मंगलवार, 17 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - (सु)गंध से पहचानें इंसान को

गंध से पहचानें इंसान को

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

हर तत्व का अपना आभामण्डल होता है और उससे संबंधित रंग-रूप, गंध, शब्द, स्पर्श का प्रभाव रहता है।  इनमें गंध का भी विशेष महत्त्व है।

यह गंध न सिर्फ हमारे खान-पान और व्यवहार को इंगित करती है बल्कि हमारे मन-मस्तिष्क की मलीनता और सडान्ध को भी व्यक्त करती है।

शुद्ध-बुद्ध और सात्ति्वक लोगों से हमेशा सुगंध आती रहती है और यह दूसरों को भी भाती है। इसके विपरीत मैले मन और प्रदूषित शरीर से तीखी बदबू आती है।

मनुष्य की रोजमर्रा की जिन्दगी और व्यवहार, चरित्र और चाल-चलन से लेकर वैचारिक भावभूमि के अनुरूप की सुगंध या दुर्गन्ध आती है। कोई भी मनुष्य ऎसा नहीं हो सकता जिसके शरीर से गंध न आती हो।

कई बार विलक्षण प्रतिभा वाले लोग गंध के आधार पर ही सामने वाले मनुष्य की पहचान कर लिया करते हैं और गंध से ही उन्हें पता चल जाया करता है कि कौन अच्छा है और कौन बुरा।

गंध के भी अनेक प्रकार हैं जिनसे मनुष्य के बहुआयामी व्यक्तित्व और चरित्र की थाह पायी जा सकती है।  जो व्यक्ति प्रकृति और मनुष्य स्वभाव के जितना करीब होगा उसकी गंध में सामने वालों को आकर्षित करने की क्षमता होती है और यही कारण है कि बिन्दास लोग, प्रकृति के सामीप्य और सान्निध्य में रहने वाले और शुद्ध चित्त वाले लोग हमेशा आकर्षण का केन्द्र होते हैं।

इन लोगों की इस क्षमता का मूल कारण चित्त की शुचिता होता है और जहाँ मन और मस्तिष्क दोनों ही पवित्र होते हैं वहाँ मुग्ध कर देने वाली गंध का प्रभाव हमेशा बना रहता है।

इसके विपरीत जिन लोगों का खान-पान, चरित्र और व्यवहार सात्ति्वक नहीं होता, उन लोगों के शरीर से हमेशा ऎसी गंध आती रहती है जिसे कोई पसंद नहीं करता।

ऎसे लोगों के जिस्म से भांति-भांति की गंध आती रहती है। चित्त और मस्तिष्क में प्रदूषण होने के साथ ही इनका खान-पान भी हितभुक, मितभुक और ऋतभुक् नहीं रहता है और इस वजह से तरह-तरह के प्रदूषण के कारण अलग-अलग प्रकार की तीक्ष्ण गंध निकलती रहती है।

इस गंध का अहसास खुद को नहीं होता है क्योंकि ये लोग तरह-तरह की गंध से जुड़े खान-पान और विषयों में हमेशा रमे रहते हैं और इस कारण कोई भी गंध इन्हें नई या अनमनी नहीं लगती।

हमारे आस-पास और संपर्कितों में अक्सर खूब सारे लोग होते हैं जिनके शरीर से सुगंध या दुर्गध निकलती रहती है ।

कई सारे लोग तो ऎसे भी होते हैं जो कि जहां बैठते हैं वहाँ से उनके चले जाने के बाद भी काफी देर तक सडांध आती रहती है।  इसके आधार पर भी किसी भी इंसान की वृत्ति को अच्छी तरह पहचाना जा सकता है।

जिनके शरीर से सुगंध निकलती है, जिनकी गंध से सुकून प्राप्त होता है वे लोग मन और मस्तिष्क दोनों से सात्ति्वक और शुद्ध-बुद्ध होते हैं और ऎसे लोगों का सामीप्य हर कोई पसंद करता है। जबकि जिन लोगों के शरीर से दुर्गन्ध आती है उन लोगों के पास बैठना भी कोई पसंद नहीं करता है।

हालांकि दुर्गन्ध देने वाले लोगों के समक्ष उनकी सडांध के बारे में कोई कह पाने का या तो साहस नहीं जुटा पाता अथवा फालतू में वाद-विवाद नहीं चाहता, इस कारण कोई बताता नहीं है।

दूसरी ओर सडांध वाले इंसान को अपनी बदबू का आभास कभी नहीं होता क्योंकि उसकी नाक सडान्ध की अभ्यस्त हो जाया करती है।

कोई कहे या न कहे लेकिन यह तथ्य है कि किसी भी इंसान की गंध के आधार पर सटीक और सही-सही पहचान कर पाना संभव है। सुगंध और दुर्गन्ध के आधार पर इंसान के चाल-चलन को अच्छी तरह परखा जा सकता है। जिसके जिस्म से दुर्गंध आए वह इंसान अच्छा कभी नहीं हो सकता।

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