महावीर सरन जैन का आलेख - रामकथा और तुलसीदास के राम

SHARE:

रामकथा और तुलसीदास के राम     प्रोफेसर महावीर सरन जैन नवरात्र के आरम्भ से लेकर दशहरा तक उत्तर भारत के नगरों, कस्बों, गाँवों में एक ओर दुर्...

रामकथा और तुलसीदास के राम


    प्रोफेसर महावीर सरन जैन
नवरात्र के आरम्भ से लेकर दशहरा तक उत्तर भारत के नगरों, कस्बों, गाँवों में एक ओर दुर्गा पूजा के लिए दुर्गोत्सव होता है और दूसरी ओर बाड़ों में रामलीला खेली जाती है अथवा मंचों पर रामलीला का मंचन होता है। सम्प्रति हम भगवान राम के सम्बंध में विचार करेंगे। भगवान शिव एवं भगवान श्रीकृष्ण की अपेक्षा मर्यादा पुरुषोत्तम राम का चरित अधिक लोकप्रिय रहा है। राम कथा को आधार बनाकर भारत की विभिन्न भाषाओं में साहित्य की रचना हुई है। आधुनिक भारतीय भाषाओं में जिन प्रसिद्ध एवं उल्लेखनीय रचनाओं का विवरण उपलब्ध है उसके अनुसार बांग्ला में 25, तमिल में 12, हिन्दी में 11, मराठी में 8, ओड़िया में 6 तथा तेलुगु में 5 रचनाएँ मिलती हैं। (हिन्दी विश्वकोश में देखें 'राम')। भारत के बाहर भारत के निकटवर्ती नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार (बर्मा) एवं तिब्बत में ही नहीं अपितु दक्षिण-एशिया के सभी देशों में राम कथा की परम्परा मिलती है। इन देशों में इंडोनेशिया, थाइलैण्ड, लाओस, मलेशिया, फिलिपींस, कंपूचिया, जापान, चीन, मंगोलिया के नाम अधिक उल्लेखनीय हैं

 image


भारत में राम कथा पर विचार करते समय कुछ विद्वानों ने वैदिक साहित्य में भी रामकथा में वर्णित पात्रों और स्थानों को खोज निकाला है। इस सम्बंध में विद्वानों में बहुत विचार विमर्श हुआ है। सम्बंधित विचारों का गहन अध्ययन करने के बाद मेरा मत यह है कि जिन संदर्भों में उन पात्रों और स्थानों का उल्लेख हुआ है उनका सम्बंध राजा दशरथ के पुत्र राम से नहीं है। मैं डॉ. रामकुमार वर्मा के इस मत से सहमत हूँ कि "राम के ऐतिहासिक वृत्त का उल्लेख सर्वप्रथम 'वाल्मीकि रामायण' में ही मिलता है। यहाँ राम का विष्णु से कोई सम्बंध नहीं। वे अवतार न होकर केवल मनुष्य, महात्मा और धीरोदात्त नायक हैं"।
(डॉ. रामकुमार वर्मा : हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, पृ.333)


इसके बाद रामचरित्र का वर्णन हमें महाभारत के 'रामोपाख्यान', 'आरण्य', 'द्रोण', 'शांति पर्वों' में मिलता है। पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' एवं कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में भी कुछ परिवर्तनों के साथ रामकथा वर्णित है। पौराणिक साहित्य में हरिवंश पुराण, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, स्कंध पुराण, पद्म पुराण में भी रामकथा विषयक सामग्री उपलब्ध होती है। इससे सिद्ध होता है कि पुराण काल (400 ई.-1500ई.) में रामचरित की लोकप्रियता बढ़ती गई।


