मंगलवार, 24 मार्च 2015

जय प्रकाश भाटिया की लघुकथा - हमशक्ल

हमशक्ल

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जय प्रकाश भाटिया

दिसंबर की सर्द रात और रात के १२ बजे,फ्रंटियर मेल लुधियाना स्टेशन के एक नंबर प्लेटफॉर्म से छूट रही थी, तेजी से भागता हुआ और हांफता हुआ रमेश किसी तरह से ट्रेन में चढ़ गया और डिब्बे के एक कोने में दुबक गया , थोड़ी देर में में जब उसकी श्वास सामान्य हुई तो यह क्या , वह तो गलती से फर्स्ट ए सी के डिब्बे में चढ़ गया है. अब क्या होगा, जेब में पैसे भी नहीं? सामने टी टी को आता देख कर वह बहुत घबरा गया,उसे लगने लगा की अब उसे जेल की हवा खाने से कोई नहीं बचा पायेगा , और जैसे ही टी टी पास आया और बोल। “सुरेश जी, अरे आप यहाँ क्यों बैठे हैं, क्या ज्यादा पी ली है, चलिए अपने केबिन में और वह टी टी रमेश को बी केबिन में धकेल कर आगे बढ़ गया .

अरे यह क्या , रमेश को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था, सामने की सीट पर बैठा शख्स शत प्रतिशत उसका हमशक्ल, बिलकुल फिल्म के डबल रोल के जैसे। अब उसकी समझ में आया की टी टी ने उसे सुरेश क्यों समझा ।अब क्या होग। वह यह सोच ही रहा था की सीट पर बैठे शख्स ने बड़े प्यार से उसे बिठाया और बोला । मित्र… मैं भी हैरान हूँ तुम्हें देख कर, हम दोनों तो जैसे देव आनंद की फिल्म ‘हम दोनो’ जैसे हैं, और हंसने लगा , रमेश की समझ में तो कुछ नहीं आ रहा था और वह अभी भी पूरा घबराया हुआ था,उसकी मनोदशा समझ कर सुरेश बोला, मुझे अपना मित्र समझो, और पूरी बात बताओ तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ, मुंबई में मेरी पाली हिल्स बांद्रा में कोठी है, बहुत पैसा है. सब ठीक कर दूंगा,

रमेश की जान में जान आई और बोला, मित्र , मैं लुधियाना की एक स्वेटर बनाने वाली कंपनी का सेल्स मैन हूँ, मैंने कहीं से ५०,००० रूपये की पेमेंट ली, और गबन कर ली,और खर्च कर दी, मालिक को झूठ बोला की पैसा रास्ते में किसी ने चाकू दिखा कर लूट लिया है, मालिक को शक हुआ, उसने पुलिस में रपट लिखवा दी, पुलिस मेरे पीछे है और मैं रात को चोरी से भागता हुआ इस ट्रेन में चढ़ गया हूँ,

सुरेश को पूरी बात समझते देर ना लगी, और बोला मैं कल रमेश बन कर तुम्हारी कंपनी में जाऊँगा और ५०,००० रूपये दे दूंगा, तुम बच जाओगे, मैं अम्बाला स्टेशन पर उतर कर वापिस लुधियाना चला जाता हूँ, तुम मेरी टिकट पर मुंबई मेरे घर चले जाओ, कुछ दिन वहीँ रहो, और दो चार दिन में मैं तुम्हे मुंबई में आकर मिलता हूँ,

और सुरेश अम्बाला स्टेशन पर उतर गया और जाते जाते उसे बहुत से पैसे भी दे गया, रमेश तो जैसे उसके अहसानो के नीचे दब गया, उसे तो जैसे नई ज़िंदगी मिल गई हो,

पूरे दिन के सफर के बाद अगली सुबह गाड़ी जब मुंबई पहुँची तो यह क्या, रमेश के पैरो के नीचे से जैसे ज़मीन खिसक गई, उसे पुलिस ने घेर लिया, और पकड़ कर थाने ले आई,उस से पूछा गया की तुम रमेश हो, लुधियाना से आये हो , और तुमने कहीं किसी कंपनी में गबन किया है, तो रमेश ने बनावटी हसीं बनाते हुए कहा, आपको धोखा हुआ है, मेरा नाम सुरेश है, यहाँ मेरी पाली हिल्स बांद्रा में कोठी है,

लेकिन क्या तुम यकीन से कहते हो की तुम रमेश नहीं हो,………. इंस्पेक्टर ज़ोर से बोला, हाँ मैं यकीन से कहता हूँ , मैं सुरेश हूँ, वह चिल्लाया।

हाँ, तो तुम सुरेश हो और जिस कोठी का तुम नाम ले रहे हो उसे अपनी बता रहे हो, तुम वहां पर नौकर थे, तुमने उसके मालिक का खून किया है, और उसका पैसा , मॉल लेकर फरार हो गए थे, हमें शक था की तुम अमृतसर गए हो, तब से तुम्हारा पीछा कर रहे हैं, और अब तुम पकड़ में आ गए हो……. और रमेश के पास कहने को अब कुछ नहीं था, अब उसे अच्छी तरह समझ आ चुका का था की सुरेश ने उसे कैसे अपनी जगह , हमशकल होते हुए, क़त्ल के केस में फंसा दिया था, ……और खुद बच निकला। ……। —- जय प्रकाश भाटिया

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  1. बेहतरीन लघुकथा,जय प्रकाश भाटिया जी।

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