सोमवार, 23 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - मानवता के दुश्मन हैं झूठी तारीफ करने वाले

मानवता के दुश्मन हैं

झूठी तारीफ करने वाले

- डॉ. दीपक आचार्य

94133060477

dr.deepakaacharya@gmail.com

पहले आदमी अच्छे कामों से खुश होता था लेकिन आज किसी को भी खुश करने के लिए न किसी आदर्श की आवश्यकता है, न मधुर व्यवहार की, न सच या ईमानदारी की और न ही संवेदनशील स्वभाव की।

आजकल आदमी अपनी तारीफ सुनकर खुश हो जाता है, अपने बारे में अच्छा छपा हुआ पढ़कर या किसी छोटी-बड़ी स्क्रीन पर अपनी प्रशंसा भरी तस्वीरों को देख कर ही खुश हो जाया करता है। भले ही वो सब कुछ झूठा और मनगढंत ही क्यों न हो।

आदमी की फितरत में आए इस बदलाव को देखकर खास और आम सभी प्रकार के लोगों ने भी अपने स्वार्थ पूरे करने, काम निकलवाने और मनमानी परिस्थितियों को साकार करने के लिए बाकी सारे आदर्शों, सिद्धान्तों, सच्चाई, ईमानदारी भरे कर्मयोग तथा माधुर्यपूर्ण एवं संवेदनशील व्यवहार को भुला दिया है। अब इनकी कोई आवश्यकता नहीं है।

आजकल छोटे-बड़े किसी भी आदमी को खुश करने के लिए झूठी प्रशंसा और मिथ्या वाहवाही की काफी है। फिर जब सब झूठ ही बोलना है तो इसमें कंजूसी क्यों।

यों भी आदमी इतना सस्ता हो गया है कि उसे न अच्छे काम चाहिएं, न चरित्र, और न ही उत्तम चाल-चलन या चेहरा। जो जहाँ हैं, जैसा है उससे कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर कह देने में किसी का क्या जाता है।

फिर कौन फालतू बैठा है जो अपनी कही हुई झूठी बातों का मूल्यांकन करने वाला है।

आजकल सभी तरह झूठी तारीफों के पुल बांधे जा रहे हैं और पुल भी ऎसे कि तारीफ करने वाले भी हवा में, और तारीफ सुनने या करवाने वाले भी सातवें आसमान पर। तारीफ करने और कराने वालों का सीधा संबंध अभिनय से होता हैं।

इस किस्म के लोग रंगमंच और फिल्मों में ज्यादा शौहरत हासिल कर सकते हैं क्योंकि इनकी जिन्दगी ही अपने आप में किसी अभिनय से कम नहीं होती।

तारीफ से जब भगवान खुश हो सकते हैं तो फिर आदमी की क्या बिसात। हर आदमी अपनी तारीफ सुनना चाहता है और वह भी खूब सारे माध्यमों से।

जो उसकी तारीफ करता है वह उसका सगा है, जो तारीफ करने का सामथ्र्य नहीं रखता वह उसका घोर दुश्मन। 

कई बार ऎसे-ऎसे लोग एक-दूसरे की तारीफ करते रहते हैं जो कि वास्तव में धुर विरोधी होते हैं और फूटी आँखों नहीं सुहाते।

यह भी अपने आप में अभिनय का वह चरमोत्कर्ष है जो झूठ की बुनियाद पर टिका हुआ होता है। तारीफ ही तारीफ करने वाले लोगों की संख्या इन दिनों सभी स्थानों पर खूब बढ़ती जा रही है।

इन लोगों के हाथ यह सूत्र लग गया है कि कोई भी आदमी कितना ही नालायक, कमीन, भ्रष्ट, चोर-उचक्का, डकैत, व्यभिचारी, अनाचारी, शोषक और मक्कार क्यों न हो, हमें अपने काम से मतलब, उसके गुणावगुणों से क्या लेना-देना।

