शनिवार, 21 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - उत्सवी निष्ठा ही काफी नहीं सच्ची भारतीयता जरूरी

उत्सवी निष्ठा ही काफी नहीं

सच्ची भारतीयता जरूरी

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

भारतीय संस्कृति और पुरातन परंपराओं की बात हम सभी लोग साल भर कहते रहते हैं।

साल में एक बार चैत्र नव वर्ष के मौके पर हमारे भीतर नव वर्ष मनाने का ज्वार भी इस कदर उमड़ पड़ता है कि कुछ वर्णन नहीं किया जा सकता।

हर तरफ भारतीय नव वर्ष की बधाई और शुभकामनाओं भरे प्रत्यक्ष, कागजी, टेलीफोनिक और ई मैसेजों का अंबार लग जाता है। नव वर्ष के नाम पर धूम भी खूब मचती है।

एक-दो दिन तक तो यही लगता है कि जैसे भारतवर्ष का पुनरुत्थान हो गया है और अब सभी के सभी लोग भारतीय संस्कारों, संस्कृति और परंपराओं में रच बस गए हैं।

हर साल  इन दिनों में यही जश्न का माहौल सर्वत्र पसरा रहता है। 

हममें उत्साह और उल्लास जितनी जल्दी परवान चढ़ता है उतनी ही जल्दी उतर भी जाता है।

इन दो-चार-दस दिनों में हमारे भीतर भारतीयता का ऎसा ज्वार हिलोरें लेता प्रतीत होता है कि हम सभी आत्ममुग्ध होकर जीने लगते हैं और मानते हैं कि अब भारत जग गया है।

लेकिन नववर्ष की धूम थमने के बाद हम फिर लौट पड़ते हैं अपने पुराने ढर्रे पर।

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दो-चार दिन हम भारतीय नव वर्ष, हमारी परंपराओं और विलक्षणताओं, महापुरुषों आदि का महिमागान करते हैं, भारतीय संस्कृति को जीवन भर के लिए आत्मसात करने की बातें करते हैं, खूब सारे आयोजन करते हैं, परिवेश को सजा-सँवार देते हैं और इतना सब कुछ कर दिया करते हैं कि सब कुछ नए वर्ष के अभिनंदन में रमने लगता है।

लेकिन थोड़े दिन बाद फिर जैसे थे। 

भारतीय संस्कारों, संस्कृति और परंपराओं के नाम पर हमारी निष्ठाएं अब सिर्फ उत्सवधर्मिता तक सीमित होकर रह गई हैं जहां हम कभी खुद के प्रचार और प्रशस्ति के लिए, और कभी दूसरों को दिखाने भर के लिए भारतीयता की बातें करते हैं, बड़ी-बड़ी डींगे हांकते हैं, आयोजन करते हैं और दो-चार दिन तक सब कुछ चरम यौवन पर बनाए रखते हैं।

लेकिन हममें से कितने लोग ऎसे होंगे जो भारतीय संस्कृति, परंपराओं और संस्कारों को जीवन भर आत्मसात किए रखते हैं, यह अपने आप में ऎसा यक्ष प्रश्न है कि इसका सटीक जवाब हर कोई नहीं दे पाता। 

इतने वर्षो से हम भारतीय नव वर्ष मनाते रहे हैं। बावजूद इसके हम जहाँ थे वहाँ से भी पीछे जा रहे हैं।

आज संस्कारों का संकट है, अनाचार, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, बेईमानी, सैटिंग और दूसरी सभी प्रकार की वे गतिविधियां जारी हैं जिनसे समाज और देश खोखला हो रहा है।

आतंकवाद और अधर्म का प्रभाव निरन्तर बढ़ता जा रहा है।

हममें से कितने लोग हैं जो इसका मुखर होकर विरोध करने का साहस संजोये रखते हैं।

हम सभी लोग समाज सुधार और सेवा की बातें करते हैं लेकिन साल भर अपने ही घर भरने में लगे रहते हैं।       समाज और देश को बनाने तथा समृद्ध करने के लिए जिन बुनियादी तत्वों की जरूरत है उस तरफ हमारा अपेक्षित ध्यान नहीं जा पा रहा है।

स्वदेशी और देशाभिमान की हमें बातें करते हैं लेकिन विदेशी वस्तुओं और विदेशियों के प्रति हमारा दिली लगाव और समर्पण किसी से छिपा हुआ नहीं है।

हम उन देशों की बनी वस्तुओं का इस्तेमाल करने की आदत बना चुके हैं जो देश भारत और भारतीयता के खिलाफ हैं। 

अपने क्षुद्र स्वार्थों से घिरकर हम उन लोगों के पिछलग्गू बने हुए हैं जो लोग समाज और देश के दुश्मन हैं। हमारा दुर्भाग्य ही है कि हमें अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए विदेशियों के प्रमाण पत्रों और मार्क की आवश्यकता पड़ती है। जबकि विश्वगुरु के रूप में हम ही ने दुनिया को ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति और सभ्यता का पाठ पढ़ाया। 

हममें से काफी सारे लोग भारतीय संस्कृतिपरक हर उत्सव पर धूमधाम में रमे रहते हैं। सार्वजनिक आयोजनों में हम जिस छवि में पेश आते हैं, व्यक्तिगत जिन्दगी में हमारा व्यवहार दूसरा होता है।

हममें से खूब सारे लोग ऎसे हैं जो समाज और राष्ट्र की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, राष्ट्रीय चरित्र, कत्र्तव्य परायणता और ईमानदारी के झण्डाबरदार बने हुए हैं लेकिन हमारे बारे में आम लोगों की क्या धारणा है, लोग हमारे व्यक्तित्व और कर्मों के बारे में क्या सोचते हैं, इस बारे में भी थोड़े कान धरने शुरू कर दें जो हमारा भी भला हो जाए और निखार आ जाए। 

असल में हमारी कथनी और करनी में इतना अंतर आ गया है कि लोग हमारी वाणी को वाग्विलास का माध्यम समझने लगे हैं, हमारे आचरण में कहीं न कहीं कोई कमी रह गई है जिसकी वजह से कोई खास प्रभाव सामने नहीं आ पा रहा है।

आज के दौर में सबसे बड़ा संकट यह भी हो गया है कि ऎसे कितने लोग हैं जिनका अनुकरण किया जा सकता है। स्थानीय परिप्रेक्ष्य और राष्ट्रीय कैनवास से लेकर हमारे आस-पास के परिक्षेत्रों पर नज़र डालनी जरूरी है।

दैव वाणी संस्कृत, गौ वंश और पुरातन संस्कारों की रक्षा किए बगैर हमारी सारी निष्ठाएं केवल उत्सवी ही बनकर रह जाएंगी।

समाज और देश को बनाने वाली बुनियाद को सुदृढ़ करने की आज आवश्यकता है और यह काम हमें ही करना है। दोहरा चरित्र और स्वार्थी व्यवहार रखकर हम देशभक्ति या राष्ट्रीय चरित्र को आकार नहीं दे सकते।

हम सभी आत्मचिन्तन करें और यह प्रण लें कि भारतीयता केवल वाणी में ही नहीं हमारे प्रत्येक आचरण में होनी चाहिए।

हमारा जो कुछ भी कर्म है वह सिर्फ अपने और परिवार तक सीमित नहीं रहे बल्कि हम इस सत्य को अंगीकार करें कि हमारा जीवन समाज और राष्ट्र के लिए है।

हर क्षण देश के लिए समर्पित होने का ज़ज़्बा पैदा करने की आवश्यकता है। तभी हमारे ये उत्सवी आयोजन सार्थक हैं।

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ....

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