मंगलवार, 17 मार्च 2015

वीरेन्द्र सरल का व्यंग्य - भला करने वाले

व्यंग्य
भला करने वाले


वीरेन्द्र सरल
साधो सावधान रहो! जमाना बड़ा खराब है। हर मोड़ पर भला करने वाले खड़े हैं। कौन कब किसका भला कर दे कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसा ही कुछ सोचता हुआ मैं चाय की चुस्कियों के साथ घर के आँगन पर अखबार पढ़ते हुये बैठा था। तभी डाकिया मेरे हाथों में एक लिफाफा थमाकर चला गया। लिफाफा खोलकर पत्र पढ़ा तो दिमाग घूम गया। पत्र में लिखा था कि आपने शिक्षा, साहित्य, कला, संस्कृति, खेल, वकालत, स्वास्थ्य, बीमा, नशाबंदी, कृषि, उद्यानिकी, वन्यजीव संरक्षण, बाल कल्याण इत्यादि के अतिरिक्त, जो हम भी नहीं जानते, उन क्षेत्रों में भी  प्रभावोत्पादक और उत्कृष्ट कार्य किया है। इसलिये हम आपको एक सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित करना चाहते हैं।

वैसे तो हमारे गोदाम में एक से बढ़कर एक सर्वोच्च सम्मान रखे हुए हैं, दूसरे अर्थ में कहें तो हमारे सभी सम्मान सर्वोच्च ही है। जिसे हम गरिमामय समारोह आयोजित करके देते हैं। यदि आप किसी भी कारण से समारोह में सम्मान ग्रहण करने के लिए नहीं आ पाते हैं तो अपने दुधमुँहे बच्चे से लेकर घरेलू नौकर तक को सम्मान ग्रहण करने के लिये भेज सकते हैं। हम उन्हें ही आपका प्रतिनिधि समझकर सम्मान पत्र थमाने का पुरूषार्थ करते हैं। यदि आप प्रतिनिधि भी नहीं भेज सकते तो हम डाक से सम्मान पत्र आप के घर तक भी पहुँचा सकते हैं क्योंकि हमारे पास घर पहुँच सम्मान सेवा सुविधा भी उपलब्ध है। साथ-ही-साथ हम आपके सम्मान की खबर को अखबारों में अपने ढंग से छपवाने का पुण्य कार्य भी करते हैं। जिसमें बड़े-बड़े शहरों में आयोजित बड़े साहित्यक समारोह का उल्लेख हम अपने ढंग से करते हैं। कृपया एक बार सेवा का अवसर प्रदान करें। बस हम तो आपका भला करना चाहते हैं।


        मैं आसमान की ओर हाथ जोड़कर बुदबुदाया-''हे भगवान! आखिर मुझसे ऐसी क्या गलती हो गई, अंजाने में ऐसा कौन सा अपराध हो गया प्रभु! जो ये लोग मेरा सम्मान करने पर तुले हैं। पत्र में उल्लेखित किसी भी क्षेत्र से मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इस संस्था से ऐसे पत्र मुझे पहले भी कई बार मिल चुके हैं। इन भला करने वालों से मुझे बचा लो प्रभु! अब मैं आपकी शरण में हूँ।


        पत्र पढ़कर मैं बहुत टेंशन में आ गया था, मैं सोच रहा था, क्या ये लोग त्रिकालदर्शी हैं? अरे, पत्र में उल्लेखित क्षेत्रों में मैंने कब उत्कृष्ट कार्य किया ये तो मुझे भी पता नहीं है, फिर इन्हें कैसे पता चल गया? ये लोग क्या गर्भ से ही उदारता का ठेका लेकर पैदा हुए हैं? जो काम मैंने किया ही नहीं है उसके लिये मुझे सम्मानित करने के लिये ये लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हैं? क्यों ये मुझे सम्मानित करने के लिये मरे जा रहे हैं।


