रविवार, 29 मार्च 2015

हरिवंशराय बच्चन की चंद चुनिंदा बाल-कविताएँ

अभिषेक बच्चन की चौथी वर्षगाँठ ( पाँचवें जन्मदिन) पर हरिवंशराय बच्चन ने उन्हें उपहार स्वरूप बाल-कविताएँ और बाल नाटक लिख कर दिए.

प्रस्तुत है उनमें से कुछ चुनिंदा बाल-कविताएँ. 

देखें कि लोकप्रिय, मनोरंजक बालकथाओं को बच्चन ने बड़ी ही खूबसूरती से बाल-कविताओं में उतारा है -

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खट्टे अंगूर

एक लोमड़ी खोज रही थी
जंगल में कुछ खाने को,
दीख पड़ा जब अंगूरों का
गुच्छा, लपकी पाने को ।

ऊँचाई पर था वह गुच्छा,
दाने थे रसदार बड़े,
लगी सोचने अपने मन में
कैसे ऊँची डाल चढ़े ।

नहीं डाल पर चढ़ सकती थी
खड़ी हुई दो टाँगों पर,
पहुंच न पाई, ऊपर उचकी
अपना थूथन ऊपर कर ।

बार-बार वह ऊपर उछली
बार-बार नीचे गिर कर
लेकिन अंगूरों का गुच्छा
रह जाता था बित्ते भर ।

सौ कोशिश करने पर भी जब
गुच्छा रहा दूर का दूर
अपनी हार छिपाने को वह
बोली, खट्टे हैं अंगूर

 

काला कौआ

उजला-उजला हंस एक दिन
उड़ते-उड़ते आया,
हंस देखकर काका कौआ
मन-ही-मन शरमाया ।

लगा सोचने उजला-उजला
में कैसे हो पाऊं-
उजला हो सकता हूँ
साबुन से में अगर नहाऊँ ।

यही सोचता मेरे घर पर
आया काला कागा,
और गुसलखाने से मेरा
साबुन लेकर भागा ।

फिर जाकर गड़ही पर उसने
साबुन खूब लगाया;
खूब नहाया, मगर न अपना ।
कालापन धो पाया ।

मिटा न उसका कालापन तो
मन-ही-मन पछताया,
पास हंस के कभी न फिर वह
काला कौआ आया ।

प्यासा कौआ

आसमान में परे शान-सा
कौआ उड़ता जाता था '
बडे जोर की प्यास लगी थी
पानी कहीं न पाता था ।

उड़ते उड़ते उसने देखा
एक जगह पर एक घड़ा,
सोचा अन्दर पानी होगा,
जल्दी-जल्दी वह उतरा ।

उसने चोंच घड़े में डाली
पी न सका लेकिन पानी,
पानी था अन्दर, पर थोड़ा
हार न कौए ने मानी ।

उठा चोंच सें कंकड़ लाया,
डाल दिया उसको अन्दर,
बडे गौर से उसने देखा
पानी उठता कुछ ऊपर ।

फिर तो कंकड़ पर कंकड़ ला
डाले उसने .अन्दर को
धीरे- धीरे उठता-उठता
पानी आया ऊपर को ।

बैठ घड़े के मुँह पर अपनी
प्यास बुझाई कौए ने ।
मुश्किल में मत हिम्मत हारो
बात सिखाई कौए ने ।

 

ऊँट गाड़ी

ऊंटों का घर रेगिस्तान-
फैला बालू का मैदान ।
वहां नहीं जाती है घास,
पानी नहीं, लगे यदि प्यास ।

कहीं-कहीं बस उग आती है
छोटी झाड़ी काँटे-दार,
भूख लगे तो ऊँटराम को
खाना पड़ता हो लाचार ।

चलते - चलते दो ऊँटों ने
आपस में की एक सलाह;
कहा एक ने चलें बम्बई ।
कहा दूसरे ने भई वाह!

चलते - चलते चलते - चलते
दोनो' पहुँचे सागर - तीर;
लोग देखकर उनको बोले
इनका कैसा अजब शरीर ।

छोटा-सा सिर, लम्बी गर्दन,
लम्बी टाँगें? उचकल चाल ।
नन्ही-सी दुम, पीठ तिकोनी,
सब तन पर बादामी बाल ।

देख जानवर यह अजूबा ।
सूखा लोगों को खिलवाड़ ।
खूब रहेगा जो खिंचवाएं ''
इनसे गाड़ी पहिएदार ।

' अब जुत गाड़ी में ऊँटराम
रहे खींचते इस-उस ओर,
लद गाड़ी में नौ-दस बच्चे
हंसते, गाते, करते शोर ।

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