शनिवार, 28 मार्च 2015

माड़भूषि रंगराज अयंगर की कहानी - सीमा

सीमा

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कुछ दिनों पहले ही सीमा इस घर में आई थी. पहले कहीं और किसी मुहल्ले में रहा करती थी. परिवार में चार बच्चे और पति थे. सबसे छोटी अंजू कोई कोई दो – पौने दो साल की होगी. इससे बड़े दो लड़के और एक लड़की थी रानी. बड़ा लड़का रजेश और छोटा विनोद दोनों बहनों के बीच का था.

बहुत समय से बड़े घर में जाने का इंतजार था सीमा को. पिछला घर तो एक ही बेडरूम वाला था. यह दो बेडरूम वाला मकान था. साथ में बहुत ही लंबा हॉलनुमा भीतरी बरामदा था इस नए घर में. किचन, स्टोर अलग. पिछवाड़े आंगन में बाथरूम टॉयलेट अलग - अलग थे. हाँ, बरसात के दिनों में टॉयलेट जाने के लिए थोड़ा बारिश में होकर जाना था. कुल मिलाकर नया मकान पुराने से बहुत ही बेहतर था

इधर मुहल्ले में बच्चे भी बहुत थे इसलिए बच्चों का भी मन लग गया था. पति नरेश तो रेल्वे की नौकर थे. उनका जाना खासकर गाड़ियों के वक्त पर निर्भर करता था. कभी दिन में तो कभी रात में जाते आते – इसकी खबर उनको ही होती थी. सीमा सुनती थी आज चार बजे जाना है जल्दी लंच कर, तीन बजे नाश्ता कर जाऊंगा. उसी तरह तैयार कर देती थी. कोई और सरोकार न था पति ड्यूटी के बारे में. बाद – बाद में वह जानने लगी कि फलाँ अप या फलाँ डाऊन गाड़ी में जाना - आना है. अब तो रेल्वे की समय सरिणी सीमा के दिलो -दिमाग पर अंकित थी. उसे कभी - कभी चिंता भी होती थी कि वे अब तक नहीं आए, कह गए थे 10 बजे आऊंगा, अब एक बजने को आ रहे हैं. कोई टेलीफोन भी तो नहीं हुआ करता था तब. मोबाईल तो जन्मा ही नहीं था. बस, दर पर खड़े इंजतार ही करना पड़ता था और हर आते जाते में उम्मीद करती कि वे आ गए हैं, फिर निराश होती.

वे अक्सर सायकिल से स्टेशन जाते थे. स्टेशन पर सायकिल-स्टेंड में रखकर ड्यूटी चले जाते और लौटते वक्त उसी से वापस आते. उनका तो रोज का आना जाना था इसलिए रिक्शा के लिए पैसे लगाना कोई अक्लमंदी का सौदा भी न था. आटो तो उन दिनों दिखते ही नहीं थे. शहर में गिन - गिन के दो चार स्कूटर होते थे, बाकी सब सायकिल सवार ही नजर आते थे.

मई का महीना था. दिन भर घर में सामान खोलना सजाना चलता था . शाम को छोटे बच्ची अंजू को गोद में लेकर सीमा दरवाजे पर खड़ी रहती थी - मुहल्ले वासियों को देखते हुए. कोई परिचित तो था ही नहीं. बच्चे बाहर आकर अपने हम उम्रों के साथ खेलने की कोशिश करते रहते. शुरुआत की तकलीफें झेली जा रही थी.

इसी समय सामने रहने वाली लड़की रीता की नजर सीमा पर पड़ी. न जाने क्यों उसे लगा कि सीमा अकेली पड़ गई है, उसका साथ देना चाहिए. रीता सीमा के पास गई, अपना परिचय दिया और उनसे परिचय लिया. इतने में देखा कि भीतर से एक अंकल दरवाजे पर आए जिसे रीता जानती थी. अब सारा राज खुला कि सीमा, नरेश अंकल की पत्नी है. नरेश रीता के पापा के मित्र थे वे अक्सर पापा से मिलने आते रहते थे. कभी परिवार के साथ नहीं आए इसीलिए सीमा से मुलाकात नहीं हो पाई थी.

धीरे - धीरे अँधेरा छाने लगा मुहल्ले के बच्चे खेल बंद कर घरों की तरफ बढ़ने लगे. सीमा के बच्चों ने भी घर की राह की. साथ - साथ सीमा भी भीतर जाते हुए, रीता को भी घर में ले गई. बच्चों से परिचय कराया और इधर - उधर की बातें होने लगी.

