सोमवार, 30 मार्च 2015

पाठकीय : रामजी मिश्र 'मित्र' - कान्हा की मुरली की दर्द भरी आवाज

सुबह सुबह मेले की ओर चल दिया। शिलापुर गाँव के मेले में बाइक खड़ी की और मेले का लुत्फ़ लेने लगा। मुझे शोर शराबे के बीच बांसुरी की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ रही थी और मैं उसी ओर खिंचा चला जा रहा था। अचानक वह ध्वनि बंद हो गयी मुझे बड़ा खराब लगा। अब उस कलाकार को ढूँढू तो कैसे। आखिर उसने बजाना बंद क्यों कर दिया अब तो न ढूंढ पाउँगा।

एक बूढ़ा सा आदमी अचानक मेरे आगे लपककर आ गया मुस्कराकर मेरी राह सी रोकने लगा। मैंने उसकी वेश भूसा देखी गरीब था पर वह क्या चाहता है मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। मैं बड़ा असहज सा था इस विचित्र स्थिति के कारण। उसने मेरी ओर देख के कहा पहचान पाये तो मैंने न में सिर हिला दिया। वह हंस पड़ा, बोला आप इधर आइये मैं सोच रहा था ये कोई अराजक व्यक्ति है मेरा अनुमान और अधिक बलवान हो रहा था। मैंने भी सोच लिया था इसे आज सही रास्ता दिखा ही दूंगा।

वह बांसुरी की दूकान पे ले जाकर रुक गया। वह बोला आपने पिछले साल मेरी बहुत सी बांसुरी खरीद ली थीं ये मेरी दुकान है। आपको देखा तो पहचान गया। मुझे भी घटना याद आ गयी यह सत्तर साल का सीतापुर के कजियारे में रहने वाला वहीँ इकबाल है। मुझे उससे मिल के काफी खुशी हुई। मैंने उससे उसकी कुशल पूछी तो बोला पहले सांस की दिक्कत थी सो आपको मुरली की तान न सुना पाया था पर अबकी बजाऊंगा। और अब तो मेरे प्रोग्राम टीवी पे भी आते हैं।

इकबाल आज भी बहुत मेहनत करता है दिन रात जुटा रहता है कर्तव्यनिष्ठा से लेकिन उसकी एक बांसुरी की कीमत महज 3 से 4 रुपये ही होती है। टीवी पे आने का उसका अपना हुनर था पर उससे उसका पेट तो नहीं भर सकता था। उसने बांसुरी उठाई और फिर शुरू किया बजाना। उसकी बांसुरी का दर्द स्पष्ट समझ आ रहा था। बांसुरी की ध्वनि काफी मधुर थी पर उपेक्षा का दर्द हर सांस में था। चारों तरफ बांसुरी की मधुरता फ़ैल रही थी और उसकी आवाज सवाल खड़े कर रही थी जो अनगिनत थे।

न मालूम कितने धंधे और उद्योग लुप्त हो गए अब उस एकलौती आवाज की बारी है। मैंने जेब से 40 रुपये निकाले और जबरदस्ती देकर दो बांसुरी खरीद लीं। वह अब ऐसा न करूँगा कह कर 20 रुपये वापस करने लगा। मैंने उसे बहुत समझाया पर उसने दो अच्छी कीमत की बांसुरी मुझे महज बीस में दे दी। और मेरे द्वारा चुनी बांसुरी मेरे हाथ से रखा लीं।

तभी एक महोदय वहां कार से उतरे और दो रुपये की बांसुरी पे भी काफी महंगी बता कर पैसे कम करने को बहस पे उतर आये। उनका बच्चा बांसुरी की जिद पकड़ चुका था। आखिर बांसुरी मन की कीमत पर एक बड़े आदमी ने खरीद ली थी हमेशा के लिए। लोग उसकी बांसुरी तो खरीद रहे थे लेकिन उस उपेक्षा के दर्द की उनको भनक तक न थी। न मालूम कितनी योजनाएं और सरकारें आई और चली गयीं पर इन हुनरमंद श्रमिकों के धंधे तब भी इतिहास बन रहे थे और अब भी।

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