरान में एक बहुभाषी शिलालेख मिला। उसमें एक भाषा बहुत प्राचीन थी और उसे कभी ईराक की प्राचीन सभ्यता उपयोग करती थी। यह क्षेत्र टिगरिस और म्फ्रेटस नदियों पर स्थित था।

इस क्षेत्र का इतिहास मिस्त्र से भी प्राचीन पाया गया। ईराक में सुमेरियन लोगों ने ई पू 3200 में लिखाई का आविष्कार किया था।

यह सब बाईबिल में लिखी बातों से मेल खाता था। बाईबिल के अनुसार अगर उत्पत्ति ई पू 4००4 में हुई थी तो उसमें सबसे प्राचीन सुमेरियन लोगों से लेकर बाकी सभी सभ्यताओं के लिए भी स्थान था।

इस बीच विज्ञान में विशेषकर भूविज्ञान के क्षेत्र में बहुत प्रगति हो रही थी।

भूविज्ञान में पृथ्वी के पत्थरों का अध्ययन किया जाता है।

स्काटिश भूवैज्ञानिक जेम्स हटन ( 1726 - 1797) ने पत्थर कैसे बनते हैं इस विषय का अध्ययन किया। कुछ पत्थर गीली मिट्‌टी से शुरू होते हैं। पानी निचुड़ने के बाद वे ठोस और सख्त बन जाते हैं। यह पत्थर ' सेडिमेट्री पत्थर ' कहलाते हैं। लैटिन भाषा में सेडिमेंट का अर्थ होता है ' नीचे ठहरना '।

कुछ अन्य पत्थर ज्वालामुखियों से निकले गर्म लावा से बनते हैं। सभी पत्थर हवा और पानी के प्रभाव से धीरे- धीरे करके घिसते हैं।

पत्थर बनने या उसके घिसने की हरेक प्रक्रिया बहुत ही धीमी गति से होती है। पत्थर बनने में करोडों-खरबों साल लगते हैं। 1785 में हटन ने अपने शोधकार्य के बारे में लिखा। उनके अनुसार पृथ्वी बहुत प्राचीन थी।

बहुत समय तक लोगों ने हटन की बात नहीं मानी क्योंकि उनका कथन बाईबिल के खिलाफ जाता था। 1833 में स्काटिश भूवैज्ञानिक चार्ल्स लायल ( 1797 - 1875) ने तीन-खंडों की किताब लिखी जिसमें उन्होंने हटन की बात को सही माना। हटन के बाद अन्य तमाम सबूत मिले। उनसे यह पता चला कि पृथ्वी के पत्थर ' कस्ट ' - परतों में बंटे हैं और इन परतों का बहुत दूरी तक अध्ययन किया जा सकता था। पृथ्वी के प्राचीन इतिहास को इन परतों से) और उनमें मिले पत्थरों से समझा जा सकता था।

लायल ने इन सब बातों को बहुत अच्छी तरह से समझाया था। उसके बाद वैज्ञानिकों ने को बहुत प्राचीन माना। और बाईबिल में लिखी उत्पत्ति की तारीख पृथ्वी को गलत माना।

इसका अर्थ था कि मानव पृथ्वी पर ई पू 4००4 से कहीं अधिक पहले से थे। मिसाल के लिए इतिहासकारों को उस काल का पता था जब इंसान लोहा बनाना नहीं जानते थे। ई पू 1000 से कुछ पहले ही उन्होंने लोहा पत्थर को गलाकर लोहा बनाना सीखा था। उससे पहले हथियार बनाने के लिए वे पीतल या कांसा उपयोग करते थे। उदाहरण के 'इलियाड' के वर्णन में यूनानी और ट्रोजन फौजी कांसे के हथियारों से लडे थे।

पर कांसे का उपयोग ई पू 3200 के आसपास ही शुरू हुआ था। उसी समय लिखाई का भी इजाद हुआ था। उससे पहले मनुष्यों को धातुओं के बारे में बिल्कुल ज्ञान नहीं था और वे पत्थर के औजार और हथियार बनाते थे।

clip_image006

एक डच वैज्ञानिक क्रिश्चियन जार्जसन टौमसन १७६८-१८५ ने 1834 में इस बात को बहुत स्पष्टता से लिखा, ' अब हम लौह-युग में जी रहे हैं,' उन्होंने लिखा, 'उससे पहले हम कांसे के युग में थे। और उससे पहले पाषाण-युग में थे। '

इतिहास का निर्माण लिखाई के आविष्कार के बाद ही सम्भव हुआ। लिखाई से पहले के इतिहास को हम लोगों के घरों) मंदिरों और उनके औजारों के अध्ययन से ही समझ सकते हैं। इससे हमें कुछ जानकारी तो अवश्य मिलती है। पर इससे हमें घटनाओं का कम नहीं समझ सकते जो इतिहास के लिए जरूरी है।

इसीलिए लिखाई से पहले के इतिहास को ' प्री-हिस्ट्री ' या प्रैगएतिहासिक कहा जाता है। इसलिए पाषाण-युग प्रैगएतिहासिक है और उस समय के लोग भी लिखाई नहीं जानते थे।

मिस्त्र और सुमेरिया में प्राचोन काल के पत्थर के औजार पाए गए थे। और वे सभी बहुत ऊंचे दर्जे के थे। इससे लगता था कि लोग बहुत लम्बे अर्से से पत्थर के औजार बना रहे थे और अब वे इस कला में बहुत दक्ष हो गए थे। पत्थर के खराब औजार मिस्त्र और सुमेरिया के लोग हजारों वर्ष पहले से बनाते होंगे।

1797 में अंग्रेज भूवैज्ञानिक जान फइर ( 174० - 18०7) को दक्षिणी इंग्लैण्ड में उत्खनन के दौरान ऐसे अनेकों प्राचीन पत्थर के औजार मिले। प्रैगएतिहासिक लोगों ने उन औजारों को वहां फेंका होगा अथवा छोड़ा होगा और फिर वे धीरे- धीरे पत्थर की तहों तले दब गए होंगे। औजारों के ऊपर की मोटी परतें इस बात का प्रमाण थीं कि वे हजारों सालों से वहां पडे होंगे।

पत्थर के औजारों के साथ जानवरों की हड्‌डियां भी थीं। यह हड्‌डियां आज मिलने वाले जानवरों की नहीं थीं। इन प्राचीन हड्‌डियों को हम ' फासिल ' या जीवाश्म बुलाते हैं। ' फासिल ' का अर्थ होता है ' खोद कर निकालना '।

बहुत समय पहले ही यह जानवर लुप्त हो गए थे। इसलिए वहां मिले पत्थर के औजार तो उनसे भी पुराने होंगे।

भौंडे दिखने वाले कुछ पत्थर के औजार अन्य स्थानों पर भी मिले। जिन लोगों ने उन्हें बनाया होगा वो उससे भी प्राचीन होंगे।

1860 में फ्रेंच जीवाश्म-वैज्ञानिक एडुआर्ड आरमंड लैहरटे १८०-१८७ को एक गुफा में 'मैमथ' का एक भीमकाय दांत मिला। 'मैमथ' लुप्त जीव थे और वे वर्तमान हाथियों के रिश्तेदार थे। 'मैमथ' हजारों साल पहले हो लुप्त हो चुके थे।

इस ममँथ' के दांत पर ममँथ' का खरोंचकर बनाया हुआ एक चित्र भी था। उसके बाद मँमय' के तमाम कंकाल भी मिले और वो चित्र उनसे मेल भी खाता था। चित्र में विस्तृत जानकारी थी और उसे देखकर ऐसा लगता था कि जैसे चित्रकार ने जीवित 'मैमथ' को वाकई में देखा हो।

clip_image008

वैज्ञानिक तब तक इस निर्णय पर पहुंच गए थे कि प्रैगएतिहासिक लोग बहुत पहले से पृथ्वी पर मौजूद थे। तब उन्होंने पाषाण-युग को ' प्राचीन पाषाण-युग ' ' मध्य पाषाण-युग ' और ' नवीन पाषाण-युग ' की श्रेणियों में बांटा। वैज्ञानिकों को लगा कि

सबसे पुराने पत्थर के औजारों को लोगों ने एक-लाख वर्ष पहले बनाया होगा और उसके बाद से उन्होंने उनमें लगातार सुधार किया होगा।

में स्पैनिश भूवैज्ञानिक मारसिलिनो सोओ (मृत्यु 1888) ने कुछ नई 1879 एक डू गुफाओं का अध्ययन किया। प्रैगएतिहासिक लोगों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए गुफाएं बहुत अच्छा स्थान थीं क्योंकि अतीत में लोग उन्हें घर जैसे उपयोग करते थे। प्राचीन काल के लोगों को तभी तो गुफा-निवासी भी कहा जाता है। गुफाओं में सेडिमेंटरी पत्थरों के साथ-साथ पत्थर के औजार मिलने की सम्भावना बहुत ज्यादा होती है।

मारसिलिनो जब गुफा में लालटेन की रोशनी में खुदाई कर रहा था तो उसके साथ उसकी पांच साल की बेटी थी। लड़की ने ऊपर की ओर देखा और चिल्लाई ' बैल! बैल!' पिता ने जब ऊपर देखा तो उन्होंने पाया कि वहां तमाम जानवरों के चटकीले रंगों में चित्र बने थे।

उसके बाद से अन्य स्थानों पर भी इस प्रकार के भीतिचित्र पाए गए हैं। प्राचीन लोग शायद हमारे जितना नहीं जानते थे परन्तु उनका मस्तिष्क हमारे जितनी ही कुशलता से चित्र बना सकता था।

clip_image010

2. नियनडरथल मैन

प्रैगएतिहासिक लोग देखने में कैसे थे? पुराने जीवाश्म और कंकालों से हम उनका कछ अनुमान लगा सकते हैं। इसमें एक मुश्किल है। अधिकांश जीवाश्म तब बनते हैं जब जानवर पानी में फंस कर मरते हैं और फिर उनके मृत देह पर मिट्‌टी की परते चढ़ती हैं। और जब यह मिट्‌टी की परतें दबाव के कारण पत्थर बनती हैं तब जानवरों के शरीर खासकर उनके दांत जीवाश्म (फासिल) में बदलते हैं।

1868 में, गुफा-चित्र की खोज से 11 वर्ष पहले दक्षिण-पूर्वी फ्रांस में रेल लाईन बिछाने के लिए खुदाई चल रही थी। खुदाई में एक गुफा मिली जिसमें पांच लोगों के कंकाल मिले। इन्हें क्रोमैनयॉन-मैन' कहते हैं।

clip_image012

लारटेट जिसने ' मैमथ ' के दांत की खोज की थी को इन कंकालों के अध्ययन के लिए भेजा गया। कंकाल जिन पत्थरों में पाए गए थे उसने उनकी जांच की और पाया कि वे पत्थर 35०० साल पुराने थे। (इस प्रकार के अन्य कंकाल 5००० वर्ष पुराने भी हो सकते हैं)।

कंकालों को देखने से लगा कि ' क्रोमैनयॉन-मैन ' लोग बिल्कुल हम जैसे ही रहे होंगे। शायद वर्तमान लोगों से वो थोड़े ऊंचे हों और उनके मस्तिष्क भी कुछ बडे हों। 1735 में स्वीडिश वनस्पति-शास्त्री कैरोलस लिनियस ( 17०7 - 1788) ने उस समय तक खोजे गए सभी पौधों और जीवों का वर्गीकरण किया और उन्हें दो लैटिन शब्दों के नाम दिए। पहला शब्द उस जीव का समूह या ' जीनस ' निर्धारित करता था। और दूसरा शब्द उस जीव का समूह में विशेष या ' स्पेसिफिक ' नाम निर्धारित करता था।

लिनियस ने मनुष्यों को ' होमो-सेपियन ' नाम दिया। ' होमो ' लैटिन शब्द है और मनुष्य जिस ' जीनस ' से आते हैं उसका द्योतक है। इस ' जीनस ' में केवल अब मनुष्य ही बचे हैं। प्रजाति का नाम ' सेपियन्स ' है जिसका मतलब होता है होशियार।

' होमो-सेपियन ' का अर्थ होता है ' होशियार मनुष्य '।

' क्रोमैनयॉन-मैन ' के कंकाल वर्तमान के मनुष्यों से इतने मिलते-जुलते थे इसलिए वे भी ' होमो-सेपियन ' ही होंगे।

तो क्या सम्भव है कि बाईबिल द्वारा सुझाए अनुसार लोगों की उत्पत्ति मनुष्य जैसे दिखने वाले जीवों से न हुई हो? यह भी सम्भव है कि तारीख में कुछ गलती हो? हो सकता है ऐडम और ईव 6०० साल पहले नहीं बल्कि 5००० वर्ष पहले पैदा हुए हों? और हो सकता है कि उससे पहले मनुष्य हों ही नहीं?

एक इंसान का इससे भिन्न मत था। चार्ल्स रॉबर्ट डारविन ( 18०9 - 1882) एक अंग्रेज प्रकृतिशास्त्री थे। 24 वर्ष की आयु म डारविन एक खोजी जहाज पर पांच साल की यात्रा और अन्वेषण के लिए निकले। इससे डारविन को दुनिया के कई भागों में पौधों और जानवरों के अध्ययन का मौका मिला। जैसे-जैसे उसका जहाज दक्षिणी अमरीका के तटवर्ती इलाके में आगे गया वैसे-वैसे उन्हें जीवों की समान प्रजातियों में थोड़ा- थोड़ा अंतर दिखने लगा। प्रशांत महासागर में अलग- थलग पडे गैलापतोज द्वीप में उन्हें 14 अलग- अलग प्रकार के ' फिंच ' पक्षी दिखे। यह फिंच पक्षी दक्षिणी अमरीका के महाद्वीप के अलावा दुनिया में और कहीं नहीं मिलते हैं। यह कैसे हुआ?

डारविन का लगा कि समय के साथ फिंच की प्रजातियों में भी परिवर्तन आया होगा। नई प्रजातियां धीरे- धीरे करके पुरानी प्रजातियों से विकसित हुई होंगी। वो अपने मत की पुष्टि के लिए सबूत जमा करने लगे। उन्हें मालूम था कि उनके मत से तमाम लोगों को धक्का लगेगा क्योंकि वे बाईबिल के कथन के विरुद्ध जाते थे।

1859 में डारविन ने ' आरिजिन ऑफ स्पीशीज ' नामक पुस्तक प्रकाशित की।

पुस्तक ने काफी तहलका मचाया। बरसों तक पुस्तक पर चर्चा होती रही पर धीरे- धीरे करके वैज्ञानिकों ने डारविन के सिद्धांत को स्वीकार किया।

अगर सभी प्राणी और पौधे अन्य प्रजातियों से विकसित हुए हैं तो फिर मनुष्य का क्या? क्या मनुष्य ऐसी प्रजातियों से विकसित हुए हैं जो मनुष्य जैसी नहीं थीं? और या फिर वे प्रजातियां उनसे भी भिन्न प्रजातियों से विकसित हुई थीं?

clip_image014

डारविन की पुस्तक में इस बात का उल्लेख नहीं है) पर अन्य वज्ञानिक इस पर शोध करने लगे। भूवैज्ञानिक लायल ने 1863 में एक पुस्तक लिखी। उनके अनुसार मनुष्य भी इसी प्रकार विकसित हुए थे। 1871 में डारविन ने एक और पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने अपनी इस धारणा के पक्ष में सभी प्रमाण भी दिए।

मनुष्य के शरीर का ढांचा अफोका में पाए जाने वाले बनमानुषों ऐप्स और गुरिल्लों से मिलता-जुलता है। शायद तीनों किसी एक बहुत पुराने पूर्वज से उपजे हों? शायद वे पुराने पूर्वज देखने में बनमानुष ज्यादा और मनुष्य कम लगते हों?

