बुधवार, 18 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - घोटिया आम्बा मेला : लोक लहरियों का उल्लास

प्रकाशनार्थ विशेष लेख

(संदर्भ - घोटिया आम्बा मेला 18 से 22 मार्च 2015)

पहाड़ों में मनता है नव वर्ष का अनूठा जश्न,

सप्ताह भर रहती है धूम

मदमस्त कर देता है लोक लहरियों का उल्लास

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

दुनिया में कई क्षेत्र ऎसे हैं जहाँ के रीति-रिवाज, परंपराएं और लोक जीवन के पर्व-उत्सव अपने आप में विभिन्न प्रकार की खासियतें लिए हुए हैं।

अनूठी हैं परंपराएं

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इनमें कुछ स्थानों की परंपराएं और रस्में विलक्षणताएं लिए हुए होने के साथ ही रोचक एवं मनोहारी हैं तथा इनका दिग्दर्शन मंत्र मुग्ध कर देने वाला है। यह सब कुछ भारतीय परंपराओं में ख़ासतौर पर  देखने को मिलता है जहाँ हर दिन कोई न कोई पर्व, उत्सव और रस्मों के साथ उगता है और लोक जीवन को आनंद से भर देता है

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लोक संस्कृति का गढ़ है दक्षिणी छोर

भारतवर्ष के राजस्थान प्रान्त के दक्षिणी छोर पर माही नदी के मुहाने पर्वतों के आँचल में स्थित बांसवाड़ा ऎसा ही जिला है जहाँ जनजीवन में विचित्र और लोक लुभावनी परंपराओं का सहज ही दर्शन किया जा सकता है।

यह पूरा इलाका जनजाति बहुल है और इस वजह से जनजाति लोक संस्कृति की बहुआयामी विलक्षणताओं का केन्द्र है। राजस्थान का यह दक्षिणी छोर मध्यप्रदेश और गुजरात से सटा हुआ है इस वजह से तीनों ही राज्यों की लोक संस्कृति, परपराओं और लोक लहरियों की त्रिवेणी सदियों से पूरे वेग से बह रही है।

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मुखर है जनजातीय संस्कृति

इस वजह से यह पूरा अंचल जनजातीय लोक संस्कृतियों का वह संगम स्थल है जहाँ विविधताओं के बीच मनोहारी परंपराओं के इन्द्रधनुषी दर्शन होते हैं।

इस पहाड़ी अंचल में बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से कुछ दूर घोटिया आम्बा का पर्वतीय जंगल है जो दुर्गम गिना जाता रहा है।  इसका संबंध द्वापर युग से है जहाँ पाण्डवों ने अपने विहार का काफी कुछ समय बिताया था। श्रीकृष्ण और अन्य देवी-देवताओं से लेकर सिद्ध ऋषि-मुनियों का भी यह प्रिय स्थल रहा है। इस वजह से इस पर्वतीय क्षेत्र को दिव्य माना गया है।

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वर्ष संक्रांति का केन्द्र है घोटिया आम्बा पर्वत

सदियों  से घोटिया आम्बा के इन पहाड़ों में हर वर्ष विक्रम संवत के अंतिम दिनों में मेला भरता है जिसमें समीपवर्ती राज्यों से डेढ़-दो लाख मेलार्थी भाग लेते हैं और भगवान भोलेनाथ, राम, श्रीकृष्ण तथा अन्य देवी-देवताओं व ऋषियों तथा पाण्डवों का स्मरण कर पुराने वर्ष को विदाई देते हुए नए साल का जश्म मनाते हैं और उसके बाद ही घर लौटते हैं।

गोवर्धन व ब्रज परिक्रमा की ही तरह घोटिया आम्बा के पहाड़ और यहां के घोटेश्वर महादेव व पाण्डवों की प्रतिमाओं के दर्शन, पवित्र पाण्डव कुण्ड में स्नान, घोटेश्वर से केलापानी तक की परिक्रमा तथा पहाड़ों में सामूहिक भोज व मौज-शौक का विशेष महत्त्व रहा है।

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मुक्ताकाशी रंगमंच पर मौज-मस्ती का नृत्य

प्रकृति के खुले आँगन में पुराने वर्ष को विदा करने तथा नए विक्रम संवत वर्ष के स्वागत की यह परंपरा विदेशी जश्नों को भी उन्नीस ही ठहराती है।

मेलार्थी वर्ष के अंतिम दो दिनों में घोटिया आम्बा के पहाड़ों में जमा होते हैं तथा पाण्डव कुण्ड में स्नान के उपरान्त घोटेश्वर महादेव, धूंणी, हनपुमान, पौराणिक आम्र वृक्ष, केलापानी आदि में देवदर्शन करते हैं, पहाड़ों से रिसकर आए औषधीय व दिव्य जल का आचमन करते हैं, पठारों से साल के चावल ढूँढ़ते हैं और इसके बाद दाल-बाटी-चूरमा, दूध-पानीये आदि सामूहिक भोज का आनंद पाते हैं।

 

हर ढलान पर मेला बाजार

मेले की रस्मों से फुरसत पाकर मेलार्थी लम्बे मेला बाजारों से घर-गृहस्थी, खेती-बाड़ी आदि की सामग्री क्रय करते हैं और रंगझूलों व अन्य मनोरंजन संसाधनों का लुत्फ उठाने के बाद नए संकल्पों के साथ घर लौटते हैं।

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जश्न के पहाड़ पर मदमस्ती का ज्वार

घोटिया आम्बा मेला अपने आप में मालवा, गुजरात और वागड़ की जनजाति लोक संस्कृति का बहुआयामी स्वरूप दर्शाने वाला है जिसमें फागुनी गीत-संवाद और श्रृंगार के साथ धार्मिक भजन लहरियां और प्रकृति के नाद मिलकर मौज मस्ती का ज्वार उमड़ाते हुए सभी को मस्ती से सराबोर कर देते हैं। हर मेलार्थी ताजगी भरी नई ऊर्जाओं के साथ नए संकल्पों के साथ नए वर्ष में प्रवेश करता है।  हालांकि दुर्गम व दूरस्थ क्षेत्र में होने की वजह से यह मेला और स्थल प्रचार नहीं पा सके हैं अन्यथा दुनिया के दूसरे जश्नों को भी यह वर्ष संक्रमण उत्सव इक्कीस इक्कीस ही ठहरता है।

जंगल में मंगल के गीत

पुरातन परंपराओं और इतिहास से परिपूर्ण भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़े रहकर नए वर्ष का जश्न मनाना अपने आप में अनूठा ही है जहाँ जर्रा-जर्रा जंगल में मंगल के गीत गाता है। प्रकृति की गोद में नव पुराने वर्ष को विदाई और नए वर्ष का जश्न पर्व अपने आप में अनूठा ही है।

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