गुरुवार, 26 मार्च 2015

पाठकीय - प्रतिभा अंश : एक सोच

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पसंद करके तो लाते हैं, पर पसंद नहीं करते मैंने कभी दुख को न तो देखा है, न ही कभी समझा बल्‍कि उसे महसूस किया है।

यह लेख उन सभी महिलाओं के लिए है, जो इस दुःख से ग्रसित तो हैं, पर न तो वो किसी से कुछ कह पाती हैं, और न कुछ कर पाती हैं, जब हम माता-पिता अपने बेटे की शादी करते है, तो हमारे न जाने कितने सपने होते हैं, औेर हम हर एक सपने को पूरा करने का प्रयास करते हैं।

जब बात शादी की हो तो इसमें सबसे अहम किरदार लड़के के लिए लड़की का ढूंढना होता है। हम अपने बेटे के लिए न जाने कितनी लड़कियों को नापसंद करार दे देते हैं। जब हमें लड़की पसंद आ जाती है, तब हम उसे हर तरह से परखते हैं, कि लड़की में कोई अवगुण तो नहीं , लड़की हमें सर्वगुण सम्‍पन्‍न लगती है, तब हम उसका रिश्ता अपने बेटे के लिए तय करते है; लेकिन कोई मुझे बताएँ ऐसा क्‍यों होता है, कि वही लड़की जिसे हम हजारों में से छाँट के लाते है, कुछ समय के बाद वही लड़की हमें खटकने लगती है।

ऐसा लगने लगता है कि हमने अपने बेटे के लिए गलत लड़की का चयन कर लिया है। मैं आप सब से पूछती हूँ ? क्‍या यह पूर्ण रूप से सत्‍य है।

मुझे दो-तीन बातें बहुत अटपटी सी लगती है, पहली जो ये कि हम सिर्फ लड़की से ही उम्‍मीद क्‍यों करते हैं, हर परिवार के कुछ नियम होते हैं, वो नियम सिर्फ महिलाओं के लिए ही क्‍यो? क्‍यों बहू को ही घर परिवार के लिए अपनी नौकरी से समझौता करना पड़ता है। उसके साथ सौतेला व्‍यवहार हम क्‍यों करते है। क्‍यों उसके द्वारा कहे गलत शब्‍दों को हम दिल से लगा लेते है।

जब गलती हमारी बेटी या बेटा करता है। तब हम उसे बड़े प्‍यार व अपनेपन के साथ समझाते है, पर जब गलती बहू से होती है, तब हम उसे सहन नहीं कर पाते हम ऐसा क्‍यों नहीं करते कि उसकी गलती पर बिना कुछ कहे उसे गले से लगाकर उसे अपनेपन का एहसास दिलाएँ ,पर हम ऐसा नहीं करते क्‍यों? हम तो उसके माता -पिता के पास उसे भेज देते हैं क्‍या यह सही निर्णय होता है? कल तक जो बहुत प्‍यारी थी, आज वही अचानक बहुत बुरी लगती है।

कल जो लड़की जिन्‍दगी को जिन्‍दादिली से जीया करती थी आज वो सिर्फ जी रही है। वो किसके पास जाए समझ नहीं पाती अगर वो जाती भी है तो कैसे कहे कि जो लोग कल तक उसे पसंद करते थे , आज वही उसे नापसंद करने लगे हैं। आज मैं-आप से पूछती हूँ कि क्‍या हमारा कोई दायित्‍व नहीं बनता कि हम कुछ ऐसा करें जो समाज व परिवार के लिए एक सकारात्‍मक सोच को पेश करे। मैं चाहती हूँ कि हम अपने रिश्तों को बिना किसी भेद-भाव के निभाएँ जहाँ अपनेपन का एहसास हो जहाँ एक -दूसरे को यह एहसास हो कि हमारे साथ वाले सभी मेरे अपने वो हर-हाल में मेरा साथ देंगे । इस प्‍यार व अपनेपन से ही हमारी बच्‍चियों को एक नई ऊर्जा मिलेगी और वे जिंदगी कि हर लड़ाई को जीत जाएँगी और शायद यह कभी न कह पाएँगी कि ” पसंद करके तो लाते , पर पसंद क्‍यों नहीं करते, और इस प्रकार शायद एक नई नारी का जन्‍म होगा ।

प्रतिभा अंश

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  1. प्रतिभा जी,

    सवाल तो आपने सही उठाए हैं और ये हम सभी अनुभव करते हैं और जानते भी हैं. लेकिन हममें अपनी कमी को मानने की हिम्मत नहीं है. लड़की तो हमने ही चुनी है - जाँच परख कर ( ये बात और है कि जाँच परख करना ही अपने आप में अन्याय है.). फिर यदि सही चुनाव नहीं हुआ तो लड़की गलत क्यों? हम अपनी गलती क्यों नहीं मानते. दूसरा - अपने पराए का भेदभाव. - जब तक बहू को अपनाएंगे नहीं, तब तक कोई भी उससे बेटी सा बर्ताव नहीं कर पाएगा/ गी. इस घर में बहू नई है , उसे अपनत्व का भाव हमें ही देना होगा. मेरी सोच है कि यदि ऐसा हो तो कई सवाल उटने के पहले ही दब जाएंगे. सवाल का अंत भले न हो वह कम असरदार हो जाएगा. अंत में कहना चाहूँगा कि आपने सवाल तो किया लेकिन अपनी राय देने में आपने वो दृढ़ता नहीं दिखाई जो आपके ब्लॉग संदेश में देने की कोशिश की गई है.

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