डारविन के सिद्धांत से बाईबिल में विश्वास रखने वाले को गहरा धक्का लगा। वो यह मानने का तैयार नहीं थे कि ऐडम और ईव के पूर्वज बनमानुष थे।

अगर डारविन का सिद्धांत सही था तो बनमानुष और मनुष्य के बीच की प्रजातियों के कंकाल) जीवाश्मों के रूप में बतौर सबूत मिलने चाहिए थे। डारविन के समय में यह प्रमाण नहीं मिले थे और इन जीवों को ' मिसिंग-लिंक ' या लापता-कड़ी के नाम से जाना जाता था।

पर ' क्रोमैनयॉन-मैन ' के कंकाल मिलने और डारविन की पुस्तक से 11 साल पहले कुछ रोचक हड्‌डियां मिलीं थीं।

पश्चिमी जमर्नी में राईन नदी के पास नियनडरथल नाम की घाटी है। 1857 में वहां खुदाई के समय कुछ कंकाल मिले जो देखने में काफी-कुछ मनुष्यों जैसे थे पर एकदम मनुष्यों से मेल नहीं खाते थे।

उनका माथा थोड़ा चौड़ा था और भौंहों के स्थान पर उभरी हुई हड्‌डियां थीं।

उनके दांत सामान्य मनुष्य के दांतों से बडे थे। उनका जबड़ा आगे को था और ठोडी कछ पीछे को। वो बनमानुष जैसे अधिक और मनुष्यों से कम मिलते-जुलते थे।

वैसे वैज्ञानिकों की इन अवशेषों में गहरी रुचि थी पर उन्होंने इस खोज को किसी विशेष महत्व का नहीं माना। जर्मन चिकित्स फौल्फ फिरखुव ( 1821 - 19०2) का डारविन के सिद्धांत में कोई यकीन नहीं था। उनके अनुसार यह साधारण मनुष्यों के कंकाल थे। फर्क यह था कि उन मनुष्यों को हड्‌डियों की बीमारी थी।

कई वैज्ञानिक इस मत से सहमत भी थे। परन्तु एक फ्रेंच वैज्ञानिक पियरे पॉल बोका ( 1861 - 1942) के अनुसार उन कंकाल का ढाचा एकदम सामान्य था और वो किसी रोग से विकृत नहीं हुआ था।

बाद के सालों में अन्य कई स्थानों पर भी उसी प्रकार के कंकाल मिले जिनके दौत बडे थे और ठोडी पीछे को थी। वे सभी हड्‌डियों के रोगी तो नहीं हो सकते थे? अंत में बोका की बात ठीक निकली और फिरखुव की बात गलत।

उसके बाद से वैज्ञानिक नियनडरथल-मैन की बात करने लगे। उसे एक लैटिन नाम दिया गया ' होमो-नियनडरथलिस '। वे भी मनुष्य समूह के सदस्य थे। बस उनकी प्रजाति अलग थी।

फिर 1911 में फ्रेंच जीवाश्म-वैज्ञानिक पियरे मारसिलन बूल ( 1861 - 1942) को अचानक नियनडरथल-मैन का एक सम्पूर्ण कंकाल मिला।

पूरे कंकाल से नियनडरथल-मैन जीवित स्थिति में कैसा दिखता था उसका चित्र बना पाना सम्भव हुआ। उसकी ऊंचाई ' क्रोमैनयॉन-मैन ' से कुछ छोटी थी। मर्द करीब पांच फीट ऊंचे थे और महिलाएं उनसे कुछ छोटी थीं।

कछ लोगों को वे बनमानुष जैसे लगे - क्योंकि उनका चित्र कछ-कछ वैसे ही बनाया गया था। जब कभी ' क्रोमैनयॉन-मैन ' का पुतला या चित्र बनाया जाता तो वो हमेशा देखने में सुंदर) दादी बिना और सोच-विचार की स्थिति में होता। जबकि नियनडरथल-मैन को हमेशा झुका हुआ और दादी के साथ दर्शाया जाता था। वो बुद्ध दिखता और उसके चेहरे पर एक क्रूर भाव होता था।

दरअसल यह गलत था। नियनडरथल-मैन के तमाम कंकालों के मुआयने से पता चला कि बूल का कंकाल असल में एक बूढे व्यक्ति का था जो गठिया से पीड़ित था। सामान्य कंकालों की जांच से पता चला कि नियनडरथल-मैन भी हमारे समान ही आसानी से सीधा खड़ा हो सकता था। उसका चेहरा हम से कुछ बदसूरत जरूर था परन्तु उसका मस्तिष्क हमारे जितना ही बड़ा था। और उसके कंकाल के अध्ययन से लगता है कि नियनडरथल-मैन एक सम्पूर्ण मानव था।

clip_image016

धीरे-धीरे नियनडरथल-मैन के अवशेष यूरोप में ही नहीं, अफ्रीका और एशिया में भी मिलने लगे। अभी तक 4० स्थानों से 100 ऐसे कंकाल मिले हैं।

clip_image018

नियनडरथल-मैन के सबसे नए कंकाल केवल 3० ०० वर्ष पुराने हैं। इसका अर्थ है कि क्रोमैनयॉन-मैन और नियनडरथल-मैन दोनों पृ थ्वी पर 2० ०० साल तक टुकड़े रहे होंगे। कुछ नमूने बीच के हैं जिनमें क्रोमैनयॉन-मैन और नियनडरथल-मैन दोनों के लक्षण दिखते हैं। इससे लगता है कि वे परस्पर सम्भोग भी करते होंगे।

वैज्ञानिकों को अब स्पष्ट लगता है कि नियनडरथल-मैन भी होमो-सेपियन्स ही हैं। इसलिए अब होमो-नियनडरथैलिस के समूह को हटा दिया गया है।

वैसे नियनडरथल-मैन होमो-सेपियन्स में सबसे प्राचीन है। नियनडरथल-मैन में कछ ऐसे लक्षण हैं जो एक से डेढ लाख वर्ष पुराने हैं। वे क्रोमैनयॉन-मैन के पूर्वज होंगे और वे पृ थ्वी पर उनसे एक लाख वर्ष पहले आए होंगे।

उसक पश्चात नियनडरथल-मैन लुप्त हो गए। क्या उन्हें क्रोमैनयॉन-मैन ने मार डाला? इसकी सच्चाई हमें नहीं पता।

क्या क्रोमैनयॉन मानवों की उत्पत्ति नियनडरथल मानवों से हुई? सम्भवत : नहीं। शायद दोनों की उत्पत्ति किसी अन्य प्राचीन जीव से हुई हो।n

clip_image020

3. जावा-मैन और पीकिंग-मैन

यह स्पष्ट है कि अगर नियनडरथल-मैन भी होमो-सेपियन्स हैं तो वे लापता-कड़ी नहीं हो सकते। नियनडरथल-मैन हमसे बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं और इसलिए उनका ' मिसिंग-लिंक ' ( लापता-कड़ी) होने की बात ठीक नहीं लगती।

पर डारविन के सिद्धांतों में विश्वास करने वालों को लगता था कि ऐसी लापता-कड़ी होनी ही चाहिए। जर्मन जीवशास्त्री अरनेस्ट हेनरिक हेकुल ( 1834 - 1919) ने इस लापता-कड़ी को एक नाम तक दे डाला था ' पिभिनकैनथोपस ' जिसका यूनानी में अर्थ होता है ' बनमानुष '। उन्हें लगता था कि यह प्रजाति मनुष्य और बनमानुष के बीच की कोई प्रजाति होगी।

डच चिकित्सक यूजीन डयूबौह ( 1858 - 1941) की ' पिथिनकैनथोपस ' की हड्‌डियां खोजने में बहुत रुचि थी और उन्हें इस काम को कैसे किया जाए यह भी पता था। मानव के पूर्वजों के अवशेषों को खोजने के लिए उन्हें वहां जाना पड़ेगा जहां अभी भी बनमानुष रहते थे। चार बनमानुषों में से दो - गुरिल्ले और चिंपांजी अफ्रीका में) और दो - गिबन और औरंगउटान दक्षिण-पूर्वी एशिया और इंडोनेशिया में पाए जाते हैं।

' पिथिनकैनथोपस ' भी एक प्रकार का बनमानुष ही होगा। इसलिए वो या तो अफ्रीका में) या फिर दक्षिण-पूर्वी एशिया और इंडोनेशिया में रहता होगा।

उस समय तक हेकुल इस निर्णय पर पहुंच चुका था कि गिबन) मनुष्यों से सबसे करीबी से मिलते-जुलते हैं। (यह समझ गलत थी क्योंकि वास्तविकता में गिबन और मनुष्य एक-दूसरे से सबसे कम मिलते-जुलते हैं) परन्तु डयूबौह को इसका पता नहीं था)। इसलिए डयूबौह ने अपनी खोजबीन एशिया से शुरू की।

उस समय इंडोनेशिया के द्वीप पर नेद्‌रलैण्ड का राज था और वो डच ईस्ट इंडीज के आधीन था। क्योंकि डयूबौह खुद डच थे इसलिए उन्होंने इंडोनेशिया जाकर' पिथिनकैनथोपस ' की खोजबीन करने की ठानी।

डयूबौह ने यूनिवर्सिटी की नौकरी छोड़ दी और फौज में भर्ती हो गए। उनके मित्र इससे बहुत नाखुश हुए। 1887 में वो मिलटिमरी चिकित्स के रूप मे ईस्ट इंडीज जाने में सफल भी हुए। वहां पहुंचने के तुरन्त बाद उन्होंने प्राचीन मानव के अवशेषों को खोजने के लिए गुफाओं की खुदाई शुरू कर दी।

फिर तीन साल उत्खनन के बाद 1891 में) जावा के नजदीक ट्रिनिल नाम के गांव कछ से उन्हें? हड्‌डियां और खोपडिया बरामद हुईं। खोपडी का माथा और भौंहें बिल्कुल नियनडरथल-मैन जैसी थीं। परन्तु खोपडी के अंदर का भाग बहुत छोटा था।

मनुष्य के मस्तिष्क का भार औसतन 3 -पाउंड का होता है। परन्तु डयूबौह को जो खोपडी मिली उसका मस्तिष्क अधिक-से- अधिक 2 -पाउंड का होगा। वो कंकाल किसी बच्चे का भी नहीं था क्योंकि उसकी भौंहें किसी व्यस्क व्यक्ति जैसी पूरी तरह विकसित थीं।

उस खोपडी के अंदर का मस्तिष्क फिर भी किसी भी गुरिल्ले के मस्तिष्क से दोगुना बड़ा था। यानि कि इस नमूने का मस्तिष्क) बनमानुष और मनुष्य के बीच का था। नमूने के दांत भी बनमानुष से अधिक मिलते-जुलते थे।

डयूबौह को पक्का लगा जैसे उसने ' पिथिनकैनथोपस ' खोज लिया हो। उसने अन्य सबूत खोजने के लिए गुफाओं को अच्छी तरह खोजा। एक साल बाद खोपडी मिलने के स्थान से सिर्फ 45 -फीट दूर) उसी पत्थर की परत में उसे एक जांघ की हड्‌डी भी मिली। वो हड्‌डी खोपडी जिनती ही पुरानी और किसी मनुष्य की दिखती थी। उसके आकार से लगता था कि जिस किसी जीव की वो हड्‌डी रही होगी वो आसानी से मनुष्य जैसे ही खड़ा हो सकता होगा।

डयूबौह ने अपने कंकाल को नाम दिया ' पिभिनकैनथोपस-इरेक्टस ' या फिर ' सीधा खड़ा रहने वाला बनमानुष '। परन्तु आज उसे एक साधारण नाम ' जावा-मैन ' के नाम से जाना जाता है।

1894 में डयूबौह ने अपने अध्ययन को प्रकाशित किया। अगले वर्ष नेदरलैन्ड वापस लौटने पर उसके खुद को लड़ाई के मध्य पाया।

यह शायद पहला सबूत था लापता-कड़ी का। डारविन के सिद्धांत से असहमत लोगों ने इसे बनमानुष की खोपडी बताया। औरों के अनुसार वो खोपडी एक ऐसे मूर्ख मनुष्य की थी जिसका मस्तिष्क कभी विकसित ही नहीं हुआ था। अन्य लोगों ने कहा डयूबौह को मिले दोनों नमूने एक जीव के नहीं थे - खोपडी बनमानुष की थी और जांघ की हड्‌डी मनुष्य की थी।

डयूबौह लोगों के चीखने-चिल्लाने से बहुत तंग आ गया। अब वो अपने शोधकार्य पर ही दुख व्यक्त करने लगा। वो इतना झल्ला गया कि उसने सारी हड्‌डियों को संदूक में बंद कर दिया जिससे सालों तक उन्हें कोई नहीं देख पाया।

इसका सबसे सरल हल था - दुबारा जावा वापस जाकर वहां ' जावा-मैन ' की और हड्‌डियों को खोजना। इस काम को जर्मन जीवाश्म-वैज्ञानिक गुस्ताव कौयनिगवाल्ड ने किया।

193० में वो जावा गया और उसने कई बरसों तक शोधकार्य किया। इसमें उसने स्थानीय लोगों की मदद ली। उसने उन्हें शोधकार्य की ट्रनिंग दी और छोटी हड्‌डी खोजकर लाने के लिए 1० -सेंट का इनाम देने का वादा किया। कुछ लोगों को खोपडिया परन्तु ज्यादा इनाम मिलीं भी लेने के लिए उन्होंने उनके टुकड़े-टुकड़े किए।

फिर भी कौयनिगवाल्ड को तीन खोपडिया और दांत समेत कुछ जबड़े मिले। छोटे मस्तिष्क का एक मूर्ख मानव हो सकता है) चार नहीं हो सकते। ' जावा-मैन ' मनुष्य जैसा जीव था पर वो होमो-सेपियन नहीं था।

clip_image022

आजकल होमो-सेपियन और कुछ जीव जो होमो-सेपियन जैसे नहीं हैं पर जो मनुष्य से ज्यादा मिलते-जुलते हैं और बनमानुषों से कम) ऐसे प्राणियों को ' होमोनौइड्‌स ' कहा जाता है। ' जावा-मैन ' पहला ' होमोनौइड ' था जो होमो-सेपियन नहीं था।

कौयनिगवाल्ड की खोज के समय डयूबौह जीवित था। उसकी आयु 8० वर्ष से ज्यादा थी और वो बहुत चिड़चिड़ा हो गया था। उसका ' जावा-मैन ' से विश्वास उठ गया था और वो अपने कंकाल को एक बनमानुष बताने लगा था। कौयनिगवाल्ड द्वारा समझाने के बावजूद भी डयूबौह ने उसकी बात नहीं मानी। और फिर कुछ समय पश्चात डयूबौह का देहांत हो गया।

उसके बाद से ध्यान का केंद्र चीन बना। चीनी डाक्टरों को पुराने हड्‌डियों के जीवाश्मों की पीसकर उनसे दवाई बनाने की बात सूझी। इस वजह से हड्‌डियों के जीवाश्म चीन में दवा दुकानों में बिकने लगे। 1900 में वहां एक मनुष्य दौत का जीवाश्म मिला। उसके बाद से लोग चीन में भी प्रैगएतिहासिक लोगों को तलाशने लगे। पीकिंग अब चीन की राजधानी है। पीकिंग से 27 -मील दक्षिण-पश्चिम में एक गांव है चौकोटीन जहां बहुत सी गुफाएं हैं जो अब ठोस मिट्‌टी से भरी हैं। प्राचीन ' होमोनौइड्‌स ' के अवशेषों को खोजने के लिए वो एक अच्छा स्थान होगा।

clip_image024

वहां एक गुफा में उन्हें ' क्वार्टज ' नाम के पत्थर मिले। वहां प्राकृतिक रूप में ' क्वार्टज ' पाने को सम्भावना बहुत कम थी। शायद प्राचीन ' होमोनौइड्‌स ' उन्हें वहां पत्थर के औजार बनाने के लिए लाए हों? एक कैनेडियन जीवाश्म-वैज्ञानिक डेविडसन ब्लैक ( 1884 - 1934) ने शोधकार्य को करने की ठानी।

