शुक्रवार, 27 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - हरामखोरी छोड़ें

हरामखोरी छोड़ें

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

कार्यस्थलों को आदर्श बनाना प्रत्येक कार्मिक का प्राथमिक फर्ज है और जहाँ के कार्मिक अपने कार्यस्थलों अर्थात कार्यालयों, प्रतिष्ठानों, दुकानों आदि के प्रति दिली लगाव रखते हैं वहाँ स्वस्थ और सुन्दर माहौल अपने सकारात्मक माहौल का सृजन करता है।

ऎसा मनोरम परिवेश वहाँ काम करने वालों के साथ ही आने-जाने वालों को भी सुकून देता है और अनुकरणीय प्रेरणा का सशक्त माध्यम बना होता है।

हमारे कार्यस्थलों से ही हमारी पहचान है और इससे भी बढ़कर बात यह है कि हमारे जीवनयापन का मूलाधार ही ये कर्मस्थल हैं और इनसे ही हमारा तथा घर-परिवार का संचालन होता है।

हमारी रोजी-रोटी का यही आधार है जिसकी नींव पर हमारा पूरा संसार टिका हुआ है।

इस दृष्टि से कार्यस्थलों के प्रति वफादारी, इन्हें साफ-सुथरा  और सुन्दर बनाए रखने, अपने जिम्मे के कामों को रोजाना पूर्ण करने, अपने संस्थान या व्यवसाय से संबंधित लोगों के प्रति जवाबदेही, पारदर्शिता, निष्ठा और ईमानदारी से कार्य संपादन तथा संस्थान/कार्यालय की छवि बेहतर बनाए रखने की जिम्मेदारी कार्मिकों पर है।

चाहे वह बड़े से बड़े ओहदे वाला हो या फिर सबसे निचली श्रेणी का ही कोई कार्मिक।

संस्थानों को अपना मानकर काम करने की आत्मीय भावना का हाल के वर्षों में लोप होता जा रहा है। कार्यसंस्कृति पर चौतरफा हमले जारी हैं।

हम इतने प्रमादी, घोर आलसी और उच्छृंखल हरामखोर होते जा रहे हैं कि चाहते हैं कि सब कुछ हमारी झोली में आ जाए, लेकिन इसके लिए परिश्रम करना न पडे।

इसमें मोटी-मोटी तनख्वाह लेने वालों, एसी वाहनों और घरों में आनंद पाने वालों, भोग-विलासिता के सारे संसाधनों का उपयोग करने वाले और राजसी ठाठ-बाठ से रहने वालों से लेकर सभी किस्मों के छोटे-बडे महान लोग शामिल हैं।

इन सभी किस्मों के लोगों में से काफी तो ऎसे हैं जिनका जीवन संघर्ष से कभी पाला नहीं पड़ा, जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं, खूब सारे दूसरों की दया से लगे हुए हैं और ढेरों ऎसे हैं जो अनुकंपात्मक आशीर्वाद का पा रहे हैंं।

धरातल की सोच से दूर इन लोगों को पता ही नहीं है कि परिश्रम क्या चीज है, समाज और देश के लिए हमारे क्या फर्ज हैं, हमारे कर्म की उपयोगिता क्या है, हम जिन कामों मेें लगाए गए हैं उनके प्रति हमारा दृष्टिकोण और कर्म व्यवहार क्या होना चाहिए।

आजकल की प्रजातियों में निष्ठा, कर्म और परिश्रम गायब है और इसका स्थान ले लिया है नाकारापन, आलस्य, प्रमाद के साथ ही हराम का खान-पान और बिना मेहनत का पैसा पाने की आदतों ने।

जितना हमें मिलना चाहिए, जितनी हमारी असली योग्यता है उससे कई गुना अधिक हम प्राप्त कर रहे हैं। इसके बावजूद हम संतुष्ट और तृप्त नहीं हो पा रहे हैं, हमारी भूख लगातार बढ़ती ही जा रही है।

और जितना मिल रहा है उसकी तुलना में हम काम कितना कर पा रहे हैं, यह प्रश्न कोई हमसे पूछ ले तो हम लाल-पीले हो जाते हैं।

कारण साफ है कि हमारे पास इसका कोई जवाब नहीं है। वास्तव में देखा जाए तो हम अपनी प्राप्ति की तुलना में दस फीसदी काम भी करके नहीं दिखा पा रहे हैं।

कुछ महान लोग तो जरा भी काम नहीं करते बल्कि बंधी-बंधायी के साथ ही एक्स्ट्रा भी ले उड़ते हैंं।

