सोमवार, 16 मार्च 2015

विनिता राहुरीकर की कहानी - गांठ

गांठ

सुभाष ने जैसे ही चाय का कप टेबल पर रखा सामने से सुरभि ने गुनगुनाते हुए घर में प्रवेश किया।

'' आओ बेटा चाय पी लो।'' सुरभि की मां रंजना ने उसे आवाज दी।''

'' नहीं मां मैं अपनी सहेली पारूल के साथ चाय पीकर आयी हूं।'' सुरभि ने कहा और सीधे अपने कमरे मे चली गयी।

'' तुम्हें इसका व्यवहार कुछ अलग सा नहीं लग रहा?'' सुभाष ने रंजना से पूछा।

'' हां जब से ससुराल से आयी है तब से कुछ बदली बदली सी तो है। कुछ लापरवाह और मनमाना सा व्यवहार कर रही है''। रंजना ने जवाब दिया।

'' हां मैं भी देख रहा हूं सुरभि में आए इस बदलाव को। सब का ध्यान रखने वाली और कायदे से काम करने वाली हमारी बिटिया एकदम से स्वच्छन्द सी हो गयी है, जैसे अपने अलावा किसी दूसरे से कोई मतलब ही नहीं है उसे।'' सुभाष चिन्तित स्वर में बोले '' चार पांच दिनों से देख रहा हूं सौरभ से भी बात करती हुई नहीं दिखती वरना पहले जब भी आती थी तो दिनभर में सौरभ के चार पांच फोन आ जाते थे। आजकल में थोड़ा उसके मन की टोह लेनी पडेगी।''

सुरभि, सुभाष और रंजना की इकलौती बेटी थी। शहर में ही उसका ब्याह हुआ था। पति सौरभ के अलावा घर में सास भी थी। डेढ़ बरस हो गया उसके ब्याह को। सुरभि सबका मन रखकर चलने वाली थी, सबका ध्यान रखती। साल छः महीने सब ठीक रहा। पिछले कुछ महीनों से सुरभि उखड़ी हुई लगती। पर जीवन में उतार चढ़ाव आते ही रहते है यही सोचकर सुभाष और रंजना ने कभी व्यर्थ में उसे कुरेदना सही नहीं समझा। गृहस्थ जीवन में थोड़ी बहुत खटपट तो चलती ही रहती है।

लेकिन इस बार सुरभि का व्यवहार देखकर दोनों चिंतित हो गये। सुरभि पूरी तरह बदल गयीं न किसी काम को हाथ लगाती ना किसी की खोज खबर लेती बस मन मौजी की तरह घूमती रहती। उसका कमरा भी अस्त व्यस्थ पड़ा रहता है। पहले तो उसका काम एकदम साफ सुथरा और करीने से था मजाल है कि एक तिनका भी यहां से वहां हो जाये। कपड़े, किताबें, सब तरतीब से सजा रहता।

और अब गीला तौलिया पलंग पर पड़ा रहता है। किताबें कपडे सब बिखरे हुए हैं,चादर तक तह करके नहीं रखती यह सब उसकी मन की किसी अव्यक्त कहानी को व्यक्त कर रहा था। कुछ तो ऐसा हो रहा था जो उसके मनके विरूद्व था। और वही उसके उल्टे व्यवहार में द्वारा बाहर आ रहा था।

सुभाष देर तक सोच में डूबे सुरभि के व्यवहार का अवलोकन करते रहे। सबका ध्यान रखने वाली, करीने से काम करने वाली सफाई पसन्द उनकी बीटिया। सुरभि को कभी कुछ विशेष सिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। हर काम को करीने से करने का उसमें ईश्वर प्रदत्त गुण था। किसी भी काम को वह एक दम परफेक्ट तरीके से करती थी, काम में जरा भी इधर उधर या लापरवाही उससे बर्दाश्त नहीं होती थी। कई बार तो वह अपने मां के काम में भी कमियां ढूंढ लेती थी। तब रंजना हंस कर कहती '' हां गुरू गुड़ रह गया और चेला शक्कर हो गया।''

अब उसी सुरभि का काम के प्रति ऐसा लापरवाह रवैया? जरूर उसके मन को कोई फांस चुभ रही है।

दूसरे दिन शाम को सुभाष सुरभि को अपने साथ सैर पर ले गये। थोड़ी देर टहलने के बाद वो दोनों एक पार्क में जाकर बैंच पर बैठ गये। आस पास बहुत से लोग टहल रहे थे। पेड़ों पर पक्षी अपने अपने घरों में वापस आकर एक आनन्द पूर्ण कलरव कर रहे थे। उन पक्षियों का आनन्द देखकर सुभाष के कलेजे में टीस उठी। विवाह के बाद बेटियां अपनी गृहस्थी के नीड़ में ही अच्छी लगती है। यूं तो पिता का घर भी बेटियों का ही होता है, और सुरभि तो यूं भी उनकी इकलौती बेटी थी। उनके घर के द्वार हमेशा उसके लिए खुले हैं। लेकिन बेटियों के जीवन का सुख, सच्चा सन्तोष और आनन्द उनके अपने घरों में ही होता है। अपने घोंसलों से भटकने पर वे हैरान परेशान व घबराई हुई हो जाती है।