1923 में उसे वहां एक दांत मिला) 1926 में दूसरा और 1927 में तीसरा। दांतों की जांच-परख से पता चला कि वो न तो मनुष्य के थे और न ही बनमानुषों के।

निर्णय लिया गया कि वे दांत एक ' होमोनौइड ' के थे। उन्हें एक नाम दिया गया ' सिनैनथोपस-पीकिनसिस ' यानि ' चीन का पीकिंग-मैन '। कुछ लोगों ने संक्षिप्त में उसे ' पीकिंग-मैन ' बुलाया।

1929 में चीन के जीवाश्म-शास्त्री पाई को खुदाई के समय खोपडी के वक्र जैसी वस्तु मिली। उसके बाद अनेकों खोपडिया जबड़े और दांत भी मिले। 1934 में ब्लैक के देहांत के बाद उसके कार्य को जर्मन जीवाश्म-शास्त्री फ्रैंज वाइडनरिखे ( 1873 - 1948) ने जारी रखा। अंत म वहां 4० ' होमोनौइड्‌स ' के अवशेष मिले।

इस बार कोई विवाद नहीं उठा। सबने ' पीकिंग-मैन ' को ' होमोनौइड ' माना।

दुर्भाग्यवश) उसी समय जापान ने चीन पर हमला किया और 1937 में उस इलाके पर कब्जा किया। जापानियों ने उत्खनन जारी रखने की अनुमति दी परन्तु धीरे- धीरे स्थिति बिगड़ती गई और जापान और अमरीका के बीच युद्ध की सम्भावना बढ़ने लगी। अंत में जीवाश्म-शास्त्रियों ने हड्‌डियों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें अमरीका भेजने का निर्णय लिया। यह काम 5 दिसम्बर 1941 को ही सम्पन्न हो पाया। पर उसके दो दिन बाद ही जापान ने पर्ल-हार्बर पर हमला कर दिया।

उसके बाद की गड़बड़ी में किसी को भी नहीं पता कि उन हड्‌डियों का क्या हुआ। उसके बाद से उन्हें कभी किसी ने नहीं देखा। शायद वो सदा के लिए खो गईं। पर उससे पहले उन हड्‌डियों का जो कुछ भी अध्ययन हुआ उससे इतना सुनिश्चित हुआ कि ' पीक्गिं-मैन ' और ' जावा-मैन ' दोनों में बहुत समानता थी। बस ' पीकिंग-मैन ' का मस्तिष्क ' जावा-मैन ' से थोड़ा बड़ा था। वर्तमान में जीवाश्म-शास्त्री ' पीकिंग-मैन ' और ' जावा-मैन ' को दो अलग- अलग ' होमोनौइड्‌स ' नहीं मानते हैं। वो एक ही प्रजाति की दो अलग किस्म. हैं। बिल्कुल उसी तरह जैसे ' नियनडरथैल-मैन ' और ' क्रोमैनयॉन-मैन ' भी एक ही प्रजाति की दो अलग किस्में थीं।

वैसे ' पीकिंग-मैन ' और ' जावा-मैन ' होमो-सेपियन्स नहीं हैं फिर भी वो उसके बहुत करीब हैं और उसी जीनस के सदस्य हैं। इसलिए ' पिथिनकैनथोपस ' और ' सिनैनथोपस ' नामों को अब त्याग दिया गया है। उनके स्थान पर ' पीक्गिं-मैन ' और ' जावा-मैन ' अब होमो-इरेक्टस के उदाहरण हैं - जो बडे मस्तिष्क के मनुष्यों से पहले छोट मस्तिष्क के लोग थे।

द्वितीय महायुद्ध के बाद होमो-इरेक्टस की हड्‌डियां अफ्रीका में भी पाई गईं और उनके यूरोप में पाए जाने की भी सम्भावना है। होमो-सेपियन्स के आने से पूर्व कोई भी होमोनौइड्‌स अमरीका या आस्टेरलिया या अन्य किसी द्वीप में नहीं पहुंचे)।

होमो-इरेक्टस का मस्तिष्क होमो-सेपियन्स का दो-तिहाई होगा। पर वे मनुष्यों जैसे चलते थे और औजार बनाते थे। और लगता था कि चौकोटीन में ' पीकिंग-मैन ' ने आग का उपयोग भी किया था। होमो-इरेक्टस की उत्पत्ति 15 -लाख वर्ष पहले हुई होगी और वे 5 -लाख वर्ष पहले लुप्त हो गए होंगे।

क्या होमो-इरेक्टस वाकई में लुप्त हुए? या फिर मस्तिष्क के विकास के साथ-साथ वे होमो-सेपियन्स में परिवर्तित हो गए?

तार्किक स्तर पर यह ठीक लगता है पर एक अंग्रेज इस मत से असहमत थे। वे थे लुई एस बी लीकी ( 19०3 - 1972)।

लीकी के माता-पिता धर्मप्रचारक थे और लीकी ने अपना बचपन पूर्वी अफ्रीका में बिताया था। केम्बिज में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे दुवार अफ्रीका गए और फिर उन्होंने अपना सारा जीवन वहीं बिताया।

1931 में उन्होंने तनजानिया स्थित औल्डुवाई गौर्ज ( पर्वत के बीच के संकुचित मार्ग) में खुदाई शुरू की। वहां के सेडिमेंट्री ( तलछटी) पत्थर 2० -लाख वर्ष पुराने थे। लीकी वहां होमोनौइड्‌स के अवशेष खोजने गए थे।

196० में उन्हें वहां तीन खोपडिया मिलीं जो देखने में होमो - इरेक्टस जैसे थीं। पर उनके मस्तिष्क बहुत छोटे थे - होमो - सेपियन्स के आ धे। उनकी हड्‌डियां भी होमो - सेपियन्स से कहीं ज्यादा नाजुक थीं।

clip_image026

यह खोपडिया शायद 18 -लाख साल पुरानी होंगी और लीकी ने उन्हें ' होमो-हिबैलिस ' यानि ' कुशल-मनुष्य ' का नाम दिया। लीकी ने यह नाम इसलिए दिया क्योंकि इन खोपडियों के पास पत्थर के औजार मिले थे। इससे यह लगता था कि छोटा मस्तिष्क होने के बावजूद यह लोग औजार बनाने में कुशल थे।

' होमो-हिबैलिस ' ' होमो ' जीनस में शामिल किए जाने वाले सबसे प्राचीन होमोनौइडम्स थे।

लीकी के अनुसार ' होमो-हिबैलिस ' का दो दिशाओं में विकास हुआ। एक दिशा कछ बड़ा में मस्तिष्क? हुआ परन्तु खोपडी की हड्‌डियां मोटी हुईं और उससे भौं: विकसित हुईं और दांतों में बदलाव आया। और इस प्रकार ' होमो-इरेक्टस ' बना।

दूसरी दिशा में मस्तिष्क बढ़ा और वहां की हड्‌डियां मुलायम रहीं - और उससे' होमो-सेपियन्स ' बने।

शायद यह समझना ज्यादा आसान होगा कि मस्तिष्क के विकास से साथ' होमो-हिबैलिस ' धीरे- धीरे ' होमो-इरेक्टस ' बना। कै ' होमो-इरेक्टस ' धीरे- धीरे करके ' होमो-सेपियन्स ' बने।

कुछ अन्य होमोनौइड्‌स की खोजों के पश्चात ही हमैं क्रमागत उन्नति एवोल्युशन के बारे में सही पता चलेगा।

clip_image028

4. छोटे बनमानुष

अभी तक हमने तीन होमोनौइड्‌स का वर्णन किया है, जो सभी होमों जीनस के सदस्य हैं। यह हैं होमो-सेपियन्स' (यानि हम लोग, क्रोमैनयॉन-मैन' और नियनडरथल-मैन) और होमो-इरेक्टस' (यानि 'पीकिंग-मैन' और 'जावा-मैन') और होमो-हिबैलिस'।

क्या कोई ऐसे होमोनौइड्‌स हैं जो वर्तमान मानव से इतने भिन्न हैं कि उन्हें होमों जीनस में नहीं रखा जा सकता है?

इस प्रकार के होमोनौइड्‌स की खोज का श्रेय आस्टेरलियन चिकित्सक रेमंड आर्थर डार्ट (जन्म 1893) को जाता है। 1923 में वे जौहानसबर्ग, दक्षिणी अफ्रीका के एक मेडिकल कालेज में शरीर-रचना एनाटामी) पड़ाने गए।

clip_image030

1924 में उन्हें किसी के घर में एक बबून की खोपडी का जीवाश्म दिखा जो सजावट के लिए वहां रखी गई थी। पूछने पर मालूम पड़ा कि वो टुआग नाम की जगह पर मिली थी और वहां चूना पत्थर की पहाड़ियों की ब्लास्टिंग का काम चल रहा था।

डार्ट ने खबर भेजी कि अगर वहां कोई अन्य जीवाश्म मिलें तो वो उन्हें जरूर देखना चाहेंगे। और जल्द ही उनके पास चूने पत्थर से भरा) जीवाश्मों का एक संदूक आ गया।

फिर जीवाश्म के टुकड़ों को एक-दूसरे के साथ जोड़ा गया। दांत) जबड़े और चेहरे की हड्‌डियों को जोड़ने पर वो एक युवा बनमानुष जैसा दिखा। मस्तिष्क का खोखला भाग युवा बनमानुष के लिए बहुत बड़ा था। भौंहों का कोई नामोनिशां न था और चेहरे देखने में एक बनमानुष जैसा नहीं लगता था।

डार्ट ने उसे ' आस्ट्रेलोपिथीकायस एफ्रीकास्ल ' का नाम दिया यानि ' अफ्रीका का दक्षिणी बनमानुष '। 1925 में उन्होंने इसका विस्तृत वर्णन छापा और उसे बनमानुष और मनुष्य के बीच की कड़ी बताया।

clip_image032

उस समय लोग ' जावा-मैन ' के ऊपर लड-झगडु रहे थे अरि डयूबौह ने अपनी खोजी हड्‌डियों को किसी को दिखाने से मना कर दिया था। तब तक ' पीकिंग-मैन ' का सिर्फ दांत मिला था। उस समय लोग डार्ट के कथन को मानने को तैयार नहीं थे।

डार्ट का वर्णन पढ़ने के बाद तमाम विशेषज्ञों को वो एक युवा बनमानुष लगा - जो मनुष्य की अपेक्षा गोरिल्ला या चिंपाजी से ज्यादा मिलता-जुलता था।

फिर दस साल तक और कुछ प्रगति नहों हुई। किसी अन्य होमोनौइड के अवशेष नहीं मिले।

पर एक व्यक्ति ने डार्ट के कथन को स्वीकार किया। वो थे स्काटिश जीवाश्म-शास्त्री रार्बट लूम ( 1866 - 1951)। 1934 में डार्ट द्वारा खोजे जीव की अन्य हड्‌डियों को ढूंढने के लिए लूम खुद दक्षिणी अफ्रीका गए।

जोहैनसका के पास ही चूना पत्थर की गुफाएं थीं और उनमें एक बबून की हड्‌डियों के जीवाश्म अवशेष भी मिले। 1936 में लूम खुद गुफाओं में गए और वहां उन्हें एक व्यस्क ' आस्टेरलोपिथीकायस ' की खोपडी का एक जीवाश्म मिला। दो बरस तक वो चूना पत्थर की ब्लास्टिंग पर नजर रखे रहे। हर कुछ दिनों में कोई रोचक जीवाश्म निकल कर आता - जैसे जांघ की हड्‌डी का जीवाश्म। फिर उन्हें एक स्कूल का छात्र मिला जिसे एक दूसरे स्थान पर जीवाश्म मिले थे। वहां जाने पर उन्हें एक बड़ा जबड़ा और खोपडी मिली।

यह नया जीवाश्म जिस जीव का था वो डाट के जीव से बड़ा था। लूम ने उसका नाम ' पैराथोपस ' दिया। उसका अर्थ होता है ' मनुष्य से मिलता-जुलता '। लूम को यह जीव मनुष्यों से अधिक और बनमानुषों से कम मिलता-जुलता दिखा। तब तक ' जावा-मैन ' को स्वीकारा जा चुका था और ' पीकिंग-मैन ' की खोज हो चुकी यो इसलिए वैज्ञानिक कुछ अन्य पूर्व होमोनौइड्‌स को स्वीकार ने के लिए भी तैयार थे। द्वितीय महायुद्ध की वजह से काम कुछ रुका। पर युद्ध के बाद लूम फिर काम पर लग गए और अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने कई और जीवाश्म खोजे। उनमें से कई ' पैराथोपस ' जैसे बडे और कुछ ' आस्टेरलोपिथीकायस ' जैसे छोटे थे।

आज उन्हें एक ही जीनस का सदस्य माना जाता है। पर वे ' होमो ' जीनस के

नहीं हैं।

' पैराथोपस ' और ' आस्ट्रेलोपिथीकांथस ' ' होमो ' जीनस के न होने के बावजूद फिर भी होमोनौइड्‌स तो हैं। उनके दांत) बनमानुषों की अपेक्षा मनुष्य से कहीं ज्यादा मिलते हैं। और उनके कूल्हे की हड्‌डी से साफ लगता है कि वे भी मनुष्यों जैसे सीधे खडे होकर चल पाते होंगे।

उनका आकार कुछ छोटा था। ' पैराथोपस ' शायद ' होमो-इरेक्टस ' जितने ऊंचे हों पर ' आस्ट्रेलोपिथीकांथस ' केवल चार-फीट ऊंच थे और उनका मस्तिष्क वर्तमान मनुष्य के मस्तिष्क का सिर्फ आधा था। असल में ' आस्ट्रेलोपिथीकांथस ' का मस्तिष्क आज के गुरिल्लों से बड़ा नहीं था।

पर फिर भी ' आस्ट्रेलोपिथीकांथस ' पत्थर के सरल औजार निर्माण कर पाता था जो गुरिल्ले नहीं कर पाते। ' आस्ट्रेलोपिथीकांथस ' का मस्तिष्क एक बहुत छोटे शरीर को नियंत्रित करता था जबकि उसकी तुलना में गुरिल्लों का शरीर बहुत बड़ा होता है। यह सम्भव है कि ' आस्ट्रेलोपिथीकांथस ' के मस्तिष्क में सोच-विचार के लिए अधिक स्थान हो क्योंकि उसे शरीर के नियंत्रण के लिए कम दिमाग की जरूरत पड़ती।

clip_image034

' आस्टेरलोपिथीकायस ' ' पैराथोपस ' की अपेक्षा देखने में अधिक मनुष्य जैसा लगता था। यह भी सम्भव है कि ' होमो-हिबैलिस ' ' आस्टेरलोपिथीकायस ' से विकसित हुए हों और ' पैराथोपस ' उनकी कोई कड़ी हो जो बिना कोई संतान छोड़े लुप्त हो गई हो।

' आस्टेरलोपिथीकायस ' का उद्‌गम आज से 4० -लाख साल पहले हुआ। वो 5 -लाख वर्ष पहले तक जीवित रहे और तब उन्हीं की कुछ प्रजातियों से ' होमो-हिबैलिस ' कै ' होमो-इरेक्टस ' का उद्‌गम हुआ।

मनुष्य के पूवर्जों को खोजने का काम एकदम आसान न था। कई बार गलत रास्तों पर भटकना भी पड़ता था।

