सोमवार, 16 मार्च 2015

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - बिन बेटी नवरात्र नहीं, अबला नहीं हैं बेटियां

21 मार्च नवरात्रि पर विशेष
बिन बेटी नवरात्र नहीं, अबला नहीं हैं बेटियां


देशभर में इक्कसवीं शादी का शुरूआती दौर एक बड़ी चिंता के रूप में नये अभियान को जन्म दे चुका है। वह महत्वपूर्ण अभियान किसी सरकार अथवा संस्था से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि उसका प्रत्यक्ष संबंध एक-एक व्यक्ति से है। उक्त अभियान की सोच तब हमारे समाज में जरूरी समझी जाने लगी, जब हमारे स्वार्थ के चलते स्थिति ही नहीं गड़बड़ायी बल्कि प्रकृति का नियम भी मनुष्योंद्वारा तहस-नहस कर दिया गया। मानवीय समाज के सुचारू रूप से आगे बढ़ाने के लिये लिंगानुपात का समान होना बेहद जरूरी है। जो अब पूरी तरह असंतुष्टि दिखायी पड़ रहा है। हमारे समाज में बेटियों को बाहर की दुनिया की दिखाने से पूर्व ही यमलोक का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया। बेटों की चाहत और बेटियों के पराया धन होने की सोच ने उक्त स्थिति निर्मित की। अब सिथ्ज्ञति ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ी है कि वंश को आगे बढ़ाने का प्रतीक माने जाने वाले लड़कों के लिये लड़कियां ही नहीं मिल रही है। क्या  यह संभव है कि अकेला लड़का समाज को जिंदा रख सकता है? जब प्रत्येक मनुष्य यह समझता है कि समाज का निर्माण युवक एवं युवती के जीवन साथी बनने के बाद ही संभव हो सकता है, तो फिर पुत्री के रूप में जन्म लेने वाली आवश्यक कड़ी को मारने का दुःसाहस कैसे किया गया? क्या मनुष्य धर्म शास्त्रों के इतिहास को भी भुल चुका है? यही कारण है कि अब हमारी सरकार बेटी बचाओ अभियान को महत्व दे रही है


पौराणिक काल से पूजी जा रहीं बेटियां
किसी भी धर्म से अलग हिंदू धर्म ही है जो पौराणिक काल से बेटियों को महत्व देता आ रहा है। बेटी के जन्म को कभी किसी देवता के नाम से संबोधित नहीं किया गया है। हिंदू धर्म ही ऐसा गौरवशाली धर्म है, जिसे वर्ष में 18 दिन कन्या पूजन का अवसर प्राप्त होता है। हिंदी पंचाग के चैत्र एवं क्वांर नवरात्र माह में मनाया जाने वाला नवरात्रि का पर्व हमें सदियों से बेटियों के सम्मान का संदेश देता आ रहा है। दोनों नवरात्रि पर्व पर एकम से लेकर नवमीं तक कन्याओं का पूजन कर उन्हें स्वादिष्ट भोजन करने की परंपरा चली आ रही है। जहां तक संभव हो प्रत्येक हिंदू परिवार जो मां .....के नवरात्रों पर व्रत करता आ रहा हे वह तीन वर्ष से लेकर ग्यारह वर्ष तक की बालिकाओं को भोजन और मिष्टान खिलाकर नौ देवियों तुल्य उन्हें श्रृंगार की सामग्री प्रदान कर अपने व्रत की महिमा को फलीभुत करना चाहता है। यही कारण है कि बेटी का जन्म महज परिवार वृद्धि न मानकर लक्ष्मी का स्वरूप मानते हुए मंगल और समृद्धि का सूचक माना जाता है। हमारे धर्म शास्त्रों में देवी-देवताओं का नाम भी देवियों की प्रमुखता से संबंद्ध है। भगवान की पूजा अथवा नाम्मोचारण भी सीता-राम, राधा-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण, गौरी-शंकर के रूप में किया जाता है।


बेटियों के लिये हों नौ-संकल्प
बेटियों को समाज में गौरवशाली स्थान दिलाने के लिये हमें कुछ संकल्प इस प्रकार लेने होंगे, जिससे बच्चियों का मनोबल उन्हें आत्मबल प्रदान करें। सबसे पहले हमें उस कहावत को त्यागना होगा, जिसमें बेटी को पराया धन के रूप में संबोधित किया जाता है। हमें बेटियों को यह बताना होगा कि वह भी परिवार एक ऐसी सदस्य है जिससे परिवार गौरवान्वित हो सकता है। वह लड़कों की तरह उच्च पद प्राप्त करने उच्च शिक्षा की हकदार है। माता-पिता को इस सोच को भी छोड़ना होगा कि बेटी के के हाथ पीले कर विदा करना ही उनका परम कर्तव्य है। जहां तक मैं सोचता हूं कि बेटियों को अपना गौरव बनाने के लिये जुड़ाव बनाना हमें मुख्य रूप से नवरात्रि पर्व की पूजा को ध्यान में रखते हुए नौ संकल्पों से जुड़ाव बनाना होगा। उन नौ संकल्पों में सबसे पहले बेटी की प्रारंभिक शिक्षा अच्छे शैक्षणिक वातावरण में संपन्न करानी होगी।