        दूसरे दिन मैं पत्र पर लिखे पते पर पहुँच गया। वह एक छोटा-सा कमरा था, जिसके बाहर एक साइनबोर्ड लगा था। जिसमें लिखा था, 'कार्यालय अनन्त आकाश, संचयी साहित्य अकादमी, अध्यक्ष-भलाईदास।' वहाँ एक आदमी  कम्प्यूटर पर सम्मान पत्र टाइप करते हुए मुझे मिला। मैंने उनका अभिवादन करते हुये उससे पूछा-''मै श्री भलाईदास जी से मिलना चाहता हूँ।'' उसने मुस्कराते हुये कहा-''जीं, मैं ही भलाईदास हूँ। कहिये, आपकी क्या भलाई करूँ।'' मैंने उन्हें उनका भेजा हुआ पत्र दिखलाया। इस बार उसने गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए बैठने का निवेदन किया। मैं चुपचाप बैठ गया। फिर उसने कहा-''लाइये, जल्दी कीजिये।'' मुझे कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने पूछा-''मैं आपका मतलब नहीं समझ पाया श्रीमान जी?'' उसने दाँत निपोरते हुये कहा-''कोई बात नहीं, कुछ देर बाद समझ जायेंगे और सुनाइये कैसे हैं आप?''

मैंने सकुचाते हुये कहा-'बाकी सब तो ठीक है पर मन में एक जिज्ञासा जरूर है। आपके कार्यालय का नाम अनन्त आकाश है परन्तु यहाँ से आकाश तो दूर उसका कोई कोना भी दिखाई नहीं दे रहा है। दरवाजे के सिवाय यहाँ खिडकी व रोशनदान तक नहीं है।'' वह खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोचते हुये मुस्करा कर रह गया। मैंने आगे पूछा-''आप अपनी अकादमी की गतिविधियों के बारे में भी तो कुछ बताइये। जैसे पुस्तक लेखन, समीक्षा, प्रकाशन या किसी गंभीर विषयों पर कोई संगोष्ठी या कार्यशाला का आयोजन वगैरह होता है कि नहीं ?'' उसने निर्लज्जता पूर्वक कहा-''महाशय! हम इन झंझटों में नहीं पड़ते। हम तो विशुद्ध रूप से केवल साहित्य सेवा ही करते हैं।

जैसे शासन की मंशा है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति को मिले वैसे ही हमारी भी मंशा है कि सम्मान का लाभ अंतिम व्यक्ति को मिले। जिनका कोई सम्मान नहीं करता उनका सम्मान हम करते है। चाहे सम्मान पाने वाला इसके योग्य हो, चाहे मत हो। इससे हमें कोई लेना-देना नहीं होता। अब आप ही बताइये इससे बड़ी साहित्य सेवा और क्या हो सकती है? हम तो एक हाथ ले और एक हाथ दे के सिद्धांत पर साहित्य सेवा का धंधा करते हैं यदि पशु-पक्षी भी हमें पैसा दे तो हम उनका भी सम्मान कर सकते हैं। तभी तो लोग गाते है कि जिसका कोई नहीं उसका भलाईदास तो है यारों। अब और ज्यादा मेरा दिमाग मत खाइये, जल्दी लाइये।'' यह कहते हुये उसने किसी प्रशिक्षित भिखारी की तरह अपना हाथ मेरे सामने फैला दिया।


            इसके बाद भी मैंने मासूमियत से पूछा-''श्रीमान! मैं अब भी कुछ नहीं समझ पा रहा हूँ आखिर आप मुझसे क्या माँग रहे हैं?'' वह तुरन्त गिरगिट की तरह रंग बदलते हुये कहा-''अरे हम तो आपको पढ़ा-लिखा आदमी समझते थे। पत्र में साफ-साफ लिखा है, सम्मान पाने के लिये हजार रूपये जमा करना पड़ेगा। हजार नहीं तो पाँच सौ ही दे दीजिये। इतना भी नहीं है तो कम-से-कम तीन सौ रूपये तो दे रे बाबा! सम्मानित होने के लिये। हमारे पास राशि के हिसाब से अलग-अलग सम्मान पत्र टाइप किये हुये पड़े हैं। जो जैसा देगा उसे वैसा मिलेगा, अब समझा कुछ?'' मैंने बचकानी अंदाज में पूछा-''फोकट में देने के लिये कोई सम्मान पत्र नहीं है क्या आपके पास?'' वह बौखला गया, दाँत किटकिटाते हुये बोला-''निकल जा यहाँ से, दूर हो जा मेरी नजरों से। जब जेब में फूटी कौड़ी नहीं है तो क्या करेगा सम्मानित होकर? मैंने तुझे क्या समझा था और तू क्या निकला? अरे! बुराई लाल, जमाने भर की बुराई है तेरे भीतर। मैं तेरा भला करने चला था, पर तूने मेरा ही बुरा करके छोड़ा। दफा हो जा मेरी निगाहों के सामने से वरना मैं पागल हो जाऊँगा।'' फिर वह छत की ओर देखते हुये चीखा-''हे भगवान! मुझे बचा, इस बुराई लाल से नहीं तो मैं इसका गला दबा दूँगा।'' उसकी हालत देख मैं डर के मारे वहाँ से चुपचाप खिसक गया ।