यही कारण है कि बहुत सारे लोग ऎसे हैं जिन्होंने झूठी तारीफ को वह ब्रह्मास्त्र मान लिया है जो हर किसी आदमी पर एकदम सटीक बैठ जाता है।

फिर तारीफ सुनने के बाद कोई अपनी बात न मानें, ऎसा कैसे हो सकता है।

आजकल लोगों ने तारीफ को मैनेजमेंट का महागुर बना लिया है। जिससे काम पड़े, जो सामने आए उसकी तारीफ पर तारीफ करते रहो और अपने बनाते रहो।

प्रशंसा का शहद ऎसी रामबाण औषधि है जो हर किसी मरीज पर कारगर है, चाहे उसका रोग साध्य हो या फिर असाध्य।

लगता है लोग पीढ़ियों और सदियों से भूखे हैं अपनी तारीफ करवाने के। समाज के शातिर लोगों ने उनकी इस कमजोरी को भुनाने में कोई कसर बाकी नहीं रख छोड़ी है। हमारे आस-पास भी ऎसे खूब सारे लोग हैं जो तारीफ करने का कोई मौका नहीं छोड़ते।

इसके दो सीधे फायदे हैं। एक तो तारीफ सुनने वाले हमारे लट्टू हो जाते हैं और दूसरा हमारा व्यक्तित्व दुनिया की नज़रों में सकारात्मक छवियों से ऎसा सुनहरा दिखता है कि बस।

आजकल लोगों को अपने काम निकलवाने और स्वार्थ पूरे करने से मतलब रह गया है। उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि कौन आदमी अच्छा या बुरा।

चतुर लोगों को यह अच्छी तरह भान है कि आदमी की किस्म चाहे कैसी भी हो, वह तारीफ पाने का भूखा रहा है और रहेगा।

उसकी इस भूख को जो शांत कर देता है वही उसके लिए सबसे बड़ा और निकटस्थ शुभचिंतक है। और ऎसे शुभचिन्तकों के काम आसान कर देना, हर जायज-नाजायज स्वार्थ पूरे कर देना वह अपना पहला फर्ज और धर्म मानता है।

तारीफ करने के मामले में हम सारे गुणधर्म, मूल्यांकन और सत्यासत्य का विवेक खो बैठते हैं। जो कोई जैसा कहता है सुन लेते हैं, अपनी ओर से सिर्फ वाहवाही की करने के आदी हो गए हैं। कितना ही झूठा, मक्कार और फरेबी हो उसकी भी तारीफ कर डालते हैं।

हममें से काफी सारे लोग ऎसे हैं जो झूठी तारीफ को अपनी जिन्दगी में इतना अहम स्थान दे चुके हैं कि बात-बात में लोगों की झूठी तारीफ करते हैं।

इन लोगों को झूठ बोलने में जरा भी शर्म नहीं आती कि वे रोजाना कितना झूठ बोलते हैं।  फिर सामूहिक आयोजनों में भाषण हों या कवि गोष्ठी या फिर कोई सा अवसर, बिना सोचे समझे वाह-वाह करने, तालियां बजाने वाले लोगों की अपने यहाँ कोई कमी नहीं है।

झूठे लोग और झूठी तारीफ करने वालों के जमावड़े का ही असर है कि हम सच को सच कहने और झूठ को झूठ कहने का साहस खो चुके हैं।

हम अपने स्वार्थ की खातिर झूठ को अपना चुके हैं और वह भी इतना कि बात-बात में झूठ बोलते हैं,  झूठी तारीफें करते हैं और असत्य को अपनाते हुए जिन्दगी भर झूठ और झूठन पर जिन्दा रहने लगे हैं।

असल में झूठी तारीफ सुनने और करने वाले दोनों पक्ष मानवता के दुश्मन हैं और इनकी वजह से समाज और देश का कितना नुकसान हो रहा है इसका अन्दाज लगाना भी मुश्किल है।

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