शनिवार, 28 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - सब जगह हैं कबाड़ी और जुगाड़ी

सब जगह हैं

कबाड़ी और जुगाड़ी

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

देश को बाहर से जितना खतरा नहीं है जितना अंदर वालों से हैं।

देश में कर्मशीलता की जड़ों को खोखला अगर कोई कर रहा है तो वे ऎसे लोग हैं जो कर्म में परिपक्वता की बजाय कामचलाऊ कल्चर के हिमायती हैं।

ऎसे लोग जुगाड़ के भरोसे अपने काम निकाल लेते हैं और फिर भूल जाते हैं।

इन लोगों को सिर्फ अपने ही अपने तात्कालिक कामों और स्वार्थों से ही मतलब होता है। इनका एकसूत्री एजेण्डा यही होता है कि चाहे जिस तरह भी हो, अपने काम निकाल लो, बाद में क्या हो यह बाद वाले जानें, हमारा क्या जाता है।

इस मामले में हमारे महान भारतवर्ष में दो तरह के लोगों का जमावड़ा खासतौर पर देखने को मिलता है। एक हैं कबाड़ी, और दूसरे हैं जुगाड़ी।

इन दोनों ही सम्प्रदायों के लोग सर्वत्र पाए जाते हैं। बात घर-दुकान-दफ्तर की हो या किसी संस्थान की।

इन लोगों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया जाए तो यही सामने आएगा कि इनके अवचेतन में कहीं न कहीं कबाड़ और जुगाड़ के बीज तत्व ऎसे घर कर गए होते हैं कि जो मरने के साथ ही स्वाहा हो पाते हैं।

जीते जी लाख समझाईश भरी कोशिशें की जाएं, इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

कबाड़ और जुगाड़ का स्वभाव इनका स्थायी भाव है और इनका उन्मूलन कभी संभव नहीं देखा गया।

इन दोनों ही सम्प्रदायों में पुरुषों और महिलाआें का कोई भेद नहीं है बल्कि यह स्वभाव लिंगभेद से ऊपर अपनी सत्ता रखता है।

कोई वस्तु अपने किसी काम की न हो, अवधिपार और खराब ही हो गई हो, भविष्य में भी कोई सी वस्तु अपने किसी काम की न हो, फिर भी कबाड़ी किस्म के लोग अपने यहां इनका भण्डार जमा कर रखते हैं।

इन लोगों के दिमाग में जाने क्या फितूर भरा होता है कि नाकारा वस्तुओं का बेवजह संग्रह किए रखते हैं।

इस सनक के मारे कई सारी वस्तुएं समय बीतने पर खराब भी हो जाती हैं फिर भी ये न खुद उपयोग कर पाते हैं न किसी और को उपयोग के लिए दे पाते हैं।

लेकिन सामग्री को अपने भण्डार में पड़ी रहते हुए खराब होते हुए देखने में इन्हें अनिर्वचनीय आनंद प्राप्त होता है।

यही नहीं तो सामग्री खराब या पूरी तरह अनुपयोगी हो जाने के बाद भी इनका मोह नहीं छूटता है और ऎसी खराब सामग्री तब भी इनके भण्डार से बाहर का रास्ता नहीं देख पाती।

इस मामले में ये लोग कारोबारी कबाड़ियों से भी गए बीते होते हैं। कबाड़ी तो सामग्री जमा करने के बाद अपना मुनाफा पाकर दूसरी जगह बेच भी देते हैं मगर ये घरेलू और सनकी कबाड़ी इनसे भी कई गुना अधिक विलक्षण होते हैं।

अपनी ही सामग्री को अपने ही सामने खराब होते हुए देखना इनकी फितरत में होता है।

इन अजीब किस्म के कबाड़ियों के भाग्य में न दान करना लिखा होता है न उपयोग करना। इसी तरह की दूसरी प्रजाति में जुगाड़ी लोग आते हैंं।

यह जुगाड़ ऎसा सार्वजनीन शब्द है जो कि दुनिया के हर कर्म में प्रयुक्त होता है और इस मामले में हम सभी भारतीयों का कोई मुकाबला नहीं।

किसी भी वस्तु के उपयोग, सेवा या सुविधा का लाभ लेने में जहां कहीं कोई दिक्कत आती है हम लोग इसका तात्कालिक और सबसे सरल तथा सहज उपलब्ध विकल्प तलाशते हैं और कोई न कोई शोर्ट कट अपनाकर उपयोगिता सिद्ध कर दिखा ही देते हैंं।

हमें इससे कोई मतलब नहीं कि इससे वस्तु किस अनुपात में आकर्षण और अपना मूल आकार-प्रकार व उपयोग खो देगी, खराब हो जाएगी और इसके कितने नुकसान सामने आएंगे।

घर-दफ्तर या कोई सा सार्वजनिक स्थान क्यों न हो, सभी जगह जुगाड़ के दर्शन स्वतः ही हो जाते हैं।

जुगाड़ की दृष्टि से पढ़े-लिखों और अनपढ़ों में कहीं कोई फर्क नहीं है।

कहीं बिजली की लाईन अस्त-व्यस्त मिलेगी, जगह-जगह टेप चिपकी हुई दिखेगी, कहीं तार खुले होंगे तो कहीं कट आउट गायब यानि की सब तरह का खतरा बना हुआ है, बचना हमेंं ही है।

नल की टोंटियां और पाईप लाईन का रिसाव आम बात हो गया है। दीवारों से लेकर फर्नीचर तक सभी स्थानों पर यही जुगाड़ का कमाल देखने को मिलता है। मिले भी क्यों न, जब हमारे यहां जुगाड़ियों की जनसंख्या निरन्तर बढ़ने लगी है।

उपयोग करने के मामले मेें हम सभी लोग फ्री स्टाईल हैं। चाहे जैसा उपयोग कर लो, कोई पूछने वाला नहीं है। चाहें उस वस्तु को अपने हिसाब से तोड़-मोड़ दो, हमारा तो बस काम निकल जाना चाहिए।

उपयोगिता जुगाड़ की जननी है और जब तक जुगाड़ रहेगा तब तक हर चीज का उपयोग होता रहेगा।

इसी जुगाड़ का प्रतिफल यह हो रहा है कि कुछ समय तो हमारे भाग्य से जुगाड़ साथ दे देता है लेकिन इसके बाद उपयोगिता में बाधाएं ही बाधाएं आनी शुरू हो जाती हैं और बड़े पैमाने पर सामग्री का खराबा होता है।

इससे कितने व्यापक पैमाने पर उपयोगी संसाधन बर्बाद हो रहे हैं, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

कबाड़ और जुगाडा दोनों का स्वभाव त्यागे बिना हम तरक्की नहीं पा सकते।

ये दोनों ही सनक से कम नहीं हैं और जब तक ये कायम रहेंगी तब तक इंसान आगे नहीं बढ़ पाएगा।

यही कारण है कि इस किस्म के सनकी अपने जीवन में ठहराव पा लेते हैं और पूरी जिन्दगी जड़ता को ओढ़ लिया करते हैं।

कबाड़ और जुगाड़ अपने आप में वास्तु दोष भी है और बुद्धि दोष भी, जो हमारी ताजगी और कर्म की सुगंध को छीन लेता है और जीवन को अंधकारमय बना डालता है।

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