सोमवार, 30 मार्च 2015

रवि श्रीवास्तव की कविताएँ

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रवि श्रीवास्तव

रायबरेली, उ.प्र.

9718895616, 9452500016

लेखक, कवि, व्यंग्यकार, कहानीकार

 

आख़िर खुदकुशी करते हैं क्यों ?


जिंदगी जीने से डरते हैं क्यों ?
फंदे पर लटककर झूले
जीवन है अनमोल ये भूले।
अपनों को देकर तो आंसू,
छोड़ दिए दुनिया में अकेले।
कभी ट्रेन के आगे आना,
कभी ज़हर को लेकर खाना।
कभी मॉल से छलांग लगा दी,
देते हैं वो खुद को आज़ादी।
इस आज़ादी के ख़ातिर वो,
अपनों को देते तकलीफ़
लोग हंसते ऐसी करतूतों पर,
करते नहीं हैं वो तारीफ़।
पिता के दिल का हाल ना पूछो,
माता पर गुजरी है क्या
इक छोटी सी कठिनाई के ख़ातिर,
क्यों कदम इतना बड़ा लिया उठा।
पुलिस आई है घर पर तेरे,
कर रही सबको परेशान,
ख़ुद चला गया दुनिया से,
अपनों को किया परेशान।
संतुष्टि मिल गई है तुमको
अपनी जान तो देकर के,
हाल बुरा है उनका देखो,
बड़ा किया जिसने पाल-पोसकर के।
जिंदगी की सच्चाई में क्यों?
इतना जल्दी हार गए।
आखिर मज़बूरी है क्या?
दुनिया के उस पार गए।
याद नहीं आई अपनों की,
करते हुए तो ऐसा काम,
क्या बीतेगी सोचते अगर,
नहीं देते इसको अंजाम।
दुख का छाया, क्या है अकेले तुम पर
जो हो गए इतना मजबूर
औरों के दुख को भी देखो,
जख्म बन गए हैं नासूर।
हर समस्या का कभी तो,
समाधान भी निकलेगा।
ऊपर बैठा देख रहा जो,
उसका दिल भी पिघलेगा।
बुजदिली कहें इसे,
या कायरता कहकर पुकारें,
छोड़ रहे दुनिया को क्यों ?
और भी हैं जीने के सहारे।
कठिनाइयों से डरते हैं क्यों?
आख़िर खुदकुशी करते हैं क्यों ?

उनकी तमन्ना


उन्होंने तमन्नाओं को पूरा कर लिया,
मुझे नहीं है उनसे कोई भी शिकवा।
किसी के वादों से बंधा मजबूर हूं,
उन्हें लगता है शायद कमजोर हूं।
बड़ों का आदर, छोटों का सम्मान सिखाया है,
मेरे परिवार ने मुझे, ये सब बताया है।
हर क्रिया की प्रतिक्रिया, हम भी दे सकते हैं,
जान हथेली पर हमेशा हम भी रखते हैं।
उम्र का लिहाज करके, इस बार सह गया,
चेहरे पर मुस्कान लाकर, क्रोध पी गया।
लगता है मंजिल से, ज्यादा नहीं दूर हूं।
किसी के वादों से बंधा मजबूर हूं,
उन्हें लगता है शायद कमजोर हूं।
दुआ खुदा से है, गलती न दोहराए,
रोष में आकर कही, हम अपना आपा न खो जाएं
तोड़ दूंगा इस बार, वादों की वो जंजीर,
खुद लिख दूंगा, अपनी सोई हुई तकदीर,
परवाह नहीं है जमाने की, न जीने की है चाहत,
चल देंगे उस रास्ते पर, जिसमें दो पल की है राहत।
दिल पर लगे जख्मों का, मैं तो नासूर हूं,
उन्हें लगता है मैं शायद कमजोर हूं।
किसी के वादों से बंधा मैं तो मजबूर हूं,