थोड़ी ही देर में रीता बहर आकर अपने भाई तारक को आवाज देने लगी. तारक अपने मित्रों के साथ नाले की पुलिया पर बैठे गपिया रहा था. आवाज सुनकर वह दीदी की तरफ हो लिया. दीदी ने उससे कहा कि इनके (सीमा के) घर में रोशनी नहीं है, ट्यूब लाईट नहीं जल रहे हैं. देख कर ठीक कर दे, ताकि बच्चे पढ़ सकेंगे. दीदी की आज्ञा पर तारक घर से अपने सामान ले आय़ा और लग गया रोशनी के फेरे में. कोई आधे घंटे में जरूरी दोनों कमरों में रोशनी हो गई. सीमा और रीता दोनों तारक की सहायता पर बहुत खुश हुए. धन्यवादों के ज्ञापन से निकलकर, तारक सामान घर पर रख फिर पुलिए पर आ गया. सीमा सोते वक्त तक देखती रही कि तारक का मजमा अब भी पुलिया पर जमा है. शायद उसने सोचा भी कि तारक पुलिए पर बैठकर समय गँवाने वाले उन लड़कों मे से ही है जिनको पढ़ाई की एकदम फिक्र नहीं होती.

दिन बढ़ते गए. सीमा के पुराने जानकार जो पुराने घर के पास रहते थे आने जाने लगे. मुहल्ले में भी लोगों से उनका परिचय होने लगा. तब जाकर शायद सीमा को खबर लगी कि तारक तो इंजिनीयरिंग में पढ रहा है. उन दिनों इंजिनीयरिंग में पढ़ने वाले को मेधावी समझा जाता था. लेकिन तारक को उनने कभी पढ़ते हुए देखा ही नहीं था. सुबह करीब साढ़े आठ बजे कालेज के लिए निकलता था, तो शाम छः बजे के आस पास ही लौटता था. शनिवार को दिन में तीन – साढ़े तीन बजे वापस आ जाता था.

नरेश अक्सर बताया करते थे कि तारक रोज शाम को करीब सात बजे रेल्वे प्लेटफार्म पर घूमते रहता है. मुँह में पान भरकर, कभी कभी तो पान की रस मुँह से लार की तरह निकलता रहता है. यह लड़का कभी इंजिनीयरिंग में पास ही नहीं हो सकता.

कभी - कभार रात में तारक ड्राईँग बनाते दिखता था. वह ड्राईंग का काम रोशनी के लिए सामने के बरामदे में किया करता था. बाकी उसके पढ़ने के लिए उनकी अम्मी ने किचन का कमरा खाली कर दिया था, जो घर के भीतर एक कोने में था. किसी के घर में आने जाने से भी वहाँ तक कोई शोर नहीं पहुंचता था.

सीमा का छोटी बेटी अंजू धीरे - धीरे मुहल्ले वासियों से वाकिफ होने लगी. रीता के कारण अंजू का परिचय तारक से भी होने लगा व अंजू तारक को अच्छी लगने लगी. अंजू ने अभी अभी चलने में स्थिरता पाई थी. तारक को देखते ही वह घर से भागते हुए, सड़क पार कर उनके दरवाजे पर पहुँच जाती थी. इसी बीच कोई न कोई तारक के फेंसिंग का दरवाजा खोल देता और अंजू दौड़ते हुए भीतर तारक तक पहुंच जाती. समय - असमय के कारण सीमा को हमेशा डर लगा रहता कि कभी अंजू किसी सायकिल या रिक्शा के चपेट में न आ जाए. पर ऊपर वाले की मेहरबानी कि अंजू कभी भी सड़क पर लड़खड़ाई नहीं. किसी भी समय किसी भी गाड़ीवान से उसकी टक्कर नहीं हुई. श्रेय केवल अंजू को नहीं, बल्कि मुहल्ले वालों को भी दी जानी चाहिए कि वे इतने सतर्क थे कि कभी कोई हादसा होने ही नहीं दिया.

