गुरुवार, 19 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - प्रभावित न हों चकाचौंध से

प्रभावित न हों

चकाचौंध से

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

आस-पास के लोगों की बाहरी जिन्दगी और परिवेश की चकाचौंध इतनी मायावी होती है कि हम सभी लोग औरों की बराबरी करने को ही जीवन का महानतम लक्ष्य मान बैठे हैं और इसी फेर में दूसरों की देखादेखी फैशन, अंधानुकरण और अनुचरी करने को उद्यत हो जाते हैं अथवा ऎसा करने के लिए अक्सर ही गंभीरतापूर्वक सोचते रहते हैं।

व्यक्ति का जीवन मर्यादित और अनुशासित होना चाहिए। अपने कुल के आचारों और धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं के अनुरूप जीवन का पूरा क्रम पालन करने पर हमारी कई समस्याएं अपने आप हल हो जाया करती हैं और जीवनयापन आसान एवं निरापद हो जाता है।

जीवन निर्वाह में समस्याओं की शुरूआत शोर्ट कट तलाशने और पुरुषार्थहीन संपदा का संग्रहण करने से ही होती है।

हममें से बहुतेरे लोग हैं जो इस बात से चिंतित और दुःखी रहते हैं कि वे निष्ठावान, ईमानदार और कठोर परिश्रमी लोग अभावों से ही घिरे रहते हैं, न उनके अभाव दूर होते हैं, न प्रतिष्ठा ही प्राप्त हो पाती है।

यह मानव स्वभाव ही कहा जाना चाहिए कि इन हालातों में हम उन लोगों का चिंतन करने को विवश हो जाते हैं जो चोर-उचक्के, बेईमान, हरामखोर, दूसरों के माल को हड़पने वाले, अतिक्रमणकारी, लूटेरे, नालायक, कमीशनबाज, रिश्वतखोर और शोषण की मनोवृत्ति में माहिर होकर अपने आपको ऎसे मुकाम पर पहुंचा दिया करते हैं जहां दूसरों को लगता है कि ये संसार के समृद्ध और सुखी लोग हैं।

इन वैभवशाली लोगों के पास बंगला, वाहन, पद-प्रतिष्ठा और अकूत संपदा बनी रहती है और जीवन यापन से लेकर भोग विलास के तमाम साधन हमेशा उपलब्ध रहा करते हैं।

हम उन लोगों के वैभव को देखकर अपनी तुलना करने लगते हैं और चाहते हैं कि हम भी उन्हीं की तरह बन जाएं ताकि उनके स्तर के करीब आ सकें और जमाने की नज़रों में वैभवशाली और प्रतिष्ठित कहलाये जा सकें।

बाहर की चकाचौंध का आकर्षण हमारे मन और मस्तिष्क पर पड़ना स्वाभाविक है लेकिन हम सिर्फ जड़ संपदा की ओर ही ध्यान देते हैं और उसे ही सर्वस्व मानकर चलते हैं जबकि हकीकत ठीक इसके उलट है। 

आमतौर पर इंसान दुनिया का पूरा का पूरा वैभव भले ही प्राप्त कर ले, उसके पास आत्मीय शांति, संतोष और आनंद नहीं है तो कोई अर्थ नहीं उसके परम वैभवशाली होने का। क्योंकि सभी प्रकार की धन-दौलत, जमीन-जायदाद, पद-प्रतिष्ठा, लोकप्रियता, सम्मान और अभिनंदन को प्राप्त कर लेने के बावजूद उसका दिमाग गरम रहे, चित्त में उद्विग्नता, अशांति और असंतोष बना रहे, रातों की नींद  हराम हो जाए, कोई क्षण ऎसा न मिल पाए जिसमें अपने और अपने लोगों के बारे में सोचने-समझने की फुरसत न हो, प्रत्येक पल निन्यानवे के फेर में उलझा रहे, तो उस वैभव का क्या अर्थ है।

