शुक्रवार, 27 मार्च 2015

प्रमोद यादव का हास्य व्यंग्य - यस्य पूज्यते नार्यस्तु... / प्रमोद यादव

यस्य पूज्यते नार्यस्तु... /

प्रमोद यादव

 

‘ सुनिये जी...आज से मैं भी “आप” की आराधना किया करुँगी...’ पत्नी ने पोहे से भरी प्लेट टी.वी. समाचार देखते पति को थमाते कहा.

‘ क्यों भई ? मंदिर जाना बंद कर रही हो क्या ? ‘ पति ने चुटकी लेते पूछा.

‘ मंदिर जाना तो अब आप बंद करेंगे श्रीमान..जब घर में ही जीती जागती देवी विद्यमान हो तो बाहर चरणामृत तलाशने की..आशीर्वाद लेने की क्या जरुरत ? ‘ पत्नी बोली.

‘ अरे..अभी तो तुम कह रही थी मेरी आराधना करोगी..और अब मुझे ही मंदिर जाने से “बैन” कर रही हो.. बात क्या है यार....थोड़ा साफ़-साफ़ कहो..’ पति ने विनती के स्वरों में कहा.

‘बात तो बिलकुल साफ़ है पर आप है कि पूरे “हाफ” हैं...मैं आपकी नहीं..पार्टी की बात कर रही थी.. आपने समाचार नहीं पढ़ा क्या कि दिल्ली सरकार के एक मंत्री ने महिला दिवस पर अपने श्रीमुख से हम पत्नियों का कितना मान-सम्मान बढ़ाया.. हमारे अच्छे दिनों का वृहत खुलासा किया.. पी.एम. साहब ने तो भांजी मारी कि अच्छे दिन जरुर आयेंगे..साल गुजरने को है.. उनके सिवा और किसके आये- पता नहीं पर दिल्ली के आप सरकार में तो हम महिलाओं के ( खासकर पत्नियों के ) अच्छे दिन आ ही गए.. इसलिए आप के आराधना की बात कह रही थी..’

‘ अच्छा..अच्छा..समझ गया..तुम महिला और बाल विकास मंत्री की बात कर रही हो न .. अरे भई जब उन्हें मंत्रालय ही महिलाओं वाला मिला है तो उनके फेवर में बोलना उनका कर्तव्य बनता है....उनके खुलासे या बयान पर मत जाओ..देश में बयान-बहादुरों की कमी है क्या ? रोज एक से बढ़कर एक बयान आते-जाते रहते हैं..किस-किस पर कान धरोगी ? कभी कोई चार बच्चे वाला देता है तो कभी कोई गोरा-काला वाला..ये सब “खबरों में बने रहने” के हथकंडे हैं..तुम महिलाओं के साथ यही परेशानी है..बहुत जल्द झांसे में आ जाती हो..’ पति ने समझाते हुए कहा.

‘ फालतू बात मत करो जी..कैसे कह दिए कि झांसे में आ जाते हैं ? ‘ पत्नी नाराजी से बोली.

‘ अरे.. आये दिन समाचारों में छपते ही रहता है कि अमुक शहर में फलां घर की संभ्रांत महिला जेवर दुगुनी करने के लालच में ठगी का शिकार हुई..या..जेवर साफ़ करने आये दो युवकों ने महिला का सारा जेवर साफ़ किया ..आदि..आदि..’

‘ अरे वो अनपढ़ और गंवार महिलाएं होंगी जो झांसे में आ गई ..आज की महिला अब अबला नहीं रही..सबला हो गई है.. और अच्छे-अच्छों का तबला बजा रही है..समझे ? ‘

‘ चलो..तबला वाली बात को मान लेता हूँ..अच्छे-अच्छों का मुझे नहीं मालूम पर अपने-अपने पतियों का जरुर बजाती हो..ये सीखने तुम लोगों को किसी अल्ला-रखा की जरुरत नहीं होती..ये गुण तो तुम सबमें “इन-बिल्ट” होता है...’ पति ने मजाक के लहजे में कहा.

‘ देखोजी..मजाक मत करो..मैं एकदम ही गंभीर मसले पर बोल रही हूँ और आप हैं कि मुझे उडाये जा रहे हैं..’ पत्नी फिर नाराज होती बोली.

‘ अच्छा बाबा..बोलो.. मेन मसला क्या है ? ‘ पति ने पुचकारा.

‘ मसला नहीं अब मसाला ही कहो..बिना मसाले के जिस तरह सब्जी स्वादहीन होती है वैसे ही जिंदगी में भी कुछ न कुछ मसाला छिड़कते रहना चाहिए..ताकि स्वाद बनी रहे..जीवन में लुत्फ़ बना रहे..’

पति ने बात काटते कहा- ‘ तुम औरतें भी अजीब होती हो यार..मसले और मसाले का भी भेद नहीं जानती..कभी मसला कहती हो तो कभी मसाला..पहले तय कर लो कि बात किस पर करनी है ? ‘

‘ बात तो उसी पर करनी है जो मंत्री महोदय कह गए.. जब वे रोज सुबह-सवेरे अपनी पत्नी के पैर छू आशीर्वाद ले सकते हैं तो आप क्यों नहीं ? ‘ आप भी उतने ही इसके हकदार हैं जितने कि मंत्री महोदय..’ पत्नी एक सांस में बोली.

‘ अच्छा ..तो ये बात है...इतनी देर से घोर-घोर रानी क्यों कर रही थी मेरी रानी ...सीधे मुद्दे पर ही आ जाती ..वैसे तो अपरोक्ष रूप से हर पति ये नेक काम करता ही है..भले ही नायिका इस तरह गाये - “नदी नारे न जाओ श्याम पैंया पडूं..” पर उसकी असली चाहत तो यही होती है कि नायक गुनगुनाये- “ तुझे रात दिन पूजना चाहता हूँ..वफ़ा कर रहा हूँ ..वफ़ा चाहता हूँ..”