बौद्ध साहित्य की जातक कथाओं में राम से सम्बंधित तीन जातक प्रसिद्ध हैं। (1) दशरथ जातक (2) अनाम जातक (3) दशरथ कथानक। इन जातकों में राम से सम्बंधित जिन घटनाओं का विवरण मिलता है, वे 'वाल्मीकि रामायण' में वर्णित घटनाओं से मेल नहीं खातीं।
बौद्ध साहित्य की अपेक्षा जैन साहित्य में राम से सम्बंधित कथाओं पर आधारित साहित्य की मात्रा और गुणवत्ता अधिक है। जैन परम्परा में राम का मूल नाम संस्कृत में 'पद्म' तथा प्राकृत एवं अपभ्रंश में 'पउम' है। संस्कृत में निबद्ध कृतियों में 1. रविषेणाचार्य प्रणीत 'पद्मचरित्र' (660 ईस्वी) 2. हेमचन्द्र प्रणीत 'जैन रामायण' (1200 वी शती) 3. जिन दास प्रणीत 'राम पुराण' (1500 वी शती) 4. पद्मदेव विजयगणि प्रणीत 'राम चरित' (1600 वी शती) तथा 5. सोम सेन प्रणीत 'राम चरित (1600 वी शती) प्रसिद्ध हैं। प्राकृत भाषा में लिखी गई कृतियों में विमल सूरी प्रणीत 'पउम चरिय' (तीसरी शती) तथा अपभ्रंश भाषा में लिखी गई कृतियों में स्वयंभू देव प्रणीत 'पउम चरिउ' सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। स्वयंभू देव प्रणीत 'पउम चरिउ' तथा तुलसीदास प्रणीत 'रामचरित मानस' का अनेक विद्वानों ने तुलनात्मक अध्ययन किया है। श्री राहुल सांकृत्यायन, डॉ. राम सिंह तोमर, डॉ. नामवर सिंह, डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा 'अरुण' तथा डॉ. संकटा प्रसाद आदि विद्वानों ने रामचरित मानस पर स्वयंभू देव प्रणीत 'पउम चरिउ' के प्रभाव की मीमांसा की है।


मध्य युग के भक्ति काल के पहले राम के व्यक्तित्व का अधिकांश रचनाओं में जो विवरण उपलब्ध है उसमें राम एक महापुरुष हैं। वे धीरोदात्त नायक हैं। उनके चरित्र की विशिष्टता आचरण की निर्मलता, सरलता, शुद्धता, निष्कपटता, निर्भीकता एवं पराक्रम है। उनमें अद्भुत साहस है किंतु अहंकार और अभिमान नहीं है।

 
राम का उपास्य रूप उस काल खण्ड से आरम्भ होता है जब वे भगवान विष्णु के अवतार के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। राम भक्ति का आरम्भ दक्षिण भारत के आलवार युग (800 ईस्वी से 1100 ईस्वी) में हुआ। आलवार साहित्य का गहन अध्ययन करने वाले विद्वानों की मान्यता है कि आलवार साहित्य में रामभक्ति का वर्णन नौवीं शताब्दी (900 ईस्वी) में आरम्भ हो गया था। उत्तर भारत में रामभक्ति के प्रचार एवं प्रसार का वास्तविक श्रेय रामानन्द को है।

 
राम कथा की परम्परा में तुलसी कृत रामचरितमानस के पहले 'अध्यात्म रामायण' एवं 'आनन्द रामायण' के नाम भी मिलते हैं जिनमें राम के अलौकिक स्वरूप के संकेत मिलने आरम्भ हो जाते हैं। 'श्री सम्प्रदाय' में भी राम और सीता को उपास्य मानकर उनकी पूजा करने का विधान है। मगर यहाँ राम विष्णु के रूप हैं और सीता लक्ष्मी और शक्ति स्वरूपा हैं। आचार्य रामानन्द ने राम को ही भक्ति का अधिष्ठाता बना दिया। रामानन्द के भक्तों में निर्गुण और सगुण दोनों पंथों के अनुयायी थे। निर्गुण परम्परा के भक्तों में कबीरदास और सगुण परम्परा के भक्तों में तुलसीदास का नाम सर्वाधिक प्रख्यात और लब्धप्रतिष्ठ है।


यह निर्विवाद है कि राम-काव्यधारा के सबसे प्रधान कवि तुलसीदास हैं। महाकवि तुलसी निर्भ्रांत रूप में घोषणा करते हैं - ‘सिया राम मय सब जग जानी'।

 
तुलसीदास ने राम के माध्यम से भारत की अनेक साधनाओं और भक्ति तथा धर्म संप्रदायों में समन्वय भी स्थापित करने का काम किया। अपने युग में शिव और विष्णु के अनुयायियों में पारस्परिक संघर्ष देख तुलसी ने शैवों और वैष्णवों में सामंजस्य स्थापित करने के लिये सेतुबंध के अवसर पर राम द्वारा शिव की पूजा करायी और कहलवाया –
''सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा"।
(रामचरितमानस, लंकाकांड पृ.758)


