शुक्रवार, 27 मार्च 2015

दीपक आचार्य का व्यंग्य - क्रिकेटिया राष्ट्रभक्तों को नमन

क्रिकेटिया राष्ट्रभक्तों को नमन ...

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

न छब्बीस जनवरी है, न पन्द्रह अगस्त। फिर भी जाने क्यों देशभक्ति का ज्वार उमड़ा हुआ रहा। हर तरफ वल्र्ड कप क्रिकेट मैच का बुखार छाया रहा। और छाये भी क्यों न, अपने भारत का सवाल जो था। दर्शकों का पूरा संसार ही उमड़ पड़ा।

क्रिकेट प्रेमियों के लिए मैच देखना उनकी सेहत के लिए भी जरूरी है और मन मस्तिष्क के लिए भी। इससे नई ताजगी और ऊर्जा प्राप्त होती है।

हर कोई चाह रहा था कि भारत की जीत हो। प्रत्येक भारतवासी की दिली तमन्ना भी यह होनी ही चाहिए, यह भी देशभक्ति का एक अंग है।

लेकिन क्रिकेट मैच देखने के शौकिनों में एक खेप ऎसी भी है जो अपने आपको उसी समय देशभक्त मानती है जबकि भारत का किसी से कोई क्रिकेट मैच चल रहा हो। इसके दो दिन पहले से लेकर दो दिन बाद तक यह बुखार हावी रहता है।

इन्हीं में काफी कुछ लोग ऎसे भी हैं जिनके लिए भारत की जीत की उम्मीद के साथ क्रिकेट मैच देखना ही राष्ट्रभक्ति है, इसके सिवा कोई काम ऎसा नहीं है जो इनके लिए देशभक्ति के दायरे में आए।

अपने कर्मस्थलों से अपनी या घर वालों की बीमारी, जरूरी काम और सैकड़ों बहाने बनाकर मैच देखने भर के लिए गायब रहना, दिन भर का काम-काज छोड़ कर मैच के प्रति दीवानगी का प्रकटीकरण करना, अपने दायित्वों के प्रति उपेक्षा का बर्ताव, अपने स्वजनों, कुटुम्बियों, सहकर्मियों, पड़ोसियों, क्षेत्रवासियों और संपर्कितों के किसी काम न आना, फाईलों के ढेर होने के बावजूद काम नहीं करना, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और निकम्मापन, अनुशासनहीनता, अनाचार आदि इनके लिए सामान्य हैं।

इनसे ये न तो राष्ट्रभक्ति का संबंध जोड़ना चाहते हैं, अपने व्यक्तित्व से।  उस राष्ट्रभक्ति का क्या अर्थ है जो सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट मैच में भारत को जिताने की उम्मीद तक सीमित पड़ी रहे। 

सुनने और देखने में कितना अजीब लगता है कि कोई इंसान अपनी ड्यूटी के प्रति बेपरवाह बना रहे, अपने निर्धारित काम तक पूरे न करे, टाईमपास करता रहे, किसी के काम न आए, कोई मानवीय संवेदनाएं न रखे, लेकिन पैसा और सभी प्रकार के भोग-विलास पाने को हर क्षण लपकता रहे, यह देशभक्ति है क्या।

क्रिकेटिया देश भक्ति का ज्वार देखकर लगता है कि हमारी देशभक्ति का प्रवाह जाने किस दिशा में मुड़ता जा रहा है। कितना अच्छा हो यदि हम अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार और निष्ठावान हों, वहाँ भी देशभक्ति की भावना को सामने रखें।

ऎसा हम कर पाएं तो मैच देखने का वास्तविक आनंद भी आएगा और शेष दिनों में हमारी देशभक्ति का ज़ज़्बा देश को नई ऊँचाइयों की ओर भी ले जाने वाला सिद्ध होगा ही। ( सभी क्रिकेट प्रेमी, सच्चे देश भक्तों से क्षमायाचना सहित)।

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1 blogger-facebook:

  1. डॉ. साहब,

    यह न तो देश भक्ति है न ही क्रिकेट भक्ति है.
    काम से भागने काएक जरिया मात्र है.
    देश भक्ति होताी तो क्रिकेट से ही चिपकी नहीं होती अन्य खेलों में ( कम से कम) भी होती. और क्रिकेट भक्ति होती तो क्रिकेट के साथ होती - भारतीय टीम के साथ नहीं.
    यदि अच्छा क्रिकेट खेला गया है तो प्रशंसा करती.
    हमारे लोगों ने तो भारतीय खिलाड़ियों में इतनी हवा फूँक दी कि गुब्बारे से गुबार ही निकल आया.

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