समय को साथ साथ कुछ ऐसा होने लगा कि सोई हुई अंजू उठकर, खुमारी भरी आँखों से तारक के आते ही उसके घर चल पड़ती. पता नहीं नींद में उसे क्या होता, उसे कैसे खबर पड़ती कि तारक घर पहुँच चुका है , वह उठकर सीधे तारक के घर की तरफ चल देती और उसके साथ बैठकर चाय पीती, पराठे खाती. तारक की वजह से अंजू को भी चाय की लत सी लगने लग गई थी. दोनों के बीच यह कैसा संबंध बनता जा रहा था – यह किसी को समझ में आ ही नहीं रहा था.

साल डेढ-साल बाद रीता की शादी हो गई. फिर उनके पिताजी तबादले पर कहीं बाहर चले गए. इधर तारक की पढ़ाई चल रही थी. समस्या की बात यह थी कि जिन दिनों रीता के परिवार को नए जगह जाना था, उन दिनों तारक की परीक्षाएं चल रही थीं. इस पर तारक के पिता की नरेश से बातचीत हुई और आपस में तय हुआ कि परीक्षाओं के दौर में तारक सीमा के घर रह जाएगा और उसके बाद हॉस्टल चला जाएगा.

ऐन समय पर जब तारक के परिवार वालों का सामान ट्रक में चढ़ गया तब तारक अपना एक सूटकेस लेकर सीमा के घर आ गया. घर के सभी लोग तो परिचित थे ही. तारक को कोई नयापन नहीं लगा. वह जल्दी ही परिवार का सदस्य बन गया. सीमा अपने बड़े बच्चे सा उसकी पूरी देखभाल करती , पूरे मन से उसकी सेवा करती रहती कि उसे किसी प्रकार की तकलीफ न हो. खाने में भी उसके स्वाद का विशेष ख्याल रखती.

सीमा के इस अपनेपन ने तारक का मन जीत लिया. परीक्षाओं के बाद भी सीमा के कहने पर तारक उनके ही घर पर रह गया. बच्चे भी तारक से हिल मिल गए. उससे पढ़ने लग जाते, सवाल करते और उसे तंग भी करते. तारक भी इन सब बातों में अपना मन लगा लेता था. उसे बच्चों के बीच अच्छा लगने लगा था. इस लिए वहाँ से जाने का उसका भी मन नहीं करता था.

परीक्षा के बाद तारक का मन हुआ कि वह पिताजी के कहे अनुसार हॉस्टल चला जाए. किंतु उसका मन था कि सीमा के परिवार से हटता ही नहीं था. किसी तरह वह वहाँ से हॉस्टल चला तो गया किंतु किसी न किसी कारण वह सीमा के घर आता, अक्सर खाना खाकर ही रात को लौटता. दिन में तो कॉलेज के कारण आना नहीं हो पाता था.

एक दिन पता चला कि सीमा घर पर नहीं है. बच्चों ने बताया कि वह अस्पताल में भर्ती है. तारक को समझ में नहीं आया कि यह क्या और कैसे हो गया ? कोई विस्तृत जानकारी देने वाला नहीं था. बड़े कोई घर पर थे ही नहीं. इंतजार करते करते रात हो चली, तब कहीं जाकर नरेश घर आए और उनसे सारी खबर मिली. तारक तुरंत अस्पताल पहुँचा और सीमा को देखने के बाद ही उसका मन शाँत हुआ.

तारक के अस्पताल में रहते हुए ही नरेश आए. उनके पास एक समस्या थी कि रात में सीमा के पास किसी को रहना पड़ेगा. इसलिए घर पर बच्चों के साथ किसी की जरूरत रहेगी. दोनों में बात हुई कि एक घर पर रह लेगा और एक अस्पताल की जरूरतों को सँभाल लेगा. लेकिन समस्या वह थी ही नहीं .. सवाल था कि छोटी बेटी अंजू घर पर किसके साथ रह सकेगी. क्या वह तारक के पास रह लेगी, रात में सोएगी या सबको तंग कर देगी. फिर समस्या का समाधान बच्चे पर छोड़ते हुए निश्चय हुआ कि नरेश घर जाकर खाना ले आएँगे और इसी बीच छोटी बच्ची की मानसिकता जानकर आएँगे. उसके अनुसार, जिसे यहाँ रहना है वह रह जाएगा और दूसरा घर जाकर बच्चों को सँभाल लेगा. नरेश घर की ओर रवाना हो गए.