        मैं वहाँ से घर वापस आ ही रहा था कि रास्ते में पड़ोस वाले भाई साहब भाभी जी के साथ कहीं जाते हुये मिल गये। उनकी रोनी सूरत देखकर मैंने पूछा-''क्या बात है आप लोग अभी कहाँ जा रहे हैं?'' उन्होंने बताया, भला करने वाले के विरूद्ध थाने में रिपोर्ट लिखवाने जा रहे हैं। मुझे बात समझ में नहीं आई। मैंने कहा-''पहेलियाँ मत बुझाओ, साफ-साफ बताओ, आखिर बात क्या है? भाई साहब ने भाभी जी की ओर देखा। भाभी सिसकते हुये बताने लगी-''क्या बताऊँ, आज सुबह-सुबह कुछ अंजान लोग घर पर आये। ये उस समय घर पर थे नहीं। मैं रसोई में काम कर रही थी। उनकी आवाज सुनकर मैं बाहर आई। उन्होंने मुझसे कहा कि हम महिलाओं के भला करने वालों में से हैं। हाथों से जेवर साफ करते हैं। किसी भी प्रकार का केमिकल उपयोग में नहीं लाते। पहले मैं उन्हें मना करती रही पर वे भला करने की जिद पर अड़े रहे। अन्ततः मैं उनके झाँसे में आ गई और अपना भला कराने के लिये तैयार हो गई। अपने सारे जेवर साफ करने के लिये उनके हाथों में दे गई और फिर से रसोई में काम करने पर जुट गई। जब तक बाहर आई तब तक वे नेताओं के दिल से ईमान की तरह गायब हो चुके थे। अब मुझे पता चला कि वे हाथ से जेवर साफ करने वाले नहीं बल्कि जेवर पर हाथ साफ करने वाले थे।'' इतना बताकर भाभी जी रोने लगी। मैंने उन्हें सांत्वना दी। कुछ समय तक बातचीत करने के बाद वे आगे बढ़ गये और मैं भी अपने रास्ते पर आगे बढ़ गया।


    मैं भी इन भला करने वालों को कोसते हुये थके-हारे कदमों से घर वापस आ गया था। दिमाग एकदम बोझिल हो गया था। मैंने रिलेक्स होने के लिये टी वी ऑन किया। उसमें भी भला करने वाले कई विज्ञापन दिखाये जा रहे थे। मैंने चैनल बदल कर समाचार सुनना शुरू किया। उसमें समाचार आ रहा था कि चुनावी बिगुल बज चुका है। सभी राजनैतिक दल आपका भला करने के लिये कमर कस चुके हैं। अब आप भी अपना भला कराने के लिये तैयार हो जाइये। मैं माथे पर छलक आये पसीने को पोंछते हुये सोचने लगा-''बाप-रे-बाप! अब तो खैर नहीं। ये लोग हमारा भला करके ही दम लेंगे।


वीरेन्द्र 'सरल'
बोड़रा (मगरलोड़)
जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)
saralvirendra@rediffmail.com

1 blogger-facebook:

  1. बढ़िया व्यंग्य वीरेन्द्र जी..कौन कहता है कि भलाई का ज़माना नहीं रहा ..प्रमोद यादव

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