लोगों की एक प्रजाति ने तो कर्मस्थलों को आरामगाह या ऎशगाह तक बना रखा  है और अपने कर्म को मौजमस्ती के लिए सुविधादाता।

इन लोगों को कोई सा कत्र्तव्य कर्म, सेवा या परोपकार का कार्य करने में मौत आती है। और बातें करने में ऎसे मीठे कि जानें पूरे दफ्तर या संस्थान का पूरा काम-काज इन्हीं के भरोसे चल रहा हो।

ऎसे दो-चार लोग ही किसी संस्थान में एक सरीखे मिल जाएं तो उस संस्थान का कबाड़ा होने में ज्यादा देर नहीं लगती। फिर जिस जगह सारे के सारे लोग इसी प्रकार के हों तब तो भगवान भी इन महान कर्मयोगियों को देख कर मुँह मोड़ लेता है।

वह जमाना चला गया जब लोग अपने कार्यस्थलों को अपना मानते थे और उसके रख-रखाव और विकास में समर्पित होते थे। आजकल लोग सिर्फ मासिक पगार पाने और संस्थानों के संसाधनों  के वैयक्तिक उपयोग के सिवा किसी को अपना नहीं मानते, चाहे जो हो जाए।

नालायकों की यह किस्म आजकल सभी स्थानों पर देखी जा सकती है जो बेशर्म होकर अपना अधिकार मानकर सब कुछ करती है और पछतावा तक नहीं होता। इन्हेें लगता है कि इनका जन्म ही इसके लिए हुआ है। करना कुछ नहीं और पा लेना सब कुछ।

फिर ऊपर से नीचे तक ऎसे स्वनामधन्य लोग बड़ी संख्या में हैं जो ‘परस्परोपग्रहोपजीवानाम् ’ का उद्घोष करते हुए एक-दूसरे को सहयोग भी करते हैं और मौका आने पर बचाते भी हैं।

ऎसे संस्थानों की स्थिति विचित्र और अजीबोगरीब ही हो जाती है जहाँ इस किस्म का एकाध प्राणी भी उपलब्ध हो जाए।

संस्थानों के प्रति न इनकी वफादारी होती है न संस्थानों की छवि को लेकर कोई चिंता।

इस किस्म को सिर्फ अपनी ही अपनी पड़ी होती है और यही कारण है कि संस्थानों की छवि और भौतिक स्थिति दोनों निरन्तर उतार पर चलते चले जाते हैं और सभी लोग यह मानने लगते हैं कि ये नालायक न होते तो शायद संस्थान और कार्मिकों की छवि कुछ अलग ही होती ।

जानकार तो ऎसे लोगों के नाम  ले लेकर गालियाँ देते हैं। कई संस्थान इस कदर बदनाम हैं कि इनका नाम ले लो तो कोई सूई भी उधार न दे। आम लोगों इन संस्थानों के बारे में अच्छी तरह पता होता है कि ये संस्थान और इसके कार्मिक कैसे हैं।

हमारे आस-पास भी ऎसे खूब लोग हैं जिनकी निष्ठा सिर्फ मौज-मस्ती, मुद्राओं, निन्दा और आलोचनाओं में ही है, संस्थान के कल्याण और छवि को बेहतर बनाने का ये लोग स्वप्न में भी नहीं सोच सकते।

संस्थानों के प्रति लगाव और आत्मीयता में कमी ही वह कारण है कि कई गलियारे और परिसर कुछ गंदी मछलियों और मुफ्तखोर गैण्डों-घड़ियालों की वजह से बदनाम हैं।

इन लोगों को शायद पता ही नहीं है कि खुद की छवि भी कोई अच्छी नहीं हो सकती यदि संस्थान की छवि खराब होगी। इन आत्मघातियों की वजह से काफी संस्थानों का असमय अवसान हो रहा है।

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4 blogger-facebook:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी है और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार- 27/03/2015 को
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः 45
    पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें,

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी बात शत प्रतिशत सही है | न कार्य के प्रति श्रद्धा न संस्थान के प्रति केवल अपना उल्लू सीधा किया और निकल लिए ... शायद आपका ये लेख पढ़ कोई एक व्यक्ति भी समझ पाए ये प्रार्थना रहेगी ... शुभ कामनाये :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सही लिखा है आपने। सराहनीय लेख है एवं शिक्षा प्रदान करने वाला। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  4. आप की नाराजगी जायज है

    उत्तर देंहटाएं

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