बुधवार, 18 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - मदद उनकी करें जो परोपकारी हों

मदद उनकी करें

जो परोपकारी हों

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

सेवा और परोपकार इंसान का फर्ज है और यह हर इंसान को अपने सम्पूर्ण जीवन के लिए मूल मंत्र के रूप में आत्मसात कर अपनाना चाहिए।

लेकिन सेवा, परोपकार और सहयोग के लिए सबसे पहले पात्रता का परीक्षण कर लिया जाना चाहिए। क्योंकि अपात्रों को सहयोग करना किसी अपराध से कम नहीं है। 

समाज में दो प्रकार के लोग होते हैं जिन्हें हमारी मदद की आवश्यकता होती है। एक प्रजाति उन लोगों की है जो शातिर और चतुर हैं तथा किसी भी इंसान का अपने स्वार्थ या काम के लिए किस प्रकार उपयोग करना उन्हें अच्छी तरह आता है।

ये लोग सिद्धान्तों, आदर्शों और समाज सेवा की सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें ही करते हैं, बड़े-बड़े और प्रतिष्ठित देशी-विदेशी संगठनों से अपने आपको जोड़ देते हैं और फिर आए दिन किसी न किसी प्रवृत्ति के माध्यम से प्रचार पाने की दौड़ में जुट जाते हैं।

इस किस्म के लोग आडम्बरी समाजसेवी होते हैं जिनका समाज की सेवा, जरूरतमन्दों की मदद या देश भक्ति से कुछ भी लेना-देना नहीं होता बल्कि इन लोगों को अपने नाम, तस्वीरों, लोकप्रियता पाने और अपने आपको सर्वश्रेष्ठ एवं प्रतिष्ठित मानने-मनवाने का फोबिया सर चढ़ा होता है अथवा अपने किसी धंधे की बरकत के लिए प्रचार और दूसरे लोगों की जरूरत पड़ती है ताकि अच्छा नेटवर्क किसी न किसी बहाने स्थापित हो जाए और संपर्कों का लाभ अपने वैयक्तिक कामों और धंधों के लिए सुविधा बना रहे। ऎसे लोग हर जगह घुसपैठ कर लिया करते हैं।

ऎसे ही लोगों में कई सारे होते हैं जो आपराधिक पृष्ठभूमि वाले, भ्रष्ट, बेईमान या नालायकी से भरे होते हैं और उन्हें लगता है कि सेवा के नाम पर कोई सुनहरी चादर ओढ़ ली जाए तो इससे बढ़िया और बेहतर आवरण और कुछ हो ही नहीं सकता।

इस किस्म के लोग चाहे कितने समृद्धिशाली हों, गरीबों, जरूरतमन्दों और समाज के लिए एक धेला तक निकालने की उदारता इनमें नहीं होती।

यह अलग बात है कि समाजसेवा, धर्म और परोपकार के नाम पर दूसरे लोगों से लाखों का चंदा निकलवा लेने में इनसे बड़ा माहिर और कोई नहीं हो सकता। फिर जहाँ चंदा उगाही की बात आती है ऎसे दो-चार-दस लोगों का समूह बनकर निकल पड़ता है और सामने वालों पर दबाव डालकर अपने सोचे हुए कामों में सफलता पा लेता है। 

इस किस्म में कई बड़े-बड़े ओहदे वाले, धनाढ्य और प्रभावशाली होते हैं लेकिन उदारता नाम की कोई चीज इनमें कभी देखने को नहीं मिलती। 

इनमें से खूब सारे लोग हमारे  देखने में आते हैं जो समाज और राष्ट्र निर्माण, राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाने की बड़ी-बड़ी डींगे हाँकते हैं लेकिन व्यक्तिगत जीवन में लूट-खसोट और शोषण के सिवा कुछ देखने को नहीं मिलता।

अपने-अपने धंधों और तथाकथित समाजसेवी नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए ये लोग अपने स्वार्थ पूरे करते रहते हैं और कई बार तो जिन संगठनों या संस्थाओं से जुड़े होते हैं उनके लोगों की चापलुसी, स्नेहिल आतिथ्य और समर्पण के माध्यम से अपनी समृद्धि की रफ्तार को कई गुना करने के लिए सारे वाजिब-गैर वाजिब हथकण्डे अपनाते रहते हैं।

समाजसेवा और परोपकार इन लोगों के लिए आत्मिक आवश्यकता और सामाजिक सरोकारों का निर्वहन नहीं है बल्कि यह या तो मैनेजमेंट फण्डा है अथवा मनोरंजन या फिर लोकेषणा का कोई स्वरूप।

दूसरी किस्म में वे लोग आते हैं जिनके जीवन का ध्येय निष्काम सेवा और परोपकार है और वे इसमें अपना पैसा भी लगाते हैं, समय और श्रम भी। संवेदनशील इतने होते हैं कि पूरी उदारता के साथ जरूरतमन्दों के काम आते हैं और अपने भविष्य की भी परवाह नहीं करते हैं। न इन्हें लोकप्रियता या स्वयं को मनवाने-पूजवाने की भूख होती है, न कोई स्वार्थ।

इन स्थितियों में सेवा,परोपकार और मदद में किन लोगों को अपना साथ दिया जाए, इस विषय पर गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है। जो लोग नाम, तस्वीरों, पैसों, लोकप्रियता आदि की भूख को पूरा करने, अपने धंधेबाजी नेटवर्क को मजबूत करने में लगे हुए हैं उन धंधेबाजों की सेवा अपने आप में सामाजिक अपराध है क्योंकि इनकी सेवा और परोपकार स्वार्थ से घिरी हुई होती है।  इससे समाज या देश का कोई भला नहीं होने वाला बल्कि नालायक और कमीन लोगों को प्रश्रय ही मिलेगा और बाद में जाकर ये रक्तबीज ही देश का नुकसान करते हैं।

अपना पैसा, श्रम और समय उन लोगों के लिए समर्पित करना चाहिए जो लोग दूसरों की सेवा निष्काम भाव से करते हैं और जिनमें उनका कोई सा स्वार्थ नहीं होता। सहयोग उन्हें दें जो दूसरों को सेवा व परोपकार भाव से सहयोग देते हैं, निःस्पृह कार्य करते हैं और अपेक्षामुक्त जीवन जीते हैं। तभी हम सेवा और परोपकार के माध्यम से समाज और देश को आगे बढ़ा सकते हैं। इस दृष्टि से आज चतुर धंधेबाजों की नहीं बल्कि निष्काम सेवाव्रतियों की जरूरत है।

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