हर्षद दवे का आलेख - वर्तन परिवर्तन - खुशी या तनाव

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

वर्तन परिवर्तन -

हर्षद दवे.

ख़ुशी या तनाव?

‘आप के पास केवल पांच-दस मिनट बैठते हैं तो ‘बैटरी चार्ज’ हो जाती है!’ नरेश शाह और मेरे अन्य मित्र मुझ से कहते हैं,’आप के चेहरे पर हमने कभी टेंशन नहीं देखा. क्या राज है इस का?’

वह मोटिवेशनल स्टोरी मैं हमेशा याद रखता हूँ जिसे आप भी पढ़ना पसंद करेंगे.

एक मजदूर हमेशा काम करने जाता था. काम के वक्त उस का बोस उस पर चिल्लाता रहता था. अन्य मजदूर अपना काम उस पर थोप दिया करते थे. कभी चूक के कारण उसे डांट पड़ती थी तो कभी निर्धारित समय में कार्य पूरा करने का टेंशन उसे रहता था. रात को वह अपने एक मित्र के साथ रोज घर जाता था. उस का मित्र देखता कि घर में प्रवेश करने से पहले वह मजदूर आँगन में लगे वृक्ष के पास पल दो पल के लिए खड़ा रहता था.

एक दिन वह मित्र उस के साथ उस के घर के अंदर गया. अंदर जाते ही उसने देखा कि वह बिलकुल आराम से, बेफिक्र हो कर बच्चों के साथ खेलता था. पत्नी के साथ हंसकर बातें करता था. माता-पिता के पास इत्मीनान से बैठ कर उन की बातें भी वह गौर से सुनता था.

मित्र को बड़ा आश्चर्य हुआ. दूसरे दिन उसने अपने दोस्त से पूछा कि ‘काम करने में इतना टेंशन होते हुए भी तू घर में इतना सरल-सहज कैसे रह सकता है?’

मजदूर ने कहा: ‘घर में प्रवेश करने से पहले मैं अपने टेंशन, परेशानी, अपमान, निराशा ई. की गठरी घर के आँगन में लगे पेड़ पर टांग देता हूँ. यह तो रोज की बात है. इस में मेरे परिवार का क्या कसूर? जो मैं झेलता हूँ उसे वे क्यों भुगते?’

यही है खुश रहने का अचूक फार्मूला. अपने टेंशन, परेशानी ई. टांगने की एक खूँटी ढूंढ लो और टांग दो उसे वहां, फिर रहो तनाव मुक्त!

मैंने देखा है, दफ्तर से घर आ कर आदमी बच्चों पर या अपनी पत्नी पर चिल्लाता है. माता-पिता की ओर देखता तक नहीं. यह स्वस्थता नहीं है. माना कि आपने बाहर काफी काम किया है, टारगेट पूरा करने का प्रेशर भी झेला है. किन्तु उस में आप के बच्चों का या पत्नी का या फिर आप के माता-पिता का क्या कसूर? आप अपने परिवार के लिए ही काम करते हैं और आप के परिवार के प्रियजन ही बनते है आप के क्रोध का निशाना! बेहतर यही होगा कि आप अपने टेंशन को घर के प्रवेशद्वार के पास रखे पायदान पर छोड़ कर ही घर में प्रवेश करें. फिर देखना, आप को प्रसन्न प्रियजनों का प्यार भरा साथ मिलेगा. तब प्रवेशद्वार पर ‘स्वीट होम’ लिखने की जरुरत नहीं रहेगी. आजमा के देखिए एकबार!

=======================================================

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "हर्षद दवे का आलेख - वर्तन परिवर्तन - खुशी या तनाव"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.