1935 में कौयनिगवाल्ड ( जो ' जावा-मैन ' के अवशेषों को खोजने दुबारा जावा वापस गए थे) को हांगकांग में एक दवा दुकान में चार रोचक दांत दिखे। देखने में वे बिल्कुल मनुष्य के दांत लगते थे पर उनका आकार बड़ा था।

उससे पहले सभी होमोनौइड्‌स ' होमो-सेपियन्स ' से छोटे थे। शायद ' होमो-सेपियन्स ' से बडे होमोनौइड्‌स भी रहे हों? वैसे बाईबिल के साथ-साथ सभी मिथकों में दानवों और दैत्यों का उल्लेख है। दैत्यों को हमेशा बेवकूफ और बुद्ध समझा जाता है। इसलिए यह सम्भव है कि उनके शरीर बडे हों और मस्तिष्क छोटे।

कौयनिगवाल्ड ने उस प्राणी का नाम ' जायजैंटोपियस ' यानि ' बड़ा बनमानुष ' रखा। बीस साल तक लोग ' जायजैंटोपियस ' के बारे में अचरज करते रहे फिर चीनी वैज्ञानिकों ने सभी दवाई की दुकानों में उसकी अन्य हड्‌डियों की खोज की। इसमें उन्हें कई अन्य दांत और निचले जबड़े मिले।

दरअसल ' जायजैंटोपियस ' के नाम का अर्थ बिल्कुल सटीक था। वो होमोनौइड नहीं था बल्कि बहुत विशाल 9 -फीट ऊंचा बनमानुष ( ऐप था। ' जायजैंटोपियस ' के दांत मनुष्यों जैसे थे परन्तु उसका जबड़ा बिल्कुल बनमानुष ऐप जैसा था।

शायद ' जायजैंटोपियस ' कोई एक-लाख साल पहले लुप्त हुए हों और उसी समय होमो-सेपियन्य का उद्‌गम हुआ हो। शायद ' जायजैंटोपियस ' के कारण ही दैत्यों के बेवकूफ होने की बात ने इस मिथक को जन्म दिया हो।

परन्तु ' जायजैंटोपियस ' होमोनौइड नहीं थे। आज तक पाए जाने वाले सबसे ऊंचे होमोनौइड्‌स होमो-सेपियन्स ही हैं।

' जायजैंटोपियस ' से भी ज्यादा रोचक खोज 1911 में पिल्टडाउन इंग्लैण्ड में एक वकील चार्ल्स डौसन ( 1864 - 1916) ने की। उन्हें एक खोपडी और निचला जबड़ा मिला। खोपडी मनुष्य की लगती थी और दांत बनमानुष ऐप के। उसे ' ईऐनश्रोपस ' या फिर ' पिल्टडाउन-मैन ' बुलाया गया।

चालीस साल तक जीवाश्म-वैज्ञानिक उसके बारे में मनन-चिंतन करते रहे। पूर्वजों के पेड की किस शाख पर उसे टांगे इस पर वो सोच-विचार करते रहे। बाकी होमोनौइड्‌स में जैसे-जैसे खोपडी मनुष्य जैसे होती गई वैसे-वैसे जबड़ा भी मनुष्य जैसा होता गया। मनुष्य की खोपडी और बनमानुष के जबड़े वाला होमोनौइड एक अपवाद था।

और 1953 में वो गलत और झूठ साबित हुआ। जांच के बाद वो नकली निकला। खोपडी जरूर मनुष्य की थी पर बनमानुष के बडे दांतों को रेती से घिस कर खोपडी में फिट किया गया था।

शायद 1911 में सही और गलत के बीच अंतर करना मुश्किल होता। क्योंकि तब तक वैज्ञानिक होमोनौइड्‌स के बारे में बहुत कम ही जानते थे।

5. कैसे शुरुआत हुई

अभी तक हमनें कोई महत्वपूर्ण लापता-कड़ी का जिक्र नहीं किया है। सबसे पहले पाए जाने वाले होमोनौइड्‌स ' आस्टेरलोपिथीकायस एफ्रीकास्ल ') ' होमो-सेपियन्स ' से ज्यादा मिलते-जुलते थे और बनमानुषों से कम। जहां तक ' जायजैंटोपियस ' की बात है वे बनमानुषों से ज्यादा मिलते थे और ' होमो-सेपियन्स ' से कम। और

' पिल्टडाउन-मैन ' शायद कभी था ही नहीं।

' आस्टेरलोपिथीकायस ' जब अफ्रीका के जंगलों में होगा उस समय वहां पर गोरिल्ले और चिंपैंजी भी अवश्य होंगे। क्या इससे भी पहल कोई प्राणी होगा जो इन सबका पूवर्ज हो। अगर हां) तो वही असली लापता-कड़ी होगी जो गोरिल्ले चिंपैंजी और होमोनौइड्‌स का पूर्वज होगा।

1934 में अमरीकी जीवाश्म-वैज्ञानिक जी एडवर्ड लूइस) उत्तर भारत की प्राचीन शिवालिक पहाड़ियों में खोजबीन कर रहे थे। वहां उन्हें कुछ दांत और एक जबड़ा मिला। यह जीवाश्म उन पत्थरों में धंसे थे जो ' आस्टेरलोपिथीकायस ' से भी बहुत प्राचीन थे। वो जिस भी प्राणी के दांत थे वो कम-से-कम 7० -लाख और अधिक-से- अधिक 14० -लाख साल पुराना था।

लूइस ने उसका नाम ' रामापिथिकस ' यानि ' राम का बनमानुष ' रखा। भारत में राम हिंदुओं के प्रमुख भगवान हैं। क्योंकि जीवाश्म भारत में मिला इसलिए यह नाम उपयुक्त भी था।

लूइस को लगा कि दांत छोटे होने के कारण वे किसो बनमानुष के नहीं होंगे। वैसे ' रामापिथिकस ' भोजन को अपने हाथों से पकड़ता था। इसलिए उसे लगा कि ' रामापिथिकस ' को एक होमोनौइड मानना चाहिए। परन्तु उस समय के अन्य जीवाश्म-वैज्ञानिक उसके मत से सहमत नहीं थे।

पर 1961 में लीकी को ' रामापिथिकस ' जैसे दांत कनया) अफ्रीका में मिले। कुछ अन्य दांत और जबड़े भी मिले परन्तु शरीर की कोई हड्‌डी नहीं मिली।

जो भी सबूत और प्रमाण आजतक मिले हैं उनसे जीवाश्म-वैज्ञानिकों को लगता है कि लूइस की बात ठीक थी। ' रामापिथिकस ' एक छोटा होमोनौइड था और वो ' आस्टेरलोपिथीकायस ' से भी प्राचीन था और वो सीधा चल पाता था। वो शायद सबसे प्राचीन होमोनौइड था और शायद सबसे पहला भी।

और बनमानुषों ऐप्स के पूर्वजों का क्या? मैंने ' जायजैंटोपियस ' का उल्लेख किया है - वैसे वो कब का लुप्त हो चुका है पर वो बनमानुषों का पूर्वज नहीं है।

पूर्वजों को खोजने के लिए हमें उससे भी पीछे जाना होगा।

लूइस लीकी और उसकी पत्नी जब पूर्वी अफ्रीका के लेक विक्टोरिया के पास खुदाई कर रहे थे तब उन्हें कुछ हड्‌डियां मिलीं जो निश्चित ही लुप्त बनमानुषों की थीं।

उसमें कोई विवाद की बात नहीं थी क्योंकि उनके जबड़े और दांत बिल्कुल बनमानुष जैसे थे।

clip_image036

लंदन के चिड़ियाघर में एक बहुत लोकप्रिय चिंपैंजी था उसका नाम था ' काऊंसिल '। इसलिए लीकी ने अपनी खोज को ' प्रोकाऊंसिल ' नाम दिया। उसका अर्थ हुआ ' काऊंसिल से पहले '। ' प्रोकाऊंसिल ' की बहुत सारो हड्‌डियां मिलीं और फिर लगभग पूरा कंकाल मिला जिससे जीवाश्म-वैज्ञानिक अच्छी प्रकार देख सके कि वो वर्तमान के बनमानुषों से कितना अधिक पुराना था।

' प्रोकाऊंसिल ' प्राचीन बनमानुषों के एक जीनस का सदस्य हैं जिन्हें ' ड्राईओपिथिकस ' यानि ' ओक ट्री ऐप ' कहते हैं। यह नाम इस लिए दिया गया क्योंकि उनके जीवाश्म) ओक पेड के जीवाश्मों के साथ मिले थे।

' ड्राईओपिथिकस ' शायद तभी भी पेडों पर रह रहा था और उसने सीधे चलना नहीं सीखा था। 1856 में ' ड्राईओपिथिकस ' की पहली हड्‌डियां फ्रांस में मिलीं थी। पर अब उनके काफो जीवाश्म पूर्वी अफ्रीका में मिले हैं।

' ड्राईओपिथिकस ' की कई प्रजातियां थीं - कुछ बहुत छोटी और कछ गोरिल्लों जितनी बड़ी। उनकी सबसे पुरानी प्रजातियां कोई 25० -लाख साल पहले उपजी होंगी।

' ड्राईओपिथिकस ' आज के चिंपैंजी और गोरिल्लों का पूर्वज लगता है। पर अभी भी प्रश्न है कि क्या उससे ही ' रामापिथिकस ' उपजा) और क्या ' रामापिथिकस ' वो लापता-कड़ी है जो बनमानुषों और मनुष्यों को आपस में जोड़ती है।

जीवाश्म-वैज्ञानिक इसके बारे में पक्की तौर पर कुछ नहीं कह सकते हैं। इसके लिए ' रामापिथिकस ' के पूरे शरीर क जीवाश्म चाहिए होंगे। तभी यह बात निश्चित तौर पर पक्की होगी।

मिस्त्र में भी 400 -लाख पहले के जीवाश्म मिले हैं जिनसे लगता है कि उस काल में भी बनमानुष जैसे जीव थे। उनमें से एक है ' इजिप्टोपियिकस ' या ' ईजिप्ट का ऐप '। अगर ' ड्राईओपिथिकस ' होमोनौइड्‌स और अफ्रीकी बनमानुष का सांझा पूर्वज नहीं था तो ' इजिप्टोपियिकस ' या और कोई प्राणो जरूर रहा होगा।

मनुष्य का जीवन कैसे शुरू हुआ उसे संक्षिप्त में हम इस प्रकार लिख सकते हैं। 700 -लाख वर्ष पूर्व डायनोसौर के लुप्त होने के बाद बंदर जैसे जीव कछ प्राचीन प्राणियों से विकसित हुए। वो देखने में आज के ' लेमर ' जैसे होंगे।

400 -लाख वर्ष पूर्व इन बंदर जैसे जीवों की पूंछ लुप्त हुई होगी) उनका मस्तिष्क विकसित हुआ होगा और उन्होंने हाथ से काम करना सीखा होगा जिससे उन्होंने बनमानुष ऐप का रूप लिया होगा।

इनमें से धीरे- धीरे कुछ बनमानुष दक्षिणी और पूर्वी-एशिया में गए होंगे और वहां पर गोरिल्लों और चिंपैंजियों के रूप में विकसित हुए होंगे।

आज से 200 -लाख वर्ष पूर्व ' ड्राईओपिथिकस ' प्रजाति ने विकास की एक नई दिशा ली होगी। उनके दांत और जबड़े छोटे और उनकी हड्‌डियां पतली बनी होंगी।

क्योंकि उनके दांत और जबड़े छोटे थे इसलिए ' ड्राईओपिथिकस ' प्रजाति के प्राणियों को भोजन हाथ से पकड़कर मुंह तक लाना पड़ता होगा।

जब सूखे मौसम के कारण जंगल नष्ट हो गए होंगे तो उन्हें मजबूरन पेड से नीचे उतरना पड़ा। उनके कूल्हे की हड्‌डी इस प्रकार विकसित हुई होगी कि अब वो घास पर सीधा खडे हो सकते होंगे और वो हर समय अपने हाथों का उपयोग कर सकते होंगे।

क्योंकि वो हर समय अपने हाथों से चीजें छूते) उन्हें उठाते और इधर-उधर ले जाते थे) उन्हें तोड़कर जोड़ सकते थे। तो इन क्रियाओं से उनका मस्तिष्क उत्तेजित हुआ होगा और धीरे- धीरे उसका आकार बढ़ा होगा।

clip_image038

हाथ का उपयोग करने वाले और सीधे खडे होने वाले सबसे पहले होमोनौइड्‌स थे। उनका उद्‌गम 200 -लाख वर्ष पहले हुआ होगा।

हमारी खोज के हिसाब से ' रामापिथिकस ' शायद पहले होमोनौइड थे जिनका उद्‌गम पूर्वी अफ्रीका में हुआ। फिर करीब 1०० -लाख वर्ष पहले वे एशिया में फैल गए। अफ्रीका में ' रामापिथिकस ' का मस्तिष्क और उसका आकार दोनों बडे हुए और करीब 4० -लाख वर्ष पूर्व ' आस्टेरलोपिथीकायस ' विकसित हुआ।

इसके बाद से शरीर और मस्तिष्क के विकास की प्रक्रिया सतत जारी रही। इससे करीब 2० -लाख वर्ष पहले सबसे पथम होमोनौइड्‌स का उद्‌गम हुआ। उनका ढांचा मनुष्यों से बहुत कुछ मेल खाता था और उन्हें ' होमो ' जीनस में रखा गया। इस प्रकार सर्वप्रथम ' होमो-हैबैलिस ' की उत्पत्ति हुई। अब तक होमोनौइड्‌स का मस्तिष्क काफी बड़ा हो गया था। किसी भी काल के बनमानुषों का मस्तिष्क इतना बड़ा कभी नहीं था। वैसे आज के मनुष्य की तुलना में यह मस्तिष्क छोटा था।

15 -लाख वर्ष पूर्व ' होमो-इरेक्टस ' का उद्‌गम हो चुका था। वे एशिया) चीन और इंडोनेशिया में भटके और वहां पर ' जावा-मैन ' और ' पीकिंग-मैन ' के नमूने मिले।

1० -लाख सालों तक होमो-इरेक्टस के मस्तिष्क का लगातार विस्तार होता रहा और उसने आग का उपयोग करना सीखा। डेढ़-लाख वर्ष पहले मस्तिष्क का आकार इतना बड़ा हो गया था कि अब हम उसे ' होमो-सेपियन ' मान सकते थे।

सबसे पुराना ' होमो-सेपियन ' नियनडरथल-मैन था। पर करीब 5० ,0० ० वर्ष पहले ' क्रोमैनयॉन-मैन ' का उद्‌गम हुआ और उसके बाद से विकास की प्रगति काफी तेजी से हुई।

आज से 1००० साल पहले ' होमो-सेपियन ' ने फसलें उगाना) जानवर पालना और शहर बसाना सीखा और तबसे सभ्यता की शुरुआत हुई। आज से 5०० साल पहले लिखाई का आविष्कार हुआ और उसके बाद से इतिहास की रचना शुरू हुई। 400 वर्ष पहले आधुनिक विज्ञान का पर्दापण हुआ और 200 साल पहले औद्योगिक क्रांति का आगमन हुआ।

वैसे हम अभी भी अपनी जड़ों को तलाश रहे हैं!

clip_image039

clip_image002

रवि श्रीवास्तव

रायबरेली, उ.प्र.

9718895616, 9452500016

लेखक, कवि, व्यंग्यकार, कहानीकार

 

आख़िर खुदकुशी करते हैं क्यों ?