इधर सीमा और तारक में बात चल पड़ी कि अंजू किस के साथ रहना चाहेगी. दोनों का निर्णय़ एक सा ही था कि वह नरेश के साथ घर पर रहेगी और तारक को अस्पताल में रहना पड़ेगा. सोचते सोचते ही नरेश लौट आए. सीमा का खाना भी लेकर आए. आते ही बोले देखो तारक, अंजू को साथ लाया हूँ, वह घर पर तुम्हारे पास रहना चाहती है इसे घर ले जाओ. खाना मैंने इसे खिला दिया है. बाकी बच्चों को खाना खिलाकर सुला देना. तुम रात में घर पर ही रुक जाओ. ऐसा ही हुआ.

सुबह करीब सात बजे जब तारक तैयार होकर नाश्ता पैक कर रहा था तो अंजू भी जाग गई और उसके साथ मम्मी के पास जाने की कहने लगी. ठंड हल्की - हल्की ही थी इसलिए तारक ने उसे साथ ले जाने की हामी भर दी. बाकी बच्चे अभी सो रहे थे. बड़े को उठाकर, सजग रहने को कहकर तारक अंजू को साथ लेकर अस्पताल जा पहुँचा. वहाँ नरेश अंजू को देख कर धबराए कि शायद इसने रात भर तारक को सोने नहीं दिया. फिर सही खबर जानकर कि सब के सब घोड़े बेचकर सो गए सब खुश हुए. नरेश के साथ अंजू भी घर चली गई और तारक अस्पताल में सीमा के पास रह गया. यह सिलसिला कुछ दिन चला फिर सीमा घर वापस आ गई तो तारक लौटकर हॉस्टल चला गया.

कुछेक बरस बीते. तारक पढ़ाई पूरी नौकरी करने चला गया. पढ़ाई के दौरान सीमा ने तारक को बहुत करीब से देखा. उसका रहन-सहन, उसके विचार, काम करने कराने के, तौर तरीके, पहनावा, तहजीब सब पर गौर किया . अंततः वह उसे बहुत भाया. उसके मन में एक तीव्र इच्छा घर कर गई कि तारक को किसी तरह परिवार में जोड़ लिया जाए। उसने तारक के सामने धीरे से प्रस्ताव भी रख दिया कि वह उसकी बेटियों में से जिसे चाहे पसंद करे - एक से शादी कर ले.

जहाँ पसंद की बात आती थी तो तारक को अंजू ही पसंद थी. किंतु उनके पसंद में रोमाँस का लेश मात्र भी भाव नहीं था. वैसे भी दोनों मे कोई 15 बरस का अंतर भी तो था. एक बार तो सीमा ने हिम्मत कर अंजू और तारक दोनों के सामने भी संयुक्त रूप से प्रश्न रख दिया. अब दोनों के लिए मुसीबत हो गई. जवाब देना भारी पड़ रहा था. दोनों ने अब तक ऐसी सोच को कभी स्थान दिया ही नहीं था. हतप्रभ अंजू ने एक ही स्वर में जवाब दिया. माँ यह कैसे हो सकता है, कल तक तो उसे तारक भैया कहते थे. तारक ने भी इस बात पर हामी भर दी. दोनों तो संतुष्ट हो गए लेकिन सीमा रुष्ट हो गई. उसके सपनों का संसार जो चूर – चूर होकर बिखर गया था.

खैर, दोनों पक्षों के समझ-बूझ ने इसके बाद भी रिश्ते बनाए रखा बल्कि उनमें और भी प्रगाढ़ता आई. नरेश के रिटायरमेंट के बाद पूरा परिवार पटना स्थिर हो चुका था.

तारक का उनके घर आने-जाने का सिलसिला भी कायम था. सीमा अपने रिश्तेदारों से कहते थकती ही नहीं थी कि तारक मेरा सबसे बड़ा बेटा है. कुछेक रिश्तेदारों ने तो आश्चर्य प्रकट कर ही दिया. अरे सीमा, यह क्या पहले कभी इसके बारे में न तो बताया, न ही कभी सुना या देखा. तब जाकर सीमा उनके रिश्तों का ब्यौरा पेश करती और बताती कि कैसे तारक उसका बड़ा बेटा है.

