रविवार, 29 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - सर्वश्रेष्ठ होता है अपना सृजन

सर्वश्रेष्ठ होता है

अपना सृजन

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

अपना हर सृजन हर मामले में उम्दा और सर्वश्रेष्ठ होता है।

हो सकता है दूसरों की नज़रों में इसकी कोई अहमियत न हो या वे अपने दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों की वजह से कमतर आँकें।

हर इंसान की दृष्टि भिन्न-भिन्न होती है, सोचने, समझने और करने की क्षमताएं अलग-अलग होती हैं, और उसी के अनुरूप उनकी प्रतिक्रियाएं होती हैं। 

इंसान यदि अपने मूल इंसानी स्वभाव के अनुरूप होता है तब तो वह हर क्रिया और कार्य के गुणावगुणों का स्पष्ट मूल्यांकन कर सकता है।

लेकिन आजकल ऎसा नहीं रहा। अब इंसान अपने मूल स्वभाव से भटका हुआ है और इसलिए किसी न किसी रूप में दूसरे लोगों या परिवेशीय आकर्षण-विकर्षण से प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकता।

फिर आजकल आदमी को भरमाने और लुभाने वाले स्वदेशी और विदेशी आकर्षणों की खूब भरमार है।

इंसान किसी न किसी गली या रास्ते से गुजरता हुआ किसी न किसी से प्रभावित, मोहित और मुग्ध हो ही जाता है।

अधिकांश मामलों में आदमी की फितरत यही है कि वह आकर्षण में बंध कर आसक्त हो ही जाता है और यही आसक्ति उसे मोहांध बनाकर ही छोड़ती है। 

बहुत कम इंसान ऎसे होंगे जो भोलेपन में आकर कहीं अनचाहे फंस जाते होंगे या फंसा दिए जाते होंगे अन्यथा अधिकांश इंसान किसी न किसी स्वार्थ, मोह या प्रलोभन में स्वयं ही फंसने से बच नहीं पाते।

मायावी संसार और मायावी लोग हर क्षण इंसान को अपने मोहपाश में जकड़ने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

इनके लिए अब इंसान को भ्रमित करना मामूली खेल ही रह गया है जहाँ किसी को भी कंचन-कामिनी और लोकेषणा के सुनहरे कैनवास दिखाकर भटकाया जा सकता है।

जबकि हर इंसान दुनिया में अन्यतम है और उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता।

प्रत्येक इंसान अपने आप में नवाचार है और सर्जक के रूप में जो कुछ करता है वह उसकी अपनी निजी मौलिकता है जिसका मुकाबला कोई दूसरा कभी नहीं कर सकता। 

इस दृष्टि से दुनिया का हरेक इंसान अपने आप में विलक्षण कृति है लेकिन इस विलक्षणता का महत्त्व तभी साकार हो सकता है जबकि हम इसे समझने को तैयार होंं।

हममें से अधिकांश लोग अपने आपको दूसरों के मुकाबले हीन और नीचे दर्जे का मानने लगते हैं।

यहीं से हमारी विकास यात्रा रुक जाती है और आत्महीनता भरी यथास्थिति ठहराव ला देती है।

बात अपने लेखन की हो या फिर किसी भी प्रकार की सृजनात्मकता की।

अपनी संतति की हो या अपने द्वारा निर्मित किसी बिंब की।

हर मामले में यह साफ-साफ मानना चाहिए कि हमारे द्वारा किया गया सृजन दुनिया में अन्यतम और सर्वश्रेष्ठ है और इस मामले में हम लोग केवल स्रष्टा नहीं बल्कि सर्जक की भूमिका में होते हैं।

हर इंसान सर्जक है और उसकी सृजनात्मकता के सामने दूसरे सारे के सारे लोग दृष्टा। हमारे व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमजोर यही है कि हम अपने सृजन को गौण तथा हीन मानने लगते हैं और दूसरों को इससे अधिक।

सृजन कैसा भी हो, हर सृजन अपनी मौलिकता लिए हुए होता है तथा इसी मौलिकता में छिपा होता है कुछ न कुछ नयापन।

इस दृष्टि से हम सभी लोग सर्वशक्तिमान की वह अनुपम कृति हैं जिसका कोई सानी नहीं।

अपने आपको जानने, समझने और उसके अनुरूप अहं ब्रह्मास्मि और तत्त्वमसि के बोध वाक्यों को जीवन में उतारने की जरूरत है।

यह विचार मन और मस्तिष्क में हमेशा इस प्रकार बना रहना चाहिए कि हमारा आभामण्डल उसी उत्कृष्टता बोध से भरा रहे।

एक बार जब हम अपने आपको सर्वशक्तिमान का अंश या प्रतिनिधि मानना आरंभ कर देते हैं फिर हममें वो सामथ्र्य आ जाता है कि जिससे हम संसार को कुछ ऎसा दे पाने की स्थिति में होते हैं कि सभी को प्रसन्नता का बोध होता है और हमारी वजह से सुकून भी मिलता है।

जीवन यात्रा में तरक्की की कामना रखने वाले सभी लोगों को चाहिए कि वे स्वयं जो कुछ करें, उसके प्रति श्रेष्ठता का भाव रखें। और जो कुछ करें मौलिकता का पूरा-पूरा ध्यान रखें। चाहे जितना कुछ करें, उसके प्रति श्रद्धा और सर्वश्रेष्ठता का भाव रखें।

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