जिंदगी जीने से डरते हैं क्यों ?
फंदे पर लटककर झूले
जीवन है अनमोल ये भूले।
अपनों को देकर तो आंसू,
छोड़ दिए दुनिया में अकेले।
कभी ट्रेन के आगे आना,
कभी ज़हर को लेकर खाना।
कभी मॉल से छलांग लगा दी,
देते हैं वो खुद को आज़ादी।
इस आज़ादी के ख़ातिर वो,
अपनों को देते तकलीफ़
लोग हंसते ऐसी करतूतों पर,
करते नहीं हैं वो तारीफ़।
पिता के दिल का हाल ना पूछो,
माता पर गुजरी है क्या
इक छोटी सी कठिनाई के ख़ातिर,
क्यों कदम इतना बड़ा लिया उठा।
पुलिस आई है घर पर तेरे,
कर रही सबको परेशान,
ख़ुद चला गया दुनिया से,
अपनों को किया परेशान।
संतुष्टि मिल गई है तुमको
अपनी जान तो देकर के,
हाल बुरा है उनका देखो,
बड़ा किया जिसने पाल-पोसकर के।
जिंदगी की सच्चाई में क्यों?
इतना जल्दी हार गए।
आखिर मज़बूरी है क्या?
दुनिया के उस पार गए।
याद नहीं आई अपनों की,
करते हुए तो ऐसा काम,
क्या बीतेगी सोचते अगर,
नहीं देते इसको अंजाम।
दुख का छाया, क्या है अकेले तुम पर
जो हो गए इतना मजबूर
औरों के दुख को भी देखो,
जख्म बन गए हैं नासूर।
हर समस्या का कभी तो,
समाधान भी निकलेगा।
ऊपर बैठा देख रहा जो,
उसका दिल भी पिघलेगा।
बुजदिली कहें इसे,
या कायरता कहकर पुकारें,
छोड़ रहे दुनिया को क्यों ?
और भी हैं जीने के सहारे।
कठिनाइयों से डरते हैं क्यों?
आख़िर खुदकुशी करते हैं क्यों ?

उनकी तमन्ना


उन्होंने तमन्नाओं को पूरा कर लिया,
मुझे नहीं है उनसे कोई भी शिकवा।
किसी के वादों से बंधा मजबूर हूं,
उन्हें लगता है शायद कमजोर हूं।
बड़ों का आदर, छोटों का सम्मान सिखाया है,
मेरे परिवार ने मुझे, ये सब बताया है।
हर क्रिया की प्रतिक्रिया, हम भी दे सकते हैं,
जान हथेली पर हमेशा हम भी रखते हैं।
उम्र का लिहाज करके, इस बार सह गया,
चेहरे पर मुस्कान लाकर, क्रोध पी गया।
लगता है मंजिल से, ज्यादा नहीं दूर हूं।
किसी के वादों से बंधा मजबूर हूं,
उन्हें लगता है शायद कमजोर हूं।
दुआ खुदा से है, गलती न दोहराए,
रोष में आकर कही, हम अपना आपा न खो जाएं
तोड़ दूंगा इस बार, वादों की वो जंजीर,
खुद लिख दूंगा, अपनी सोई हुई तकदीर,
परवाह नहीं है जमाने की, न जीने की है चाहत,
चल देंगे उस रास्ते पर, जिसमें दो पल की है राहत।
दिल पर लगे जख्मों का, मैं तो नासूर हूं,
उन्हें लगता है मैं शायद कमजोर हूं।
किसी के वादों से बंधा मैं तो मजबूर हूं,

मेहनत किसान की

आखिर हम कैसे भूल गये, मेहनत किसान की,
दिन हो या रात उसने, परिश्रम तमाम की।

जाड़े की मौसम वो, ठंड से लड़े,
तब जाके भरते, देश में फसल के घड़े।

गर्मी की तेज धूप से, पैर उसका जले,
मेहनत से उनकी देश में, भुखमरी टले।

बरसात के मौसम में, न है भीगने का डर,
कंधों पर रखकर फावड़ा, चल दिये खेत पर।

जिनकी कृपा से आज भी,चलता है सारा देश,
सरकार उनके बीच में, पैदा होता मतभेद।

मेहनत किसान की, कैसे भूल वो रहे,
कर्ज़, ग़रीबी, भुखमरी से, तंग हो किसान मरे।

दूसरों का पेट भर, अपनी जान तो दी,
आखिर हम कैसे भूल गये , मेहनत किसान की।

सुहाना सपना

सपनों ने दिखाये अरमान, देश में बनाओ अपनी पहचान,
हक़ीक़त से मैं था अंजान, सपनों में था जो बहुत आसान।

चल दिये उसी मंजिल पर, जिसको पूरा करना था,
हुआ वही जो सपना देखा, पर मेरा ख्बाव अधूरा था।

हर रास्ते पर मिली ठोकरें, मंजिल तक न पहुंच पाने को,
हिम्मत नहीं हारी है मैंने, ये वक्त है कुछ कर दिखाने को।

देखा सपना पूरा करुंगा, डालूंगा मैं इसमें जान,
सपनों ने दिखाये अरमान, देश मैं बनाओ अपनी पहचान।

याद करेगा मुझे ज़माना, दिल में मैंने अपने ठाना,
उदास न हो ऐ मेरे साथी, कहीं तो होगा अपना ठिकाना।

हर तरफ फिर धूम मचेगी, खुशियों की कलियां खिलेंगी,
जीवन के इस सुर में फिर, मिल जायेगा ताल से ताल,

सपनों ने दिखाये अरमान, देश में बनाओ अपनी पहचान।


रेल क्यों हो रही है फेल ?


देश की रीढ़ बनी ये रेल,
आख़िर क्यों हो रही है फेल ?

जाने कैसे हो गई बीमार
हो रही हादसे का शिकार ।

कभी एक दूसरे से टकराना,
कभी पटरी से नाचे उतर जाना।

असुविधाओं भरा हो रहा, अब तो  इसका सफर,
यात्रियों को सताता रहता है असुरक्षा का डर।

ऐसे गम्भीर मुद्दे पर राजनीति न खेलें,
राजनीति की इस चोट को आम आदमी झेले।

किसकी लापरवाही है ये किसकी ज़िम्मेदारी है,
बढ़ते ट्रेन हादसों पर रोक लगाना ज़रूरी है।

बातें करने से नहीं कुछ कर दिखाने से होगा,
इसकी हालत ऐसी है तो बुलेट ट्रेन का क्या होगा।

मुसाफ़िरों की जिंदगी से न खेलो ऐसा खेल,

     देश की रीढ़ बनी ये रेल,
    आख़िर क्यों हो रही है फेल ?

उड़ान

एक दिन बैठकर मैं,
बस यही सोचता था,

किस तरह से उड़ते हैं पक्षी, क्या उनकी उड़ान है।
गिरने का न डर है उनको, उनकी यह पहचान है,

सोचते सोचते आखिर, पहुंच गया उस दौर तक,
पंख तो होते हैं उनके, पर हौसलों में भी जान है।

कभी यहां तो कभी वहां, क्या गज़ब का खेल है,
पंख संग हौसले का, कितना प्यारा मेल है।

सीख लें पक्षी से हम सब, इस दुनिया की उड़ान में,
हौसला न हारो कभी, जीना पूरी शान में।

क्रोध

आग की ज्वाला से देखो, तेज़ तो है मेरी आग,
मेरे चक्कर में फंसकर, जाने कितने हुये बर्बाद।

काबू पाना मुश्किल मुझ पर, चाहे हो कितना खास,
मिट जाता है नाम जहां से, बनते काम का हो सत्यानाश।

तापमान शरीर का बढ़ाऊं,
दिमाग काम कर देता बंद, क्रोधित को कैसे समझाऊं।

आपा खोना पछतावा होना, मेरी यही निशानी है,
सभी की यही परेशानी है।

थोड़ा अच्छा, बहुत बुरा हूं, फिर चाहे हो कोई बात,
आग की ज्वाला से देखो, तेज़ है मेरी आग।


लहू तो एक रंग है


आपस में एक दूसरे से, हो रही क्यों जंग है ?
लहू तो एक रंग है,   लहू तो एक रंग है।
हर तरफ तो शोर है, किस पर किसका जोर है?
ढ़ल रही है चांदनी, आने वाली भोर है।
रक्त का ही खेल है, रक्त का ही मेल है,
क्यों इतना अभिमान है, रक्त तो समान है।
रक्त न जाने है धर्म, रक्त न जाने है जाति,
रक्त भी अनमोल है , मत बहाओ पानी की भांति।
भाई-चारा छोड़कर , क्यों लड़ रहे है हम सभी
मजहब के नाम पर , क्यों मर रहे है हम सभी।
छोड़ दो आपस में लड़ना, तोड़ दो सारी दीवार,
दिखा तो तुम सभी को, हम एक दूसरे के संग है।
लहू तो एक रंग है, लहू तो एक रंग है।

    समय

तूफानों से तेज चलूं मैं
न ही थकूं न ही रूकूं मैं ।

सब कुछ मेरे ही अधीन है,
मेरी बातें भिन्न-भिन्न हैं।

गुजर गया वापस न आऊं,
सबक दुनिया को मैं सिखलाऊं।

बात मेरी सब लोग हैं करते,
प्रहार से मेरी रोते हंसते।

जीवन के हर मोड़ पर मैं,
बीता हुआ मैं तो कल हूं।

मैं समय हूं, मैं समय हूं, मैं समय हूं।
डर लगने लगा है।
एक बार फिर से डर लगने लगा है ,
एक बार फिर से कोई अच्छा लगने लगा है।
लोगों के तानों का सिलसिला शुरू हुआ
गैरों से नहीं मुझे, अपनों से गिला।
न कोई सच्चाई है, न कोई है बात,
इन सूनी राहों में, नहीं है कोई साथ।
नाम उनका लेकर, मुझको लगे चिढ़ाने,
हर जगह, हर तरफ, मुझे लगे सताने।
बातों में ऐसे आकर, कहीं हो न जाऊं दीवाना,
मासूमियत पर मेरी, हंसेगा ये जमाना।
दर-दर भटकूंगा, न होगा कोई ठिकाना,
ये खुदा रहम कर, इस आग से बचाना।
एक बार फिर से डर लगने लगा है ,
एक बार फिर से कोई अच्छा लगने लगा है।

 


पानी की बर्बादी


मत करो मुझको बर्बाद, इतना तो तुम रखो याद।
प्यासे ही तुम रह जाओगे, मेरे बिना न जी पाओगे।
कब तक बर्बादी का मेरे, तुम तमाशा देखोगे,
संकट आएगा जब तुम पर, तब मेरे बारे में सोचोगे।
संसार में रहने वालों को, मेरी जरूरत पड़ती है,
मेरी बर्बादी के कारण, मेरी उम्र भी घटती है।
ऐसा न हो इक दिन मैं, इस दुनिया से चला जाऊं
खत्म हो जाए खेल मेरा, लौट के फिर न वापस आऊं।
पछताओगे रोओगे तुम , नहीं बनेगी कोई बात,
सोचो समझो करो फैसला, अब तो ये है तुम्हारे हाथ।
मेरे बिना इस दुनिया में, जीना सबका मुश्किल है,
अपनी नहीं भविष्य को सोचो, भविष्य भी इसमें शामिल है।
मुझे ग्रहण कर सभी जीव, अपनी प्यास बुझाते हैं,
कमी मेरी पड़ गई अगर तो, हर तरफ सूखे पड़ जाते हैं।
सतर्क हो जाओ बात मान लो, मेरी यही कहानी है।
प्रकृति का वरदान धरा पर, जीवन देना मेरी निशानी है।
करो फैसला मिलकर आज, मत करो मुझको बर्बाद।
, इतना तो तुम रखो याद।

समीक्षा

समकालीन स्त्री-विमर्श को डॉ. विनय कुमार पाठक का प्रदेय

(डॉ. दादू लाल जोशी के शोध प्रब्रंध की समीक्षा)

इस शोध प्रबंध की समीक्षा, समालोचना अथवा आलोचना में कुछ लिखने अथवा कहने से पहले हमें ध्यान देना होगा कि इस ग्रंथ की चौदह पृष्ठों की विस्तृत और विद्वतापूर्ण भूमिका के अलावा दोनों फ्लैफ में भी, दो अलग-अलग विद्वानों की अमृत वाणियाँ (मीठे वचन को संत कवियों ने अमृत के समान ही माना है।) दी गई हैं। इस तरह की सामग्रियाँ वस्तुतः प्रस्तुत कृति की समीक्षाएँ ही होती है। फिर भी मान्य समीक्षकों की समीक्षाएँ अलग महत्व रखती हैं और अधिक मूल्यवान होती हैं, अतः समीक्षाओं और आलोचनाओं की और भी निर्झरणियाँ विभिन्न स्रोतों से निकलनी चाहिए, निकलकर बहनी भी चाहिए, यह हमारी साहित्यिक परंपरा के अनुकूल भी है और आवश्यकता भी

 

कहा गया है -

’’सूर, सूर, तुलसी शशि, उड़ुगण केशवदास।

बांकी सब खद्योत सम, जँह-तँह करत प्रकाश।’’

सूर्य, चन्द्रमा और तारों की रोशनी के बाद कुछ अहमियत जुगनुओं की भी होती है, पर हमारे अर्थात् मेरे समान प्रकाशहीन और हैसियतहीन व्यक्ति की तो कुछ औकात ही नहीं बनती कि इस पर कुछ कह सकूँ। जो कुछ भी कहने का प्रयास मैंने किया है वह एक दृष्टिविपन्न पाठक की त्त्वरित और अनर्गल, पाठकीय प्रतिक्रिया के अलावा और कुछ भी नहीं है। दृष्टि में ही दोष हो तो ताजमहल में भी हजारों दोष दिख जायेंगे, परन्तु इससे न तो ताज की सुंदरता कम होती है और न ही उसकी अहमियत। इस ग्रंथ में मुझे यदि कोई दोष दिख भी जाये तो उसका संदर्भ इस स्वयं सिद्ध उक्ति से अधिक और कुछ भी नहीं होगा।

इस ग्रथ के कव्हर फ्लैफ के प्रथम पृष्ठ के (प्रथम फ्लैफ के) लेखक डॉ. चंपा सिंह के अनुसार - ’’डॉ. दादू लाल जोशी ने इनके (डॉ. विनय कुमार पाठक के) स्त्री विमर्श के समग्र कार्यों की परिक्रमा करके विशेषतः ’स्त्री-विमर्श: पुरूष रचनाधर्मिता के संदर्भ में’ ग्रंथ की पड़ताल करके डॉ. विनय कुमार पाठक के प्रदेय को शोध का विषय ही नहीं बनाया, स्त्री-विमर्श की समझ विकसित करके हिन्दी साहित्य को नई दृष्टि देने का उपक्रम भी निवेदित किया है।’’ अर्थात:-

(अ) इस शोध प्रबंध में शोधार्थी (डॉ. दादू लाल जोशी) ने डॉ. पाठक के समग्र कार्यों का अध्ययन तो किया है परन्तु मुख्य पड़ताल ’स्त्री-विमर्श: पुरूष रचनाधर्मिता के संदर्भ में’ ग्रंथ की हुई है।

(जिस आत्म विश्वास के साथ उपरोक्त बातें कही गई है, जाहिर है, फ्लैफ लेखक ने स्वयं डॉ. पाठक के समग्र कार्यों का अध्ययन किया होगा।) (ब) इस शोध प्रबंध ने दो (महान्) लक्ष्य हासिल किया है -

1. इस शोध प्रबंध ने स्त्री-विमर्श की समझ विकसित किया है। हिन्दी साहित्य जगत में स्त्री-विमर्श से संबंधित सामग्रियों की बेहद कमी है, ऐसा कहना शायद उचित नहीं होगा; इसके बावजूद वर्तमान समाज में स्त्रियाँ चौतरफा प्रताड़ित और अपमानित हो रही हैं। जाहिर है, और सत्य है कि समाज में स्त्रियों के प्रति समझ का अभाव है। डॉ. जोशी के इस शोध प्रबंध को पढ़कर यदि स्त्री-विमर्श के प्रति मूढ़मति समाज की समझ विकसित हो सके तो इसके लिए समाज डॉ. जोशी का ऋणी होगा। परन्तु किताब की कीमत (छः सौ रूपये) और हिन्दी पाठकों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कैसे होगा और किस सीमा तक हो सकेगा, कहना बेहद मुश्किल है। बेहतर होगा, इस ग्रंथ को लोगों तक पहुँचाने में सरकार भी अपनी सहभागिता निभाये।

