मंगलवार, 31 मार्च 2015

हरदेव कृष्ण का आलेख - घास के जूते

आलेखः घास के जूते

लेखकः हरदेव कृष्ण

जानकारी का स्त्रोतः अखबार और प्रदर्शनियां

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घास के जूते

पैरों की हिफाजत के लिए जूते और चप्पलों का अविष्कार किया गया। इनके निर्माण के लिए मुख्यतः पशुचर्म, रबड़ या सूती वस्त्र को उपयोग में लाया जाता है। शुद्धि के लिए साधु लोग काष्ठ को , यानि खड़ाऊं को महत्व देते हैं। लेकिन देवभूमि हिमाचल , विशेषकर कुल्लू अंचल में ‘ घास के जूते या चप्पल’ प्रयोग में लाए जाते हैं। इन्हें स्थानीय भाषा में “ पूला” कहा जाता है। गांव में चमड़े के जूते घर के अंदर ले जाना अच्छा नहीं समझा जाता, मंदिर के परिसर में भी इनकी मनाही है। कुल्लू के कुछ गांव , जैसे कि तीऊन, जठानी और खोपरी आदि में , सीमा के बाहर ही जूते उतारने आवश्यक हैं। वहां केवल पूला पहन कर जाना पड़ता है। वैसे भी हिमाचल प्रदेश के ऊपरी क्षेत्रों में बर्फ और सर्दी खूब पड़ती है। वहां नंगे पाँव धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करना कठिन होता है। पूला चप्पल पहन कर बर्फ में भी चल-फिर सकते हैं।

पूला बनाना एक हुनर है। इसके लिए विशेष प्रशिक्षण लेना पड़ता है। इसे बनाने के लिए भांग के रेशों को प्रयोग में लाया जाता है। यहां इन्हें शेःल कहा जाता है। पूला का सबसे नीचला भाग यानि तला शेःल की रस्सी से बनाया जाता है। इसके लिए लगभग 10 मीटर लंबी रस्सी बाटी जाती है। नाप के अनुसार ,एक विशेष कारीगीरी के तहत इस रस्सी के फंदे और लड़ें बनाकर पूला के तले को बनाया जाता है। बाद में एक प्रकार की बुनाई की जाती है जो कि ऐड़ी की तरफ से आरंभ करके आगे तक जाती है। पूला के ऊपरी भाग में स्थानीय सफेद झबरी बकरी के बाल उपयोग में लाए जाते हैं। उन्हें ऊन के तरह मरोड़ी दी जाती है। फिर उन्हें लाल,गुलाबी या हरे रंगों में रंग लिया जाता है। इससे पूला सुन्दर लगने लगता है। इस ऊपरी भाग को बनाने के लिए बहुत एकाग्रता और कुशलता की दरकार होती है। इस पर कई रंगों के धागों को भी खूबसूरती से पिरोया जाता है।

कुछ जगहों पर आधे पैर की पूलें उपयोग में लाई जाती है। इन्हे ‘ मेदू- पूला’ कहते हैं। इसके लिए धान की घास प्रयोग में लाई जाती है। इसे पहले पानी में गीला किया जाता है, फिर उसे रस्सी की तरह बाट लेते हैं। ऊपरी भाग के निर्माण में भी इसी रस्सी की सहायता ली जाती है। कभी-कभी इस के लिए वनों में मिलने वाली ‘ बगड़ घास’ को भी उपयोग में ले लेते हैं।

लाहुल-स्पिति जैसे क्षेत्रों में पूला बनाने के लिए गेहूं और जौ के डंठलों का प्रयोग किया जाता है। धान के घास की भांति ही इन डंठलों को पानी में भिगो कर कूट लिया जाता है। उसके बाद बाट कर रस्सी बनाई जाती है। लेकिन बाद में भेड़ या बकरी की खाल चढ़ा दी जाती है। इसका ऊन वाला भाग बाहर होता है। इनकी खासियत यह है कि यह जूते घुटनों तक लंबे होते हैं। यह मजबूत ,गर्म और टिकाऊ होते हैं, इनके भीतर पानी तक नहीं जाता। वहां की भौगोलिक परिस्थति के हिसाब से यह जूते बहुत उपयोगी सिद्द होते हैं। किन्नौर में इन्हें ‘ पोनो ’ कहा जाता है। वहां इसका ऊपरी भाग कपड़े का होता है, और जब इसमें कशीदाकारी की जाती है तो इसे ‘ जोम्बा ’ का नाम दिया जाता है।

हिमाचल के इन खास जूतों को , सर्दी और गीले मौसम में कोई भी पहन सकता है। किसी जगह क्राफ्ट मेला लगा हो तो इन को अवश्य परखें।

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हरदेव कृष्ण, ग्राम/डाक – मल्लाह-134102

जिला पंचकूला (हरियाणा)

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