शुक्रवार, 27 मार्च 2015

पाठकीय : शालिनी श्रीवास्तव की रम्य रचना - मेरे निराले पिताजी

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पिताजी

ईमानदारी, समझदारी, और जिम्‍मेदारी इन तीनों का संगम मैंने अपने पिता श्री विपिन कुमार श्रीवास्‍तव में देखा है। सूरज की पहली किरण और उनकी आंखों की किरण साथ-साथ जागती हैं और जगाती भी है पर सूरज तो दिन भर थक कर सो जाता है पर मेरे पापा नहीं थकते हैं।

मेरे पापा के काम करने के तरीका बड़ा ही निराला है मेरे पिताजी एक समय में दो काम करते हैं अगर रात में एक आंख से सोएंगे तो दूसरी आंख से सपने में मुंबई जाकर अपने बेटी दामाद से भी मिल कर आ जाते हैं। और अगर पान चबाएंगे तो साथ ही साथ घर के छोटे बड़े झगडों के मस्‍ले भी दबाएंगे।

और जिम्‍मेदारी तो ऐसे निभाते है जैसे कोई जादू कर रहे हो मैंने सिर्फ एक बार ही कहा था कि पापा मुझे अच्‍छा नहीं लगता है और न ही चैन से नींद आती है। तो उन्‍होंने अपनी पहनी हुई पुरानी शर्ट से अपना चश्‍मा पोंछा और आंखों पर चढाया, और मुझे देखकर पूछा बेटा तुम्‍हें ऐसा क्‍यों होता है?

मैंने कहा कि मेरे पास नौकरी नहीं है और न ही शादी के लिए किसी लड़के को दिखाने के लिए खूबसूरती है। और जो थोड़ी बहुत है उसमें भी थोड़ी प्राब्‍लम है। तब उन्‍होंने अपने बड़प्‍पन और जिम्‍मेदारी का हाथ मेरे सिर पर रखकर कहा कि तुम्‍हें अपनी चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्‍योंकि अभी मैं जिंदा हूं।

ये कह कर मुझे तो चैन से सुला दिया पर खुद बेचैन की नींद सोते रहे तब तक कि जब तक मुझे प्रतिष्ठित विभाग और प्रतिष्ठित परिवार नहीं दिला दिया। पर अब तो ऐसे चैन से सोते हैं और साथ ही साथ खर्राटे भी लेते हैं, जिनकी आवाज मेरे ससुराल में बैठे कानों तक आ ही जाती है और मुझे प्रसन्‍न कर जाती हैं.

शालिनी

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