लोक में राम को राम कथा से जाना जाता है। मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूँ कि भगवान राम के तात्त्विक स्वरूप को जानना बहुत मूल्यवान है।यही रूप उपास्य है। एक प्रसंग याद आ रहा है। एक बार आमचुनावों के पहले कुछ राजनेताओं ने राम सेतु का मुद्दा उछाला था। मैंने अपने एक मित्र को बताया कि पउम चरिउ एवं अध्यात्म रामायण जैसे ग्रन्थों में राम सेतु का जो विवरण मिलता है वह राम चरितमानस से भिन्न है। उन्होंने उत्तर दियाः
“हमें आपकी बात से कोई प्रयोजन नहीं है। इसका कारण यह है कि हमारी श्रद्धा तो केवल तुलसीकृत रामचरितमानस में है”।
इस प्रसंग की चर्चा करने का उद्देश्य यह प्रतिपादित करना है कि उत्तरभारत के जनमानस की आस्था तुलसीकृत राम चरितमानस में बहुत गहरी है। आस्था भी ऐसी कि उसके आगे किसी अन्य ग्रंथ की कोई सार्थकता एवं प्रासंगिकता नहीं रह जाती। रामचरितमानस की लोकप्रियता अप्रतिम है।

 
रामचरितमानस का सम्पूर्ण प्रयास मानवीय वृत्तियों का उन्नयन करना है, मानवीय भावों का उदात्तीकरण है। यहाँ मैं प्रबुद्धजनों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि रामचरितमानस के कथा-विधान में दो धरातल हैं; दो स्तर हैं। एक धरातल पर राम अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं। इस रूप में राम आम आदमी की भाँति क्रियाएँ करते हैं। उदाहरण के रूप में सीता हरण पर आम आदमी की तरह विलाप करते हैं – “ एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी। मनहु महा बिरही अति कामी”। वियोग में इतनी विदग्धता कि पशु पक्षियों से भी सीता के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं – “हे खग मृग हे मधुकरश्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनयनी”।।
राम का यह रूप आम आदमी के लिए सहज है। इस प्रकार के चित्रण एवं प्रसंग राम-कथा में राम की लीलाएँ हैं; एक अभिनेता का कथा के विभिन्न प्रसंगों के अनुरूप अपने पार्ट का अभिनय करना है। रामलीला में जिस राम कथा को खेला जाता है और जिसको करोड़ों करोड़ो लोग प्रतिवर्ष देखते हैं और उसमें रस लेते हैं, वे राम के इसी स्वरूप को जानते हैं। मगर तुलसी के राम मूलतः वह नहीं हैं जो रामलीला में 'लीला' करते हैं। तत्त्वतः वे परात्पर ब्रह्म हैं जिनका अवतार 'परित्राणाय साधूनाम् विनाशायच दुष्कृताम्' के लिए होता है। इस धरातल पर राम आम आदमी नहीं हैं; वे परात्पर परब्रह्म स्वरूप हैं। वे भगवान हैं। वे उपास्य हैं। वे आराध्य हैं। राम-कथा का वाचक या रामलीला का दर्शक अभिनेता रूप को ही वास्तविक न समझ बैठे – इस बारे में तुलसीदास पग-पग पर भगवान राम के तात्त्विक स्वरूप को अभिव्यक्त करते हैं, वाचक एवं दर्शक को सचेत करते हैं। अयोध्या कांड में गुरु वशिष्ठ सबको स्पष्ट करते हैं कि श्रीराम का जन्म सामान्य घटना नहीं है, उनका जन्म लोकमंगल के लिए ही हुआ है –
सत्य संध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतु।।


जैसे किसी भी बालक का नाम-संस्कार होता है, राम का भी नाम-संस्कार होता है। इस अवसर पर भी तुलसीदास गुरु वशिष्ठ के द्वारा सबको राम के वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं कि राम के रूप में जिस बालक ने जन्म लिया है वे कोई बालक नहीं हैं, वे प्रभु हैं जो ‘अखिल लोक दायक विश्रामा’ हैं –
जो आनन्द सिंधु सुख रासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी।
जो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक विश्रामा।।