इससे पूर्व बेटी के जन्म के साथ ही उसके उज्जवल भविष्य की चिंता करते हुए उसके लिये सुरक्षित धन राशि भी जमा की जानी चाहिये। बेटी की स्वास्थ्य सुरक्षा से संबंधित सारे वेक्सिन भी समय पर पूरे किये जायें। यह भी संकल्पना लेना होगा कि बेटी की शैक्षणिक परिवेश किसी भी रूप में बेटों की तुलना में कम न हो। बेटियों को इस प्रकार का संबल प्रदान किया जाना चाहिये जो उन्हें समाज में कमजोर न बनने दें। परिवार में अन्य सदस्यों के साथ किया जाने वाला व्यवहार एवं प्यार स्नेह उसे भी बराबरी के हक के साथ देना हमारा कर्तव्य होना चाहिये। उसकी इच्छा के अनुसार हर प्रकार की कला में निपुण होने उसे प्रशिक्षण से न रोका जाये। अकेले आने जाने की रूकावट भी उन्हीं परिस्थितियों में हो जहां वह बहुत जरूरी हो। आत्मविश्वास पैदा करने के लिये उसे निर्णय की स्वतंत्रता देना भी गलत नहीं होगा, बशर्ते की सामाजिक रीति-रिवाजों का उल्लंघन न हो।


देवी का हर स्वरूप झलकता है बेटियों में
नवरात्रि पर्व पर हम नौ दिनों का व्रत धारण कर मंदिरों में माजा के दर्शन करने जाया करते है और अपने तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते है। हम मां के नौ स्वरूपों की उनके निर्धारित तिथि पर विधि-विधान से पूजा करते हुए मंगल कामना करते है। मां का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री  के रूप में हम सभी को नौ दिन के व्रत के लिये असीम शक्ति प्रदान करता है। नवरात्रि का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी की की पूजा से संबंधित बताया गया है। तपस्या और आचरण से संबोधित किया जाने वाला मां यह स्वरूप घर की बेटी की तपस्या और सबके साथ प्रेम-व्यवहार स्वरूप देखा जा सकता है। मां के इस स्वरूप की पूजा व्रति को तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम आदि जैसा संस्कार प्रदान करती है। तृतीय दिवस मां चंद्रघण्टा की अराधना से भक्तों को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन एवं शांति  प्राप्त होती है। चतुर्थ दिवस मां कुष्माण्डा ब्रम्हाण्ड की रचियता के रूप में पूजी जाती है। इनकी पूजा से श्रद्धालुओं के रोग, शोक का नाश होता है। पंचम स्कंदमाता मोक्ष के द्वारा खोलने वाली मानी गयी है।

मनुष्यों की हर उपासना मां के इस स्वरूप की पूजा से पूर्व होती है। छठवें दिन मां कात्यायनी अपने भक्तों के पापों को नाश कर मनोवांछित फल प्रदान करती है। इस तरह सावतें दिन मां कालरात्रि हमारे जीवन में आये अंधकार को दूर करती है। आठवें दिन महागौरी का स्वरूप हमें भविष्य में भी क्लेशों और संकटों से बचाने वाला होता है। अत्यंत शांत मुद्रा वाली मां महागौरी हमें अपनी सौम्य बेटी की तरह ही दिखायी पड़ती है और अंतिम तथा नवें दिन मां सिद्धिरात्रि सभी प्रकार की सिद्धियों पर हमें विजय दिलाती है।
मां के नौ दिन की पूजा अर्चना को किसी भी प्रकार बेटियों के मान सम्मान से जोड़कर देखना ही भारतीय संस्कृति का संदेश है। यदि बेटियां ही उपेक्षा कर दी जायेगी तो यह निश्चित मान लेना चाहिये कि देवी अराधना कोई फल प्रदान नहीं रुक सकेगी। घरों तथा समाज में बेटियों का स्थान दैविय माना जाना चाहिये। ऐसा कहा भी जाता है कि जिनका भाग्य अच्छा होता है वे पुत्र के माता पिता बनते है, किंतु जिनका सौभाग्य अच्छा होता है वे बेटियों के माता पिता कहलाते है। बेटियों का जन्म परिवार की सुख समृद्धि का द्योतक माना जाता है। नवरात्रि पर्व ही नहीं पूरे वर्ष भी बेटियों के रूप में देवी के दर्शन उन परिवारों को मिलते है, जहां बेटियां जन्म लेती है। हमारा समाज बेटियों के इसी उपकार को समझ ले तो बेटी बचाओ जैसे अभियान की जरूरत नहीं पड़ेगी।

 

 


                                           प्रस्तुतकर्ता
                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                    मो. नंबर 94255-59291

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