बच्चे बड़े होने लगे रानी की शादी हो गई. अंजू के लिए भी रिश्ते देखे जाने लगे. उसका किसी प्रेम - पात्र माँ पिताजी को गवारा ना हुआ. बड़ी मुश्किल से अंजू ने माँ को रिश्ते देखने की अनुमति दी. नसीबवश ही कहिए जल्दी ही किसी दूर दराज के रिश्तेदार की शादी में एक लड़के ने अंजू को देखा और चाह बैठा. उसने अपनी तरफ से पता लगाया और नरेश के पास संदेशा पहुँचा. फिर क्या था, नरेश भी पूरे जोर से रिश्ते बनाने में लग गए. लड़का - लड़की ने एक दूसरे को देखा – लड़के वालों की मंजूरी भी आ गई, लेकिन यह क्या अंजू खामेश ! कोई जवाब ही नहीं आ रहा था.

उधर अंजू ने तारक से संपर्क किया. उसे बताया कि माँ-पिताजी ने मेरे प्यार को अपनाने पर ऐतराज किया है और एक नया रिश्ता तय कर रहे हैं. मेरा मन तो मानने को नहीं हो रहा है. बता क्या करूँ ? तारक को लगा कि हालात कुछ तनाव पूर्ण हो गए हैं. उसने अंजू को समझाने की कोशिश की कि माँ पिताजी यदि कोई रिश्ता तय कर रहे हैं तो अच्छा ही करेंगे लेकिन यदि तुम्हें कोई खास आपत्ति हो तो बताओ, मैं उनसे बात करता हूँ. अंजू भावुक हो गई और कहने लगी – तारक तुम आ जाओ, जितनी जल्दी हो सके. तुम्हारे हाँ कहने पर ही मैं मां – पिताजी को उस रिश्ते के लिए हाँ कह सकूंगी. उसने यह भी कहा कि मैंने तुमसे बात करने के बारे में किसी से नहीं कहा है हालातों को समझते हुए तारक किसी तरह नौकरी से छुट्टी मंजूर करवाकर पटना पहुँच गया. वहां तो अंजू को उसका इंतजार था, लेकिन घर वाले सभी चकित हो गए - कि यह अचानक कैसे ?

तारक की अँजू से विस्तार में बातचीत हुई. तारक ने पता लगाने की पूरी कोशिश भी की कि मना करने का कोई कारण विशेष है क्या ? अंजू के मन को भाँपकर तारक उस नए परिवार से मिला, लड़के के साथ मिल जुल कर, साथ घूम-फिर कर उसके बारे मे जानकर, उसने अपनी राय से अंजू को अवगत कराया कि वह अच्छा लड़का है. अंजू को समझाया कि उसे शादी के लिए हाँ कर देना चाहिए. हफ्ते भर बाद सबको दुआ सलाम करता हुआ तारक अपने कार्यस्थल लौट गया. दो – तीन दिनों में जब अंजू ने अपनी माँ को, उस लड़के से शादी के लिए रजामंदी जता दी तब किसी को समझ में नहीं आया कि ऐसा क्या हो गया कि महीनों से अटका फैसला आज अपने आप आ गया. देर सबेर उन्हें तो अंदाजा हो ही गया कि इसमें तारक की कोई भूमिका है.

सीमा ने तारक से संपर्क कर जानना चाहा कि मामला क्या है. तारक ने पूरी बातों का खुलासा किया कि अंजू उस लड़के के बारे में मुझसे हामी चाहती थी. इसलिए वहाँ आकर, लड़के से मिलकर मैंने अपनी मंजूरी उसे बता दी और तब ही उसने शादी के लिए हामी भरी है. सीमा की आँखें छलक गईं. मुँह बोले भाई के प्रति इतना विश्वास कि माँ - पिताजी से भी छुपकर उसे बुलाया, लड़का दिखाया, मिलाया और उसके हाँ कहने पर ही शादी की हामी भरी. कितना निश्छल, निर्मल और पवित्र प्यार था दोनों में. शायद सगे भाई बहनों से भी ज्यादा.

कुछ ही समय में शादी की तारीख तय हुई और उस समय परिवार वालों के बीच अंजू ने एक अजीब सी शर्त रख दी कि तारक को एक महीने पहले आना होगा. और तारक भी इसके लिए तैयार हो गया. समयानुसार तारक आ भी गया और शादी बड़े धूम धाम से संपन्न हुई. तारक ने शादी में लगी चाँदी ने जिम्मा ले लिया. अंजू को इसकी खबर ही नहीं थी. अगले नवरात्र को लक्ष्मी पूजन पर अंजू को खबर लगी तब उसे समझ आया कि वह तारक से बेमतलब ही लड़ रही थी कि उसने कोई शादी का तोहफा नहीं दिया.