कितने स्थलों पर तुलसी व्यक्त करते हैं कि “राम कथा जग मंगल करनी”। श्रीराम और सीता का यश समस्त मंगलों की खान है।
विगत दशकों में समाज में राम का अभिनय वाला रूप उभर रहा है या कहें जानबूझकर उभारा जा रहा है। एक अभिनेता विभिन्न फिल्मों में अनेक पात्रों का अभिनय करते हैं। जब हम किसी फिल्म में किसी अभिनेता को फिल्म के पात्र का अभिनय करते हुए देखते हैं तो उस अभिनेता को उस फिल्म के उस पात्र के रूप में समझ बैठते हैं। फिल्म के पात्र का अभिनय करने में एवं जिंदगी में अपने परिवार के साथ जिंदगी जीने वाले व्यक्ति का अन्तर स्पष्ट है।

मैं तुलसीदास के रामचरितमानस और भगवान राम के भक्तजनों तथा समस्त प्रबुद्धजनों के लिए तुलसीकृत राम चरितमानस की दोहा-चौपाइयों के आधार पर राम के तात्विक स्वरूप का निरूपण करना चाहता हूँ।

तत्त्व अद्वैत एवं परमार्थ रूप है। जीव और जगत उस एक तत्व 'ब्रह्म' के विभाव मात्र हैं। अध्यात्म एवं धर्म के आराध्य राम तत्व हैं, अद्वैत एवं परमार्थ रूप हैं-
राम ब्रह्म परमारथ रूपा।
इसी कारण राम के लिए तुलसीदास ने बार-बार कहा है-

' ब्यापकु अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप ।΄

 

अध्यात्म के मूल्य शाश्वत होते हैं। राजनीति के मूल्य शाश्वत नहीं होते। राजनीति में यदि मूल्य होते भी हैं तो वे तात्कालिक होते हैं। राजनीतिज्ञों के लिए भगवान राम साध्य नहीं रह जाते, आराध्य नहीं रह जाते; “ब्यापकु ब्रह्म अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी” नहीं रह जाते; परमार्थ रूप नहीं रह जाते। राजनीतिज्ञों के लिए भगवान राम चुनावों में विजयश्री प्राप्ति के लिए एक साधन हो जाते हैं, उनके नाम पर भोली-भाली जनता से पैसा वसूलकर अपनी तिजोरी भरने का जरिया हो जाते हैं; दूसरों के उपासना केन्द्र के विध्वंस एवं तत्पश्चात विनाश, तबाही, बर्बादी के उत्प्रेरक हो जाते हैं। अध्यात्म के साधक एवं धर्म के आराधक के लिए तो राम त्याग, तपस्या एवं साधना के प्रेरणास्रोत होते हैं; राजनीति के कुटिल, चालबाज, धोखेबाज नेताओं के लिए राम  ́शिलापूजन΄ के नाम से करोड़ों-करोड़ों की धनराशि वसूलने के लिए एक जरिया हो जाते हैं।

अध्यात्म के साधक एवं धर्म के आराधक के लिए तो राम  ́‘अजित अमोघ शक्ति करुणामय΄ हैं, ‘सर्वव्यापक’ हैं, ‘इन्द्रियों से अगोचर’ हैं,‘ चिदानन्द स्वरूप’ हैं, ‘निर्गुण’ हैं, ‘कूटस्थ एकरस’ हैं, सभी के हृदयों में निवास करने वाले प्रभु हैं, ́ब्यापक ब्यापि अखंड अनन्ता΄ हैं। राजनीति के कुटिल, चालबाज, धोखेबाज नेताओं के लिए सच्चिदानन्दस्वरूपा राम समाज के वर्गों में वैमनस्य, घृणा, कलह, तनाव, दुश्मनी, विनाश के कारक एवं प्रेरक हो जाते हैं। राजनीति की कुटिलता, चालबाजी, धोखेबाजी का इससे बड़ा प्रतिमान और क्या हो सकता है कि हमारे देश में, ऐसा भी हुआ कि सत्ता प्राप्ति के पूर्व अनेक नेताओं ने राम के नाम की कसमें खाई थीं, सौगंध खा-खाकर बार-बार कहा था- ́सौगंध राम की खाते हैं, मन्दिर यहीं बनाएँगे΄, जन-जन को भावना रूपी सागर की उमगाव एवं उछाव रूपी लहरों से आप्लावित कर दिया था- ́बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का΄ मगर जब राम के नाम के सहारे सत्ता प्राप्त कर ली तो फिर उन राजनेताओं को राम से कोई मतलब नहीं रहा, राम से कोई प्रयोजन नहीं रहा, राम से कोई वास्ता नहीं रहा। राजा दशरथ ने तो राम कथा में राम को वनवास दिया था; राजनीति के इन नेताओं ने तो राम को ही अपने एजेंडे से निकाल फेंका।


