गुरुवार, 26 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - सुख न दे पाएँ, तो व्‍यर्थ है जीना

सुख न दे पाएँ,

तो व्‍यर्थ है जीना

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

 

अपने पूरे जीवन की अब तक की उपलब्‍धि के बारे में थोड़ी गंभीरता रखते हुए ठण्‍डे दिमाग से सोचें कि हम किसे क्‍या दे पा रहे हैं।

हमारी वजह से कितने लोग प्रसन्‍नता का अनुभव करते हैं।

कितने लोगों को हमारी मौजूदगी अच्‍छी लगती है।

कितने लोगों का हम सुख या सुकून प्रदान कर पा रहे हैं, कितनों की आशाओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं पर हम खरे उतर रहे हैं।

इन प्रश्‍नों का उत्तर हमारी पूरी जिन्‍दगी के मकसद का सार एक ही झटके में बता देने के लिए काफी है। बात अपने माता-पिता, गुरु, पति-पत्‍नी, बच्‍चों, कुटुम्‍बियों या बुजुर्गों से संबंधित हो या अपने सहकर्मियों, सम्‍पर्कितों की, अपने परिचितों से व्‍यवहार की हो अथवा अपने पड़ोसियों, क्षेत्रावासियों से किसी भी प्रकार के संपर्कों की। इनमें से कितने लोग हमसे कितने खुश हैं या कितने लोगों को हम खुशी दे पा रहे हैं, इस बार में चिंतन-मनन करने की जरूरत है।

हम सारे के सारे लोग इतने खुदगर्ज, स्‍वार्थी व संकीर्ण हो चले हैं कि हर मामले में हमारा लक्ष्‍य हम तक ही आकर अटक जाता है।

अपने सिवा किसी और को न देखते हैं, न देखना पसंद ही करते हैं। लेकिन जहां कहीं कोई दोष देखना या दिखाना होता है, दोषारोपण करना होता है, वहाँ हम दूसरों की तलाश करने लगते हैं, पराये कंधे तलाशते हैं और ऐसा बर्ताव करना शुरू कर देते हैं कि कोई कभी खुश रह ही नहीं सकता।

हममें से काफी तादाद में लोग हैं जिनसे कोई खुश नहीं है। न हमारे माता-पिता हमसे खुश हैं, न गुरु, पति-पत्‍नी या बच्‍चे। जाति-बिरादरी की बात हो, सगे-संबंधियों की या किसी और की। जब हमसे कोई खुश नहीं है तो इसका सीधा सा मतलब यही है कि हमारा इंसान के रूप में पैदा हो जाना व्‍यर्थ है अथवा हम अपने ही लिए जीने के इतने आदि हो चले हैं और इस बात को भूल चुके हैं कि दुनिया में हमें सामाजिक प्राणी भी माना गया है।

इस मामले में सभी भ्रमित हैं कि हम बहुत कुछ हैं। यह शाश्‍वत सत्‍य है कि जो औरों को खुश नहीं रख सकता, वह स्‍वयं भी कभी खुश नहीं रह सकता।

आज के युग का सबसे बड़ा और गंभीर प्रश्‍न यही है कि हम इस बात का प्रयास करें कि हमारी वजह से औरों को खुशी, मिले, आत्‍मीय आनंद का अनुभव हो तथा हमारी मौजूदगी हर किसी को सुख व सुकून देने वाली सिद्ध हो।

ऐसा हम कर पाएं तभी हमारा जीवन सफल है अन्‍यथा ऐसे लोगों की तो कहीं कोई कमी है ही नहीं जिन्‍हें कोई भी पसंद नहीं करता, दिमाग से भी इनके बारे में घृणित विचार प्रस्‍फुटित होते रहते हैं।

सुख देने का अर्थ यह नहीं है कि हम कुछ अतिरिक्त प्रयास करें और कोई ज्‍यादा शक्ति खर्च करके दिखायें।

हम सभी लोग अपनी मर्यादाओं में रहकर सिर्फ अपने लिए निर्धारित कर्त्तव्‍य कर्म को ही पूरे करने का संकल्‍प ले लें तो हर दृष्‍टि से आदर्श स्‍थिति सामने आ सकती है कि हमारी वजह से सभी को दिली सुकून व खुशी प्राप्‍त हो तथा इच्‍छा हो कि बार-बार संपर्क-सान्निध्‍य बना रहे।

कर्म के प्रति निष्‍ठा, एकाग्र भाव तथा समर्पण ही वह कारक है जो मनः सौन्‍दर्य और शरीर का आकर्षण बढ़ाते हैं और यही सब कुछ मिलकर ही अपने व्‍यक्तित्‍व में खिंचाव पैदा करता है जिसका आकर्षण हर किसी को मोह पाश में बाँध लेने का सामर्थ्‍य पा जाता है।

इस स्‍थिति में जो हमारे करीब आता है या हम जिसके करीब जाते हैं उसे अनिवर्चनीय सुख व सुकून का तीव्र अहसास भी होता है और इसका साकार रूप सामने आता है।

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