मेहनत किसान की

आखिर हम कैसे भूल गये, मेहनत किसान की,
दिन हो या रात उसने, परिश्रम तमाम की।

जाड़े की मौसम वो, ठंड से लड़े,
तब जाके भरते, देश में फसल के घड़े।

गर्मी की तेज धूप से, पैर उसका जले,
मेहनत से उनकी देश में, भुखमरी टले।

बरसात के मौसम में, न है भीगने का डर,
कंधों पर रखकर फावड़ा, चल दिये खेत पर।

जिनकी कृपा से आज भी,चलता है सारा देश,
सरकार उनके बीच में, पैदा होता मतभेद।

मेहनत किसान की, कैसे भूल वो रहे,
कर्ज़, ग़रीबी, भुखमरी से, तंग हो किसान मरे।

दूसरों का पेट भर, अपनी जान तो दी,
आखिर हम कैसे भूल गये , मेहनत किसान की।

सुहाना सपना

सपनों ने दिखाये अरमान, देश में बनाओ अपनी पहचान,
हक़ीक़त से मैं था अंजान, सपनों में था जो बहुत आसान।

चल दिये उसी मंजिल पर, जिसको पूरा करना था,
हुआ वही जो सपना देखा, पर मेरा ख्बाव अधूरा था।

हर रास्ते पर मिली ठोकरें, मंजिल तक न पहुंच पाने को,
हिम्मत नहीं हारी है मैंने, ये वक्त है कुछ कर दिखाने को।

देखा सपना पूरा करुंगा, डालूंगा मैं इसमें जान,
सपनों ने दिखाये अरमान, देश मैं बनाओ अपनी पहचान।

याद करेगा मुझे ज़माना, दिल में मैंने अपने ठाना,
उदास न हो ऐ मेरे साथी, कहीं तो होगा अपना ठिकाना।

हर तरफ फिर धूम मचेगी, खुशियों की कलियां खिलेंगी,
जीवन के इस सुर में फिर, मिल जायेगा ताल से ताल,

सपनों ने दिखाये अरमान, देश में बनाओ अपनी पहचान।


रेल क्यों हो रही है फेल ?


देश की रीढ़ बनी ये रेल,
आख़िर क्यों हो रही है फेल ?

जाने कैसे हो गई बीमार
हो रही हादसे का शिकार ।

कभी एक दूसरे से टकराना,
कभी पटरी से नाचे उतर जाना।

असुविधाओं भरा हो रहा, अब तो  इसका सफर,
यात्रियों को सताता रहता है असुरक्षा का डर।

ऐसे गम्भीर मुद्दे पर राजनीति न खेलें,
राजनीति की इस चोट को आम आदमी झेले।

किसकी लापरवाही है ये किसकी ज़िम्मेदारी है,
बढ़ते ट्रेन हादसों पर रोक लगाना ज़रूरी है।

बातें करने से नहीं कुछ कर दिखाने से होगा,
इसकी हालत ऐसी है तो बुलेट ट्रेन का क्या होगा।

मुसाफ़िरों की जिंदगी से न खेलो ऐसा खेल,

     देश की रीढ़ बनी ये रेल,
    आख़िर क्यों हो रही है फेल ?

उड़ान

एक दिन बैठकर मैं,
बस यही सोचता था,

किस तरह से उड़ते हैं पक्षी, क्या उनकी उड़ान है।
गिरने का न डर है उनको, उनकी यह पहचान है,

सोचते सोचते आखिर, पहुंच गया उस दौर तक,
पंख तो होते हैं उनके, पर हौसलों में भी जान है।

कभी यहां तो कभी वहां, क्या गज़ब का खेल है,
पंख संग हौसले का, कितना प्यारा मेल है।

सीख लें पक्षी से हम सब, इस दुनिया की उड़ान में,
हौसला न हारो कभी, जीना पूरी शान में।

क्रोध

आग की ज्वाला से देखो, तेज़ तो है मेरी आग,
मेरे चक्कर में फंसकर, जाने कितने हुये बर्बाद।

काबू पाना मुश्किल मुझ पर, चाहे हो कितना खास,
मिट जाता है नाम जहां से, बनते काम का हो सत्यानाश।