2. इस शोध प्रबंध ने हिन्दी साहित्य को नई दृष्टि देने का उपक्रम निवेदित किया है। समय के अनुसार दृष्टियाँ बदलनी ही चाहिए, इस लिहाज से यह कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है। दृष्टियाँ बदलने से ही परिदृश्य बदलती है, समाज बदलता है। सदियों से अंधदृष्टि भारतीय समाज की दृष्टि बदले चाहे न बदले, इस कृति को पढ़कर खुल ही जाये, तब भी यह डॉ. जोशी द्वारा किया गया एक महान् कार्य ही माना जायेगा।

दूसरे फ्लैफ के लेखक डॉ. जितेन्द्र कुमार सिंह ने कहा है, ’’इनके (डॉ. विनय कुमार पाठक के) ’स्त्री-विमर्श’ पर केन्द्रित कार्यों को शोध और समीक्षा का आधार बनाकर डॉ. दादू लाल जोशी ने प्रस्तुत ग्रंथ के द्वारा नई स्थापना दी है, जिसका स्वागत न सिर्फ हिन्दी वरन् भारतीय भाषाओं में भी होगा, इसमें दो मत नहीं।’’ अर्थात:-

(अ) डॉ. जोशी का यह ग्रंथ केवल शोध ग्रंथ ही नहीं है अपितु एक समीक्षा ग्रंथ भी है।

(ब) डॉ. दादू लाल जोशी ने प्रस्तुत ग्रंथ के द्वारा एक नई स्थापना दी है।

उपर्युक्त दोनों कथनों की जांच तो आप तभी कर पायेंगे जब आप इस ग्रंथ के पन्नों को एक-एक कर पलटते और परखते जायेंगे। और अंत में फ्लैफ लेखक ने आशा व्यक्त किया है कि इसका स्वागत हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं में होगा। लेखक की तरह मैं भी ऐसा ही सोचता हूँ और इसी तरह की कामना भी करता हूँ। संभव हो तो इसी तरह की कामना आप सबको भी करना चाहिए।

इस ग्रंथ की विस्तृत भूमिका डॉ. सभापति मिश्र जी ने लिखा है। स्त्री-विमर्श को परिभाषित करते हुए वे लिखते हैं - ’’स्त्री विमर्श एक नारीवादी सिद्धांत है, जिसमें स्त्री-केन्द्रित ज्ञान की चर्चा-परिचर्चा होती है।’’(p-vii)

और स्त्री-विमर्श अस्तित्व में कैसे आया, इसका करण स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं कि - ’’समकालीन सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियाँ साहित्य की सभी विधाओं में दृष्टिगोचर होती हैं। स्त्री-विमर्श उन्हीं विसंगतियों की देन है।’’(p-vii)

यदि व्याप्त विसंगतियों के समस्त आयामोें को टटोला जाय तो आगे भी लगभग सभी विद्वानों ने इसे ही स्त्री-विमर्श के अस्तित्व में आने का प्रमुख कारण माना है। भूमिका में इसके आगे जितनी बातें कही गई हैं लगभग सभी इसी ग्रन्थ से संदर्भित हैं, न सिर्फ संदर्भित हैं बल्कि उद्धृत हैं।

दो सौ अड़तालीस पृष्ठों की इस शोध ग्रन्थ को डॉ. जोशी जी ने छः अध्यायों में समेकित किया है। प्रारंभ में उन्होंने प्रस्तावना तथा छठे अध्याय के अंत में डॉ. विनय कुमार पाठक के नारी-विषयक विचार विस्तार में तथा अन्य विद्वानों के विचार संक्षिप्त में दिया है। छठा अध्याय समाकलन (उपसंहार) का है। यहाँ डॉ. जोशी जी लिखते हैं - ’’फिर भी 1975 के पहले तक ऐसे कोई विचार या सिद्धांत सजग, सचेत विमर्श की तरह लगभग न विकसित हुए, न लिखे गये जिसे स्त्री नितांत अपना विमर्श मान सके और और नेतृत्व में भागीदारी कर सके।’’(p- 229)

भारत में स्त्री-विमर्श की स्थिति, अवधारण, स्थापना और परंपरा पर अपनी स्थापना देते हुए डॉ. जोशी जी आगे लिखते हैं कि - ’’सन् 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ भारत सरकार के अनुबंध के कारण सरकारी पहल पर एक ’सोशल इंजीनियरिंग’ का दौर शुरू हुआ। उसमें भी वैचारिक, सैद्धांतिक संदर्भ के लिए पश्चिमी विमर्श को ज्यों का त्यों अपना लिया गया। स्पष्ट है, अंग्रेजी में स्त्रीवादी आंदोलन और स्त्री-विमर्श को एक-दूसरे से अलग करके देखें तो दरअसल स्त्री-विमर्श का अगर सारा का सारा नहीं तो लगभग सारा कार्यकलाप अंग्रेजी में ही चलता है। जाहिर भी है कि वह अंग्रेजी पृष्ठभूमि वाले भारतीय स्त्री समाज के भी एक सीमित अंश के सिवाय भारतीय स्त्री के लिए जैसे का तैसा अपना विमर्श न हो सकता है, न है।

मुझे पूरा विश्वास है कि भारत व्याकुलता, अंध परंपरावाद, प्रतिक्रियावाद, बौद्धिक साम्प्रदायिकतावाद, संकुचित दृष्टकोण, संकीर्ण मानसिकता और शुद्ध ब्राह्मणी भाषा से ऊपर उठकर स्त्री-विमर्श पर विचार करेगा। डॉ. विनय कुमार पाठक भारतीय परंपरा के विद्वान हैं इसलिए उनके लेखन व चिंतन में स्त्री-विमर्श, स्त्री के भरोसे भारतीय (जो भी उसका अर्थ हो) को बचाये रखने में भारतीयता के नाम पर स्त्री की स्वतंत्रता, समानता, भगिनीभाव, न्याय, धर्मनिरपेक्षता और आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए किया गया सार्थक प्रयास है।’’(p- 229-230)

स्पष्ट है कि डॉ. विनय कुमार पाठक ही भारतीय परंपरा में समकालीन स्त्री-विमर्श के संस्थापक या जनक हैं। समकालीन स्त्री-विमर्श को यही डॉ. विनय कुमार पाठक का सबसे बड़ा प्रदेय है। ़डॉ. जोशी जी लिखते हैं - ’’डॉ. विनय कुमार पाठक हिन्दी में पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने स्त्री-विमर्श के मानदण्ड का निर्धारण किया है और समीक्षा को भी रचनात्मकता प्रदान की है।’’(p-xxiv)

(’’सन् 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ भारत सरकार के अनुबंध’’ की बात पर मुझे The UN Convention on the Rights of the Child, 1989 (UN - CRC) का स्मरण हो आता है जिस पर भारत सरकार ने 11 दिसंबर 1992 को हस्ताक्षर किया था और जिसकी वजह से भारत में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए*THE JUVENILE JUSTICE (CARE AND PROTECTION OF CHILDREN) ACT, 2000* संक्षेप में (JJ ACT, 2000) तथा बालकों के ऊपर होने वाले अत्याचारों और आपराधिक कृत्यों के प्रभावी रोकथाम के लिए *THE PROTECTION OF CHILDREN FROM SEXUAL OFFENCES ACT, 2012* संक्षेप में(POCSO ACT 2012) बनाये गए तथा ’बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ की स्थापनाएँ की गई।

भारत में, हिन्दी साहित्य में बाल-साहित्य की न्यूनता जग जाहिर है। भारतीय फिल्म उद्योग की भी यही स्थिति है। इसी के मद्देनजर मैं कहना चाहूँगा कि अब समय आ चुका है कि भारत में ’’बाल-विमर्श’’ की परंपरा की भी स्थापना किया जाय, जिससे कि बाल मनोविज्ञान तथा बाल-समस्याओं पर आधारित साहित्य की कमी को पूरा किया जा सके और इस विकट और बेहद महत्वपूर्ण समस्या की ओर समाज का ध्यान आकृष्ट किया जा सके।)

डॉ. दादू लाल जोशी ने अपनी उपर्युक्त स्थापनाओं में लगभग शब्द पर विशेष जोर दिया है। (’’अगर सारा का सारा नहीं तो लगभग सारा कार्यकलाप अंग्रेजी में ही चलता है।’’ तथा ’’लगभग न विकसित हुए, न लिखे गये।’’) इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि डॉ. विनयकुमार पाठक द्वारा समकालीन स्त्री-विमर्श की परंपरा स्थापित करने के पूर्व और 1975 के पूर्व भी स्त्री विषयक विमर्श होते रहे हैं, चाहे वह ’संकीर्ण मानसिकता और शुद्ध ब्राह्मणी भाषा’ में ही क्यों न होती रही हो। स्त्री-विमर्श के संदर्भ में डॉ. दादू लाल जोशी जी का यह कथन कि - ’वह अंग्रेजी पृष्ठभूमि वाले भारतीय स्त्री समाज’ तक ही सीमित होकर रह गई थी, भी उपरोक्त लगभग के दायरे में आकर अपर्याप्त लगता है।

प्रथम अध्याय में डॉ. जोशी जी ने लिखा है - ’’समकालीन स्त्री-विमर्श पूर्ववर्ती स्त्री-विमर्श से अलग अपनी पहचान के बिन्दु रखता हैं। समकालीन स्त्री-विमर्श अपने पूर्ववर्ती स्त्री-विमर्श से जिस आधार पर अलग हुआ उसकी चर्चा विभिन्न विद्वानों द्वारा बड़े-बड़े दावों के साथ की गयी है, लेकिन इससे वस्तुस्थिति को समझने में विशेष सहायता नहीं मिली।’’(p-35) डॉ. दादू लाल जोशी अपनी प्रस्तावना में लिखते हैं - ’’स्त्री-जीवन की समस्याओं को केन्द्र में रखकर कुछ शोध-प्रबंध लिखे गये हैं, लेकिन स्त्री-विमर्श के मानदण्ड व इतिहास पर प्रकाश नहीं डाला गया है।’’(p-xxiii)

स्पष्ट है कि हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श की परंपरा तो रही है, परंतु इसके मानदण्ड व इतिहास पर प्रकाश नहीं डाला गया है। डॉ. दादू लाल जोशी जी लिखते हैं - ’’हिन्दी साहित्य में बदलाव की दिशा 1960 ई. के बाद ही दिखायी देने लगती है। 1965 ई. तक पहुँचते-पहुँचते स्त्री-विमर्श का यह बदला हुआ रूप पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। समकालीन स्त्री-विमर्श के प्रारंभिक वर्षों (1960-65) के बीच हमारे देश में व्यक्ति की जीवन-स्थितियाँ बहुत तेजी से बदलीं।’’(p-36)

डॉ. दादू लाल जोशी ने पूर्व में कहा है - ’1975 के पहले तक ऐसे कोई विचार या सिद्धांत सजग, सचेत विमर्श की तरह लगभग न विकसित हुए, न लिखे गये’ और अब वे कहते हैं - ’1965 ई. तक पहुँचते-पहुँचते स्त्री-विमर्श का यह बदला हुआ रूप पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है।’

तिथियों में इस तरह की हेराफेरी से मेरे जैसे मूढ़मति पाठक की बुद्धि चकराने लगती है।

प्रथम अध्याय में ’समकालीन बोध’ को समझाने का प्रयास किया गया है। बहुत सारे विद्वानों के अभिमत दिये गये हैं। डॉ. दादू लाल जोशी ने समकालीन बोध पर अपना मंतव्य तो पहले ही दे दिया है। डॉ. दादू लाल जोशी के अनुसार - ’’जब हम समकालीन या समकालीनता की बात करते हैं, तो उसमें हम युग विशेष की प्रत्येक प्रकार की स्थितियों अर्थात् - समूचे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन का समावेश कर लेते हैं। इसी को ’युग-परिवेश’, ’युग-परिदृश्य’ या ’युग-परिप्रेक्ष्य’ भी कहते हैं।’’ इसी पृष्ठ पर वे आगे लिखते हैं - ’’यह मान्य है कि अपने समय की प्रवृत्तियों को पहचानने, व्यक्ति और समाज की विषम स्थितियों को समझने और गहरी संवेदनशीलता के साथ युग-चेतना से संपृक्त होने का पर्याय समकालीनता है।’’(p-xix)

समकालीन बोध पर प्रथम अध्याय में विभिन्न विद्वानों की कई तरह की और भी परिभाषाएँ दी गई हैं। किसी विषय पर अलग-अलग विद्वानों की अलग-अलग परिभाषाएँ स्वाभाविक हो सकती हैं परन्तु एक ही विषय को एक ही विद्वान के द्वारा अलग-अलग ढंग से परिभाषित करना, जैसा कि ऊपर उद्धृत किया गया है, क्या है, क्यों है, मुझे समझ में नहीं आया। डॉ. दादू लाल जोशी करे भी तो क्या, साहित्य सहित राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और भी शास्त्रों की परंपरा ही यही है। किसी विषय पर हर व्यक्ति की समझ, सोच उनके विचार और दृष्टिकोण अलग-अलग हों तो या तो यह विषय की व्यापकता के कारण होता होगा या उस विषय में उलझाव, अस्पष्टता आदि कारणों से अथवा विद्वानों की अतिबौद्धिकता ज्ञापित करने की लालसा की वजह से। समकालीन बोध और समकालीनता पर इतनी सारी परिभाषाएँ पढ़कर भी मैं यह समझ नहीं पाया कि एक ही कवि की कुछ कविताएँ छायावादी और कुछ कविताएँ समकालीन कैसे हो जाती हैं और पिछले युग की एक ही समय के कवियों में किसी कवि की रचनाओं में समकालीन प्रवृत्तियाँ कहाँ से आ जाती हैं। यह भी समझ में नहीं आती कि समकालीन प्रवृत्तियाँ वर्तमान की सीमाओं का अतिक्रमण करके बाल्मीकि तक कैसे पहुँच जाती हैं।

फैराडे ने डायनमो का सिद्धांत दिया - ’जब कोई कुण्डली और चुम्बक एक दूसरे के सापेक्ष गति करते हैं तो कुण्डली में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है।’ फैराडे के बाद अनेक वैज्ञानिक आते रहे हैं, परन्तु डायनमो के सिद्धांत की इससे भिन्न और कोई परिभाषा नहीं बन पाई।

डॉ. दादू लाल जोशी ने स्त्री-विमर्श को परिभाषित करते हुए लिखा है - ’’समकालीन स्त्री-विमर्श अपने समय की जीवन्त समस्याओं की समझ और सक्रिय हिस्सेदारी का जागरूक विमर्श है, जो सामाजिक संरचना, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था के उस सांचे को तोड़ने का सार्थक प्रयत्न करता है, जिसमें जनतंत्र की दुहाई तो खूब दी जाती है, लेकिन सारी सुविधाएँ पुरूष वर्गोन्मुखी होती हैं। हम कह सकते हैं कि समकालीन स्त्री-विमर्श, यथास्थिति का विरोध करता हुआ असंगतियो के स्पष्ट उद्घाटन द्वारा, अपने रचनात्मक हस्तक्षेप की जनतांत्रिक पद्धति को सही मायने में उभारने और सँवारने वाला विमर्श है। यह यथास्थिति का केवल भाण्डाफोड़ ही नहीं करता बल्कि उसे बदलने में सक्रिय साझेदारी भी निभाता है। जनमानस को बुनियादी हक की प्राप्ति के लिए प्रबुद्ध करता है और अपने तार्किक, ठोस विश्लेषणों द्वारा हमें झकझोरता है, ताकि हम सब वैषम्यमूलक, पुरूषवादी सभ्यता की शोषक व्यवस्था से जूझ सकें। इसे ही समीक्षकों ने समकालीन स्त्री-विमर्श की चेतना स्वीकार किया है।’’(p-xx)