दोनों लड़कियों की शादी हो चुकी थी. अब सीमा को अपने मकान की हालत परेशान कर रही थी. वह चाहती थी कि पुरानी तरह से बना मिट्टी की दीवारों वाले मकान को नरेश के रहते हुए कंक्रीट खंभों वाला बना लिया जाए. लेकिन खर्च की सोचकर उनके रोंगटे खड़े हो जाते थे. तारक को भी इसकी खबर लगी. उसे भी तो कहीं अपने लिए एक मकान बनवाना ही था. उसने हालात का जायजा लिया, समझ और चाहा कि अपनी कंपनी से कर्ज लेकर मकान बनाया जा सकता है. इसी दरमियान सीमा के मकान का भी जीर्णोद्धार संभव है. लेकिन कंपनी का एक शर्त है कि मकान बनाने के लिए जमीन कर्ज से ही खरीदी जाए या फिर कर्जदार के पास कोई अपनी जमीन हो. यहाँ दोनों शर्तें पूरी नहीं हो पा रही थीं. इस पर तारक ने अपनी कंपनी के कुछ विश्वास पात्र लोगों से बात किया तो पता चला कि एक होता है, रूफ राईट – जिसके तहत ऊपरी मंजिल पर मकान बनवाने का अधिकार कर्जदार के नाम पर लेने के बाद, उस पर कंपनी मकान के लिए कर्ज देती है. बात तारक को अच्छी लगी. उसने सोचा यदि सीमा-नरेश को घर की छत पर मकान बनाने का अधिकार देने में कोई हर्ज न हो तो मकान का पुनरुद्धार हो जाएगा.

इन सब सोच में डूबा तारक एक दिन इसका जिक्र नरेश से कर बैठा. नरेश को भी बात बहुत जँची. उनने इस पर बड़ी गंभीरता से सोचा. फिर बोले – तारक सुनो धीरज से सुनना. तुम हमारे परिवार के लिए जो कर रहे हो उसके बारे में मैं शुक्रिया कैसे अदा करूँ, समझ में नहीं आता. तुम्हारी बात समझ में तो आ रही है कि इस तरह छत पर मकान बनाने का अधिकार देने मात्र से तुम अपनी कपनी के कर्ज से ऊपर तो मकान बनवा ही लोगे साथ ही साथ कंक्रीट के खंभों पर निचला हिस्सा भी बन जाएगा. बहुत अच्छे विचार हैं. किंतु तुम्हें अभी दुनियाँदारी की जानकारी नहीं है.

जब तक हम हैं तब तक तो बात निभ ही जाएगी या निभा ली जाएगी. लेकिन हमारे बाद इनमें से कोई तुम्हारा होगा या नहीं होगा – कौन जाने? ये बच्चे बड़े होकर तुम्हारे साथ किस तरह का संबंध निभाएंगे, यह आज कैसे कहा जा सकता है? दामाद तो आ ही चुके हैं, कल इस घर में दो बहुएं भी आएँगी. कल का माहौल कैसा होगा उसकी तो आज भगवान को भी खबर नहीं होगी घर बनने के बाद यदि तुम्हारी किसी से नहीं बनी, तो आदतन, तुम उसे छोड़ - छाड़ कर कहीं चल दोगे. तब तुम्हारे पास रहने का कोई ठिकाना भी नहीं होगा. इस लिए मेरी राय है कि तुम इस पचड़े में न पड़कर, किसी अलग जगह पर, इस शहर में या कहीं और जहाँ तुम्हें उचित लगे कोई अलग मकान बना लो.

बात तो दिल को लगी किंतु तारक के पास इसे मानने के अलावा कोई चारा भी न था. उसने उसी शहर में कोई दूसरा बना बनाया मकान खरीदने की कोशिश शुरु कर दिया. एक सवाल था कि उस मकान को सँभालेगा कौन? तारक को तो नौकरी के कारण यहाँ – वहाँ तबादले पर जाना पड़ता है.