सुरभि के चेहरे पर भी उसके अंतर्मन कि वो अपने घोंसले से दूर होने की बैचेनी और पीड़ा छटपटाहट साफ दिखाई दे रही थी। चाहे वह कितना भी लापरवाही और बेपरवाही दिखाने की चेष्टा करे पर सुभाष की पारखी नजरों ने भांप ही लिया।

थोड़ी देर इधर उधर की बातें करके सुभाष मूल बात पर आ गये और सुरभि भी अपना मन हल्का करना चाहती थी। उसकी मन की परतें सुभाष के सामने खुलने लगी।

कोई एक धण्टा तक सुरभि बोलती रही। शाम का धुंध अब गहराने लगा था। बात खत्म करके सुरभि चुप हुई तो वे दोनों घर लौट आए।

रात को खाना खाने के बाद सुभाष और रंजना छत पर जाकर टहलने लगे। दोनों के बीच सुरभि को लेकर बात होने लगी। रंजना ने बताया कि जब सुभाष और सुरभि घूमने गये थे तब सौरभ का फोन आया था। विनती कर रहा था कि हम सुरभि को समझाएँ, घर की छोटी छोटी बातों को तूल देकर अपने जीवन में व्यर्थ तनाव ना भरने दें।

तब सुभाष ने बताया कि सुरभि किस बात से परेशान है। दरअसल परेशानी सुरभि और उसके सास के बीच में है। सुरभि को अपने आप पर बहुत ज्यादा भरोसा है कि वह हर काम को बहुत ज्यादा अच्छे ढंग से करती है। और हर काम में परफेक्ट है। सुरभि का अपने आप पर यह भरोसा गलत भी नहीं है। पर उसके काम के तरीके में हस्तक्षेप करके उसकी सास ने सुरभि के मन में लगातार खीज पैदा कर के अब उसके भरोसे को अहंकार में बदल दिया है। उसकी सास अब तक हर काम अपने तरीके से करती आयी थी, वो चाहती है कि सुरभि घर गृहस्थी का काम उनके तरीके से करे। घर में सब उसी तरीके से चलता रहे जैसा अब तक चलता आया है। लेकिन सुरभि अपनी गृहस्थी को अपने तरीके से चलाना चाहती है।

गलती किसी की भी नहीं है पर फिर भी आपसी सामन्जस्य धैर्य की कमी रिश्तों में खिंचाव पैदा करती जा रही है। मामूली सी बात पर अपने अहंकार के कारण दोनों अपने घर और रिश्तों के बीच खुद ही दरार उत्पन्न कर रहे हैं। ये दरार अगर बहुत ज्यादा बढ़ गयी तो भरना मुश्किल हो जाएगा। इसके पहले कुछ तो उपाय करना होगा।

दूसरे दिन नाश्ता करने के बाद सुभाष कुछ बात करने के इरादे से सुरभि के कमरे में गए तो देखा सुरभि अपने लम्बे घने बालों को सुलझाते हुए बुरी तरह झल्ला रही है।

''क्या हुआ बेटा क्यों इतना चिड़चिड़ा रही हो?'' सुभाष ने प्यार से पूछा।

उसके लम्बे बालों में जगह जगह गांठे पडी हुई थी। बाल बुरी तरह उलझ गए थे। ऐसा लग रहा था कि उसने बहुत दिनों से बालों की ठीक से देखभाल नहीं की है।

'' देखिए ना पापा बाल इतने उलझ गए है कि सुलझ ही नहीं रहे है। अब ये गांठें काटनी ही पड़ेंगीं और कोई चारा नहीं है।'' सुरभि उठी और दराज से कैंची निकालकर बालों की गांठें काटने लगी। सुभाष समझ रहे थे कि वह अपनी अन्तर बैचेनी की भडास अपने बालों पर निकाल रही है।

'' कोई भी उलझन ऐसी नहीं होती बेटा कि उसे सुलझाया ना जा सके। हर समस्या का समाधान होता है। अगर समय रहते ही उलझन को सुलझा लिया जाय तो गांठें बनने ही नहीं पाती। अगर ऐसी ही गांठें काटती रही तो एक दिन बाल ही नहीं बचेगें। धैर्य से हर गांठ सुलझ जाती है। सुभाष ने कंघा हाथ में लिया और धीरे धीरे सुरभि के बाल सुलझाने लगे।