‘ अब बिलकुल ठीक समझे आप..आप भी उनकी तरह अपरोक्ष को परोक्ष कीजिये..अपनी पत्नी का पैर छू “ खूब तरक्की करो “ का आशीर्वाद लीजिये..पत्नी का पैर छूने से आप छोटे नहीं हो जायेंगे..हम देवी हैं तो आप भी देवता बने रहेंगे...’

‘ वो कैसे भई ? ‘ पति ने पूछा.

‘ वो ऐसे कि “ यस्य पूज्यते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवताः “ अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं..अब आप मेरी पूजा करेंगे तो आप भी तो देवता हुए ना,,और कोई तो यहाँ निवास करता नहीं ..’

‘ लेकिन ये थोडा गलत है यार..शादी के सात वचनों में इसका कहीं जिक्र नहीं कि कन्या वर से कहे कि जब तक आप रोज सुबह मेरे पैर नहीं छुएंगे मैं आपके वामांग में नहीं बैठूँगी..’ पति ने कहा.

‘ अरे वाह..पाँव छूने की बारी आई तो वचन याद आने लगे ? चलिए..सात वचन अगर आप संक्षेप में सुना दें तो ये अनिवार्यता आप के लिए ख़त्म ..’ पत्नी शर्त रखते बोली.

‘ ठीक है..सुनो..पहला वचन - कि यदि तीर्थ-यात्रा आदि में जाऊं तो तुम्हें भी संग लिए चलूं..पर सौभाग्यवश आज तक ऐसा नहीं हुआ.. हमें तो दिल्ली-चेन्नई से फुर्सत नहीं .. दूसरा ये कि तुम्हारे माता-पिता को भी अपने माता-पिता की तरह मानूं..वो तो मानता ही हूँ तभी तो बिना ब्याज के तुम्हारे पिता से पांच लाख लिया..तीसरा कि जीवन की तीनों अवस्थाओं में तुम्हारा पालन करता रहूँ..अब घोड़ी चढ़ने का दंड तो भरना ही होगा..चौथा कि परिवार के समस्त दायित्वों का निर्वाह करूँगा..अब ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना ? पांचवां कि सभी प्रकार के लेन-देन..खर्च आदि में जोड़ीदार से सलाह लूं..जब लाकर की चाबी ही उसके हाथ तो सलाह किस बात का ? छठा कि सार्वजनिक तौर पर तुम्हारा अपमान न करूँ..और जुआ व अन्य दुर्व्यसन से दूर रहूँ..जुआ तो खेल ही चुका शादी करके..रही बात अपमान के तो समझ नहीं आया कि इसमें “सार्वजनिक तौर पर” क्यों जोड़ा गया..मतलब कि वधु जानती है.. कि अपमानित तो होना ही है..अब आखिरी वाला वचन थोड़ा शक वाला है शादी हुई नहीं कि शक की घडी शुरू..पराई स्त्री को माँ-बहन मानूं..और सबसे खतरनाक शर्त ( वचन ) कि पति -पत्नी के बीच अन्य किसी की भागीदारी नहीं..इस आखिरी वचन पर मुझे कुछ नहीं कहना..’

‘ हाँ..कहेंगे भी क्या ? गर्ल्स कालेज में जो पढ़ाते है आप...मैं शक नहीं कर रही..पूरा विश्वास है मुझे..’

‘ किस बात का ? ‘ पति चौंका.

‘ उसी बात का जो आप समझ रहे हैं..फिर भी चलो माफ़ किया ..इसलिए नहीं कि आपको सातों वचन याद है बल्कि इसलिए कि इन सबके बावजूद आप मुझे बेहद प्यार करते हैं..यह केवल मैं जानती हूँ.. चलिए ..मैं हारी ..आप जीते ..इसलिए अब आप कदापि मेरे पैर न छुएं ..यह पुनीत कार्य मुझे ही करने दें..’

‘ अरे फिर आप वाले तो नाराज हो जायेंगे..’ पति ने टोका.

‘ हो जाएँ..वैसे भी वे तो आजकल आपस में सब नाराज ही चल रहे.’

‘ तुम औरतें भी यार सचमुच..पल में तोला ..पल में माशा..चलो इसी बात पर तुम्हारी मुराद पूरी कर दूँ..पाँव आगे करो..छू लूँ ..’

‘ अरे कैसी बातें करते हैं जी....छूना ही है तो कहीं और.... ? ‘

बात पूरी भी नहीं हुई कि पति महोदय उसके नाजुक होठों पर टूट पड़े..और तभी एकाएक बत्ती चली गई.

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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  1. बेहतरीन व्यंग्य,प्रमोद यादव जी। पढ़कर मज़ा आ गया। 'दूसरा ये कि तुम्हारे माता-पिता को भी अपने माता-पिता की तरह मानूं..वो तो मानता ही हूँ तभी तो बिना ब्याज के तुम्हारे पिता से पांच लाख लिया' इन पंक्तियों ने तो हँसी कि अविराम लड़ी लगा दी ।

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  2. बेहतरीन व्यंग्य,प्रमोद यादव जी। पढ़कर मज़ा आ गया। 'दूसरा ये कि तुम्हारे माता-पिता को भी अपने माता-पिता की तरह मानूं..वो तो मानता ही हूँ तभी तो बिना ब्याज के तुम्हारे पिता से पांच लाख लिया' इन पंक्तियों ने तो हँसी कि अविराम लड़ी लगा दी ।

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