गुरुवार, 19 मार्च 2015

सागर आनन्द की गज़लें

सागर आनन्द की ग़ज़लें

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1
आइये हम मिलें खुश्बुओं की तरह
क्या पता फिर मिलें हादसों की तरह


कुछ जगह दिल में हो दोस्ती के लिए
हम मिलें न मिलें दिलबरों की तरह


तब समझते हैं हम सांस की कीमतें
मौत आती है जब जलजलों की तरह


तुमको अपना कहूं या कहूं ग़ैर हो
तुमने चाहा भी तो सरफिरों की तरह


सोचता हूं हमें क्यूं न सागर मिला
हम बहे तो मगर आंसुओं की तरह

2

बहुत उलझे अन्धेरे हैं चरागों का पता दे दो
नज़र कुछ भी नहीं आता नज़ारों का पता दे दो


तेरी चुप्पी के पिंजरे में कहां तक फड़फड़ाउं मैं
बहुत भटके सवालों में ज़वाबों का पता दे दो


न रुठे हम खिजाओं से न रुठे हम पलाशों से
ज़रा खुशबू की चाहत है गुलाबों का पता दे दो


बहुत दौड़े हैं यारों हम दवाओं की दुकानों में
दवाओं में असर कम है दुआओं का पता दे दो


मुहब्बत के मुहल्ले को सलामत भी तो रखना है
मुहब्बत के मुसाफ़िर को वफ़ाओं का पता दे दो


बिना खिड़की के कमरों में ज़रा सांसें संवरने दो
शहर की तंग गलियों को हवाओं का पता दे दो


न रोकें हम परिंदों को खुले अंबर में उड़ने से
परिन्दे पर कटे हों गर पनाहों का पता दे दो

3

दिल हमारा भी वो दुखाते हैं
हमको टुकड़ों में आजमाते हैं


बात उनसे भला छुपाउं क्या
बात पहले ही जान जाते हैं


रोज थकती सी मेरी यादों में
शाम ढलते वो याद आते हैं


उनके बारे में बात जाहिर है
बात टुकड़ों में वो बताते हैं


डूब जाता है कोई सागर भी
अपनी आंखों में यूं डूबाते हैं


4
तेरी मर्जी है तुम जिधर देखो
मेरी मानो तो तुम इधर देखो


सारे रिश्ते हैं मतलबी यारों
सोचकर यार तुम अगर देखो


ख़्वाब देता है ख़्वाब छिनता है
कैसा जालिम है ये शहर देखो


वक़्त मंज़िल का खुद पता होगा
ये ज़रुरी है तुम सफ़र देखो


ये भी रहते हैं इस ज़माने में
ज़र्द चेहरों को एक नजर देखो


चोट खाकर जो लोग हंसते हैं
यार उनका ज़रा ज़िगर देखो

5
हमको झूठी दीवाली नहीं चाहिए
ख़्वाब खाली ख़्याली नहीं चाहिए


बेवज़ह खींचता है हरेक बात को
हमको ऐसा बवाली नहीं चाहिए


तुमको चाहूं तो अपना कभी कह सकूं
हमको झूठी ये ताली नहीं चाहिए


सुर्ख रंगों की चाहत हमें है मगर
खूने-खंजर की लाली नहीं चाहिए


जो हक है हमारा वही दीजिये गर
हमको भीखों की थाली नहीं चाहिए

6

वक़्त की अंगनाइयों में रख मुझे
वस्ल की रानाइयों में रख मुझे


नींद के कमरे में तेरा साथ हो
नींद की नरमाइयों में रख मुझे


मैं किसी की चाहतों का मौन हूं
प्यार की परछाइयों में रख मुझे


फूल हूं या ख़ार हूं जैसा भी हूं
याद की अलमारियों में रख मुझे


दिन तेरी मर्जी का हो,  मंजूर है
रात की तन्हाइयों में रख मुझे


तू खुशी की खुश्बुओं में खुश रहे
ज़ख़्म की जम्हाइयों में रख मुझे

7

कोई हमसे खफा न हो जाये
कोई अपना जुदा न हो जाये


दर्द इतना भी न अता करिये
दर्द दिल की दवा न हो जाये


आज मौसम भी खुशनुमा सा है
फिर से पागल हवा न हो जाये


दिल धड़कता है सोच कर यारों
कोई दुश्मन सगा न हो जाये


बात पहले की छेड़ दी तुमने
जख्म फिर से हरा न हो जाये

 

नाम              - सागर आनन्द

जन्म तिथि    - 31/12/1977

                   शिक्षा             - स्नातक, नेटवर्क इंजिनियर

   सम्प्रति          - फर्म का संचालन

                      प्रकाशन         - धूप कड़ी कठिन शामें - ग़ज़ल
                                           - उठो समय हुंकार भरो - काव्य
                                           - जुबां ख़ामोश है तो है – ग़ज़ल

                                        विशेष           - सचिव - प्रगतिशील लेखक संघ, जहानाबाद

                    पता              - सोनी इंजिनियरिंग कम्पनी,
                                       निकट टेलिफोन एक्सचेंज
                                काको रोड, जहानाबाद
                                    पिन - 804408 – बिहार

मोबाइल       - 09931920801

मेल             - sagaranand77@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. भावों को शब्दों में पिरोने की सुंदर कला का प्रदर्शन है इस खूबसूरत शायरी में.
    लिखते रहें- बढ़ते रहें..

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