'' बेटा उलझन चाहे रिश्तों में हो चाहे बालों में उन्हें समय से और धैर्य से सुलझाना चाहिए नहीं तो गांठें बन जाती है। यदि सुलझाने की बजाय काटने की प्रवृति रखी तो बालों की तरह की रिश्ते भी एक दिन खत्म हो जाएगें। काटना किसी गांठ से छुटकारा पाने का तरीका नहीं है। नुकसान अपना ही होता है।'' सुभाष ने कहा तो सुरभि चौंक गयी।

'' मैं जानता हूं मेरी बेटी हर क्षेत्र में हर काम में परफेक्शनिस्ट है। लेकिन एक बार सौरभ के मां के बारे में भी तो सोचो वो तीस सालों से अपने घर को अपने तरीके से चलाती आ रही है अब एक दम से तुम उनके सारे तरीकों को नकार कर हर काम अपने तरीके से करना चाहोगी तो उन्हें कैसा लगेगा। घर और रिश्ते आपसी सामन्जस्य और सम्मान से मजबूत होते है और जिन्दगी भर खुशहाल रहते है।'' सुभाष ने समझाया।

'' लेकिन पापा उन्हें भी तो मेरी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए ना।''

सुरभि बोली।

'' अगर सम्मान पाना है तो पहले सम्मान देना सीखो। माना तुम्हें लगता है कि तुम्हारे काम करने का तरीका ज्यादा सही है लेकिन एक बार अगर उनका मन रखने के लिए उनके बताए अनुसार काम कर लोगी तो छोटी नहीं हो जाओगी। हो सकता है कि तुम्हें लगे सचमुच उनका तरीका ज्यादा अच्छा है और सच में ही अगर तुम ज्यादा अच्छा काम करती हो तब भी इस बात का एहसास उन्हें उनकी भावनाओं को ठेस ना लगे इस बात का ध्यान रखते हुए धैर्य से करवाओ। एक दिन तो उन्हें समझ आ ही जाएगा। लेकिन इस तरह यदि जल्दी बाजी में अपने अहंकार को सर्वोपरि रखकर धीरज खोती रहोगी तो जीवन में बहुत कुछ खो जाएगा।'' सुभाष ने सुरभि के सारे बाल सुलझा लिए थे और उसे पता भी नहीं चला।

'' ये देखो बेटा धैर्य से सुलझाने पर सारी गांठे भी सुलझ गयी और दर्द भी नहीं हुआ।'' कहते हुए सुभाष ने सुरभि के बाल गूंथ कर चोटी बना दी और अपने कमरे में चले गये।

शाम को सौरभ और उसकी मां सुभाष और रंजना के घर आयी। सुभाष थोड़ा शंकित हो गये। तभी सुरभि ड्राइंग रूम में आयी । उसने आते ही अपने सास के पैर छुए तो उन्होनें उसका माथा चूमकर गले से लगा लिया। सौरभ भी खुश दिखाई दे रहा था। सुभाष थोड़ा निश्चिन्त हुए। तब बातों ही बातों में पता चला कि सुरभि ने ही दोपहर को फोन करके उन लोगों को खाना खाने बुलाया था। खाना खाने के बाद सुरभि इन लोगों के साथ घर वापिस जा रही थी।

'' माँ मैं अपने हाथ से पापा को बेसन गट्टे की सब्जी बनाकर खिलाना चाहती हूं। लेकिन मुझसे आपके हाथों जैसा स्वाद नहीं आता चलिए ना मुझे बता दीजिए कैसे बनाऊँ।'' सुरभि अपनी सास से बोली।

'' अरे बेटा तुम भी तो अच्छी ही बनाती हो। चलो दोनों मिलकर बनाते हैं।'' सास प्रसन्न होकर बोली और खुश होकर सुरभि के साथ रसोई घर में चली गयी।

रंजना ने सुभाष की ओर देखा और दोनों मुस्कुरा दिए। दोनों सौरभ से बातें करने लगे। रात का खाना सब लोगों ने साथ बैठकर आनन्द से हंसते हंसते खाया। रात जब सुरभि घर जाने लगी तो धीरे से सुभाष के सीने में सिर रखकर बोली '' थैंक्स पापा आपने जो जीवन मन्त्र मुझे दिया है उसे में हमेशा याद रखूंगी। अब मैं कभी भी अपने रिश्तों में गठानें नहीं पड़ने दूंगी।'' सुभाष ने उसके सिर पर हाथ फेर कर उसे भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी। अब उनकी बेटी समय रहते ही उलझनें सुलझाने का महत्व समझ गयी थी।

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