यह जड़ वैभव इंसान के लिए बेकार है।  ऎसे लोग ठीक मणिधारी, दीर्घायु और भय फैलाने वाले उस  भुजंग की तरह ही जीते हैं जिनके पास खूब सारा माल है पर उनके उपयोग का कुछ नहीं, सिर्फ जमा करते रहने से लेकर चौकीदारी का ही काम कर पाते हैं, न अपने लिए कुछ खर्च कर पाते हैं न औरों के लिए।        न समाज के लिए जीते हैं, न राष्ट्र के लिए। 

हम लोग सिर्फ चकाचौंध को ही देखते हैं, इस चकाचौंध को पाने के लिए लोगों द्वारा किए जाने वाले कर्मों, कुकर्मों, जायज-नाजायज संबंधों, समझौतों और समीकरणों, तरह-तरह के समर्पण, लोभ-लालच की प्रवृत्तियों, जहाँ-तहाँ अपने स्वाभिमान को गिरवी रखकर आगे बढ़ते रहने और दूसरे सारे वज्र्य रास्तों, प्रतिशोध, षड़यंत्रों, एक दूसरे को नीचा दिखाने और गिराने की कुटिल चालों आदि से हम सदा-सर्वदा अनभिज्ञ ही रहा करते हैं और इसी का नतीजा है कि हमें इन लोगों का वही पक्ष दिखता है जो सार्वजनीन होता है, और जिसे सायास सजाया-सँवारा और आकर्षक बनाया होता है।

दूसरे पक्ष से हन अनभिज्ञ ही रहा करते हैं। जड़ वस्तुओं भरी संपदा से आनंद स्वयं को प्राप्त नहीं हो पाता, यह केवल दूसरों को ही सुकून देता है। ऎसे लोगों को अपने बड़े और समृद्ध होने का अहंकार मात्र रहता है शेष ऎसा कुछ भी नहीं होता जो इन्हें आत्मिक शांति, सुकून और आनंद दे सके।

जितना अधिक लोकदिखाऊ बाहरी वैभव, आडम्बर और पाखण्ड होगा उसी अनुपात में इंसान अशांत, उन्मादी, उद्विग्न और मलीन होगा और उसका हर क्षण  अंधेरे पाप कर्मों में ही लगा रहेगा।

ये भोगवादी और अलक्ष्मी संचित कर वैभवशाली बने लोग  हर क्षण किसी न किसी मकड़जाल में उलझे रहते हैं। इनके मन-मस्तिष्क का यह उद्वेग और खूब सारा पा जाने का स्वभाव इनका चेहरा तक मलीन कर देता है और मुस्कान गायब हो जाती है।

कभी कभार औरों को दिखाने भर के लिए जब ये हँसते हैं तब लगता है हास्य से कोई न कोई षड़यंत्र की भूमिका का संकेत दे रहे हों। इनका क्रोध और उन्माद सामान्य है लेकिन ऎसे लोगों का हास्य कुटिलताओं और भावी अनिष्ट का प्रतीक होता है। 

अपने गोरखधंधों और पाप कर्मों से ये लोग जब संपदा का संग्रहण करते हैं तब औरों को लगता है कि ये ही दुनिया के परम सफल और प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं लेकिन एक समय ऎसा आता है जब अनीति से कमाया सब कुछ एक झटके में ऎसा निकल जाता है जिसकी की कल्पना तक ये या हम नहीं कर सकते।

इसलिए चकाचौंध से प्रभावित न हों, इसके पीछे छिपे राज और इनके परिणामों पर चिंतन करें, नालायकों और बेईमानों से अपनी तुलना न करें, न उनका अनुसरण करें। अनुकरण करें सज्जनों और श्रेष्ठ लोगों का, मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं, अपने-अपने फर्ज और धर्म का ही। यही आत्म आनंद और जगत आनंद पाने का सर्वश्रेष्ठ, सरल और सहज उपाय है।

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