देश की जनता से मेरी विनय है कि भगवान राम को राजनीति में सत्ता-प्राप्ति का कभी भी साधन न बनने दें। भगवान राम साधन नहीं हैं; वे जन जन के लिए साध्य हैं। वे समाज में विनाश के कारक नहीं हैं; वे अखिल लोक के मंगल के कारक हैं। स्वयं तुलसीदास ने भगवान राम के तात्त्विक स्वरूप को अपने ग्रंथ रामचरितमानस में इन शब्दों में व्यक्त किया हैः
भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।
किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप॥
जथा अनेक वेष धरि नृत्य करई नट कोई।
सोई सोई भाव दिखावअइ आपनु होई न सोई। ।

तुलसीदास की मान्यता है कि निर्गुण ब्रह्म राम भक्त के प्रेम के कारण मनुष्य शरीर धारण कर लौकिक पुरुष के अनुरूप विभिन्न भावों का प्रदर्शन करते हैं।  नाटक में एक नट अर्थात् अभिनेता अनेक पात्रों का अभिनय करते हुए उनके अनुरूप वेशभूषा पहन लेता है तथा अनेक पात्रों अर्थात् चरितों का अभिनय करता है। जिस प्रकार वह नट नाटक में अनेक पात्रों के अनुरूप वेष धारण करने तथा उनका अभिनय करने से वह पात्र नहीं हो जाता; नट ही रहता है उसी प्रकार राम चरितमानस में भगवान राम ने लौकिक मनुष्य के अनुरूप जो विविध लीलाएँ की हैं उससे भगवान राम तत्वतः वही नहीं हो जाते; राम तत्वतः निर्गुण ब्रह्म ही हैं। तुलसीदास ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है कि उनकी इस लीला के रहस्य को बुद्धिहीन लोग नहीं समझ पाते तथा मोहमुग्ध होकर लीला रूप को ही वास्तविक समझ लेते हैं।

आवश्यकता तुलसीदास के अनुरूप राम के वास्तविक एवं तात्विक रूप को आत्मसात करने की है।

भारत के रामभक्त एवं भारतीय समाज के समस्त प्रबुद्धजन स्वयं निर्णय करें कि वास्तविक एवं तात्त्विक महत्व किसमें निहित है- राम की लौकिक कथा से जुड़े प्रसंगों को राजनीति का मुद्दा बनाकर राम के नाम पर सत्ता के सिंहासन को प्राप्त करने की जुगाड़ भिड़ाने वाले कुटिल, चालबाज, धोखेबाज नेताओं के बहकावे में आने की अथवा भगवान राम के वास्तविक एवं तात्त्विक रूप को पहचानने की, उनको आत्मसात करने की, उनकी उपासना करने की, उनकी लोक मंगलकारी जीवन दृष्टि एवं मूल्यों को अपने जीवन में उतारने की।

 
परहित सरिस धरम नहीं भाई। परपीड़ा सम नहीं अधमाई।।

 


प्रोफेसर महावीर सरन जैन
(सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)
123, हरि एन्कलेव
चाँदपुर रोड
बुलन्द शहर 203 001
mahavirsaranjain@gmail.com

COMMENTS

BLOGGER
नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4288,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3239,कहानी,2360,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,1,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: महावीर सरन जैन का आलेख - रामकथा और तुलसीदास के राम
महावीर सरन जैन का आलेख - रामकथा और तुलसीदास के राम
https://lh3.googleusercontent.com/-gY2x1Y2oUCw/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/E7BGmIIKJ4g/s120-c/photo.jpg
https://lh3.googleusercontent.com/-gY2x1Y2oUCw/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAAA/E7BGmIIKJ4g/s72-c/photo.jpg
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2015/03/blog-post_624.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2015/03/blog-post_624.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content