बड़े ने कहा, मैं सँभाल लूँगा, तुम चिंता मत करो. फिर क्या था, जोर शोर से कोशिश होने लगी. इसी बीच बड़े की शादी हो गई और बहू भी मकान देखने कभी - कभार साथ चलने लगी. एक बार बहू ने तारक से पूछा - तुम इस शहर में मकान किसके लिए ले रहे हो? तारक ने मासूमियत के साथ जवाब दिया - तुम लोगों के लिए. इसीलिए तो तुम्हारी पसंद का देख रहा हूँ ताकि तुम लोग वहाँ खुशी - खुशी रह सको. बहू बहुत ही संपन्न घर से आई थी, उसे लगा ये मेरे लिए मकान खरीदेगा ? और अपने चेहरे पर वैसा ही भाव जाग्रत भी किया. बस क्या था, तारक ने तय कर लिया कि मकान पटना में नहीं होगा.

जब यह बात सीमा को पता चली, तब उसने तारक को समझाया कि नरेश ने उन्हे बतया था कि - यही बात उनके मन को परेशान कर रही थी जब तुमने छत पर मकान बनाकर इस मकान को सुधारने की बात की थी. वो बता रहे थे कि तारक को बुरा तो लगा होगा, पर समय आने पर वह समझ जाएगा. देखो एक बहू के आने पर ही ऐसे हालात हैं कल दूसरी आएगी और दामाद जी ने तो अभी मुँह खोला भी नहीं है. न जोने क्या होगा. भगवान ने सद्बुद्धि दिया कि गलत काम नहीं हुआ. तुम कहीं भी मकान बनाकर खुशी से रहना.

रिटायरमेंट के बाद उसी में जीवन यापन की सोच, अगले दो तीन सालों में तारक अपने किसी रिश्तेदार की सहायता से कोचीन में घर बनाया.

आज भी तारक की सीमा के परिवार से मिलना जुलना उसी तरह चल रहा है. सब की उम्र बढ़ी जा रही है. पुरानी पीढ़ी हट रही है, नई पीढ़ियाँ शामिल हो रही हैं, किंतु उनका पारिवारिक रिश्ता वैसे ही अटूट बंधनों में बँधा चला जा रहा है.

परिचय

नाम – माड़भूषि रंगराज अयंगर.

चित्र -

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प्रदर्शित नाम – एम. आर. अयंगर.

नाम से - मद्रासी ( तमिलनाड़ु से).

पैदाइशी – आँध्र प्रदेश से.

पढ़ाई – बिलासपुर , छत्तीसगढ़ से.

नौकरी – महाराष्ट्र, हरियाणा, असाम, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात

अंत में फिर छत्तीसगढ़.

ज्यादातर समय – 1957 से 1979 तक फिर 1991 से 2008 और अब 2011 से अब तक छत्तीसगढ़ में. इसलिए ज्यादा - छत्तीसगढ़ी.

जन्म – 13 अक्तूबर 1955.

शिक्षा – रविशंकर विश्व विद्यालय, रायपुर के बिलासपूर (छत्तीसगढ़) कालेजों

से बी एस सी, बी ई (विद्युत) - पूरी

ऑल इंडिया मेनेजमेंट एसोशिएशन, दिल्ली से

डिप्लोमा इन मेनेजमेंट.

लेखन - हिंदी कविता से शुरु,

हिंदी में और हिंदी पर लेखों की तरफ मुखरित,

प्रकाशन - अखबार में, हिंदीकुंज.कॉम पर, रचनाकार.ऑर्ग पर,

नराकास की पत्रिकाओं में, विभिन्न हिंदी कार्यालयीन पत्रिकाओं में,

अपने ब्लॉगों पर.

अपने ब्लॉग – laxmirangam.blogspot.in, madabhushiraju.blogspot.in, चलन में.

दो और ब्लॉग kunnirangadu.blogspot.in (English) laxmirangam.wordpress.com ( new- Hindi)

प्रकाशित पुस्तकें – अब तक कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं की है.

पेशा – 1982 से इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन में कार्यरत, प्रस्तुत कोरबा छत्तीसगढ़ में वरिष्ठ निर्माण प्रबंधक.

संप्रेषण हेतु पता – सी 728, कावेरी विहार, एन टी पी सी टाऊनशिप, जमनीपाली, कोरबा, छत्तीसगढ़, 495450.

मो. 8462021340..

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एम.आर.अयंगर.

मो. 8462021340

laxmirangam@gmail.com

सी 728, कावेरी विहार,

एन टी पी सी, जमनीपाली ,

कोरबा ( छ ग).

494450.

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