मंगलवार, 24 मार्च 2015

तारकेश कुमार ओझा का हास्य व्यंग्य - मौत पर भारी मैच

हास्य - व्यंग्य

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मौत पर भारी मैच ...

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तारकेश कुमार ओझा

क्रिकेट का एक मैच यानी हजारों सहूलियत का कैच। बाजार के लिए यह खेल बिल्कुल गाय की तरह है। जो हमेशा देती ही देती है। नाम - दाम और पैसा बस इसी खेल में है। दूसरे खेलों के महारथी जीवन - भर सुख - सुविधाओं का रोना रोते हैं, जबकि यही सुख - सुविधाएं  मानो क्रिकेट खिलाड़ियों के चरण में लोटने को तरसती रहती है। दुनिया के  विकासशील देशों में क्रिकेट आम - आदमी से लेकर महान हस्तियों यहां तक कि प्रधानमंत्री जैसे पद पर रहने वालों को सीधे प्रभावित करता है।  तो इसकी सबसे बड़ी सुविधा यह है कि घंटों करते रहिए मैच के हर कोण का पोस्टमार्टम। जीते तो भी हारे तो भी।

मैच हारे तो हार की लाश के पोस्टमार्टम के बहाने घंटों खींच सकते हैं। और यदि जीत गए तो फिर कई दिनों की बल्ले - बल्ले।  मैच जिताऊ  क्रिकेट खिलाड़ियों को असाधारण से लेकर अवतारी पुरुष तक बनाने की यहां छूट है। बुलंद सितारे वाले खिलाड़ियों के परिजनों से लेकर दोस्त, प्रेयसी , बांधवी व गर्ल फ्रेंड तक का लंबा इंटरव्यू दिखाया जा सकता है। वर्तमान में चल रहे खिलाड़ियों की महिमा का बखान करने के बहाने आप उन चेहरों पर भी  घंटों फोकस बनाए रख सकते हैं, जो अब रिटायर्ड हो चुके हैं और हाशिये पर पड़े है। इस बहाने पेज थ्री कल्चर का बखूबी पोषण हो सकता है। दुनिया के तमाम दूसरे खेल फूल की तरह है, जो खेले यानी खिले और चंद  मिनटों में खत्म यानी मुर्झा गए।

लेकिन क्रिकेट का मामला हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह है। जैसे मान लीजिए कि बारिश के चलते कोई मैच हुआ ही नहीं। फिर भी आंकड़ों के जरिए यहां यह बताने की गुंजाइश है कि इससे पहले कब - कब बारिश के चलते मैच रद हुआ था। कोई टीम लगातार हारती ही जा रही है तो भी आंकड़ों के जरिए बताया जा सकता है कि हारने के मामले में अब तक दूसरी टीमों का रिकार्ड क्या रहा है। यह संभावना दूसरे खेलों में नहीं है।  खबरों की दुनिया के लिहाज से आकलन करें तो हादसों में मौत और सैनिकों पर आतंकवादी हमला सबसे ज्यादा नेगलेक्टेड और ओवरलुक की जाने वाली खबरें हैं।

इसका इस्तेमाल बस फीलर या रुटीन खबरों की तरह ही होता है। बहुत हुआ तो सुर्खियां दिखाने के दौरान कुछ फुटेज दिखा दिए। स़ड़क हादसों में होने वाली मौत तो खबरों की दुनिया के लिए कभी चिंतनीय प्रश्न रहा ही नहीं। हां रेल हादसों का मसला काफी हद तक समय और परिस्थिति पर  निर्भर करता है। बिल्कुल शेयर मार्केट की तरह। कभी तो किसी मालगाड़ी के बेपटरी हो जाने की खबर देर तक चलती रहती है और कभी बड़े हादसों को भी वह महत्व नहीं मिलता। जो मिलना चाहिए। क्योंकि ऐसी दुर्घटनाओं में मरता तो बिल्कुल आम आदमी ही है। जैसे उस दिन हुआ। विश्व कप क्रिकेट में बांग्लादेश पर भारतीय टीम की जीत के बाद मानो चैनलों ने पूरे दिन दर्शकों को क्रिकेट के रंग में रंगने की अग्रिम  तैयारियां कर रखी थी।

एंकरों पर इसका नशा कुछ इस कदर चढ़ा हुआ था कि सफल खिलाड़ियों का  बखान ही नहीं महिमामंडन करने की जैसे  होड़ सी मची थी। । लेकिन तभी जम्मू कश्मीर में आतंकवादी हमला.... तीन जवान शहीद... और रायबरेली में ट्रेन हादसा, 32 की मौत की खबर आई। लेकिन चैनलों पर क्रिकेट पुराण जारी था। हादसे से जुड़ी खबरों को बिल्कुल चलताऊ तरीके से निपटाया जा रहा था। मसलन  रेल राज्य मंत्री ने की   मुआवजे की घोषणा...  दिए जांच के आदेश। सुर्खियां दिखाने के दौरान बस एकाध बार रेल राज्य मंत्री का चेहरा और फिर दुर्घटनास्थल का सामान्य फुटेज। जिसमें साफ नजर आ रहा है कि सरकारें बदलने के बावजूद यह वही रेल है, जिसे हम  सालों से इस्तेमाल करते आ रहे हैं।  विश्व कप  क्रिकेट पर भारत की बांग्लादेश पर जीत न हुई होती तो चार लोग चैनलों पर बहस के लिए बैठाए भी जा सकते थे। रेल व्यवस्था पर छाती पीटने के लिए। लेकिन ....।

 

लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और दैनिक जागरण से जुड़े हैं।

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तारकेश कुमार ओझा, भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर ( पश्चिम बंगाल) पिन ः721301 जिला पश्चिम मेदिनीपुर संपर्कः 09434453934

1 blogger-facebook:

  1. जब जुनून भगवान से भी ऊपर कर दिया जाये , तो देश में पागलपन की ही शुरुआत होती है , कुछ लोगों में उत्साहहए कुछ मीडिया ने इतना बढ़ा चढ़ा दिया कि किसी को और कुछ सूझ ही नहीं रहा है मैच क्या शुरू होगा देश थम जायेगा, अधिकांश व्यक्तियों के चेहरे के भाव बॉल दर बॉल बदलते जायेंगे चैनल ही नहीं हर व्यक्ति इस पर इतने मुगलती बहस करेगा गोया कि वह क्रिकेट का विशेषज्ञ हो टॉस जीतने के बाद भारत हार भी गया तो धोनी के निर्णय की न जाने कितने कोण से आलोचना होगी और भी न जाने क्या क्या तर्क दिए जायेंगे जीत के बाद की खुशियों का तो कोई ठिकाना ही नहीं शायद कुछ दर्शक तो ऐसे मिल जायेंगे जो शायद माँ बाप के मरने पर न रोते हों , रोये हों पर भारत के मैच के हारने पर रोयेंगे बाकि आपने जो लिखा वह हमारी दीवानगी का जीता जागता नमूना है यदि भारत कल नहीं जीता तो न जाने क्या हो जायेगा ,बेचारी अन्य टीमें भी जीत कर आती हैं , उनका जिक्र तक नहीं होता लगता है यह भी एक मानसिक बीमारी बन गयी है

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