तापमान शरीर का बढ़ाऊं,
दिमाग काम कर देता बंद, क्रोधित को कैसे समझाऊं।

आपा खोना पछतावा होना, मेरी यही निशानी है,
सभी की यही परेशानी है।

थोड़ा अच्छा, बहुत बुरा हूं, फिर चाहे हो कोई बात,
आग की ज्वाला से देखो, तेज़ है मेरी आग।


लहू तो एक रंग है


आपस में एक दूसरे से, हो रही क्यों जंग है ?
लहू तो एक रंग है,   लहू तो एक रंग है।
हर तरफ तो शोर है, किस पर किसका जोर है?
ढ़ल रही है चांदनी, आने वाली भोर है।
रक्त का ही खेल है, रक्त का ही मेल है,
क्यों इतना अभिमान है, रक्त तो समान है।
रक्त न जाने है धर्म, रक्त न जाने है जाति,
रक्त भी अनमोल है , मत बहाओ पानी की भांति।
भाई-चारा छोड़कर , क्यों लड़ रहे है हम सभी
मजहब के नाम पर , क्यों मर रहे है हम सभी।
छोड़ दो आपस में लड़ना, तोड़ दो सारी दीवार,
दिखा तो तुम सभी को, हम एक दूसरे के संग है।
लहू तो एक रंग है, लहू तो एक रंग है।

    समय

तूफानों से तेज चलूं मैं
न ही थकूं न ही रूकूं मैं ।

सब कुछ मेरे ही अधीन है,
मेरी बातें भिन्न-भिन्न हैं।

गुजर गया वापस न आऊं,
सबक दुनिया को मैं सिखलाऊं।

बात मेरी सब लोग हैं करते,
प्रहार से मेरी रोते हंसते।

जीवन के हर मोड़ पर मैं,
बीता हुआ मैं तो कल हूं।

मैं समय हूं, मैं समय हूं, मैं समय हूं।
डर लगने लगा है।
एक बार फिर से डर लगने लगा है ,
एक बार फिर से कोई अच्छा लगने लगा है।
लोगों के तानों का सिलसिला शुरू हुआ
गैरों से नहीं मुझे, अपनों से गिला।
न कोई सच्चाई है, न कोई है बात,
इन सूनी राहों में, नहीं है कोई साथ।
नाम उनका लेकर, मुझको लगे चिढ़ाने,
हर जगह, हर तरफ, मुझे लगे सताने।
बातों में ऐसे आकर, कहीं हो न जाऊं दीवाना,
मासूमियत पर मेरी, हंसेगा ये जमाना।
दर-दर भटकूंगा, न होगा कोई ठिकाना,
ये खुदा रहम कर, इस आग से बचाना।
एक बार फिर से डर लगने लगा है ,
एक बार फिर से कोई अच्छा लगने लगा है।

 


पानी की बर्बादी


मत करो मुझको बर्बाद, इतना तो तुम रखो याद।
प्यासे ही तुम रह जाओगे, मेरे बिना न जी पाओगे।
कब तक बर्बादी का मेरे, तुम तमाशा देखोगे,
संकट आएगा जब तुम पर, तब मेरे बारे में सोचोगे।
संसार में रहने वालों को, मेरी जरूरत पड़ती है,
मेरी बर्बादी के कारण, मेरी उम्र भी घटती है।
ऐसा न हो इक दिन मैं, इस दुनिया से चला जाऊं
खत्म हो जाए खेल मेरा, लौट के फिर न वापस आऊं।
पछताओगे रोओगे तुम , नहीं बनेगी कोई बात,
सोचो समझो करो फैसला, अब तो ये है तुम्हारे हाथ।
मेरे बिना इस दुनिया में, जीना सबका मुश्किल है,
अपनी नहीं भविष्य को सोचो, भविष्य भी इसमें शामिल है।
मुझे ग्रहण कर सभी जीव, अपनी प्यास बुझाते हैं,
कमी मेरी पड़ गई अगर तो, हर तरफ सूखे पड़ जाते हैं।
सतर्क हो जाओ बात मान लो, मेरी यही कहानी है।
प्रकृति का वरदान धरा पर, जीवन देना मेरी निशानी है।
करो फैसला मिलकर आज, मत करो मुझको बर्बाद।
, इतना तो तुम रखो याद।

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