डॉ. दादू लाल जोशी की स्त्री-विमर्श पर दूसरी परिभाषा इस प्रकार है - ’’एक छोर पर अमूर्तन की तरह एक व्यापक अस्तित्व रखने के बावजूद अपने ठोस और वास्तविक अवतार में भारतीयता भी कोई एक भारतीयता नहीं है। इसी तरह अनेक पितृसत्ताएँ भी हैं और अनेक स्त्री-विमर्श भी। अन्य सभी विमर्षों की तरह स्त्री-विमर्श भी इसी अर्थ में एक सिरे पर भिन्नताओं का समारोह है।’’(p-230)

प्रथम और तृतीय अध्याय में स्त्री-विमर्श की, अलग-अलग विद्वानों की और भी परिभाषाएँ दी गई हैं। इतनी सारी परिभाषाओं को पढ़कर मुझे तो कई बार बेहोशी आने लगी थी।

प्रथम अध्याय में ही पृष्ठ 36 से लेकर पृष्ठ 47 तक स्त्री-विमर्श के मानदण्ड को भलीभांति और विस्तार से समझाया गया है। अध्याय 3, स्त्री-विमर्श: परिभाषा और परिव्याप्ति में स्त्री-विमर्श की और भी परिभाषाएँ दी गई हैं। इसी अध्याय के पृष्ठ 101 से 103 तक स्त्री-विमर्श की अठारह मूल प्रवृत्तियों का उल्लेख भी है। परंतु स्त्री-विमर्श के इतिहास को न तो स्पष्टता पूर्वक समझाया गया है और न ही इसका काल विभाजन किया गया है। इन्हीं पृष्ठों में (पृ. 45-46 में) शापेनहावर के स्त्री विषयक विचार अंग्रेजी में दिया गया है। अंग्रेजी भाषा में उद्धृत इस विचार का हिन्दी अनुवाद भी फुट नोट के रूप में दिया जाना आवश्यक था, क्योंकि शायद परंपरा इसी प्रकार की हैं।

डॉ. जोशी के मतानुसार 1965 ई. अथवा 1975 ई. के बाद समकालीन स्त्री-विमर्श की परंपरा निर्मित होती है। परन्तु इसके पूर्व भी हिन्दी साहित्य में पौराणिक स्त्री पात्रों - यशोधरा, उर्मिला, ऊर्वशी पर काव्य लिखे गये; श्रद्धा और इड़ा; महाभारत में कुंती और द्रौपदी को लेकर स्त्रियों की समस्याओं पर चर्चा की गई हैं। रामायण में सीता हैं। रीतिकाल में तो स्त्रियाँ साहित्य के केन्द्र में ही रही हैं। वैदिक साहित्य में भी कहीं न कहीं स्त्रियाँ होंगी ही। नाच्यौ बहुत गोपाल भी है। इन कालखण्डों और इन विमर्ष को परिभाषित करना क्या आवश्यक नहीं था। डॉ. दादू लाल जोशी ने अपने इस शोध ग्रन्थ में इनमें से कुछ को, अध्याय 3, स्त्री-विमर्श: परिभाषा और परिव्याप्ति के प्रारंभिक पृष्ठों में स्पर्ष जरूर किया है, परन्तु स्त्री-विमर्श का इतिहास बताने का कोई स्पष्ट प्रयास नहीं किया है। 1965 ई. अथवा 1975 ई. के पहले यदि किसी प्रकार का स्त्री-विमर्श नहीं था तो इसकी स्पष्ट घोषण होनी चाहिए और यदि था तो उसका विधिवत उल्लेख और नामकरण।

इस शोध प्रबंध में दो बेहद मूल्यवान सामग्रियाँ हैं। इनमें पहला है - अध्याय दो में डॉ. विनय कुमार पाठक का जीवन परिचय और रचनाधर्मिता। डॉ. विनय कुमार पाठक मेरे आदर्श ही नहीं, प्रेरक, मार्गदर्शक और आशीर्वादक भी हैं; और हर व्यक्ति अपने आदर्श के विषय में जानना चाहता है। मेरे जैसे और भी होंगे जिन्हें यह अध्याय उपयोगी लगेगा। यहाँ पर डॉ. दादू लाल जोशी ने बेहद पुण्य का काम किया है। उन्हें साधुवाद।

इस शोध प्रबंध में दूसरी बेहद मूल्यवान सामग्री हैं इस ग्रन्थ के विभिन्न पृष्ठों में बिखरी हुई विभिन्न कवियों की स्त्री विषयक कविताएँ। लेकिन खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि इन कविताओं के संदर्भों-भावार्थों को न तो उसके पूर्ववर्ती पँक्तियों के साथ जोड़ा गया है और न ही पश्चातवर्ती पँक्तियों के साथ। मेरा मानना है कि केवल इन्हीं कविताओं को लेकर समकालीन स्त्री-विमर्श की बेहद उपयोगी और सर्वथा मौलिक सामग्री दी जा सकती है। इस ग्रन्थ के विभिन्न पृष्ठों में बिखरी हुई विभिन्न कवयित्रियों-कवियों की स्त्री विषयक ये कविताएँ निहायत ही संग्रहणीय हैं।

इस ग्रंथ के चैथे अध्याय: स्त्री-विमर्श और परिवेश, में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक परिवेश की चर्चा की गई है। इस अध्याय में समकालीन स्त्री-विमर्श और डॉ. विनय कुमार पाठक के प्रदेय, की न्यून उपस्थिति से यह अध्याय मुझे बेहद बोझिल लगा। यह अध्याय इन विषयों के विद्यार्थियों के लिए जरूर उपयोगी साबित हो सकता है।

ग्रंथ के पाँचवे अध्याय, ’समकालीन स्त्री-विमर्श: डॉ. विनय कुमार पाठक का प्रदेय’, में आदरणीय डॉ. पाठक के अवदानों को क्रमवार और तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इस अध्याय से हमें डॉ. पाठक के जीवन-उद्देश्यों और उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक सूक्ष्मता से समझने का अवसर मिलता है। यह अध्याय इस ग्रंथ की आत्मा की तरह है।

मुझे शोध और शोधकार्य की प्रक्रियाओं के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं है। शोध ग्रंथ भी नहीं पढ़ा हूँ। बहुत पहले मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी प्राध्यापक का मुक्तिबोध पर आधारित शोध ग्रंथ पढ़ा था। प्रो. (डॉ.) जगदीश चन्द्र झा की ’आधुनिक यूरोप’ भी पढ़ा हूँ। अभी-अभी डॉ. यशेश्वरी ध्रुव की ’छत्तीसगढ़ी कहानियों में सांस्कृतिक चेतना’ पढ़ा है और अब डॉ. जोशी जी की यह कृति। अंतिम दो कृतियों में समाहित सामग्रियों में मैंने संदर्शित ग्रंथों से उद्धृत वाक्यों को गिनने का प्रयास किया जो मात्रा में 60 प्रतिशत से भी अधिक लगीं। इस विषय पर मैंने कुछ विद्वानों से चर्चा किया। पता चला कि शोध कार्य की यही मान्य प्रक्रिया है, ऐसा नहीं करने से शोध ग्रंथ मान्य नहीं होते हैं।

डॉ. जोशी जी के इस ग्रंथ के कुछ ही पृष्ठों में प्रूफ की गलतियाँ रह गई हैं जो नगण्य हैं। फिलहाल व्याकरण और भाषा के निकशों को ध्यान में रखते हुए इन वाक्यों पर गौर किया जा सकता है -

’’जब हम समकालीन या समकालीनता की बात करते हैं, तो उसमें हम युग विशेष की प्रत्येक प्रकार की स्थितियों अर्थात् - समूचे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन का समावेश कर लेते हैं। इसी को ’युग-परिवेश’, ’युग-परिदृश्य’ या ’युग-परिप्रेक्ष्य’ भी कहते हैं।’’(p- xix) तथा -

’’....युग विशेष की प्रत्येक प्रकार की स्थितियों अर्थात् - सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक के समावेश की बात कही गयी है।’’(p- xxv)

धन्यवाद।

कुबेर

मो. 9407685557

वर्तन परिवर्तन -

हर्षद दवे.

ख़ुशी या तनाव?

‘आप के पास केवल पांच-दस मिनट बैठते हैं तो ‘बैटरी चार्ज’ हो जाती है!’ नरेश शाह और मेरे अन्य मित्र मुझ से कहते हैं,’आप के चेहरे पर हमने कभी टेंशन नहीं देखा. क्या राज है इस का?’

वह मोटिवेशनल स्टोरी मैं हमेशा याद रखता हूँ जिसे आप भी पढ़ना पसंद करेंगे.

एक मजदूर हमेशा काम करने जाता था. काम के वक्त उस का बोस उस पर चिल्लाता रहता था. अन्य मजदूर अपना काम उस पर थोप दिया करते थे. कभी चूक के कारण उसे डांट पड़ती थी तो कभी निर्धारित समय में कार्य पूरा करने का टेंशन उसे रहता था. रात को वह अपने एक मित्र के साथ रोज घर जाता था. उस का मित्र देखता कि घर में प्रवेश करने से पहले वह मजदूर आँगन में लगे वृक्ष के पास पल दो पल के लिए खड़ा रहता था.

एक दिन वह मित्र उस के साथ उस के घर के अंदर गया. अंदर जाते ही उसने देखा कि वह बिलकुल आराम से, बेफिक्र हो कर बच्चों के साथ खेलता था. पत्नी के साथ हंसकर बातें करता था. माता-पिता के पास इत्मीनान से बैठ कर उन की बातें भी वह गौर से सुनता था.

मित्र को बड़ा आश्चर्य हुआ. दूसरे दिन उसने अपने दोस्त से पूछा कि ‘काम करने में इतना टेंशन होते हुए भी तू घर में इतना सरल-सहज कैसे रह सकता है?’

मजदूर ने कहा: ‘घर में प्रवेश करने से पहले मैं अपने टेंशन, परेशानी, अपमान, निराशा ई. की गठरी घर के आँगन में लगे पेड़ पर टांग देता हूँ. यह तो रोज की बात है. इस में मेरे परिवार का क्या कसूर? जो मैं झेलता हूँ उसे वे क्यों भुगते?’

यही है खुश रहने का अचूक फार्मूला. अपने टेंशन, परेशानी ई. टांगने की एक खूँटी ढूंढ लो और टांग दो उसे वहां, फिर रहो तनाव मुक्त!

मैंने देखा है, दफ्तर से घर आ कर आदमी बच्चों पर या अपनी पत्नी पर चिल्लाता है. माता-पिता की ओर देखता तक नहीं. यह स्वस्थता नहीं है. माना कि आपने बाहर काफी काम किया है, टारगेट पूरा करने का प्रेशर भी झेला है. किन्तु उस में आप के बच्चों का या पत्नी का या फिर आप के माता-पिता का क्या कसूर? आप अपने परिवार के लिए ही काम करते हैं और आप के परिवार के प्रियजन ही बनते है आप के क्रोध का निशाना! बेहतर यही होगा कि आप अपने टेंशन को घर के प्रवेशद्वार के पास रखे पायदान पर छोड़ कर ही घर में प्रवेश करें. फिर देखना, आप को प्रसन्न प्रियजनों का प्यार भरा साथ मिलेगा. तब प्रवेशद्वार पर ‘स्वीट होम’ लिखने की जरुरत नहीं रहेगी. आजमा के देखिए एकबार!

=======================================================

सुबह सुबह मेले की ओर चल दिया। शिलापुर गाँव के मेले में बाइक खड़ी की और मेले का लुत्फ़ लेने लगा। मुझे शोर शराबे के बीच बांसुरी की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ रही थी और मैं उसी ओर खिंचा चला जा रहा था। अचानक वह ध्वनि बंद हो गयी मुझे बड़ा खराब लगा। अब उस कलाकार को ढूँढू तो कैसे। आखिर उसने बजाना बंद क्यों कर दिया अब तो न ढूंढ पाउँगा।

एक बूढ़ा सा आदमी अचानक मेरे आगे लपककर आ गया मुस्कराकर मेरी राह सी रोकने लगा। मैंने उसकी वेश भूसा देखी गरीब था पर वह क्या चाहता है मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। मैं बड़ा असहज सा था इस विचित्र स्थिति के कारण। उसने मेरी ओर देख के कहा पहचान पाये तो मैंने न में सिर हिला दिया। वह हंस पड़ा, बोला आप इधर आइये मैं सोच रहा था ये कोई अराजक व्यक्ति है मेरा अनुमान और अधिक बलवान हो रहा था। मैंने भी सोच लिया था इसे आज सही रास्ता दिखा ही दूंगा।

वह बांसुरी की दूकान पे ले जाकर रुक गया। वह बोला आपने पिछले साल मेरी बहुत सी बांसुरी खरीद ली थीं ये मेरी दुकान है। आपको देखा तो पहचान गया। मुझे भी घटना याद आ गयी यह सत्तर साल का सीतापुर के कजियारे में रहने वाला वहीँ इकबाल है। मुझे उससे मिल के काफी खुशी हुई। मैंने उससे उसकी कुशल पूछी तो बोला पहले सांस की दिक्कत थी सो आपको मुरली की तान न सुना पाया था पर अबकी बजाऊंगा। और अब तो मेरे प्रोग्राम टीवी पे भी आते हैं।

इकबाल आज भी बहुत मेहनत करता है दिन रात जुटा रहता है कर्तव्यनिष्ठा से लेकिन उसकी एक बांसुरी की कीमत महज 3 से 4 रुपये ही होती है। टीवी पे आने का उसका अपना हुनर था पर उससे उसका पेट तो नहीं भर सकता था। उसने बांसुरी उठाई और फिर शुरू किया बजाना। उसकी बांसुरी का दर्द स्पष्ट समझ आ रहा था। बांसुरी की ध्वनि काफी मधुर थी पर उपेक्षा का दर्द हर सांस में था। चारों तरफ बांसुरी की मधुरता फ़ैल रही थी और उसकी आवाज सवाल खड़े कर रही थी जो अनगिनत थे।

न मालूम कितने धंधे और उद्योग लुप्त हो गए अब उस एकलौती आवाज की बारी है। मैंने जेब से 40 रुपये निकाले और जबरदस्ती देकर दो बांसुरी खरीद लीं। वह अब ऐसा न करूँगा कह कर 20 रुपये वापस करने लगा। मैंने उसे बहुत समझाया पर उसने दो अच्छी कीमत की बांसुरी मुझे महज बीस में दे दी। और मेरे द्वारा चुनी बांसुरी मेरे हाथ से रखा लीं।

तभी एक महोदय वहां कार से उतरे और दो रुपये की बांसुरी पे भी काफी महंगी बता कर पैसे कम करने को बहस पे उतर आये। उनका बच्चा बांसुरी की जिद पकड़ चुका था। आखिर बांसुरी मन की कीमत पर एक बड़े आदमी ने खरीद ली थी हमेशा के लिए। लोग उसकी बांसुरी तो खरीद रहे थे लेकिन उस उपेक्षा के दर्द की उनको भनक तक न थी। न मालूम कितनी योजनाएं और सरकारें आई और चली गयीं पर इन हुनरमंद श्रमिकों के धंधे तब भी इतिहास बन रहे थे और अब भी।

कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग है घातक
बढ़ती जनसंख्या और घटती उत्पादन क्षमता ने हमें प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मॉल्थस के जनसंख्या सिद्धांत की ओर पुनः आकर्षित किया है। सदियों पूर्व मॉल्थस ने जनसंख्या सिद्धांत पर विचार करते हुए लिख दिया था कि हमें प्रकृति के विरूद्ध बढ़ रही जनसंख्या में नियंत्रण करना होगा। मॉल्थस ने स्पष्ट करते हुए कहा था कि जनसंख्या की गति 2, 4, 8, 16...जैसी गति से बढ़ रही है, जबकि खाद्यान्न उत्पादन 1, 2, 3 एवं 4... के अनुपात में आगे बढ़ता है। तब एक समय ऐसा आयेगा जब हम सीमित लोगों को ही भोजन करा पायेंगे, बाकि लोगों को भूखा ही रहना होगा। आज उक्त सिद्धांत सच्चाई की धरातल पर स्पष्ट देखा जा सकता है। इसी समस्या से निपटने हम प्रकृति के विरूद्ध आचारण करते हुए खाद्यान्न उत्पादन के लिये कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ चढ़कर कर रहे है, जो निश्चित रूप से मानवीय शरीर के लिये दुष्परिणाम बनकर सामने आ रहा ही है। साथ ही जमीन की उर्वरा शक्ति को समाप्त कर कीटनाशकों और अधिक उत्पादन देने वाली खादों पर निर्भर कर रहा है। एक ओर जहां कीटनाशकों का प्रयोग हमारी फसलों की रक्ष्ज्ञा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जहरीले रसायनों का उपयोग पर्यावरण पर अनेक प्रकार के हानिकारक प्रभाव भी छोड़ रहा है


समाप्त नहीं होता है असर
कृषि कार्यों में प्रयोग आने वाले कीटनाशकों की श्रेणियां अलग-अलग होती है। अकॉर्बनिक कीटनाशकों का प्रयोग बहुत लंबे समय से किया जा रहा है। इसमें विशेष रूप से सोडियम फ्लोराईट, सोडियम फ्लोसिलिकेट, साइरोलाईट, लाईन, सल्फर आदि शामिल है। अकॉर्बनिक रसायानों का जहां कीटनाशकों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। वहीं जीव जंतुओं तथा मनुष्यों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव अपना असर दिखाने लगा है। यही कारण है कि अब मनुष्य इन कीटनाशकों के उपयोग पर सचेतता बरतने लगा है। इसी तरह कॉर्बनिक कीटनाशक प्रकृति में कम समय तक अपना प्रभाव रखते है, इसलिये इनका उपयोग बढ़ रहा है। वास्तव में ये कीटनाशक आधुनिक है तथा विभिन्न प्रकार के कीटों के विरूद्ध अपना प्रभाव दिखाते है। सर्वाधिक रूप से उपयोग में लाया जाने वाला कीटनाशक डीडीटी, बीएचसी, एल्ड्रिन आदि है। बार बार इनका छिड़काव करते रहने से ये प्राकृतिक रूप से विघटित नहीं हो पाते है। यही कारण है कि इनका प्रभाव भोजनीय सामग्री में प्रत्यक्ष रूप से प्रवेश कर जाता है। भोजन के साथ मानव रक्त में मिलते हुए अपने विषैले प्रभाव को आंतरिक रूप से शारीरिक दोष के रूप में ला दिखाते हैं।

 
पशुओं और मिट्टी के लिये भी हानिकाकर है। कीटनाशकों का हानिकारक प्रभाव मानव जाति के लिये ही नहीं, वरन पशुओं एवं उपजाऊ मिट्टी पर भी अपना दुष्परिणाम दिखाता आ रहा है। डीडीटी तथा इसी के सामान अन्य यौगिकों का छिड़काव पक्षियों के प्राकृतिक आवासों को नष्ट करने के साथ स्तनपाईयों की मौत का कारण भी बन रहा है। इन्हीं कीटनाशकों का प्रयोग पक्षियों के चूजों को जीवन मिलने से पूर्व एवं पैदा होने के साथ ही मौत की नींद सुला देता है। इन दुष्परिणामों के अलावा ये कीटनाशक भोजन के माध्यम से पक्षियों के शरीर में प्रवेश कर जाते है। सारस, बगुले तथा जल कौंए जैसे पक्षियों की विलुप्ति पर जाने का कारण भी कीटनाशक ही बन रहे है। वैज्ञानिकों के अनुसार इन पक्षियों के अंडों के खोलों पर कीटनाशकों के गंभीर दुष्परिणामों को विभिन्न सर्वे एवं परीक्षणों में पाया गया है। ऐसे ही कीटनाशकों के कारण अंडों के खोल कमजोर पड़ जाते है तथा अंडों में से बच्चों के पोषित होकर बाहर आने से पूर्व ही अंडे फुट जाते है। भूमि अथवा मृदा के एक वर्ग मीटर क्षेत्र में लगभग 9 लाख बिना रीढ़ की हड्डी वाले जीव निवास करते है। यही वे जीव है तो उत्पादन करने वाले मृदा को उपजाऊ शक्ति प्रदान करते है। ऐसे ही जीवों में केचुआ भी शामिल है, जो कीटनाशकों के प्रयोग से मार जाता है। यही कारण है कि उपजाऊ भूमि कुछ वर्षों में अनुपजाऊ हो जाती है। इसके साथ ही नाईट्रोजन को संशोधित करने वाले जीवाणु भी इनके प्रयोग से मर जाते हैं।

 
वायुमंडल भी हो रहा प्रदूषित
कीटनाशकों का लंबे समय तक वायु मंडल में बना रहना भी अपना दुष्प्रभाव दिखा जाता है। ऐसे कीटनाशक धीमी गति से अपना असर दिखाते हुए डीडीटी की तुलना में अत्यधिक विषैला रूप अख्तियार करते है। एक बार इनका उपयोग कर लेने के बाद डीडीटी का विषैला प्रभाव दिनों दिन बढ़ता ही जाता है। अधिकांश कीटनाशक न तो सहजता से नष्ट होते है और न ही पशुओं द्वारा पचाये जा सकते है। इनके प्रयोग से ऐसी प्रजातियां एवं जीव भी नष्ट हो जाते है जो लाभदायी होते है। इससे प्राकृतिक परजीवियों के समूल नष्ट होने का खतरा पैदा हो जाता है। कीटनाशकों के निरंतर प्रयोग से कीटों की प्रतिरोधक शक्ति भी बढ़ती जाती है, जो आगे चलकर हर प्रकार से वायु मंडल के लिये घातक सिद्ध होती है। खेतों में कीटनाशकों का उतना ही उपयोग अच्छा माना जा सकता है, जितना की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों पर नियंत्रण के लिये जरूरी हो, न की अधिक उत्पादन की लालच में बहुतेरा उपयोग।


पानी से लेकर खाद्य पदार्थों में हो रहा उपयोग
21वीं शताब्दी में भागती दौड़ती जिंदगी ने कीटनाशकों के प्रयोग को बे-इंतहा बढ़ा दिया है। अब खेतों और खलिहानों से बाहर निकलते हुए कीटनाशकों के प्रयोग ने सामान्य खाने पीने की वस्तुओं तक अपना दायरा बढ़ा दिया है। सभी प्रकार के पेय पदार्थों से लेकर बोतल बंद पानी में भी इनका प्रयोग किया जा रहा है। पानी की बोतल महीने भर या उससे भी अधिक उस पानी को शुद्ध बताती है, जो हम पहले कभी दूसरे दिन भी उपयेाग नहीं करते थे। बड़ी शान से हम पाऊच और बोलत बंद पानी पी रहे है और रहन सहन के स्तर की डींगे हाक रहे है, जबकि प्रतिदिन आपूर्ति किया जाना वाला पानी इससे कहीं अधिक बेहतर होता है। इसी तरह कोल्ड्रिंग्स से लेकर डिब्बा बंद भोजन भी इन्हीं कीटनाशकों (प्रेस्टिसाईट्स) के दम पर बेचे जा रहे है। बड़े शान से पूरा परिवार ऐसे ही डिब्बा बंद खाद्य सामग्रियों का उपयोग कर अपने उच्च जीवन स्तर पर ढिंढोरा पीट रहा है, जो वास्तव में हमारे स्वास्थ्य के लिये ताजे और गर्म भोजन की तुलना में श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता है। प्रेस्टिसाईट्स से युक्त भोजन और पेय पदार्थ हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिये भी उपयुक्त नहीं माना जा सकता है।

 

                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

आलेख (30 मार्च 2015 के लिए)

बातें छोड़ें, काम करें

आओ राजस्थान बनाएँ

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

राजस्थान प्रदेशवासियों के लिए आज उल्लास का पर्व है।

सभी ओर राजस्थान दिवस की धूम है और प्रदेशवासी उत्सवी माहौल में रमे हुए हैं। 

राजस्थान दिवस का यह मौका हमें भावी विकास और तरक्की के आयामों के बारे में ठोस और पक्की धारणाएं बनाते हुए संकल्प लेने की याद दिला रहा है वहीं बीते समय में हमारे द्वारा राजस्थान विकास के लिए किए गए कार्यों के लिए मूल्यांकनपरक आत्मचिन्तन का भी मौका देता है। 

किसी भी राज्य की तरक्की वहाँ के निवासियों की प्रदेश के प्रति समर्पित और आत्मीय भागीदारी पर निर्भर हुआ करती है।

मातृभूमि के प्रति लगाव और निरन्तर विकास के लिए पूर्ण सहभागिता ही वह पैमाना है जो उस क्षेत्र विशेष को अग्रणी बनाता हुआ अन्य प्रदेशों के मुकाबले अन्यतम और विलक्षण पहचान दिलाता है।

आज का दिन दो तरफा चिन्तन के लिए है।

अब तक निभायी गई भागीदारी का मूल्यांकन करें और इसके साथ ही आने वाले समय में और अधिक क्या कर सकते हैं, इस पर गंभीर मंथन की जरूरत है।

साफ तौर पर देखा जाए तो इंसान सामुदायिक उत्थान और विकास के लिए बना है और उसका पहला फर्ज यही है कि वह सामाजिकता के साथ रहे, सौहार्द और मानवीय मूल्यों पर अडिग रहे तथा ऎसा काम करे कि जिससे तरक्की का ग्राफ आगे बढ़ता रहे।

विकास के सुनहरे बिम्ब सभी तरफ सहज दिखाई देने लगें और अपने प्रत्येक कर्म से किसी को दुःख न पहुँचे बल्कि सुख, शांति और सुकून का दिली अहसास हो।

राजस्थान दिवस हम वर्षों से मना रहे हैं, राजस्थान के विकास की बातें भी करते रहे हैं और ढेर सारे धूमधड़ाके भी।

बावजूद इसके हम राजस्थान को अपेक्षित विकास अब तक नहीं दे पाए हैं।

जो कुछ दिख रहा है वह भौतिक विकास, सीमेंट-कंकरीट के ढाँचों, संचार उपकरणों का संजाल और बाहरी आकर्षण ही अधिक प्रतिभासित हो रहा है।

हालांकि पिछले वर्षों से लगातार बहुआयामी विकास के लिए सभी प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन वांछित जनसहभागिता का अभाव कहें या समय-समय पर प्राकृतिक आपदाओं की मार, या फिर सम सामयिक समस्याओं के थपेड़ों का कहर। 

बावजूद इन सब के राजस्थान फौलादी ज़ज़्बों के साथ आज विकास की डगर पर तेजी से बढ़ता जा रहा है।

इस बार का राजस्थान दिवस कुछ विशेष है जबकि हर तरफ त्वरित विकास, पारदर्शिता, जवाबदेही और समर्पित योगदान की कितनी ही धाराएं एक साथ मिल गई हैं।

केन्द्र और राज्य की मिली-जुली सहभागिता और आम आदमी के उत्थान की नवीन परिकल्पनाओं के साथ राजस्थान अब विकास के तीव्रतर दौर में पहुँच चुका है।

स्वच्छता अभियान से परिवेशीय शुचिता और विशुद्ध आबोहवा के द्वार खुल गए हैं वहीं परस्पर सकारात्मक सहयोग और जन भावनाओं के अनुरूप विकास की परिकल्पनाओं को पर लगने लगे हैं।

इससे सबल, सशक्त तथा विकसित राजस्थान बनाने की गतिविधियों को खासा संबल प्राप्त हो रहा है।

राजस्थान का वास्तविक और उल्लेखनीय विकास किसी योजना-परियोजना, कार्यक्रम,  अभियान या भाषणों से नहीं हो सकता है।

राजस्थान की तरक्की तभी संभव है जबकि प्रदेश का हर व्यक्ति यह तय कर ले कि उसे जो कुछ करना है वह अपने लिए नहीं करना है बल्कि राजस्थान के लिए करना है, अपनी मातृभूमि और अपने क्षेत्र के लिए करना है।

यह भी तय करना होगा कि हमारी प्राथमिकताएं हम पर ही खत्म नहीं हो जाती बल्कि हमारी प्राथमिकता में हमारा अपना क्षेत्र, अपना राजस्थान है।

जो कुछ करना है वह राजस्थान के लिए ही करना है तभी हम सशक्त और विकसित राजस्थान बनाते हुए समर्थ भारत निर्माण में ऎतिहासिक भागीदारी का इतिहास रच सकते हैं।

अब तक प्रदेश विकास के अपेक्षित लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पाने का मूल कारण यही रहा है कि हमने अपने आपको ही हर कहीं देखने की आदत बना डाली है, और इसलिए जो कुछ कर रहे हैं वह अपने आपके लिए ही कर रहे हैं।

यही कारण है  कि हममें से अधिकांश लोग चंद फीट जमीन के घेरों, भौतिक चकाचौंध भरे कुछेक संसाधनों और कुछ लोगों के मोहपाश से भरे दायरों में सिमटे हुए हैं और राजस्थान के आसमान को देखने की हमें फुर्सत ही नहीं है।

अपने कत्र्तव्य कर्म में लगे रहें मगर हम सभी का ध्येय मातृभूमि के प्रति फर्ज पूरे करना चाहिए।

जगदीश ने हमें जगत में अपने स्वार्थ पूरे करने के लिए नहीं भेजा है बल्कि जगत के परोपकार के लिए भेजा है।

हम जहाँ कहीं काम करते हैं वहाँ सच्ची निष्ठा और ईमानदारी से काम करने का प्रण ले लें तो कोई कारण नहीं कि साल भर के भीतर हमारा राजस्थान कहाँ से कहाँ पहुंच जाए।

हम सभी के सभी लोग कम से कम साल भर के लिए यह तय कर लें कि हम जो कुछ करेंगे वह पूरी निष्ठा, ईमानदारी और कत्र्तव्यनिष्ठा से करेंगे, अपने कर्मस्थलों में समय और कार्य सभी मामलों में अनुशासन और मर्यादाओं का पालन करेंगे तथा ऎसा कोई कर्म नहीं करेंगे जिससे राजस्थान की साख में कोई कमी आए।

मात्र साल भर के लिए ही सही, यह संकल्प अपने आप में राजस्थान निर्माण में अपनी वो ऎतिहासिक भागीदारी होगी जिसे पीढ़ियों तक याद भी रखा जाएगा और अनुकरण भी किया जाता रहेगा।

राजस्थान निर्माण के लिए आज के दिन वादों, नारों और भाषणों से कहीं ज्यादा जरूरी है हर व्यक्ति का संकल्पित होना।

आईये अपने राजस्थान को हर दृष्टि से अग्रणी बनाने के लिए मन से प्रतिज्ञा करें और साल भर इस पर चलते हुए ऎसा कुछ करें कि हम सभी के पास उपलब्धियों का पिटारा हो और दिग्दर्शन के लिए देश-दुनिया के पास राजस्थान का इन्द्रधनुषी स्वरूप।

राजस्थान दिवस पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ ....।

---000---

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget